गुजरात चुनाव: 2002 गुजरात दंगों के दो चेहरे, 20 साल बाद...

अशोक मोची और अंसारी कुतुबुद्दीन
    • Author, विकास त्रिवेदी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद से

अहमदाबाद का शाहपुर. निगाहें एक पता खोज रही हैं. एक दुकान जिसकी तस्वीर शायद आपने भी देखी थी.

जूते-चप्पल की दुकान. मगर ये दुकान कहीं नहीं मिली न ही मिला इस दुकान का मालिक, जिसके चेहरे से आप वाक़िफ़ हैं. ये चेहरा आपने बीते 20 सालों में कई बार देखा है.

वहीं सड़क पर टेम्पो ठीक कर रहे मैकेनिक से पूछा- यहां जूते-चप्पल का काम करने वाले अशोक परमार कहां मिलेंगे? मैकेनिक ना में सिर हिलाता है. पास बैठा लड़का बोलता है-अरे उसको पूछता होगा ये, जो वो है न फेमस मोची, न्यूज़ में आता रहता है.

अशोक मोची

इमेज स्रोत, SEBASTIAN D'SOUZA

इमेज कैप्शन, गुजरात दंगों के समय अशोक मोची

हाथ में रॉड, माथे पर पट्टी और आक्रोश से भरी अशोक परमार की तस्वीर, 2002 के बाद से ही गुजरात दंगों के चेहरे के तौर पर पेश की जाती रही है. जब अशोक परमार के ठीहे पर पहुंचे तो वहां कोई नहीं था. एक छोटी मैली कालीन बिछी थी. पास में कोई दिखा तो मैंने पूछा- अशोक भाई कहां गए?

जवाब मिला- तुम मीडिया से होएगा न, एक तारीख़ से बेचारे का कंटाला हुआ पड़ा है.

अशोक मोची

खाली ठीहा, गुस्से में आते अशोक मोची

अशोक जिस फ़ुटपाथ पर अब मोची का काम करते हैं, वहां वो नहीं हैं पर कई और लोग जुट गए. तभी अशोक के एक दोस्त धर्मेंद्र आते हैं.

धर्मेंद कहते हैं- गोधरा कांड का एंबेसडर बीजेपी कार्यालय के बाहर बैठा है और कोई पूछ भी नहीं रहा.

अशोक जहां मोची का काम करते हैं, वो दीवार बीजेपी के अस्थायी कार्यालय की दीवार से मिली हुई है. जब हम अशोक का इंतज़ार कर रहे हैं, तभी वहां चुनाव प्रचार के नारे 'हर-हर मोदी, घर-घर मोदी' सुनाई देते हैं.

तभी अशोक आते हुए दिखते हैं. पास आकर जैसे ही वो समझते हैं कि हम मीडिया से हैं, उनकी आवाज़ तेज़ हो जाती है.

मैं पूछता हूं- अशोक भाई कैसे हैं? इन दिनों परेशान हैं क्या?

अशोक मोची

अशोक नरम पड़ते हैं, ''क्या बताऊं? अपना काम ही नहीं कर पा रहा. जब देखो कोई कैमरा माइक लेकर चला आ रहा है. अपने को क्या करना कि चुनाव है कि क्या है? अपना तो सिर्फ़ एक वोट है. बाकी तो जनता तय करेगी न. रोज धंधा करके रोटी खाते हैं.

यही सब इंटरव्यू में घुसा रहूंगा तो काम कब करूंगा. एक तारीख़ से जब देखो कोई चला आ रहा है. मेरे पर 600 रुपये कर्जा हो गया है तब से. काम करने के टाइम ये मीडिया वाले लगे रहते हैं. कोई कभी ये तक नहीं पूछता कि अशोक भाई खाना खाए हो या नहीं?''

कुछ देर बाद अशोक थोड़ा और शांत होते हैं.

अशोक पास खड़े ऑटो रिक्शा में बैठकर कहते हैं, ''मीडिया वाले तो क्या हैं, अपना फ़र्ज़ अदा कर रहे हैं क्योंकि चैनलों को इंटरव्यू चाहिए होगा. शुरू-शुरू में तो चलो ठीक है कि गुजरात के बारे में कुछ जानना है. फिर तो लाइन ही लग गई. दिन में चार-पांच लोग आने लगे. धंधा वैसे ही मंदा है.''

अशोक बताते हैं कि वो पढ़-लिख कर कुछ बनना चाहते थे. मगर मां-बाप नहीं रहे. एक लड़की से प्यार करते थे मगर वो दूसरी जाति से थी. अशोक की शादी अब तक नहीं हुई. 2002 दंगे के बाद अशोक आज तक सिनेमा हॉल नहीं गए हैं. मगर वो मोबाइल पर फ़िल्में देखते हैं.

अशोक मोची के घर के पास बीजेपी का दफ़्तर
इमेज कैप्शन, बीजेपी का वो दफ़्तर जिसके पास काम करते हैं अशोक मोची.

'एक जैसे ही सवाल होते हैं...'

