भारत में बाल विवाह क्या अगले दो साल में समाप्त हो सकते हैं?

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दुनिया में भारत एक ऐसा देश है, जहाँ 23 करोड़ से ज़्यादा बाल वधू हैं और हर साल तक़रीबन 15 लाख लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में हो जाती है.
संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ़ ने साल 2021 में अपनी रिपोर्ट 'बाल विवाह को ख़त्म करने के लिए वैश्विक कार्यक्रम' में ये आँकड़ा जारी किया था.
इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि दुनिया की तुलना में भारत में एक तिहाई बाल वधू हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि भारतीय समाज में मौजूद इस कुरीति को क्या साल 2025 तक ख़त्म करना संभव है?
दरअसल कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फ़ाउंडेशन की ओर से 'नेशनल कंसल्टेशन ऑन चाइल्ड मैरेज फ़्री इंडिया' का आयोजन किया गया था.
नोबेल पुस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने साल 2022 में बाल विवाह मुक्त भारत आंदोलन की शुरूआत की थी, जिसका लक्ष्य 2030 तक देश से बाल विवाह ख़त्म करना है.
साथ ही ये कहा गया है कि भारत में बाल विवाह मुक्त अभियान का लक्ष्य बाल विवाह को साल 2025 तक 23.3 प्रतिशत से 10 प्रतिशत करना है.
इस आयोजन में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी भी मौजूद थी.
कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फ़ाउंडेशन की ओर से जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार स्मृति ईरानी का कहना था, ''बाल विवाह एक अपराध है और हमें इसे पूरी तरह से ख़त्म करना होगा. हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हम इसे मौजूदा 23 प्रतिशत से शून्य पर ले आएँ. हमारी सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध है.''
साथ ही उनका कहना था, ''ये पहली सरकार है, जिसने भविष्य और देश के बच्चों के लिए बजट तैयार किया है. आपने 2025 तक बाल विवाह को 10 प्रतिशत तक लाने की बात कही है, हम उसे शून्य तक ला सकते हैं.''

बाल विवाह को शून्य पर लाना संभव
तो ऐसे में क्या देश में दो साल में बाल विवाह को शून्य पर लाना संभव है?
कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फ़ाउंडेशन के कंट्री हेड रविकांत ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ये बिल्कुल संभव है.
वे बाल विवाह को बीमारी बताते हैं और कहते हैं कि इसे समाज में स्वीकृति मिलती रही क्योंकि इसे ग़रीबी से जोड़ कर देखा गया. हालाँकि इसके ख़िलाफ़ कई जागरूकता अभियान भी चलाए गए.
उनके अनुसार, ''असम में जिस सख़्ती से क़दम उठाए गए हैं, उसने एक क़ानूनी निवारक के तौर पर काम किया है. ऐसे में लोगों और धार्मिक गुरुओं को कड़क क़ानूनी संदेश मिला है और ये भय पैदा करेगा और इससे ऐसी शादियों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी.''
रविकांत बताते हैं, ''सोचिए इतने जागरूकता अभियान चलाए गए, लेकिन अब सरकार बाल विवाह के ख़िलाफ़ सख़्ती कर रही है, तो सभी प्रशासनिक अधिकारियों तक भी ये बात पहुँचेगी और इसका पालन होगा.''
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असम सरकार का क़दम

