गुजरात चुनाव 2022: क्या मेधा पाटकर चुनाव में मुद्दा बनती जा रही हैं?

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गुजरात में चुनावी अभियान को धार देने उतरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दो दिनों में दो चुनावी रैलियों में राहुल गांधी और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर पर हमला किया है.
मेधा पाटकर महाराष्ट्र में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुई थीं. कांग्रेस ने राहुल के साथ उनकी तस्वीरें ट्वीट की थीं.
इन तस्वीरों के सामने आने के साथ ही गुजरात में चुनाव प्रचार कर रहे पीएम नरेंद्र मोदी ने 20 नवंबर को राजकोट ज़िले के धोराजी की चुनावी रैली में कांग्रेस पर हमला किया.
उन्होंने कहा, ''कांग्रेस के नेता एक ऐसी महिला के साथ पदयात्रा निकालते देखे गए जिन्होंने तीन दशक तक नर्मदा डैम प्रोजेक्ट को रोक रखा था. आप सोचिए कि नर्मदा डैम नहीं बना होता तो आज क्या होता.''
गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा और कहा,'' मेधा पाटकर को अपनी यात्रा में प्रमुख जगह देकर राहुल गांधी ने एक बार फिर गुजरात और गुजरातियों के प्रति अपनी दुश्मनी दिखाई है. ''
उन्होंने कहा, ''वो उन तत्वों के साथ खड़े हैं जिन्होंने दशकों तक गुजरातियों को पानी से वंचित रखा. गुजरात इसे बर्दाश्त नहीं करेगा.''
एक दिन बाद यानी 21 नवंबर को नरेंद्र मोदी ने फिर इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरा. इस बार सुरेंद्रनगर ज़िले की एक रैली में मोदी ने 'नर्मदा विरोधियों' को सज़ा देने की अपील की.
उन्होंने कहा, ''लोकतंत्र में वे पद के लिए यात्रा कर सकते हैं. लेकिन जिन्होंने मां नर्मदा को गुजरात में प्रवेश करने से रोका और 40 सालों तक इस परियोजना को अदालतों में मुक़दमे कर रोके रखा, ऐसे लोगों के हाथ पकड़ कर और कंधे पर हाथ रख कर पदयात्रा करने वाले को गुजरात के लोग सज़ा देंगे''
मेधा पाटकर को मुद्दा बनाने की कोशिश
लगातार दो दिनों में दो चुनावी रैलियों में राहुल गांधी और मेधा पाटकर की मुलाकात पर पीएम के हमले से ये साफ़ होता जा रहा है कि बीजेपी अब इसे एक चुनावी मुद्दा बना रही है.
चूंकि मेधा पाटकर ने नर्मदा घाटी परियोजना से होने वाले विस्थापन के ख़िलाफ़ लंबा आंदोलन चलाया था,
इसलिए राहुल गांधी से उनकी मुलाकात ने बीजेपी के लिए गुजरात में कांग्रेस को घेरने का अच्छा मौका मुहैया करा दिया.
2017 के चुनाव में गुजरात में कांग्रेस ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी. बीजेपी को उसने 99 सीटों से संतुष्ट होने पर मजबूर कर दिया था. कांग्रेस ने 77 सीटें जीती थीं. बीजेपी के लिए ये बड़ा झटका था क्योंकि 2012 में उसने यहां 115 सीटें जीती थीं .
हालांकि इस बार के चुनाव में आम आदमी पार्टी के जोर-शोर से उतरने से चुनाव त्रिकोणीय संघर्ष में बदलता दिख रहा है. लेकिन गुजरात चुनाव पर नजर रखने वाले विश्लेषकों के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस का जनाधार ज्यादा कमजोर नहीं है. इसलिए बीजेपी के लिए कांग्रेस, आम आदमी पार्टी की तुलना में ज्यादा बड़ी प्रतिद्वंद्वी है.
यही वजह है कि राहुल से मेधा पाटकर की मुलाकात को बीजेपी कांग्रेस पर हमले के धारदार हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है.

