जनरल बिपिन रावत जिनकी निगरानी में बरबाद किए गए थे म्यांमार के चरमपंथी शिविर -विवेचना

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जब एनडीए की ट्रेनिंग के दौरान कैडेट बिपिन रावत स्वीमिंग पूल में छलांग नहीं लगा पाए तो सज़ा के तौर पर उनसे छह महीने की सीनियॉरिटी छीन ली गई.

उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि इस लड़के को न सिर्फ़ आईएमए में स्वॉर्ड ऑफ़ ऑनर मिलेगा बल्कि वो आगे चल कर भारत का सेनाध्यक्ष और फिर चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ बनेगा.

इसकी पहली झलक तब मिली थी जब आईएमए की ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने चोट लगने के बावजूद उन्होंने अपने से कहीं तगड़े मुक्केबाज़ को बॉक्सिंग के एक मुकाबले में हराया था.

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इमेज कैप्शन, सेकेंड लेफ्टिनेंट बिपिन रावत

हाल ही में रचना बिष्ट रावत ने 'बिपिन-द मैन बिहाइंड द यूनिफ़ॉर्म' नाम से जनरल बिपिन रावत की जीवनी लिखी है. वो बताती हैं, "उस मुक़ाबले में बिपिन इतने पिट चुके थे कि मैच देख रहे उनके साथी उनसे कह रहे थे कि वो बाउट छोड़ कर बाहर आ जाएं."

वो कहती हैं, "उनके हर एक मुक्के के बदले उन्हें दो मुक्के खाने पड़ रहे थे. लेकिन नाक से बहते ख़ून के बावजूद वो अपने प्रतिद्वंदी पर हमला करने का मौक़ा ढूंढने की फ़िराक़ में थे. तभी उनका एक घूंसा सीधे उस लड़के के मुंह पर लगा और वो लड़का ज़मीन पर गिर गया. मुक़ाबला देख रहे कैडटों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ कि बुरी तरह से मार खा रहे बिपिन ने अपने प्रतिद्वंदी को नॉक आउट कर दिया था."

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पहली पोस्टिंग पर ज़बरदस्त रैगिंग

जब सेकेंड लेफ़्टिनेंट बिपिन रावत अपनी पहली पोस्टिंग पर अमृतसर के पास खासा गए तो उनकी यूनिट के साथियों ने उनकी रैगिंग करने का प्लान बनाया. उनको सेकेंड लेफ़्टिनेंट उमेश सिंह थापा ने अमृतसर रेलवे स्टेशन पर रिसीव किया.

उन्होंने उनको ये आभास कराया कि वो अफ़सर नहीं बल्कि उनके सहायक हैं. बातों ही बातों में उन्होंने ये कहकर उनसे उनका पहचान पत्र ले लिया कि उसे एडजुटेंट साहब ने मंगवाया है.

उस समय सेकेंड लेफ़्टिनेंट और बाद में लेफ़्टिनेंट जनरल बने राकेश शर्मा याद करते हैं, "मैंने उनका स्वागत करते हुए कहा, मुझे अपना पहचान पत्र दिखाइए. बिपिन ने परेशान होकर कहा कि पहचान पत्र तो वो पहले स्टेशन पर सहायक को दे चुके हैं. मैंने कहा मेरे पास तो वो अब तक नहीं पहुंचा है. मैंने उन सभी लोगों को बुलाया जो बिपिन को रिसीव करने स्टेशन गए थे."

"मैंने बिपिन से पूछा इनमें से किसको आपने अपना पहचान पत्र दिया है? बिपिन उनमें से किसी को नहीं पहचान पाए, क्योंकि सभी गोरखा सैनिक एक जैसे ही दिखाई दे रहे थे. बिपिन नर्वस हो गए थे, उनको सीओ के दफ़्तर ले जाया गया, जहां कैप्टेन मदन गोपाल गंभीर मुद्रा बनाए उनकी सीट पर बैठे हुए थे."

