शरद पवार का रुख़ अदानी पर कांग्रेस से अलग क्यों है? -प्रेस रिव्यू

अदानी

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एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने हाल में एक इंटरव्यू में कहा था कि अदानी मामले की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच का कोई तुक नहीं बनता है.

उनका कहना था कि जांच से पूरा सच सामने नहीं आएगा क्योंकि कमिटी में बीजेपी सदस्यों का वर्चस्व होगा.

पवार के इस बयान पर कांग्रेस ने तुरंत प्रतिक्रिया दी. 'द टेलीग्राफ' ने पवार के इस इंटरव्यू के बाद कांग्रेस की प्रतिक्रिया को अपनी प्रमुख ख़बर बनाई है.

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ कांग्रेस ने जेपीसी पर पवार की टिप्पणी पर कहा है कि पार्टी उनके इस रुख़ से सहमत नहीं है. कांग्रेस की नज़र में जेपीसी ही एक ऐसा ज़रिया है, जिससे इस अदानी मामले से जुड़े तमाम मुद्दों की पड़ताल हो सकती है.

अख़बार लिखता है कि जेपीसी के पास असीमित ताक़त है. जेपीसी की सिफ़ारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है लेकिन इससे विपक्ष को सरकार को घेरने और एक अहम मुद्दे पर पॉलिटिकल नैरेटिव को दिशा देने में कामयाबी मिल सकेगी.

अख़बार लिखता है कि जेपीसी की सिफ़ारिशों के आधार पर सरकार की एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) संसद में रखी जाए या नहीं लेकिन विपक्ष को इस मामले से जुड़ी सभी फाइलों को देखने और इससे जुड़े हर पहलू पर सरकार से सवाल करने का मौक़ा मिल जाएगा.

अख़बार ने टेलिकॉम घोटाले के प्रमुख अभियुक्त पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा के हर बयान का राजनीतिक विवाद खड़ा करने में इस्तेमाल किया था.

उस समय बनी जेपीसी के एक सदस्य यशवंत सिन्हा ने तो तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को कमिटी के सामने हाजिर होने के लिए चिट्ठी लिख कर बड़ा धमाका किया था.

हालांकि उस समय जेपीसी के चेयरमैन पीसी चाको इस मुद्दे पर सिन्हा से बुरी तरह भिड़ गए थे और कहा था कि सिन्हा को इस तरह समन जारी करने का कोई हक़ नहीं है. लेकिन इससे ये संदेश गया कि मनमोहन कमिटी के सामने इसलिए हाजिर नहीं हो रहे हैं क्योंकि वो कुछ छिपा रहे हैं.

शरद पवार

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मनमोहन सिंह ने उस वक़्त सार्वजनिक तौर ये कहा था कि अगर उन्हें हाजिर होने का ये आदेश सही माध्यम के ज़रिये मिलता तो उन्हें कोई एतराज नहीं था. लेकिन बीजेपी इस माहौल का फ़ायदा उठाया था और मनमोहन को शक के दायरे में लाने में कामयाब रही थी.

हालांकि कोर्ट ने बाद में ए. राजा को ये कहते हुए बरी कर दिया था कि 2 जी स्पेक्ट्रम नीलामी का मामला घोटाला था भी या नहीं. लेकिन इस मुद्दे को बीजेपी ने ख़ूब भुनाया और कांग्रेस और यूपीए पर बढ़त बनाई.

इसी तरह कोल ब्लॉक घोटाले का विवाद भी ख़त्म हो गया लेकिन विपक्ष को यूपीए को घेरने का मौक़ा मिल गया.

अब कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल इसी रणनीति का इस्तेमाल कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घेरने के लिए जेपीसी जांच की मांग कर रहे हैं.

कांग्रेस के संचार प्रमुख जयराम रमेश ने जेपीसी के गठन की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जो कमिटी गठित की है वह अदानी मामले को देखने के लिए है. लेकिन हमने पीएम मोदी और सरकार पर सवाल उठाए हैं.

उन्होंने कहा, ''सुप्रीम कोर्ट की कमिटी ये सवाल नहीं उठाएगी. सिर्फ जेपीसी इन सवालों पर विचार कर सकती है. कमिटी में बीजेपी का बहुमत होगा और चेयरपर्सन भी इसका सांसद होगा. लेकिन विपक्ष को सवाल उठाने और सरकार से जवाब हासिल करने का मौक़ा मिल जाएगा. हर चीज़ रिकार्ड में होगी.''

सरकार हेल्थ इन्फ्लुएंसर्स पर शिकंजा कसने की तैयारी में

सरकार ने टीवी, सोशल मीडिया और दूसरे प्लेटफॉर्मों पर हेल्थ सलाह देने वाले वेलनेस और हेल्थ इन्फ्लुएंसर्स पर शिकंजा कसने की तैयारी शुरू कर दी है.

'बिज़नेस स्टैंडर्ड' ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है सरकार लोगों की सेहत को प्रभावित करने वाले हेल्थकेयर और वेलनेस से जुड़े प्रोडक्ट और ब्रांड को प्रमोट करने वाले इन्फ्लुएंसर्स को नियम के दायरे में लाने की तैयारी कर रही है.