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क्या था मेधा का संघर्ष ?
पीएम मोदी और बीजेपी के नेताओं के लिए इस तरह का हमला करना इसलिए आसान बन गया है क्योंकि नर्मदा घाटी परियोजना के तहत बनने वाले सरदार सरोवर बांध के निर्माण के खिलाफ मेधा पाटकर ने लगभग साढ़े तीन दशक से भी ज्यादा वक्त तक आंदोलन चलाया था.
लंबी अदालती लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बांध बनाने की इजाजत दी और अब इसके पानी और बिजली का लाभ गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश को मिल रहा है.
सरदार सरोवर बांध से ढाई करोड़ लोगों को पीने का पानी देने का लक्ष्य रखा गया है. इससे 21 हेक्टेयर ज़मीन में सिंचाई होनी है और 1450 मेगावाट बिजली पैदा की जानी है.
लेकिन दूसरी ओर बांध की वजह से नर्मदा घाटी में बसे 40 हज़ार परिवारों के विस्थापित होने की आशंका है और 37500 हेक्टेयर ज़मीन डूब क्षेत्र में आ गई है.
बांध बनने से जो लोग बेघर हुए हैं उनमें ज्यादातर आदिवासी और किसान हैं.
मेधा पाटकर और उनके आंदोलन की वजह से वर्ल्ड बैंक ने 1993 में इस बांध के लिए फंडिंग रोक दी थी. वर्ल्ड बैंक ने इसके लिए 45 लाख डॉलर देने का एलान किया था.
इसे बांध विरोधियों की एक बड़ी जीत माना गया था और मेधा पाटकर तभी से गुजरात में इस बांध की समर्थक सरकारों की आंख की किरकिरी बन गई थीं. इसमें कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकारें शामिल थीं.
बांध का काम रुकने से गुजरात के लोगों को पेयजल, सिंचाई के लिए पानी और बिजली देने का वादा करने वाली सरकारों के लिए मतदाताओं का सामना करना मुश्किल हो गया था.
नर्मदा बचाओ आंदोलन इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट ले गया. और 1996 में उसने बांध निर्माण पर स्टे हासिल कर लिया. 18 अक्टूबर 2000 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर आखिरी फैसला सुनाया और बांध के निर्माण की इजाजत दे दी. आखिरकार 2017 में पीएम नरेंद्र मोदी ने सरदार सरोवर बांध का उद्घाटन किया.

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मेधा पहले से रही हैं बीजेपी के निशाने पर
मेधा पाटकर सिर्फ सरदार सरोवर बांध के विरोध की वजह से बीजेपी के निशाने पर नहीं रही हैं. वो 2002 में गुजरात में हुए दंगों के खिलाफ आंदोलन की अगुआई कर चुकी हैं. गुजरात में उस समय नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे.
गुजरात में दंगों के खिलाफ एक शांति यात्रा के दौरान अहमदाबाद के गांधी आश्रम में उन पर हमले हो चुके हैं.
2006 में खुद मोदी गुजरात के सीएम रहते हुए नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी के सामने 51 घंटे के धरने पर बैठे थे ताकि सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई कम न की जाए. वहीं पाटकर बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने के खिलाफ धरने पर बैठी थीं. वो प्रोजेक्ट से प्रभावित लोगों के लिए सही मुआवजे की मांग कर रही थीं.
मेधा पाटेकर पर किताब लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार अरुण त्रिपाठी बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहते हैं,'' सुप्रीम कोर्ट खुद कह चुका है कि मेधा पाटकर देशद्रोही नहीं है. उन्होंने सही मुआवजे को लेकर आंदोलन शुरू किया था और वहां से वह बांध विरोध तक पहुंचा था.''
वो कहते हैं, ''मेधा ने जो आंदोलन किया उसका असर ये हुआ कि विस्थापितों को ठीकठाक मुआवजा मिलने लगा. प्रोजेक्ट में गई उनकी जमीन के बदले जमीन मिलने लगी. ये कोई मामूली उपलब्धि नहीं है. विस्थापितों को उनका हक दिलाना गुजरात और गुजराती विरोध नहीं हो सकता है.''
उनके मुताबिक देश में बड़े बांध परियोजनाओं से विस्थापितों हुए लोगों के लिए मुआवजा और पुनर्वास का रिकार्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है. ऐसे में मेधा के आंदोलन की बदौलत विस्थापितों को बेहतर मुआवजा और पुनर्वास की बात को कई अर्थशास्त्रियों ने भी स्वीकार किया है.
हाल ही में अर्थशास्त्री और स्तंभकार स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया ने दो लेख लिख कर बताया कि विस्थापितों को कितना मुआवजा मिल रहा है. उन्हें कितनी जमीन मिली है. हालांकि उन्होंने इस लेख में बांध का विरोध करने के लिए मेधा पाटकर को दोषी ठहराया है.

