दरकते पहाड़, इंसानी हड्डियों से भरी झील और नंदा देवी के कोप की कहानी

रूप कुंड

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इमेज कैप्शन, तमाम शोध के बावजूद साफ़ नहीं है कि झील में मौजूद सैकड़ों हड्डियां आईं कहां से
    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

उत्तराखंड में नंदा देवी से जुड़ी जो 'राज जात यात्रा' निकलती है, उसी रास्ते में है सैकड़ों इंसानी हड्डियों से पटी बर्फ़ानी झील- रूप कुंड.

कार्बन डेटिंग के अनुसार ये हड्डियां कम से कम 1200 साल पुरानी हैं. इन्हें लेकर इस इलाक़े में बहुत सारी लोक कथाएं मौजूद हैं. लेकिन पक्के तौर पर कोई नहीं जानता कि इन हड्डियों का रहस्य क्या है.

रूप कुंड की अस्थियों के बारे में अधिकतर कहानियाँ 'पहाड़ की पुत्री' नंदा देवी की पवित्रता से जुड़ी हैं. लोग मानते हैं कि जब-जब उन्हें 'दूषित' करने का प्रयास हुआ, देवी अपने रौद्र रूप में प्रकट हुई हैं.

चाहे वो काम वासना में जल रहे भैंसे की शक्ल के विशाल राक्षस मेखासूर के अंत की कहानी हो, या फिर कन्नौज के राजा की कहानी जिसमें तीर्थ पर गए शक्तिशाली महाराज ने भोग-विलास की वस्तुओं, नर्तकियों को साथ लाने की भूल की थी.

इतिहासकार, लेखक और पर्यावरणविद शेखर पाठक कहते हैं, "इन लोक कथाओं में एक प्रतीकात्मकता है."

साल 1808 तक तो इसे दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माना जाता था. माउंट एवरेस्ट से भी ऊँची. लेकिन बाद के वर्षों में उससे भी ऊँची कई चोटियों का पता चला. लेकिन नंदा देवी का सम्मान लोगों के मन में जस का तस बना रहा.

उत्तराखंड श्रृषि गंगा परियोजना

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इमेज कैप्शन, ग्लेशियर फटने से सुरंग में तेज़ सैलाब आया जिसमें मारे गए बहुतों के शव तक न निकाले जा सके

एक के बाद एक त्रासदी

नंदा देवी से लगभग 38 किलोमीटर दूर रूप कुंड जैसी ही कहानी दो साल पहले फ़रवरी 2021 में एक बार फिर उस वक्त दोहराई गई जब ऋषि गंगा बिजली परियोजना की साइट पर अचानक बाढ़ का पानी घुस जाने के कारण पनबिजली प्लांट का सुरंग 200 से अधिक लोगों की क़ब्रगाह में तब्दील हो गया.

कुछ शवों को छोड़कर अधिकतर के शव कभी नहीं मिले, और शायद अब भी सुरंग के किसी हिस्से में मानव कंकाल की शक्ल में ये शव तैर रहे हों या जम गए हों.

जोशीमठ जब से चर्चा में है, तब से नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन (एनटीपीसी) के तपोवन-विष्णुगढ़ प्रोजेक्ट की भी बात हो रही है. पर्यावरणविद और स्थानीय लोग इसे जोशीमठ के ज़मीन में धंसने की वजह बता रहे हैं.

हालांकि एनटीपीसी ने कहा है कि ये सुरंग शहर से दूर है और मकानों और दूसरी जगहों के दरकने और शहर के घंसने का उससे कोई लेना-देना नहीं है.

नंदा देवी का प्रवेश द्वार है जोशीमठ

हिमालय पर लिखी गई बेहतरीन क़िताबों में से एक 'बिकमिंग ए माउंटेन' में पर्वतारोही स्टेफ़ेन ऑल्टर लिखते हैं, "बहुत सारे हिंदू ये मानते हैं कि हिमालय का ऊपरी हिस्सा इंसानों की पहुंच से परे है. वहां देवताओं का निवास स्थान है और वहां जाना पवित्र शक्तियों का अनादर है."

शायद इसलिए हिमालय की गोद में बसे भारतीय राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को कुछ लोग 'देवभूमि' भी पुकारते हैं.

हिमालय के पहाड़

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हिमालय पर लिखी अपनी क़िताब में स्टेफ़ेन ऑल्टर 'राज जात यात्रा' के बारे में विस्तार से लिखते हैं.

