पटना म्यूज़ियम: क्यों लिखा राहुल सांकृत्यायन की बेटी ने नीतीश कुमार को पत्र?

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
देहरादून की रहने वालीं जया सांकृत्यायन परहाक इन दिनों परेशान हैं. उनकी परेशानी की वजह देहरादून से 1300 किलोमीटर दूर बिहार की राजधानी पटना में है. जया, महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बेटी हैं.
बीबीसी से बात करते हुए जया सांकृत्यायन कहती हैं, "मेरे पिताजी तिब्बत से जो अनमोल ग्रंथ लाए, वो पटना म्यूज़ियम में शोध करने वालों के लिए हैं. उसे एक बंडल बनाकर किसी दूसरी जगह (बिहार म्यूज़ियम) शिफ़्ट करने के लिए नहीं है. मैंने इसका विरोध जताते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखा है."
बिहार सरकार के कला संस्कृति एवं युवा विभाग की सचिव वंदना प्रेयसी इससे इनकार करती हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "राहुल जी की लाई हुई धरोहर को बिहार म्यूज़ियम में शिफ़्ट करने की हमारी कोई योजना नहीं है."
लेकिन वंदना प्रेयसी की बात से कला और इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले कई लोग संतुष्ट नहीं हैं. ख़ासतौर पर जब राज्य सरकार ने पटना म्यूज़ियम का संचालन बिहार म्यूज़ियम को सौंपने का गज़ट जारी कर दिया है.
पटना म्यूज़ियम: सरकारी से सोसाइटी एक्ट तक
साल 1917 में ब्रिटिश राज के दौरान स्थापित पटना म्यूज़ियम का 'पूर्ण' सरकारी स्टेटस अब नहीं रहा.
16 मार्च 2023 को राज्य सरकार ने एक गज़ट जारी किया है जिसमें लिखा है, "पटना संग्रहालय का भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों के अनुरूप प्रबंधन एवं संचालन बिहार संग्रहालय समिति, पटना से कराए जाने का निर्णय लिया जाता है."
बिहार म्यूज़ियम की अगर बात करें तो ये सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत रजिस्टर्ड है. इसका प्रबंधन और संचालन बिहार संग्रहालय समिति करती है, यानी ये पूरी तरह से सरकारी नहीं है.
बिहार सरकार से मिलने वाले अनुदान से इसका संचालन और प्रबंधन होता है. यानी अब पटना म्यूज़ियम का भी 'सरकारी' स्टेटस ख़त्म हो गया है.
कला संस्कृति विभाग से जुड़े एक अधिकारी बताते हैं, "हम लोगों ने शुरू से ही बिहार म्यूज़ियम को सोसाइटी एक्ट के तहत लाने के प्रस्ताव पर आपत्ति की थी. अब जो नया फ़ैसला हुआ है उसका मतलब है कि जब तक सरकार का अनुदान मिलता रहेगा, तब तक ही इन दो संस्थानों की स्थिति ठीक रहेगी."
कला संस्कृति विभाग की सचिव वंदना प्रेयसी कहती हैं, "पटना म्यूज़ियम की पहचान कभी ख़त्म नहीं होने वाली. हम बस उसका प्रबंधन ज़्यादा प्रोफ़ेशनल तरीक़े से करना चाहते हैं, इसलिए ये फ़ैसला लिया गया है."

