अतीक़ अहमद के बेटे असद का एनकाउंटर: मानवाधिकार आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा- प्रेस रिव्यू

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उमेश पाल हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त और बाहुबली नेता अतीक़ अहमद के बेटे असद अहमद और उनके साथी ग़ुलाम मोहम्मद को झांसी के पास गुरुवार को पुलिस ने एक एनकाउंटर में मार दिया है.
क़ानून का पालन करने वाली एजेंसियां एनकाउंटर का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में न कर सकें, इसलिए इस तरह की एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग्स को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) और सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत दिशानिर्देश दिए हैं.
इंडियन एक्सप्रेस ने इस दिशानिर्देश से जुड़ी कुछ बातें अपनी रिपोर्ट में छापी हैं.
अख़बार लिखता है कि 2014 में पीयूसीएल (पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़) बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढा और रोहिंगटन फ़ली नरीमन की बेंच ने पुलिस एनकाउंटर से जुड़ा 16 सूत्री दिशार्निदेश दिया था.
कोर्ट का कहना था कि ऐसे मामले जिनमें पुलिस कार्रवाई में व्यक्ति की मौत हुई हो या फिर उसे गंभीर चोट आई हो, उनमें एफ़आई दर्ज करना बाध्यकारी है, साथ ही मामले की मजिस्ट्रेट से जांच कराना, लिखित दस्तावेज़ रखना और सीआईडी जैसी एजेंसियों से स्वतंत्र जांच की बात भी शामिल है.
कोर्ट ने कहा था, "पुलिस कार्रवाई के दौरान हुई इस तरह की सभी मौतों की मजिस्ट्रेट जांच ज़रूरी है. जांच में मृतक के परिवार को शामिल किया जाना चाहिए. पुलिस को आईपीसी की उपयुक्त धारा के तहत एफ़आईआर दर्ज करनी चाहिए और इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि ताक़त का इस्तेमाल करना जायज़ था या नहीं. इसकी रिपोर्ट ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास भेजी जानी चाहिए."
दिशानिर्देशों में कहा गया है कि "पुलिस को मामले से जुड़ी जो ख़ुफ़िया जानकारी मिलती है उसे या तो केस डायरी में या फिर किसी और तरीके से लिखा जाना ज़रूरी है. अगर जानकारी के आधार पर की गई कार्रवाई में किसी व्यक्ति की मौत हुई तो एफ़आईआर दर्ज कर तुरंत कोर्ट में पेश किया जाना चाहिए."
कोर्ट का कहना था कि इस मामले में अगर जांच की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर शक़ न हों तो एनएचआरसी को इसकी रिपोर्ट देना ज़रूरी नहीं है, हालांकि एनएचआरसी और राज्य मानवाधिकार कमीशन को इसकी जानकारी ज़रूर दी जानी चाहिए.
एनएचआरसी ने क्या कहा?
1997 में पूर्व चीफ़ जस्टिस एमएन वेंकटचेलैया ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक ख़त लिखकर कहा था कि एनएचआरसी को फ़र्ज़ी मुठभेड़ों के मामलों में बढ़ोतरी की शिकायतें मिल रही हैं,
खत में उन्होंने कहा, "अगर कोई पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति की जान लेता है तो ये हत्या का मामला है, हालांकि क़ानूनी तौर पर ये साबित होना चाहिए कि ये हत्या गुनाह था या नहीं."
इसके बाद एनएचआरसी ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से कहा कि वो पुलिस एनकाउंटर में होने वाली मौतों के मामलों में दिशानिर्देशों का पालन करें और मामले से जुड़ी सभी जानकारी एक रजिस्टर में लिखें. इस तरह के मामलों में जांच स्वतंत्र एजेंसियों से कराई जानी चाहिए.
दिशानिर्देश में ये भी कहा गया है कि अगर पुलिसकर्मी मामले में दोषी पाए गए तो उनके ख़िलाफ़ मामला चलाया जाना चाहिए और मृतक के परिवार के लिए मुआवज़े की व्यवस्था होनी चाहिए.
24 फ़रवरी को प्रयागराज में हुए उमेश पाल हत्याकांड के सिलसिसे में पुलिस को असद की तलाश थी. असद और ग़ुलाम पर पुलिस ने पांच लाख रुपए का इनाम रखा था. उमेश पाल की हत्या उस वक्त कर दी गई थी जब वो कचहरी से लौट रहे थे. वो 2005 में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या के मुख्य गवाह थे.
अख़बार ने एक और ख़बर में कहा है कि मार्च 2017 में सत्ता में आई योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल के दौरान हुआ ये एनकाउंटर प्रदेश का 183वां मामला है, वहीं उमेश पाल हत्या मामले में ये तीसरा एनकाउंटर हैं.
अख़बार ने यूपी पुलिस के स्पेशल डीजी लॉ एंड आर्डर प्रशांत कुमार के हवाले से इसकी पुष्टि की है. प्रशांत कुमार ने कहा, "पुलिस मुख्यमंत्री की ज़ीरो टॉलरेंस नीति के तहत काम कर रही है और हम अपराध और अपराधियों को ख़त्म करने के लिए प्रतिबद्ध है."
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विपक्षी पार्टियों के 'गठबंधन' पर क्या बोले अखिलेश
समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव गुरुवार को विपक्षी पार्टियों के संभावित गठबंधन में शामिल होने से जुड़े एक सवाल से बचते दिखाई दिए.
अख़बार एशियन एज के अनुसार, एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए इंदौर पहुंचे अखिलेश से एक संवाददाता ने पूछा कि क्या उनकी पार्टी विपक्ष के गठबंधन का हिस्सा रहेगी. इसके जवाब में अखिलेश ने कहा, "ये एक बड़ा सवाल है. जनता को बदलाव चाहिए और मैं जानता हूं कि उत्तर प्रदेश की जनता इस बार बीजेपी को सत्ता से हटा देगी."
आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र इसी सप्ताह जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाक़ात की थी.