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इमेज कैप्शन, आईएमए ट्रेनिंग के दौरान कैडेट बिपिन रावत

बिपिन को बिना बताए दौड़ की दूरी बढ़ाई गई

राकेश शर्मा बताते हैं, "कैप्टेन गोपाल ने कहा आपने अपना पहचान पत्र गुम कर के बहुत बड़ी लापरवाही की है. अब आपको दो मील की दौड़ का 'बैटिल फ़िज़ीकल एफ़िशिएंसी टेस्ट' पास करना होगा ताकि हम देख सकें कि आप कितने फ़िट हैं. आपको ये दूरी 2 मिनट 45 सेकेंड में पूरी करनी होगी. लंबी ट्रेन यात्रा में थके होने के बावजूद बिपिन ये टेस्ट देने को तैयार हो गए. लेकिन बिपिन वो दूरी निर्धारित समय में पूरी नहीं कर पाए. दरअसल हम लोगों ने बिना उनको बताए वो दूरी 400 मीटर बढ़ा दी थी."

"उनको फिर सीओ के सामने मार्च कर ले जाया गया. सीओ ने उनसे कहा, मुझे ये देख कर बहुत निराशा हुई है कि 'स्वॉर्ड ऑफ़ ऑनर' जीतने वाला कैडेट इस मामूली दौड़ को समय में पूरा नहीं कर पाया. ये मत समझिएगा कि आपके पिता जनरल हैं तो यहां आपकी राह आसान होने वाली है. आपको यहां बहुत मेहनत करनी होगी."

"उस दिन शाम को पार्टी में एक-एक कर उन सभी लोगों ने उनको अपना परिचय देते हुए उनसे हाथ मिलाया जो इस जोक में शामिल थे. मैंने उनसे कहा वेलकम टू 5/11 गोरखा राइफ़ल्स. ये कहते ही मेरी हंसी निकल गई, जिसे मैं सुबह से रोकने की कोशिश कर रहा था. यहां से हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई जो उनके जीवित रहने तक चली."

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इमेज कैप्शन, आईएनए में सर्वश्रेष्ठ कैडेट का पुरस्कार लेते हुए बिपिन रावत

प्लास्टर लगे पैर के साथ सैनिकों के साथ डांस

अक्तूबर, 1987 में एक और दिलचस्प घटना घटी. वॉक करते समय मेजर बिपिन रावत का पैर मुड़ गया.

डाक्टरों ने उनके पैर में प्लास्टर लगाया और उन्हें छह महीने आराम करने की सलाह दी.

इस बीच दशहरा आ गया. बिपिन रावत लंगड़ाते हुए अपने कमांडिंग अफ़सर लेफ़्टिनेंट कर्नल दुर्गा प्रसाद के पास जा कर बोले कि मुझे सीमा पर अपने सैनिकों के साथ दशहरा मनाना है. दुर्गा प्रसाद ने उन्हें अनुमति देने से साफ़ इंकार कर दिया.

रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "मेजर रावत ने इसरार किया 'अरे सर परमीशन दे दो.' वो तब तक उन्हें मनाते रहे जब तक दुर्गा प्रसाद इसके लिए तैयार नहीं हो गए. शाम पांच बजे के आसपास उन्होंने एक टन के एक ट्रक पर कुछ नेपाली गायकों को बैठाया. ट्रक की लाइट बुझाई और चकोठी की तरफ़ रवाना हो गए जो पाकिस्तानी चौकी के ठीक सामने थी. पाकिस्तानी सैनिक उस पर कड़ी नज़र रखे हुए थे."

"वो 45 मिनट में सड़क के अंत तक पहुंच गए. वहां से उन्हें भारतीय चौकी तक पहुंचने के लिए 6 किलोमीटर ऊंची चढ़ाई चढ़नी थी. ये वो इलाक़ा था जहां से झेलम नदी भारतीय इलाक़े में प्रवेश करती हैं और दोनों तरफ़ के सैनिक एकदूसरे पर बंदूक तानकर सावधान की मुद्रा में रहते हैं."

"भारतीय ठिकाने तक ख़बर पहुंच गई थी कि उनके कंपनी कमांडर वहां पहुंचने वाले हैं. वो लोग सड़क तक मेजर रावत को लेने आए थे. वो उन्हें देख कर इतने खुश हुए कि वो उन्हें अपने कंधों पर उठाकर चौकी तक ले गए. वहां पर मेजर रावत प्लास्टर लगे पैर में उनके साथ नाचे और देर रात एक बजे अपने ठिकाने पर वापस लौटे. इस बीच पाकिस्तानी सैनिकों की निगाहें बराबर उन पर लगी रहीं."

