असमः बाल विवाह के ख़िलाफ़ कार्रवाई के बीच गर्भवती किशोरी की मौत

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से
असम में बाल विवाह के मामलों को लेकर आए दिन हो रही पुलिस की धर-पकड़ के बीच बोंगाईगांव में एक गर्भवती किशोरी की मौत का मामला सामने आया है.
बताया जा रहा है कि 18 साल से कम उम्र की इस किशोरी के घर वालों ने प्रशासन की कार्रवाई के डर से घर में ही बच्चे को जन्म दिलाया जिसकी वजह से उनकी तबीयत बिगड़ गई और बाद में मौत हो गई.
प्रशासन का कहना है कि इस किशोरी की शादी बाल विवाह अधिनियम का उल्लंघन करते हुई थी.
परिवार वालों की लापरवाही के कारण घर पर बच्चे को जन्म देने के प्रयास के दौरान उसकी मौत हुई है.
पुलिस ने कहा है कि इस लड़की की मौत के कारण पता करने के लिए एक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच करवाई जाएगी.
किशोरी की मौत से जुड़े मामले की पुष्टि करते हुए बोंगाईगांव ज़िले के पुलिस अधीक्षक स्वप्निल डेका ने बीबीसी हिंदी को बताया, "इस किशोरी की मौत का मामला 5 फ़रवरी का है. बच्चे को जन्म देने के समय वो 18 साल की थीं लेकिन जब उनकी शादी हुई थी तब वो नाबालिग थीं. हम इस किशोरी की मौत जैसे मामलों को रोकने के लिए ही यह कार्रवाई कर रहे हैं."
स्वप्निल डेका ने कहा,"किशोरी की मौत अस्पताल में हुई थी. हमने उनके पति और पिता समेत दोनों परिवार के कुल पांच लोगों को गिरफ़्तार किया है.''
'' बाल विवाह से जुड़े मामलों में अबतक यहां 123 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है. हमने लगभग सभी मामलों में बाल विवाह निषेध क़ानून के साथ प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफ़ेंसेज़ ऐक्ट लगाया है."
बाल विवाह पर सख़्त असम सरकार
असम की बीजेपी सरकार राज्य में शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर को कम करने और ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह को रोकने के लिए बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत व्यापक स्तर पर कार्रवाई कर रही है.
कैबिनेट ने 14 साल से कम उम्र की नाबालिग लड़कियों से शादी करने वाले पुरुषों के ख़िलाफ़ पॉक्सो एक्ट के तहत सख़्त क़ानूनी कार्रवाई करने का फ़ैसला किया है.
असम पुलिस ने एक लिखित बयान जारी कर बताया कि राज्य के अलग-अलग ज़िलों में 9 फ़रवरी तक बाल विवाह से जुड़े कुल 4,135 मामले दर्ज किए गए है और 2,763 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.
इसी क्रम में बोंगाईगांव पुलिस ने गुरुवार को किशोरी के पति साहिनूर अली समेत पांच लोगों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया है.

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सरकारी अस्पताल का क्या है कहना?
बोंगाईगांव के सरकारी अस्पताल में हुई किशोरी की मौत के बारे में जानकारी देते हुए संयुक्त स्वास्थ्य निदेशक डॉ. परेश कुमार राय कहते हैं, "दरअसल यह एक किशोर गर्भावस्था का मामला है. किसी अनुभवहीन ने घर पर ही बच्चे की डिलीवरी करवाई थी. उस युवती को गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था. घर पर ही बच्चे का जन्म करवाने के कारण यह और जटिल हो गया. प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार पोस्ट-पार्टम हैमरेज के कारण लड़की की मौत हुई है. इस मामले की और जांच की जा रही हैं."
एक सवाल का जवाब देते हुए संयुक्त स्वास्थ्य निदेशक कहते है,"हमारे यहां किशोर गर्भावस्था के मामले पहले भी आते रहे हैं. इस मामले में युवती को देर से अस्पताल लाया गया था. हालांकि नवजात की सेहत फिलहाल ठीक है और उसकी चाइल्ड केयर यूनिट में चिकित्सा देखभाल की जा रही है."

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असम सरकार की आलोचना
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा का कहना है कि असम में नवजात और गर्भवती महिलाओं की मौत का प्रमुख कारण बाल विवाह है. इसलिए बाल विवाह के ख़िलाफ़ कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी. इस सामाजिक अपराध के ख़िलाफ़ हमे में सरकार को लोगों का समर्थन चाहिए.
हालांकि सरकार की इस कार्रवाई को लेकर काफी आलोचना हो रही है.
लोकसभा में कांग्रेस के उप नेता गौरव गोगोई ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर इस किशोरी की मौत के लिए निशाना साधा है जिसकी प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई थी.
कांग्रेस नेता गोगोई ने एक ट्वीट कर कहा, "इस मासूम बच्ची की मौत बीजेपी के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के हाथों हुई है, जिनके मूर्खतापूर्ण कदम के कारण गर्भवती किशोरियां प्रसव के लिए अस्पतालों से परहेज कर रही हैं. नवजात शिशु बिना मां के है और पिता जेल में है."
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गिरफ़्तारियों पर भी उठ रहे सवाल
पुलिस एक तरफ़ दावा कर रही है कि बाल विवाह के इन मामलों में किसी समुदाय विशेष को निशाना नहीं बनाया गया है लेकिन आलोचकों का कहना है कि ज़्यादातर गिरफ़्तारियां बंगाली मूल के मुसलमानों की हुई है.
राज्य सरकार ने निचले असम के जिन ज़िलों में बाल विवाह के ज़्यादा मामले होने के आंकड़े दिए है, उनमें बंगाली मूल के मुसलमान समुदाय की आबादी ज़्यादा है.

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बाल विवाह को लेकर सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील अंशुमन बोरा कहते हैं, "सरकार की कार्रवाई का जो तरीक़ा है उसपर कई सवाल हैं. क्योंकि बाल विवाह क़ानून 2006 में बना था, लेकिन इतने सालों में इसमें कुछ नहीं किया गया. ''
''जहां तक पॉक्सो लगाने की बात है तो ऐसे मामले में शादी की तारीख़ के तीन साल के भीतर पुलिस को चार्जशीट दाखिल करनी होती है, उससे पुराने मामलों में कोर्ट कार्रवाई नहीं कर सकता. लिहाजा सरकार जिस तरह क़रीब सभी मामलों में पॉक्सो लगा रही है वो मामले कोर्ट में नहीं टिक सकते."
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