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निर्यात 6 फ़ीसदी बढ़ा, आयात 16.5 फ़ीसदी लेकिन...
साल 2022-23 में देश से 447.46 अरब डॉलर का निर्यात हुआ, जबकि इस दौरान इससे कहीं अधिक कुल 714 अरब डॉलर का कुल आयात हुआ है.
द हिंदू में छपी एक ख़बर के अनुसार, एक साल पहले के मुक़ाबले इस साल जहां निर्यात में केवल छह फ़ीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, वहीं आयात में 16.5 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
हालांकि अख़बार लिखता है कि इस साल मार्च में लगातार दूसरे महीने भारत का निर्यात और आयात दोनों ही कम हुआ है. मार्च में निर्यात में 13.9 फ़ीसदी यानी 38.38 अरब डॉलर की कमी आई है जबकि आयात में 7.9 फ़ीसदी यानी 58.11 अरब डॉलर का घाटा हुआ है.
वाणिज्य सचिव सुनील बर्थवाल के हवाले से अख़बार लिखता है कि "वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद साल 2022-23 में निर्यात के मामले में भारत ने अपने निर्धारित लक्ष्य 750 अरब डॉलर से आगे बढ़कर 770.18 अरब डॉलर का निर्यात किया है, ये पिछले साल की तुलना में 94 अरब डॉलर अधिक है."
अख़बार लिखता है कि जिन पांच चीज़ों का निर्यात बढ़ा है वो पेट्रोलियम उत्पाद (27 फ़ीसदी), इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद (7.9 फ़ीसदी), चावल (1.5 फ़ीसदी), केमिकल (एक फ़ीसदी) और दवाएं (0.8 फ़ीसदी).

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अकेली महिला भी गोद ले सकती है बच्चा
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि एक अकेली महिला को केवल इस आधार पर बच्चा गोद लेने से इनकार नहीं जा सकता कि वो कामकाजी है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक ख़बर के अनुसार, अपनी बहन का बच्चा गोद लेने से जुड़ी एक महिला की याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने ये बात कही.
अख़बार के अनुसार, हाई कोर्ट ने भुसावल ज़िला अदालत के आदेश को ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि महिला को बच्चा गोद लेने से रोकना "मध्ययुगीय मानसिकता" को दर्शाता है.
हाई कोर्ट ने कहा, "क़ानून मानता है कि एक अकेली या तलाक़शुदा महिला बच्चा गोद लेने योग्य है. बच्चे की मां के हाउसवाइफ़ होने और गोद लेने वाली महिला के कामकाज़ी होने की तुलना करना परिवार को लेकर संकीर्ण मध्ययुगीय मानसिकता को दर्शाता है."
अख़बार के अनुसार, जज ने कहा कि क़ानून अकेले पेरेंट को बच्चा गोद लेना का पूरा हक़ देता है, और अकेले पेरेंट के मामले में ऐसे बेहद कम मामले होंगे जहां व्यक्ति कामकाज़ी न हो.
इससे पहले भुसावल ज़िला अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि "जो महिला बच्चा गोद लेना चाहती है वो अकेली है, तलाकशुदा है और कामकाज़ी महिला है. वो बच्चे का पूरी तरह से ख़्याल नहीं रख पाएगी. जबकि बच्चे के असल अभिभावक उसके बेहतर ख़्याल रख पाएंगे."
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