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इमेज कैप्शन, गोरखा सैनिकों के साथ बिपिन रावत

हेलीकॉप्टर दुर्घटना में बाल-बाल बचे

2015 आते-आते बिपिन रावत 3 कोर के जीओसी बन चुके थे. इस साल दो फ़रवरी को वो अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल से मिलने जाने के लिए अपने एक इंजन वाले चीता हेलिकॉप्टर पर सवार हुए. जैसे ही हेलीकॉप्टर हवा में उठा उन्हें महसूस हुआ कि उनके हेलीकॉप्टर से आवाज़ आनी बंद हो गई है और उनका हेलिकॉप्टर तेज़ी से नीचे की तरफ़ जा रहा है.

रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "सैकेंडों के भीतर ही उनका हेलीकॉप्टर उसी स्थान पर गिर गया जहां से वो उड़ा था. जनरल रावत ने अपने दोनों हाथों से अपने सिर को कवर कर लिया था. हेलीकॉप्टर ज़मीन से टकराकर उछला और दोबारा ज़मीन पर गिरा. फिर उस तरफ़ लुढ़क गया जिधर वो बैठे हुए थे. जनरल रावत बुरी तरह टूटे-फूटे हैलिकॉप्टर से बाहर निकले. उनकी कमीज़ ख़ून से भीगी हुई थी."

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इमेज कैप्शन, अरुणाचल प्रदेश के गवर्नर के साथ बिपिन रावत

जनरल बिपिन रावत ने पायलट बीके सिंह को दिलासा दिया, "परेशान न हों, इस तरह की चीज़ें होती रही है. आपने हमें बचाने की पूरी कोशिश की."

घटनास्थल से लौट कर वो अपने घर आए और सीधे अपने पिता के कमरे में गए. उन्होंने झुक कर अपने पिता के पैर छुए और फिर जूते उतार कर घर के मंदिर में जाकर भगवान के सामने हाथ जोड़े. एक नर्स ने आकर उनकी मरहमपट्टी की.

पट्टी बंधते ही उन्होंने अपने भाई ब्रिगेडियर शिवेंद्र सिंह से कहा, "मैंने दूसरा हेलीकॉप्टर मंगवा लिया है. उनके भाई उन्हें समझाते रहे कि आज मत जाओ लेकिन जनरल रावत ने कहा 'जाना ज़रूरी है. लोग मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे.' इस तरह मौत के मुंह से निकलने के एक घंटे के अंदर जनरल रावत ने दूसरे हेलीकॉप्टर से उसी स्थान के लिए उड़ान भरी."

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इमेज कैप्शन, आईएमए की पासिंग आउट परेड के दौरान अपने पिता जनरल लक्ष्मण सिंह रावत के साथ

म्यांमार की सीमा पार कर नष्ट किए चरमपंथी शिविर

जनरल बिपिन रावत को सबसे अधिक ख्याति तब मिली जब भारतीय सैनिकों ने म्यांमार की सीमा के अंदर घुसकर चरमपंथियों के ठिकानों को नष्ट किया. इसकी शुरुआत तब हुई जब 4 जून, 2015 को इम्फ़ाल से 80 किलोमीटर दूर 6 डोगरा के एक सैनिक काफ़िले पर आईईडी से हमला किया गया. इस हमले में एक ट्रक पूरी तरह से बर्बाद हो गया. उसमें सवार सैनिक जब नीचे उतर कर भागने लगे तो उन पर चरमपंथियों ने गोली चलाई. इस हमले में 20 सैनिक मारे गए 11 अन्य गंभीर रूप से घायल हुए.

इस हमले के पांच दिनों के भीतर यानी नौ जून को भारतीय सैनिकों ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पारकर एनएससीएन-के और एनएससीएन-आईएम के दो शिविरों के नष्ट कर दिया.

रचना बिष्ट बताती हैं, "इस हमले के लिए जनरल रावत ने 21 पैरा के 70 कमांडोज़ को चुना. हमले का फ़ैसला उच्चतम स्तर पर लिया गया. जनरल बिपिन ने पूरे हमले की योजना बनाई. दिल्ली आकर उन्होंने इसके लिए सरकार की अनुमति ली और फिर इसे अमली जामा पहनाया. इन कमांडो को सीमा तक पहुंचाने के लिए ध्रुव हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल किया गया."