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, गुजरात में हुए 2002 दंगे में 790 मुसलमान और 254 हिंदू मारे गए थे. 223 लोग लापता हो गए और 2500 घायल हुए थे. इसके अलावा सैकड़ों करोड़ों रुपये की संपत्ति का नुक़सान हुआ था.

2022 गुजरात चुनाव के एलान के बाद से ही अशोक और गुजरात दंगों के दूसरे चर्चित चेहरे कुतुबुद्दीन अंसारी से जुड़ी कई ख़बरें मीडिया में आईं. इन ख़बरों में ये जानने की कोशिश थी कि गुजरात चुनाव को लेकर ये दो अहम लोग 2002 दंगों के 20 साल बाद क्या सोचते हैं?

अशोक बताते हैं, ''एक ही चीज़ सब पूछते हैं. वही गोधरा कांड, इलेक्शन के बारे में पूछते हैं कि क्या होगा. मैं पोस्टरबॉय हूं न दंगों का, तो वही जानने आते हैं कि क्या हुआ था, कैसे हुआ था. सरकार का हाथ था या नहीं था. अभी पूछते हैं कि कौन सी पार्टी आएगी, नहीं आएगी.

अरे यार कोई भी आदमी एक ही सवाल से परेशान हो जाएगा न. बराबर है? हम भी एक ही जवाब दे देकर थक जाते हैं. जी करता है कि सब मीडिया वालों को एक साथ कान्फ्रेंस में बुला लूं. सबको एक साथ जवाब दे दूं. कोई सुबह चला आ रहा है, कोई शाम. यहां भी लोगों की भीड़ हो जाती है.''

गुजरात चुनाव में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी भी मैदान में हैं. आप समेत चुनावी घोषणापत्रों में कई चीज़ों के फ़्री वादों पर अशोक ने कहा, ''मोदी सरकार ने भी 15 लाख का वादा किया था. 5 लाख रुपया भी दिया किसी को. ये लॉलीपॉप है बस. नेताओं का तो ये धंधा ही है कि इंटरव्यू देना है. हमारा ये धंधा नहीं है.''

अशोक मोची

कुछ साल पहले अशोक ने ख़ुद को मिली आर्थिक मदद से जूते-चप्पल की दुकान खोली थी. इस दुकान का नाम 'एकता चप्पल घर' रखा था. तब कुतुबुद्दीन अंसारी भी अशोक की दुकान पर आए थे.

मगर अब अशोक की ये दुकान आर्थिक वजहों से बंद हो चुकी है. हम जिस ऑटो में बैठकर बात कर रहे थे, वहां आस-पास स्थानीय लोग जुटने लगे. एक लड़का आकर अशोक को फटे हुए जूते दिखाता है.

'थोड़ा ब्रेक ले लें' ये कहकर अशोक ऑटो से उतरकर जूता सिलने लग जाते हैं. कई लोगों के जूते-चप्पल सिलने के बाद वो फिर ऑटो में आकर बैठते हैं.

अशोक अपनी बात फिर शुरू करते हैं, ''गुजरात में मेरा कोई नहीं हुआ तो मैं बाहर वालों से क्या उम्मीद करूं. कोई आरएसएस, बजरंग दल, वीएचपी, बीजेपी वाला मेरे पास नहीं आया. जबकि वहां मेरे दलित समाज के लोग काम करते हैं, उन्होंने भी मेरी कभी मदद नहीं की.

जब धर्म के ठेकेदार अपने नहीं हुए तो बाहर वालों से क्या उम्मीद रखना. मैं जब केरल गया तो हमें समानता, मानवता मिली. मैंने अब हिंदू धर्म को मानना छोड़ दिया है.''

ऑटो के बाहर से आती आवाज़ों से तंग आकर अशोक गुजराती में ऑटो वाले से कहते हैं- आगे ले चलो, इधर लोग मगजमारी करेगा.

गुजरात दंगा

क़ुतुबुद्दीन अंसारी की आंखें

गुजरात दंगों की तस्वीरों में एक दूसरा अहम नाम क़ुतुबुद्दीन अंसारी का है. हाथ जोड़े, आंखों में आंसू लिए क़ुतुबुद्दीन की तस्वीर न सिर्फ़ मीडिया बल्कि कई बार राजनीतिक दलों की ओर से भी इस्तेमाल होती है.

क़ुतुबुद्दीन अंसारी के इंटरव्यू भी मीडिया में बीते दिनों से चल रहे हैं. क़ुतुबुद्दीन अंसारी को जब फोन किया तो वो कॉल नहीं उठाते हैं.

दोबारा कॉल करने पर क़ुतुबुद्दीन से बात होती है. वो कहते हैं, ''भाई इधर बहुत परेशान हो गए हैं. पर आप पहले ऐसे हो जो ऐसे बात कर रहे हो. बाकी किसी को नहीं बुलाता हूं, पर आप घर आओ. मुझे ख़ुशी होगी.''

मैं क़ुतुबुद्दीन अंसारी के घर की ओर निकलता हूं. अहमदाबाद के इस मोहल्ले में आकर लगता नहीं कि ये उस गुजरात मॉडल का हिस्सा हो सकता है जिसकी चर्चाएं देश दुनिया में आए दिन होती रहती हैं.

