बीबीसी डॉक्युमेंट्री दिखाने की कोशिश करने वाले छात्रों का भविष्य अधर में

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली यूनिवर्सिटी के कम-से-कम सात छात्रों का भविष्य बीबीसी की डॉक्युमेंट्री 'इंडिया: द मोदी क्वेश्चन' की स्क्रीनिंग करने की कोशिश करने की वजह से अधर में है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र- लोकश चुघ, रविंदर सिंह, अंशुल यादव, स्नेहा, मिशाब, दिनेश, आशुतोष यूनिवर्सिटी प्रशासन की कार्रवाई का सामना कर रहे हैं.
10 मार्च को दिल्ली यूनिवर्सिटी प्रशासन ने एक मेमोरैंडम जारी किया था जिसमें कहा गया कि "एंथ्रोपोलॉजी के डॉक्टरेट के छात्र लोकेश चुघ और एमए के छात्र रविंदर सिंह को एक साल तक परीक्षा देने से रोका जा रहा है."
इसके अलावा कम-से-कम पांच छात्रों से कहा गया है कि "वह एक चिट्ठी लिखकर प्रशासन को बताएँ कि उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न हो."
बीबीसी ने इन छात्रों को मिले मैमोरैंड देखे हैं.

इन छात्रों में कोई प्रोफ़ेसर, कोई सिविल सर्वेंट तो कोई मानवाधिकार वकील बनना चाहता है, इनके अपने-अपने सपने हैं, लेकिन अब इन सपनों और इनके परिवारों की उम्मीदें अघर में लटकी नज़र आ रही हैं.
इन छात्रों को बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री 'इंडिया: द मोदी क्वेश्चन' की कैम्पस में स्क्रीनिंग करने की कोशिश की सज़ा दी जा रही है.
दरअसल, 27 जनवरी को कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई और भीम आर्मी स्टूडेंट फ़ेडरेशन सहित कुछ अन्य छात्र संगठनों ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस में डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग करने की योजना बनाई थी, हालांकि ये स्क्रीनिंग नहीं होने दी गई और उस वक़्त कई छात्रों को हिरासत में लेकर ये स्क्रीनिंग रोक दी गई थी.
इसके बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने सात सदस्यों की एक कमेटी गठित की थी, जिसे 27 जनवरी की घटना की जांच करने की ज़िम्मेदारी दी गई. इस कमेटी की अध्यक्षता दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रॉक्टर रजनी अब्बी कर रही है.
रजनी अब्बी का एक परिचय ये भी है कि वह साल 2011-12 में बीजेपी की ओर से दिल्ली की मेयर भी रह चुकी हैं.

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बीबीसी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के जनसंपर्क अधिकारी से बात की और इस पूरे मामले पर प्रशासन का पक्ष जानना चाहा लेकिन उन्होंने बताया कि वह इस मामले में वे बयान नहीं दे सकते हैं.
यूनिवर्सिटी की प्रॉक्टर रजनी अब्बी ही इस पर बयान देंगी. इसके बाद बीबीसी ने प्रॉक्टर ऑफ़िस से संपर्क करने की कई कोशिशें की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

- 27 जनवरी, 2023 को एनएसयूआई और भीम आर्मी स्टूडेंट फ़ेडरेशन सहित कुछ छात्र संगठनों ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस में बीबीसी की डॉक्युमेंट्री की 'इंडिया: द मोदी क्वेश्चन' की स्क्रीनिंग करने की कोशिश की थी. लेकिन स्क्रीनिंग नहीं होने दी गई थी और कई छात्रों को हिरासत में लिया गया था.
- इस महीने डीयू प्रशासन ने कुछ छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए मेमोरैंडम जारी किए है. दो छात्रों पर एक साल तक परीक्षा देने से रोक लगा दी गई है. और पांच छात्रों को भी नोटिस जारी किए गए हैं.
- डीयू के साथ-साथ जेएनयू, जाधवपुर यूनिवर्सिटी और प्रेसिडेंसी कॉलेज में भी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रखी गई थी.
- इस डॉक्यूमेंट्री को बीबीसी ने भारत में प्रसारित नहीं किया था. केंद्र सरकार ने इस डॉक्युमेंट्री के लिंक को सोशल मीडिया से हटा दिया था.
- सोशल मीडया से डॉक्युमेंट्री का लिंक हटाए जाने के खिलाफ़ टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, वरिष्ठ पत्रकार एन राम और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट याचिका दायर की थी. कोर्ट इस मामले पर सुनवाई कर रहा है और अगली सुनवाई अप्रैल में होगी.