"इन कमांडोज़ को रॉकेट लाँचर्स, असॉल्ट राइफ़ल और हैंड ग्रेनेड्स से लैस किया गया. रात में हमले के लिए उन्हें नाइटविज़न ग्लासेस दिए गए थे. जंगलों के रास्ते वो पांच किलोमीटर पैदल चलकर चरमपंथियों के प्रशिक्षण शिविर तक पहुंचे. चालीस मिनट के अंदर उन्होंने दोनों शिविरों को पूरी तरह से बर्बाद कर 38 विद्रोहियों को मारने में सफलता प्राप्त की. इधर भारतीय सीमा के अंदर एमआई-17 हैलिकॉप्टरों को तैयार रखा गया ताकि ज़रूरत पड़ने पर कमांडोज़ को वहां से सुरक्षित निकाला जा सके. इस हमले में एक भी भारतीय कमांडो हताहत नहीं हुआ."

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भारतीय सरकार ने साधी चुप्पी

ये मिशन उस समय विवादास्पद बन गया जब तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने ऐलान किया कि भारतीय सैनिकों ने म्यांमार की सीमा के अंदर घुसकर चरमपंथी ठिकानों को नष्ट किया है. म्यांमार की सरकार ने अभियान उनकी भूमि पर होने के दावे का खंडन किया.

म्यांमार के राष्ट्रपति के दफ़्तर में निदेशक ज़ॉ हते ने बयान दिया, "हम म्यांमार की ज़मीन पर किसी भी विदेशी सैन्य अभियान की अनुमति नहीं देंगे. हर देश को दूसरे देश की प्रभुसत्ता का सम्मान करना चाहिए".

इससे पहले कि मामला कूटनीतिक तूल पकड़ता भारत सरकार ने इस बारे में दावे करना बंद कर दिया. हालांकि दो साल बाद दिसंबर, 2017 में पुणे में एक क़िताब के विमोचन के मौक़े पर जनरल रावत ने उस अभियान के बारे में खुलकर बात की.

रचना बिष्ट लिखती हैं, "उन्होंने यहां तक बताया कि उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के कहने पर अंतिम समय पर योजना में थोड़ा परिवर्तन करना पड़ा था. कूटनीतिक हलकों में उनके इस वक्तव्य पर ख़ासा बवाल भी मचा कि ज़रूरत पड़ने पर इस तरह के और अभियान चलाए जा सकते हैं. जनरल रावत के साथी रहे जनरल राकेश शर्मा मानते हैं कि कूटनीति के पर्दे के पीछे छिपना जनरल रावत का स्टाइल कभी नहीं था. उन्हें हमेशा दो टूक बात करने के लिए जाना जाता रहा है."

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इमेज कैप्शन, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ जनरल बिपिन रावत

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक

18 सितंबर, 2016 को उड़ी में 12 ब्रिगेड के मुख्यालय पर चरमपंथी हमला हुआ. इस हमले में 18 भारतीय सैनिक मारे गए. बिपिन रावत को तब तक उप सेनाध्यक्ष बने मात्र 17 दिन हुए थे. उन्होंने फ़ैसला किया कि भारत इस हमले पर चुप नहीं बैठेगा.

उड़ी हमले के 10 दिनों के भीतर भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में एक सर्जिकल आपरेशन किया. इस हमले में 2 पैरा के कमांडोज़ के दो दलों ने सीमा पार कर दो चरमपंथी ठिकानों पर हमला कर उन्हें भारी नुक़सान पहुंचाया.

इस हमले में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह सुहाग, उत्तरी क्षेत्र के सेना कमांडर जनरल डी एस हूडा के साथ-साथ जनरल विपिन रावत ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 17 दिसंबर, 2016 को जनरल बिपिन रावत को भारत का 27वां सेनाध्यक्ष बनाया गया.

इस पर ख़ासा विवाद हुआ क्योंकि सरकार ने बिपिन से सीनियर दो जनरलों प्रवीन बख्शी और पी एम हारिज़ की अनदेखी कर उन्हें इस पद के लिए चुना था. गोरखा ब्रिगेड से सेनाध्यक्ष बनने वाले वो तीसरे व्यक्ति थे. पहले थे फ़ील्डमार्शल मानेक शॉ और दूसरे थे जनरल दलबीर सिंह सुहाग.

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मेजर गोगोई के बचाव पर विवाद

अपने सेनाध्यक्ष के कार्यकाल के दौरान जनरल बिपिन रावत एक बार फिर विवादों के घेरे में आए.