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पटना म्यूज़ियम में अनमोल ग्रंथ
लेकिन सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद साल 2015 में बिहार म्यूज़ियम खुलने के बाद से ही बिहार के बौद्धिक जगत में हलचल रही है.
सिर्फ़ जया सांकृत्यायन की बात करें तो वो दो बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिख चुकी हैं. पहली बार 12 सितंबर 2017 में और दूसरी बार छह मार्च 2023 को.
दोनों ही बार जया सांकृत्यायन ने इस प्रस्ताव पर अपना विरोध जताया कि राहुल सांकृत्यायन की दान की गई सामग्री को पटना म्यूज़ियम से बिहार म्यूज़ियम शिफ्ट किया जाए.
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने 1929 से 1938 के बीच चार बार तिब्बत की कठिन यात्राएं की थी. वो तिब्बत से बौद्ध धर्म के प्रज्ञापारमिता, शतसाहस्रिका जैसे अनमोल ग्रंथ लाए थे.
इतना ही नहीं वे जैलोग्राफ़ यानी तिब्बत के मठ- मंदिर की दीवारों पर लिखे गए ग्रंथों को हाथ के बने काग़ज़ पर छापकर और थांका पेंटिंग का ख़ज़ाना ख़च्चरों पर लादकर लाए थे. ये सभी चीज़ें उन्होने पटना म्यूज़ियम को दान कर दी थी.

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जया सांकृत्यायन का नीतीश कुमार को पत्र
जया सांकृत्यायन अपने पिता के साथ 1958 में पटना म्यूज़ियम आ चुकी हैं.
वो कहती हैं, "मेरे पिता ने पूरा जीवन बिहार को दिया. पटना म्यूज़ियम से उनका लगाव रहा लेकिन सरकार किसी ऐसे म्यूज़ियम (बिहार म्यूज़ियम) को सब देना चाहती है."
"जो सरकारी म्यूज़ियम नहीं है. इस बार भी जो मैंने मुख्यमंत्री को मेल किया है उसका बस इतना जवाब आया है कि संबंधित विभाग को फ़ॉरवर्ड कर दिया गया है."
दरअसल पटना म्यूज़ियम को लेकर जो आशंकाएं है, उससे जूझती जया अकेली नहीं हैं. पटना म्यूज़ियम से बिहार म्यूज़ियम में कम से कम 25 हजार पुरावशेष शिफ़्ट किए जा चुके हैं. इसमें यक्षिणी की मूर्ति भी शामिल है.
पटना म्यूज़ियम को लेकर साल 2015 में ही समाजशास्त्री हेतुकर झा, पद्मश्री उषा किरण ख़ान से लेकर पटना यूनिवर्सिटी के कई प्रोफ़ेसरों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को खुला पत्र लिखा था.
उन्होंने पटना म्यूज़ियम में रखे पुरावशेषों को बिहार म्यूज़ियम में शिफ़्ट किए जाने का विरोध किया था. साल 2017 में ही पटना के नागरिकों ने पटना संग्रहालय बचाओ समिति भी बनाई थी.

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बिहार म्यूज़ियम: नॉट इन पब्लिक इंटेरेस्ट
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते रहे हैं, "बिहार म्यूज़ियम अंतरराष्ट्रीय स्तर का म्यूज़ियम है जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं."
लेकिन पटना हाईकोर्ट ने अशोक कुमार वर्सेज स्टेट ऑफ़ बिहार केस में सुनवाई करते हुए जून 2015 में अपनी टिप्पणी में बिहार म्यूज़ियम को "नॉट एट ऑल इन पब्लिक इंटेरेस्ट" कहा था.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, "पटना हाईकोर्ट और सचिवालय के बीच साढ़े 17 एकड़ में 500 करोड़ की लागत से बन रहा अंतरराष्ट्रीय म्यूजियम सार्वजनिक हित में नहीं है."
"इस म्यूज़ियम के निर्माण में दिए गए 'कांट्रैक्ट ऑफ़ कंसेल्टेंसी' पारदर्शी नहीं हैं. चूंकि ये प्रोजेक्ट अब पूरा होने वाला है, इसलिए हम इसे रोक नहीं रहे हैं."
पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर और इंडियन काउंसिल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिसर्च की कार्यकारी परिषद के सदस्य रहे ओपी जायसवाल कहते हैं, "बिहार का इतिहास, भारत का इतिहास है. बाहरी दुनिया में अभी भी बौद्धिक जगत के संदर्भ बिन्दु 1917 में बने पटना म्यूज़ियम में है."
"बिहार म्यूज़ियम को ये स्टेटस पाने में 25 साल से ज़्यादा का वक़्त लगेगा. सरकार बिहार म्यूज़ियम को विकसित करे, इसमें कोई एतराज़ नहीं. लेकिन पटना म्यूज़ियम सहित राज्य के दूसरे म्यूज़ियम के लिए बजट, स्टाफ़ आदि मद पर ख़र्च की व्यवस्था करें."