भविष्य का क्या होगा?
दिल्ली से 400 किलोमीटर दूर राजस्थान के श्रीगंगानगर से आने वाले 24 साल के रविंदर सिंह डीयू से फ़िलॉसफ़ी में एमए कर रहे हैं. इससे पहले उन्होंने डीयू से ही कानून की पढ़ाई की है. रविंदर का सपना है कि वह मानवाधिकार वकील बनें.
10 मार्च को दिल्ली यूनिवर्सिटी प्रशासन ने मैमोरैंडम जारी करके जिन दो लोगों पर एक साल तक परीक्षा देने पर रोक लगाई है, रविंदर उनमें से एक हैं.

रविंदर बताते हैं, "मेरे पिता पेशे से किसान है. दिल्ली यूनिवर्सिटी आया तो मुझे लगा कि इतने बड़े कॉलेज में आकर मुझे अपना दायरा बढ़ाना चाहिए. यहाँ मैं भगत सिंह छात्र एकता मोर्चा से जुड़ा. उस दिन (27 जनवरी) हम वही कर रहे थे जो हमारे अधिकार हैं, लेकिन जब स्क्रीनिंग रोक दी गई तो मुझे इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि हम पर एक्शन लिया जाएगा. मैं फ़िलॉसफ़ी पढ़ रहा हूँ अगर मैं इस समाज को आलोचना और विरोध के लिए अनुकूल बनाने की बात कर रहा हूँ तो इसमें गलत क्या है?"
"मेरे घर वालों को चिट्ठी भेजी गई कि उनका बेटा यूनिवर्सिटी के नियमों का उल्लंघन कर रहा है, ये किस तरह की मोरल पुलिसिंग है जिसमें मेरे परिवार वालों तक डर पहुँचाया जा रहा है."
रविंदर को यूनिवर्सिटी का मेमोरैंडम बीते गुरुवार को मिला. वे कहते हैं कि आने वाले 10 दिनों में उनकी परीक्षा है और उन्हें नहीं पता कि वो अपना एक साल बर्बाद होने से कैसे बचाएँ.
रविंदर कहते हैं कि अगर उन पर एक साल तक रोक लगाने का प्रशासन का फ़ैसला वापस नहीं लिया जाता है, तो उनका आधे से ज़्यादा कोर्स प्रभावित होगा और उन्हें नहीं पता कि इसके बाद वो अपनी पढ़ाई जारी रख पाएँगे या नहीं.

करियर पर ख़तरा और कर्ज़ चुकाने की चिंता
24 साल के अंशुल यादव को यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अभी परीक्षा देने से रोका तो नहीं है लेकिन उन्हें एक चिट्ठी मिली है जिसमें पूछा गया है कि 'कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के लिए' उन पर एक्शन क्यों न लिया जाए?
चिट्ठी में कहा गया है कि "वह तीन दिनों में इसका जवाब दें कि प्रशासन उन पर कार्रवाई क्यों न करे."