गलियों में गंदगी, बंद-बंद सा इलाका और दरवाज़े का काम करती छोटी-छोटी खिड़कियां.

क़ुतुबुद्दीन की पत्नी आवाज़ लगाती हैं- सुनो... कोई आया है मिलने को.

लुंगी पहने पहली मंज़िल में काम कर रहे क़ुतुबुद्दीन सीढ़ियों से नीचे उतरते हैं. वो साथ में घर ले जाते हैं. मैं क़ुतुबुद्दीन की आंखों में देखने लगता है. दंगों की तस्वीर से स्मृति में दर्ज हो चुकी आंखें अब शांत और ख़ुश दिखती हैं.

क़ुतुबउद्दीन अंसारी
इमेज कैप्शन, क़ुतुबउद्दीन अंसारी के साथ बीबीसी संवाददाता विकास त्रिवेदी

'दंगे कब तक पकड़कर बैठे रहोगे?'

क़ुतुबुद्दीन कहते हैं, ''दंगों वाली बात कब तक पकड़े बैठे रहेंगे. आगे तो बढ़ना होगा न. कितने लोग आते हैं इंटरव्यू करने के लिए. वो लोग भी क्या करें. अपनी नौकरी कर रहे हैं. कुछ लोग अच्छे भी होते हैं. उनके ज़रिए लोगों को अच्छा संदेश भी जाता है, पर हम भी अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ चुके हैं.''

क़ुतुबुद्दीन घर पर ही काम करते हैं. बेटे समेत कुल तीन लोग कपड़ा सिलने का कारखाना चलाते हैं.

क़ुतुबुद्दीन बताते हैं, ''मेरा तो बस एक वोट है. पर मेरा परिवार है. कोई कहता है कि इतनी दूर से आए हैं तो हमको भी बुरा लगता है कि कैसे मना करें. कई बार मीडिया वाले किसी ऐसे को ले आते हैं जिसकी बात हम टाल नहीं सकते तो फिर मजबूरी में क्या करें. कल भी एक भाई आए थे. हमने मना किया कि कैमरे पर बात नहीं करेंगे तो वो बुरा मान गए. मैंने उनसे माफ़ी वगैरह मांगी.''

क़ुतुबुद्दीन कहते हैं, ''आजकल कोई फ़ोन करता है तो हम उठाते नहीं हैं. क्योंकि मालूम है कि मीडिया वाले ही होंगे. अभी चुनाव ख़त्म हो जाएगा न, तो थोड़ा कम हो जाएगा ये सब. अब अगर यही सब करते रहेंगे तो आस-पास या जिनके साथ हम धंधा करते हैं वो लोग भी पूछते हैं. वीडियो सब वायरल हो जाते हैं न. ''

बातचीत के दौरान क़ुतुबुद्दीन दंगों के कुछ ऐसे किस्से भी बताते हैं, जिसके एक किस्से में ही हिंदू-मुस्लिम नफ़रत भी दिखती है और मोहब्बत भी.

अपनी 2002 की तस्वीर पर क़ुतुबुद्दीन बोले, ''उस तस्वीर का पता नहीं, किस-किसने कहां-कहां इस्तेमाल किया? तस्वीर खींचने वाले फ़ोटोग्राफर ऑर्को दत्ता को भी इस बात का ख्याल था कि तस्वीर खींचकर सही किया या ग़लत? वो एक पल था. सड़कों पर दो-दो दिन तक लाशें पड़ी हुई थीं. कुत्ते आते थे और सूंघकर चले जाते थे.''

क़ुतुउद्दीन अंसारी की गली
इमेज कैप्शन, क़ुतुबुद्दीन अंसारी की गली

जब दंगा हुआ था, तब क़ुतुबुद्दीन की चार साल की बच्ची भी थी. वो लड़की इन दिनों अपनी लगभग चार साल की ही बच्ची के साथ ससुराल से मायके आई है. वो छुटंकी पलंग के पास खेल रही है. बच्ची के नाना कुतुबुद्दीन उसे देखकर ख़ुश हो रहे हैं.

इस परिवार को देख मैं क़ुतुबुद्दीन से अशोक का ज़िक्र करता हूं.

क़ुतुबुद्दीन कहते हैं, ''अशोक आता-जाता रहता है हमारे घर पर. पर मुझे लगता है कि अशोक अकेला पड़ गया है. शादी वगैरह हो जाती तो वो बस जाता. अभी फुटपाथ पर ही रहता है. रात में वहीं कहीं सो जाता है. अकेला रहता है तो थोड़ा चिड़चिड़ा भी हो गया है. ''

फ़ुटपाथ पर अकेले ज़िंदगी बिताते अशोक के चेहरे पर चिड़चिड़ाहट नज़र आती है, वहीं परिवार के साथ घर पर रह रहे क़ुतुबुद्दीन अंसारी के चेहरे पर सौम्यता और शांति दिखती है.

मगर ये शांति बीते कुछ दिनों में थोड़ी सी अस्त-व्यस्त है.

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