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डॉक्यूमेंटेशन पर सवाल
बिहार म्यूज़ियम को छोड़कर अन्य म्यूज़ियम की हालत हैरान करने वाली है.
सीएजी की 2014 की रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र है कि पटना, छपरा, दरभंगा म्यूज़ियम सहित राज्य के 11 म्यूज़ियम में पुरावशेषों का डॉक्यूमेंटेशन ही ठीक तरीक़े से नहीं किया गया है.
पटना म्यूज़ियम में सिर्फ़ 41 फ़ीसद तो दरभंगा के दोनों म्यूज़ियम में शून्य डॉक्यूमेंटेशन हुआ है.
रिपोर्ट कहती है कि इसके चलते म्यूज़ियम से बहुमूल्य पुरावशेषों में चोरी या गुम हो जाने की समस्या आ सकती है.

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26 म्यूज़ियम, चार संग्रहालय अध्यक्ष के सहारे
बिहार में छोटे-बड़े 26 म्यूज़ियम हैं जिसके लिए 20 पद संग्रहालय अध्यक्ष के हैं. इन 20 पदों में से 16 पद ख़ाली पड़े है. यानी बिहार के संग्रहालय, महज़ चार संग्रहालय अध्यक्षों की बदौलत चल रहे हैं. विनय कुमार, विमल तिवारी, शंकर सुमन और शिव कुमार मिश्र.
सिर्फ़ विनय कुमार की बात करें तो उनके ज़िम्मे आठ प्रभार हैं. वो पटना, बुद्धा स्मृति पार्क, कर्पूरी ठाकुर, बृज बिहारी, बेगूसराय, बक्सर, जगदीशपुर म्यूज़ियम के साथ-साथ क्षेत्रीय उपनिदेशक का पद भी संभाल रहे हैं.
इसी तरह विमल तिवारी पांच, शंकर सुमन पांच और शिव कुमार मिश्र आठ म्यूज़ियम के संग्रहालय अध्यक्ष हैं.
संग्रहालय अध्यक्ष का काम म्यूज़ियम का रख-रखाव, उस क्षेत्र की धरोहर का संकलन - संरक्षण करना और आम लोगों ख़ासतौर पर बच्चों में अपनी धरोहर के प्रति जागरूकता पैदा करना है. यानी एक म्यूज़ियम शैक्षणिक, सांस्कृतिक और शोध का केन्द्र होता है.
इसी तरह तकनीकी सहायक के सभी पद ख़ाली हैं और इसमें कुछ लोग संविदा पर काम कर रहे है. ताज्जुब की बात है कि क्लर्क जिसका दफ़्तर रोज़मर्रा के काम से ताल्लुक़ रखता है, उसमें भी एक क्लर्क पर चार ज़िलों का प्रभार है.
एक संग्रहालय अध्यक्ष बीबीसी से नाम ना छापने की शर्त पर कहते हैं, "एक से दूसरे संग्रहालय जाने की व्यवस्था तक हमें ख़ुद करनी पड़ती है, सरकार से उसके पैसे तो देर से ही मिलते हैं. फिर एक व्यक्ति कितनी जगह काम करेगा."
कला-संस्कृति सचिव वंदना प्रेयसी कहती हैं, "बीपीएससी इन ख़ाली पड़े पदों की परीक्षाएं ले रहा है. हमें उम्मीद है कि मई-जून तक नियुक्ति हो जाएगी."
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