यूपी के इटावा से आने वाले अंशुल संस्कृत में एमए कर रहे हैं और एनएसयूआई से जुड़े हैं. अंशुल अपने परिवार के पहले शख़्स हैं जो पढ़ाई के लिए अपने ज़िले से बाहर आए.
वह बताते हैं, "मेरे पिता लोगों के खेतों में काम करते हैं, मेरी पढ़ाई के लिए उन्होंने कर्ज़ लिया. मैं पढ़ाई में भी अच्छा हूँ. किरोड़ी मल कॉलेज से मैंने ग्रेजुएशन फर्स्ट क्लास नंबर से पास किया है. मैं प्रोफेसर बनना चाहता हूँ और अगर मुझे परीक्षा नहीं देने दी गई तो मेरे लिए ये जीने-मरने जैसी बात होगी."
"हमने डॉक्युमेंट्री दिखाने की कोशिश भर की थी, दिखा भी नहीं सके लेकिन हमें उसकी सज़ा दी जा रही है. ऐसा करके छात्रों को डराया जा रहा है कि वो प्रदर्शन और विरोध के बारे में सोचेने की भी कोशिश न करें."
अंशुल ने प्रशासन की चिट्ठी का जवाब देते हुए लिखा है, "वह एक शांतिपूर्वक आयोजित किए गए प्रदर्शन का हिस्सा थे और अपनी राय ज़ाहिर करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है लिहाजा उनके खिलाफ़ शिकायत को रद्द कर देना चाहिए."
लेकिन अंशुल कहते हैं कि अगले महीने से परीक्षा शुरू हो रही है और उन्हें अब तक ये नहीं पता है कि उन्हें परीक्षा देने दिया जाएगा या नहीं.
प्रदर्शन में शामिल नहीं, फिर भी नोटिस
अंशुल और रविंदर तो ख़ैर छात्र राजनीति से जुड़े हुए हैं लेकिन कुछ छात्रों का दावा है कि वो ना तो स्क्रीनिंग में शामिल थे और ना ही किसी संगठन का हिस्सा हैं, इसके बावजूद प्रशासन ने उनके ख़िलाफ़ मैमोरैंडम जारी किया है, क्योंकि वो उस वक्त घटनास्थल पर मौजूद थे और पुलिस उन्हें थाने ले गई थी.
मिशाब ऐसे ही एक छात्र हैं. केरल के रहने वाले 22 साल के मिसाब इतिहास में एमए कर रहे हैं. उनका कहना है कि वह 27 जनवरी को अपनी क्लास के लिए जा रहे थे जब उन्हें पुलिस उन्हें थाने ले गई, घंटों हिरासत में रखा और अब उन्हें भी यूनिवर्सिटी प्रशासन ने नोटिस भेजा है.

मिशाब बताते हैं, "हमें कोई जानकारी नहीं दी गई थी कि कैंपस में 144 लागू किया गया है. मैं हर रोज़ की तरह अपनी क्लास के लिए अपने दोस्त के साथ जा रहा था लेकिन जब हम आर्ट फैकेल्टी के सामने पहुंचे तो देखा कि वहाँ काफ़ी हलचल है."
"हमें पता था कि कुछ छात्रों ने डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग रखी है लेकिन मैं ना तो उसमें शामिल था और ना ही किसी संगठन से जुड़ा हूं, फिर भी मुझे पुलिस ने खींचकर बस में बैठाया और थाने लेकर गई. मेरी ग़लती ये थी कि मैं उस वक़्त आर्ट फैकेल्टी के सामने मौजूद था."
मिशाब के परिवार वालों को भी यूनिवर्सिटी ने चिट्ठी भेजी थी.
वह बताते हैं, "मैं केरल का रहने वाला हूँ, जब मेरे घर वालों को पता चला कि डॉक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग को लेकर ये सब कुछ हो रहा है तो ये मेरे घर वालों की समझ से परे था, क्योंकि वहां इस तरह की चीज़ें यूनिवर्सिटी में करना आम बात है."
मिशाब एक अमेरिकी कॉल सेंटर कंपनी में नौकरी करते हैं जहां वो स्कूली बच्चों ऑनलाइन पढ़ाते हैं. 17 हज़ार महीने की तनख़्वाह पाने वाले मिशाब सरकारी अधिकारी बनना चाहते हैं. लेकिन अब यूनिवर्सिटी प्रशासन से नोटिस मिलने के बाद उन्हें डर है कि अगर उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई की जाती है तो इससे उनके करियर की संभावनाओं पर असर पड़ेगा.
इन सभी छात्रों की कहानियां लगभग एक जैसी हैं, इनमें से ज्यादातर छात्र राजनीति में सक्रिय तो हैं लेकिन इसके इतर ये नौकरी करके अपने परिवार की आर्थिक हालत बेहतर करना चाहते हैं.
30 साल के लोकेश चुघ का परिवार व्यापार से जुड़ा हुआ है लेकिन वो अपने पारिवारिक बिजनेस से अलग प्रोफ़ेसर बनना चाहते हैं. एंथ्रोपोलॉजी में पीएचडी कर रहे लोकेश ने रिसर्च थीसीस पूरी कर ली है. अब उनकी सिर्फ़ मौखिक परीक्षा बची है लेकिन कुछ दिन पहले ही उन्हें बताया गया कि वो एक साल तक परीक्षा देने से रोक दिया गया है.