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मेधा और आम आदमी पार्टी का कनेक्शन
मेधा और गुजरात की सरकारों के बीच काफी वक्त से टकराव चला आ रहा है. इसलिए पहले के चुनावों में भी बीजेपी मेधा पाटकर के खिलाफ बोलती रही है.
2006 में फिल्म अभिनेता आमिर खान ने अपनी फिल्म 'फना' रिलीज होने से पहले मेधा पाटकर का समर्थन किया था. इसके विरोध में गुजरात सरकार ने फिल्म के प्रदर्शन को रोक दिया था. उस वक्त मेधा ने इस फिल्म को वहां रिलीज कराने के लिए दखल दिया था.
बीजेपी के एक नेता ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ''नर्मदा प्रोजेक्ट गुजरात के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है. ये सच है कि मेधा पाटकर ने इस परियोजना का विरोध किया था. इससे राज्य सरकार को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है.''
वो कहते हैं, ''आज जब आम आदमी पार्टी बीजेपी पर तथ्यहीन आरोप लगा रही है, बीजेपी भी हर संभव तरीके से जवाबी हमले करेगी. ये भी सच है कि पाटकर 'आप' के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं. बीजेपी के लिए ये कांग्रेस और 'आप' पर हमले का मौका है. ''
ये सच है कि 2014 लोकसभा चुनाव में मेधा पाटकर आम आदमी पार्टी के टिकट से मुंबई नॉर्थ ईस्ट सीट से चुनाव लड़ चुकी थीं. हालांकि बाद में वो आम आदमी पार्टी से अलग हो गईं.

क्या बीजेपी को इससे फ़ायदा होगा?
सवाल है कि इसके बावजूद भी बीजेपी मेधा पाटकर को मुद्दा क्यों बनाना चाह रही है?
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप गोहिल बीबीसी हिंदी से कहते हैं, ''ये पुराना मुद्दा हो चुका है. अब नर्मदा डैम बन चुका है. एक जमाने में लोगों का मेधा पाटकर के खिलाफ रोष था, लेकिन अब वो बात नहीं है.''
वो कहते हैं, ''ये भी याद रखना चाहिए कि सिर्फ बीजेपी नहीं कांग्रेस ने भी नर्मदा बांध को आगे बढ़ाने के लिए काम किया था. उस ज़माने में कांग्रेस के चिमनभाई पटेल ने भी इस मेधा के आंदोलन को खत्म करने की कोशिश की थी. ''
मेधा पाटकर और आम आदमी पार्टी को जोड़ कर बीजेपी जो हमले कर रही है उसका कितना फायदा उसे मिलेगा?
गोहिल कहते हैं, ''ये ठीक है कि मेधा पाटकर आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ चुकी हैं. उनके इसी अतीत को ध्यान में रख कर पहले बीजेपी ने गुजरात में बात फैलाई कि आम आदमी पार्टी मेधा को यहां उतार सकती है. इसलिए उन पर जुबानी हमले किए गए. अब जब राहुल गांधी के साथ मेधा की मुलाकात की बात सामने आई तो ये बीजेपी के लिए कांग्रेस पर हमला करने का मौका बन गया. ''

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क्या बीजेपी के पास ठोस मुद्दों की कमी है?
अरुण कुमार त्रिपाठी कहते हैं, ''जब किसी के बारे में इस तरह की बात कही जाती है तो लगता है आपके पास मुद्दों की कमी है. आप एकतरफा किसी को देश विरोधी, गुजरात विरोधी नहीं कह सकते. मेधा गांधीवादी, समाजवादी आंदोलन की उपज हैं. उन्होंने कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया.''
वो कहते हैं, ''अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके काम को सराहा गया है. उन्होंने सत्याग्रह किया है. गुजरात में भी लोग उनके काम को मानते हैं. इसलिए ये नहीं कहा जा सकता है कि वो गुजरात विरोधी हैं. इसलिए ये कहा जा सकता है कि छोटे-छोटे मसलों को गुजरात की अस्मिता से जोड़ कर चुनाव जीतने की कोशिश हो रही है. ''
दिलीप गोहिल कहते हैं, ''भले ही मेधा पाटकर का मुद्दा बीजेपी को फायदा न दिला पाए, लेकिन पूरे चुनाव में ये मामला उठता रहेगा. ये बीजेपी की स्टाइल है. लेकिन यहां की जनता अब बेसिक मुद्दों को उठाने लगी है. वो शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी के सवाल उठा रही है.''
अरुण कुमार त्रिपाठी कहते हैं, ''हो सकता है कि बीजेपी को मेधा मुद्दे से कुछ फायदा मिल जाए क्योंकि बीजेपी ताकतवर पार्टी है. उसे जनमत बनाना आता है. उसे बूथ मैनेजमेंट आता है. वो चुनाव जीतना जानती है. चुनाव को एक इवेंट बनाना उसे आता है. इसमें नर्मदा के पानी की तरह जनमत भी बह जाए तो आश्चर्य की बात नहीं.''
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