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने पिछले दिनों कैबिनेट में लिए गए फ़ैसले की जानकारी देते हुए कहा था, "जो युवक 14 साल से कम उम्र की लड़की से शादी करेगा, हम उनके ख़िलाफ़ पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई करेंगे. हमारी सरकार ने बाल विवाह पर अंकुश लगाने के लिए बड़े पैमाने पर राज्यव्यापी अभियान शुरू करने का निर्णय लिया है."
उन्होंने ये भी कहा था कि राज्य में शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर को कम करने और ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह को रोकने के लिए कैबिनेट ने सभी 2,197 ग्राम पंचायत सचिवों को बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत 'बाल विवाह रोकथाम (निषेध) अधिकारी' के रूप में नामित करने का फ़ैसला लिया है.
ये अधिकारी पॉक्सो एक्ट के तहत उन मामलों में प्राथमिकी दर्ज कराएँगे, जहाँ दुल्हन की उम्र 14 साल से कम है. वहीं लड़की की उम्र 14 साल से 18 साल के बीच होने पर बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के तहत एफ़आईआर दर्ज कराई जाएगी.
हिमंत बिस्वा सरमा के इस बयान के बाद से राज्य में लगभग 3000 लोगों की गिरफ़्तारी हुई है, जिनमें महिलाएँ भी शामिल हैं.
क्या काफ़ी हैं क़दम?
राजस्थान में बाल विवाह रोकने और उन्हें निरस्त कराने की दिशा में पिछले 15 साल से काम कर रही डॉ कृति भारती कहती हैं कि अब तक भारत सरकार ने जो भी क़दम उठाए हैं, वो काफ़ी नहीं हैं.

वहीं उत्तर प्रदेश में बाल विवाह के लिए काम करने वाली संस्था सद्भभावना के योगेंद्र मणि त्रिपाठी कहते हैं कि साल 2025 तक बाल विवाह को शून्य करना मुश्किल है.
वे कहते हैं कि राज्य का श्रावस्ती ज़िला ऐसा है, जहाँ सबसे ज़्यादा बाल विवाह होते हैं. यहाँ सबसे ज़्यादा निरक्षरता और जच्चा बच्चा मृत्यु दर भी सबसे अधिक है.
वे कहते हैं- मैं ज़मीन पर काम करता हूँ. इसी आधार पर व्यक्तिगत तौर पर कह सकता हूँ कि साल 2025 तक संभव ये नहीं है. हमें जहाँ स्कूलों में बच्चों को प्रार्थना के बाद ये संकल्प दिलाना चाहिए कि वो बाल विवाह नहीं करेंगे, वहीं कन्या दान की मानसिकता को भी लोगों के ज़हन से हटाना होगा, क्योंकि कई माता-पिता ऐसे में लड़की की माहवारी आने से पहले ही उसकी शादी कर देते हैं.
साथ ही वे कहते हैं कि वे श्रावस्ती और बहराइच में धार्मिक गुरूओं को जोड़ेंगे, ताकि वो उन्हें जागरूक करें.
दूसरी ओर कृति भारती कहती हैं, ''हम शारदा एक्ट आने से पहले बाल विवाह ख़त्म करने की बात कह रहे हैं लेकिन ये 2023 चल रहा है लेकिन अभी तक बाल विवाह हो रहे हैं. बाल विवाह को ख़त्म किया जा सकता है, लेकिन सही दिशा निर्देश अपनाने होंगे."
वे बताती है कि तीन बातों पर ध्यान दिया जाए तो बाल विवाह को ख़त्म किया जा सकता है या बहुत हद तक उस पर अंकुश लगाया जा सकता है.