लोकेश एनएसयूआई के राष्ट्रीय सचिव हैं और उनका आरोप है कि जांच कमेटी में छात्रों की कोई सुनवाई नहीं हुई.
वे कहते हैं, "मेमोरैंडम में कहा गया है कि हमने बैन डॉक्युमेंट्री दिखाने की कोशिश की, लेकिन ये डॉक्युमेंट्री बैन नहीं है, ये बैन होगी या नहीं, इसका फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है जिसकी अगली सुनवाई अप्रैल में होनी है. ऐसे में ये एक्शन होना ही सरासर गलत है."
"मेरी थीसीस पूरी हो गई थी लेकिन जान-बूझकर परेशान करने के इरादे से मेरी मैखिक परीक्षा रोकी जा रही है और एक साल तक रोक लगाई जा रही है."

लोकेश सहित सभी छात्र कहते हैं कि अगर प्रशासन ने अपना फ़ैसला वापस नहीं लिया तो वह अदालत का रुख़ करेंगे.
आशंका और डर के बावजूद ये छात्र इस बात पर अड़े हुए हैं कि वह प्रशासन से माफ़ी नहीं मांगेंगे और उन्होंने जो किया वह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है.
बीबीसी की डॉक्युमेंट्री क्या है
बीबीसी ने जनवरी में दो एपिसोड की एक डॉक्यूमेंट्री का प्रसारण किया, जिसका नाम है - इंडिया: द मोदी क्वेश्चन. इसका पहला एपिसोड 17 जनवरी को ब्रिटेन में प्रसारित हुआ था. दूसरा एपिसोड 24 जनवरी को प्रसारित हुआ. इस डॉक्यूमेंट्री को बीबीसी ने भारत में प्रसारित नहीं किया था. केंद्र सरकार ने इस डॉक्युमेंट्री को सोशल मीडिया या यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर शेयर करने पर रोक लगाई है. सरकारी प्रतिबंध का विरोध करके बड़ी तादाद में लोगों ने बीबीसी की अनुमति के बग़ैर डाउनलोडेड वर्जन शेयर किए.
सोशल मीडया से डॉक्युमेंट्री का लिंक हटाए जाने के खिलाफ़ टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, वरिष्ठ पत्रकार एन राम और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट याचिका दायर की थी. कोर्ट इस मामले पर सुनवाई कर रहा है और अगली सुनवाई अप्रैल में होगी.

डॉक्यूमेंट्री के पहले एपिसोड में नरेंद्र मोदी के शुरुआती राजनीतिक करियर को दिखाया गया, जिसमें वे भारतीय जनता पार्टी में आगे बढ़ते हुए, गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर पहुँचते हैं.
ये डॉक्यूमेंट्री एक अप्रकाशित रिपोर्ट पर आधारित है जिसे बीबीसी ने ब्रिटिश फ़ॉरेन ऑफ़िस से हासिल किया है. इस डॉक्यूमेंट्री में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात में साल 2002 में हुई हिंसा में कम से कम 2000 लोगों की मौत पर सवाल उठाए गए हैं.
ब्रिटिश विदेश विभाग की रिपोर्ट का दावा है कि मोदी साल 2002 में गुजरात में हिंसा का माहौल बनाने के लिए 'प्रत्यक्ष रूप से ज़िम्मेदार' थे.
पीएम मोदी हमेशा हिंसा के लिए ज़िम्मेदार होने के आरोपों का खंडन करते रहे हैं. लेकिन जिस ब्रिटिश कूटनयिक ने ब्रिटिश विदेश मंत्रालय के लिए रिपोर्ट लिखी है उससे बीबीसी ने बात की है और वो अपनी रिपोर्ट के निष्कर्ष पर क़ायम हैं.
भारत का सुप्रीम कोर्ट पहले ही प्रधानमंत्री मोदी को गुजरात हिंसा में किसी भी तरह की संलिप्तता से बरी कर चुका है. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने डॉक्यूमेंट्री के प्रसारित होने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, "मुझे ये साफ़ करने दीजिए कि हमारी राय में ये एक प्रोपेगैंडा पीस है. इसका मक़सद एक तरह के नैरेटिव को पेश करना है जिसे लोग पहले ही ख़ारिज कर चुके हैं."
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