अख़बार ने कंज्यूमर अफेयर्स विभाग के सचिव रोहित कुमार सिंह के हवाले से लिखा है कि सरकार ऐसी गाइडलाइंस लाएगी जिससे इन इन्फ्लुएंसर्स के लिए अपनी योग्यता बताना जरूरी होगा. इससे ये पता चल पाएगा कि वे ऐसी सलाह देने की योग्यता रखते हैं या नहीं.

अख़बार ने लिखा है कि पिछले महीने उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने एक गाइडलाइंस जारी कर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और सेलिब्रिटीज से उन ब्रैंडों से उनके संबंधों को बारे में बताने लिए कहा था जिनका वे प्रचार करते हैं. इसके साथ ही उन्होंने ये बताने के लिए कहा था कि क्या इसके एवज में उन्हें पैसा या कोई दूसरा फायदा मिल रहा है.

रोहित कुमार सिंह ने इस मुद्दे पर अख़बार से कहा,'' अगर आप ये कह रहे हैं के ये फूड अच्छा है या ये दवा अच्छी है तो आपको ये भी बताना होगा आप ऐसी सलाह देने की योग्यता रखते हैं या नहीं . वरना ये लोगों को गुमराह कर सकती है.''

अख़बार के मुताबिक देश में न्यूट्रेस्यूटिकल्स यानी फोर्टिफाइड (विटामिन, मिनरल मिले हुए) का बाज़ार 2025 तक 18 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है. इनमें से डाइटरी सप्लीमेंट की हिस्सेदारी बढ़ कर 65 फीसदी पर पहुंच जाने की उम्मीद है. ये बाज़ार हर साल 17 फीसदी की दर से बढ़ रहा है.

विटामिन

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समलैंगिकों के लिए समान नागरिक अधिकारों की मांग

मनोचिकित्सकों ने समलैंगिक जोड़ों के लिए समान नागरिक अधिकारों की वकालत की है. इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी ने इस बात को कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि खुद को एलजीबीटीक्यूए समुदाय का बताने वाले लोगों के लिए शादी और गोद लेना व्यावहारिक नहीं है. वे ऐसा नहीं कर सकते.

'टाइम्स ऑफ इंडिया' की एक रिपोर्ट में कहा गया है इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी ने कहा है कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों को ऐसे अधिकारों से वंचित करना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकता है.

इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी का ये बयान ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट 18 अप्रैल से समलैंगिक शादी से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई करने वाला है.

इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी ने 2018 में समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर रखने की मांग की थी. सोसाइटी का कहना था कि समलैंगिक यौन अभिरुचि कोई बीमारी नहीं है. ये सामान्य यौन अभिरुचियों की तरह ही है.

समलैंगिक विवाह

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उत्तराखंड : माल्टा किसानों को नुकसान, बिचौलिये मालामाल

'अमर उजाला' ने उत्तराखंड के माल्टा किसानों को उनकी फसल के सही दाम न मिलने की ओर ध्यान दिलाया है.

अख़बार ने लिखा है कि सरकार जिस माल्टा के लिए आठ रुपये प्रति किलो से ज्यादा दाम देने के लिए तैयार नहीं है, वही बाजार में 60 से 80 रुपये तक बिक रहा है. ऐसे में बिचौलिये सरकारी समर्थन मूल्य से दो-चार रुपये ज्यादा देकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं और किसान खाली हाथ हैं.

रुद्रप्रयाग जिले में किसानों का हक खुलेआम मारा जा रहा है लेकिन उनकी आय दोगुनी करने का दंभ भर रही सरकारी मशीनरी खामोश है. जिले में प्रतिवर्ष सैकड़ों क्विंटल माल्टा का उत्पादन होता है.

सरकार ने वर्ष 2022-23 के लिए माल्टा की खरीद के लिए ए, बी और सी श्रेणी तय की थी. सरकार ने सिर्फ सी श्रेणी के माल्टा के लिए 8 रुपये प्रति किलो दाम तय किया था.

माल्टा

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इसमें सरकारी खरीद केंद्र तक माल्टा को पहुंचाने का खर्च भी शामिल था. ऐसे में इन केंद्रों तक न काश्तकार पहुंचे और न सरकार की ओर से कोई पहल हुई. इन हालातों का बिचौलियों ने जमकर फायदा उठाया. उन्होंने दूर-दराज के गांवों में पहुंचकर 8 से 10 रुपये प्रति किलो के हिसाब से माल्टा खरीदा और बाजार 40 से 50 रुपये प्रति किलो में बेचा.

अख़बार लिखता है कि अब गांवों में माल्टा पूरी तरह से खत्म हो चुका है और पेड़ों पर नए फूल आ गए हैं. ऐसे में इन दिनों बाजारों में चुनिंदा दुकानदार माल्टा को 60 से 80 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच रहे हैं.

दुकानदारों का कहना है कि उन्होंने यह माल्टा बिचौलियों से 40 से 50 रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीदा है. दुकान तक ढुलान का खर्च अलग है. बीते एक माह में चार दुकानों से आठ क्विंटल माल्टा की बिक्री हो चुकी है.

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