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उनका कहना है, ''पहला ये कि जो बाल विवाह हुए हैं, उनको निरस्त किया जाए. ऐसे में प्रभावित लोगों के लिए सरकार कोई स्कीम लेकर आए. वहीं असम में सरकार की तरफ़ से जो कार्रवाई हो रही है, उसे मैं न सही और न ग़लत कहूँगी. लेकिन ऐसी शादियों के ख़िलाफ़ सख़्त सज़ा का प्रावधान होना चाहिए लेकिन केवल ताज़ा मामलों में. तीसरा लोगों को समझाने की ज़रूरत है कि समाज तरक्क़ी कर रहा है. इंस्टा तक लोग चलाने लगे हैं लेकिन अपनी विचारधारा को नहीं बदल रहे हैं.''
उन्होंने कहा- हमें लोगों को बताने की ज़रूरत है कि कैसे बाल विवाह उनके बच्चों का वर्तनमान और भविष्य ख़राब कर रहे हैं.
वहीं ये भी देखा गया है कि अगर कोई व्यक्ति बाल विवाह को लेकर सूचना देता है, तो उनकी सुरक्षा को लेकर भी प्रावधान नहीं दिखते क्योंकि उनकी पहचान छिपाई ही नहीं जाती. ऐसे में लोग भी बताने से हिचकते हैं.
रविकांत कहते हैं, "जब हमने 'बाल विवाह मुक्त भारत' का कैंपेन चलाया, तो ये देखा कि राज्यों के शहरों से ही नहीं गाँव की महिलाओं ने भी हमारा समर्थन किया. जो ख़ुद बाल विवाह की भुक्तभोगी थीं और वो इस बात को मान रही थीं कि उनके साथ ग़लत हुआ. लेकिन वे अपनी बेटियों के साथ ऐसा नहीं होने देंगी."
वो बताते हैं, ''असम की कार्रवाई के बाद राज्यों में बाल विवाह रोकने के लिए अफ़सर बनाए जा रहे हैं. पंचायतों को भी ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है. हालाँकि क़ानून में ये पहले से था, लेकिन उसको अमलीजामा नहीं पहनाया जा रहा था. लेकिन अब आप देखिए ये क़दम उठाए जा रहे हैं. जिसका असर दिखाई देगा.''
रविकांत कहते हैं, ''जब केंद्रीय मंत्री ये कहती हैं कि हमें बाल विवाह को इतिहास बनाना है वहीं राज्य सरकार भी सख़्ती से क़दम उठाती है तो पुलिस, सिविल सोसाइटी तक संदेश साफ़ जाता है कि उनके संज्ञान में अगर ऐसे मामले आते हैं, तो उन्हें कार्रवाई करनी होगी और उन्हें मिलकर काम करना होगा. ''
वहीं राज्यों को भी ये संदेश सख़्ती से दिया गया है.
इस बीच पश्चिम बंगाल के महिला और बाल विकास और समाज कल्याण विभाग ने बाल विवाह को रोकने के लिए सभी संबंधित विभागों को कार्रवाई करने के लिए कहा है.
बाल विवाह निषेध क़ानून

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बाल विवाह निषेध अधिनियम साल 2006 के मुताबिक़ शादी के लिए एक लड़की उम्र की 18 साल और लड़के की उम्र 21 साल होनी चाहिए.
अगर इससे कम उम्र में लड़के और लड़की की शादी कराई जाती है, तो इसके लिए क़ानून में सज़ा का प्रावधान किया गया है.
इस क़ानून के तहत अगर किसी का बाल-विवाह होता है, तो वो बालिग होने के दो साल के भीतर शादी को कोर्ट में चुनौती देकर निरस्त करा सकते हैं.
वहीं राज्यों में बाल विवाह रोकने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, जिनका काम बाल विवाह रोकना, अगर कोई ऐसा करता है, तो बाल विवाह को लेकर साक्ष्य जुटाना, लोगों को जागरूक करना और काउंसलिंग करना शामिल है.
वहीं बाल विवाह की जानकारी सामने आने पर मजिस्ट्रेट को ऐसी शादी रोकने के अधिकार भी दिए गए हैं.
वैसे भारत में लड़के और लड़की की शादी की उम्र बढ़ाए जाने को लेकर सरकार विचार-विमर्श कर रही है.
जानकार मानते हैं कि बाल विवाह का मुख्य कारण जहाँ ग़रीबी है, वहीं वो एक महिला से हर संभावना को छीन लेता है जैसे समानता का अधिकार, पढ़ाई का अधिकार या नौकरी करने का अधिकार. वहीं कम उम्र में माँ बनना, उनके स्वास्थ्य पर भी असर डालता है.
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