14 अप्रैल, 2017 को सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुए जिसमें कश्मीर में सेना की जीप पर एक आदमी बंधा हुआ था और ऐलान किया जा रहा था पत्थरबाज़ों का यही हाल होगा. 23 मई को 53 राष्ट्रीय रायफ़ल के मेजर लीतुल गोगोई ने मीडिया के सामने स्वीकार किया कि उनके द्वारा उठाए गए इस क़दम के लिए वो पूरी तरह से हैं.

मामला कुछ ये था कि नौ अप्रैल को गुंडूपोरा में चुनाव ड्यूटी कर रहे भारतीय सीमा तिब्बत पुलिस के अधिकारियों ने मेजर गोगोई को संदेश भेजा कि सैकड़ों लोगों ने मतदानकेंद्र को घेर लिया है और वो ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंक रहे हैं.

गोगोई ने बताया कि वो अपनी क्विक रिएक्शन टीम के साथ तुरंत वहां पहुंच गए लेकिन वो अपने वाहन से उतर तक नहीं पाए क्योंकि उनके ऊपर ज़बरदस्त पत्थरबाज़ी हो रही थी.

रचना बिष्ट बताती हैं, "गोगोई ने नज़दीक ही एक व्यक्ति को देखा जो पत्थर फेंकने वालों को उकसा रहा था. उन्होंने अपने आदमियों से उसे पकड़ने के लिए कहा. जब लोगों ने पत्थर फेंकना जारी रखा तो गोगोई ने उसे वाहन के बोनट पर बैठा कर बांध दिया. उसकी वजह से पत्थर फेंकना बंद हो गया. मेजर गोगोई के इस क़दम की मानवाधिकार संगठनों ने जमकर आलोचना की."

"जनरल पनाग का मानना था कि गोगोई ने भारतीय सेना की आचार संहिता और नियमों का उल्लंघन किया है. लेकिन जनरल रावत ने काउंटर इंटरजेंसी आपरेशन के लिए अच्छा काम करने के लिए उन्हें सेनाध्यक्ष का प्रशस्ति पत्र दिया. उनके इस कदम की बहुत आलोचना हुई लेकिन उन्होंने उसे इस आधार पर सही ठहराया कि इससे चरमपंथियों के इलाके में काम कर रहे युवा अफ़सरों का मनोबल बढ़ेगा."

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दूसरे मामले में उन्हीं गोगोई को सज़ा

लेकिन इस घटना के एक साल बाद जब उन्हीं मेजर गोगोई को श्रीनगर के ग्रैंड ममता होटल में एक 18 वर्षीय युवा कश्मीरी लड़की के साथ पकड़ा गया तो जनरल रावत ने उनका साथ नहीं दिया.

सेना ने एक जांच में मेजर गोगोई को सैनिक अनुशासन तोड़ने का दोषी पाया. जब जनरल रावत के सामने ये मामला लाया गया तो उन्होंने कहा, अगर मेजर गोगोई ने कुछ भी ग़लत किया है तो 'आपको यक़ीन के साथ कह सकता हूं कि जल्दी से जल्दी उनको सज़ा दी जाएगी और ऐसी सज़ा दी जाएगी कि वो एक उदाहरण बनेगा.'

मेजर गोगोई को सज़ा मिली और उनकी वरिष्ठता को छह महीने कम कर उन्हें जम्मू कश्मीर से बाहर तैनात कर दिया गया.

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इमेज कैप्शन, मेजर लितुल गोगोई

पहले चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ बने

तीन साल सेनाध्यक्ष के पद पर रहने के बाद 31 दिसंबर, 2019 को जनरल बिपिन रावत को भारत का पहला चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ नियुक्त किया गया. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए.

उन्होंने थियेटर कमान के एकीकरण की पहल की जिस पर उन्हें वर्तमान और रिटायर अफ़सरों की आलोचना का शिकार भी होना पड़ा.

थियेटर कमांड का उद्देश्य भविष्य में आने वाली रक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए तीनों सेनाओं को एक प्लेटफॉर्म पर लाना था. लड़ाई के दौरान अक्सर देखा गया है कि अलग-अलग थियेटर कमांड होने की वजह से सेना के एक्शन में दोहराव या ओवरलैपिंग होती है जिससे संसाधनों के साथ साथ मैनपावर का भी अधिक इस्तेमाल होता है. जनरल रावत इस विसंगति को दूर करना चाहते थे.

सैनिक मामलों से अलग विषयों पर अपने विचार रखने के लिए जनरल रावत की आलोचना हुई. उन्होंने कश्मीर से धारा 370 हटाने और नागरिकता संशोधन कानून पर अपने विचार रखे जिसे कुछ हलकों में पसंद नहीं किया गया. उन्होंने वायुसेना को सशस्त्र बलों की सहायक शाखा का संज्ञा दी. इस पर वायुसेना प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल आर के भदोरिया ने कहा कि वायुसेना कोई सहायक शाखा नहीं है. किसी भी युद्ध में उसकी बेहद अहम भूमिका होती है.

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गोरखाली और कुत्तों के प्रति प्रेम

जनरल बिपिन रावत अपने जीवन के अंतिन चरण में गढ़वाली बोलना सीख रहे थे हालांकि वो गढ़वाली अच्छी तरह समझ सकते थे. घर पर उन्हें कुर्ता पाजामा पहनने का शौक था जो उनकी पत्नी मधुलिका खादी भंडार से खरीदा करती थीं. रात के खाने के बाद जनरल रावत टैलिविजन पर कॉमेडी चैनल देखा करते थे.

उनकी बेटी तारिणी बताती हैं, "शुरू में वो घर में कुत्ते रखने के ख़िलाफ़ थे लेकिन फिर वो उनको पसंद करने लगे थे. नोएडा के घर में उनके कुत्ते अक्सर उनके बिस्तर पर चढ़ जाते थे और वहां से हटने का नाम नहीं लेते थे. बिपिन रावत अक्सर अपने कुत्तों के साथ ही बिस्तर पर सो जाते थे. कई बार तो वो टीवी इंटरव्यू के दौरान उनके पास पहुंच कर उनसे खेलने लगते थे. वो कभी-कभी सूफ़ी गाने सुनते थे तो कभीकभी गोरखाली लोकगीत. वो बहुत अच्छी गोरखाली बोल लेते थे. उनका हमेशा ज़ोर रहता था कि हम उनकी कार के बजाए हमेशा सार्वजनिक वाहन का इस्तेमाल करें."

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इमेज कैप्शन, पत्नी मधुलिका रावत के साथ जनरल बिपिन रावत

हेलीकॉप्टर दुर्घटना में हुई मौत

आठ दिसंबर 2021 को जनरल बिपिन रावत के हेलीकॉप्टर ने 11 बज कर 35 मिनट पर तमिलनाडु में सुलूर वायुसेना स्टेशन से वैलिंगटन के लिए उड़ान भरी. करीब 40 मिनट की उड़ान के दौरान उस ने कई चाय बागानों और घने जंगलों को पार किया.

ऊपर से ही जनरल बिपिन ने अपनी पत्नी मधुलिका को मेट्टूपलायम रेलवे स्टेशन दिखाया. यहां से ही ऊटी के लिए टॉय ट्रेन शुरू होती है. ये ट्रेन नीलगिरी पहाड़ों से 46 किलोमीटर का रास्ता तय करती हुई ऊटी पहुंचती है.

उनको अंदाज़ा था कि दस मिनटों के अंदर वो वैलिंगटन पहुंच जाएंगे. तभी उन दोनों ने नोटिस किया कि उनका हेलीकॉप्टर चारों ओर से घने स्लेटी बादलों से घिर गया है.

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इमेज कैप्शन, जनरल बिपिन रावत का दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर

दोनों पायलटों ने जल्दी-जल्दी आपस में बात की. उन्हें पूरा विश्वास था कि हैलिकॉप्टर वैलिंगटन के ऊपर है लेकिन उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था.

उनको ये आभास नहीं था कि वो अपने रास्ते से क़रीब 10 किलोमीटर भटक चुके हैं और अब ऊंचे पहाड़ों के ऊपर उड़ रहे हैं. अचानक एम आई-17 हैलिकॉप्टर के पहाड़ी से टकराने की आवाज़ सुनाई दी और उसे चारों ओर से आग की लपटों ने घेर लिया.

समय था 12 बजकर 20 मिनट. शाम को 6 बजे भारतीय वायुसेना ने ऐलान किया, "जनरल रावत. उनकी पत्नी और 10 अन्य लोगों की हैलिकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई है."

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