क़िताब में एक जगह वो लिखते हैं, "समुद्र तल से 5029 मीटर की ऊँचाई पर मौजूद रूप कुंड साल के ज़्यादातर महीनों में जमी रहती है. सिर्फ़ जुलाई और सितंबर के महीने में यहां जमी बर्फ़ पिघलती है. इन कुछ हफ्तों के बीच जब बर्फ़ पिघलती है तो झील के छिछले और हरे रंग के पानी में सैकड़ों हड्डियां दिखने लगती हैं. वहाँ मानव कंकालों की मौजूदगी रहस्यमय है. किसी को यक़ीन के साथ मालूम नहीं कि उनके पीछे की असलियत क्या है."

राज जात यात्रा दुनिया की सबसे लंबी पहाड़ी यात्राओं में से एक है. इसमें लोग 290 किलोमीटर की यात्रा कई स्थानों पर रुकते हुए करते हैं. इस यात्रा में नंदा देवी को पालकी में बिठाकर उनके मायके से उनके ससुराल ले जाया जाता है.

राज जात यात्रा हर बारह साल में एक बार आयोजित होती है. यह यात्रा नौटी गांव (चमोली) से नंदाकिनी नदी तक की होती है, नंदाकिनी गंगा की धाराओं में से एक है.

पौराणिक कथाओं के अनुसार नंदा पहाड़ों की पुत्री थीं, जिनका विवाह शिव के साथ हुआ था.

राज जात यात्रा

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इमेज कैप्शन, राज जात यात्रा में नंदी को पालकी में बैठाकर मायके से सुसराल ले जाया जाता है, बड़ी यात्रा बारह साल में एक बार होती है

कन्नौज के राजा की कहानी

कई प्रचलित लोक कथाओं में से एक है कन्नौज के राजा की कहानी.

कन्नौज के राजा अपनी गर्भवती पत्नी के साथ नंदा देवी के दर्शन के लिए गए थे. लेकिन जब वो झील पार करने की कोशिश कर रहे थे तभी तूफ़ान आ गया. इस दौरान भय से रानी ने समय से पहले ही बच्चे को जन्म दे दिया. इस वजह से झील का जल दूषित हो गया. इससे क्रोधित देवी ने ओलों की भयंकर बारिश की जिसमें राजा-रानी और साथ आए लोगों की मौत हो गई.

स्टेफ़न ऑल्टर लिखते हैं, "जैसे-जैसे आप ऊपर बढ़ते जाते हैं, वहां पेड़-पौधों में बदलाव दिखने लगता है. उसी तरह नंदा पहाड़ी से जुड़ी कहानियों में भी बदलाव होने लगता है."

यहां के लोग कन्नौज के राजा से ही जुड़े कुछ दूसरे क़िस्से भी सुनाते हैं. वो कहते हैं कि राजा तीर्थ पर आए थे और अपने साथ ऐशोआराम की सारी चीज़ें भी लाए थे. बर्फ़ से पटे पहाड़ों की सुंदरता देख कर राजा ने नर्तकियों को नाचने का हुक्म दिया, जिससे देवी नाराज़ हो गईं. देवी ने इसे अपना निरादर माना उनके कोप से वहां मौजूद सभी लोगों की मौत हो गई.

प्रकृति, भूगोल और पर्यावरण की जानी-मानी प्रत्रिका नेशनल जियोग्राफ़िक ने नेचर कम्यूनिकेशन्स की एक स्टडी के हवाले से कहा है कि अस्थियों वाली झील को लेकर सवाल सुलझने की बजाए और उलझ गए हैं.

रूप कुंड

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इमेज कैप्शन, जब कुछ हफ्तों के लिए झील की बर्फ़ पिघलती है तो ये मानव अस्थियां दिखती हैं.

झील मेंकिसकी हड्डियाँ हैं?

पुराने अध्ययनों के दौरान डीएनए शोध में पाया गया था कि सभी अस्थियाँ दक्षिण एशियाई मूल के लोगों की थी. रेडियो कार्बन डेटिंग के मुताबिक़ यह घटना सन 800 के आसपास हुई होगी. इस आधार पर ये माना गया कि सभी लोग एक ही समय में मारे गए थे.

लेकिन चंद सालों पहले तीन दर्जन से अधिक कंकालों पर हुए जीनोम विश्लेषण में पाया गया कि इनमें से कुछ का संबंध यूनान से था.

यूनान के लोग इतने दुर्गम स्थान पर उस दौर में क्यों मौजूद थे? और अगर थे, तो क्या वो हिमालय से जुड़े एक पहाड़ की तीर्थ यात्रा में शामिल थे? इन सवालों ने पूरे मामले पर कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

वैसे यूनान से भारत का संबंध ईसा पूर्व 300 साल से पहले से रहा है. उस वक्त से यूनानी भारत आनेजाने लगे थे. यही दौर है जब सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस को हराकर चंद्रगुप्त ने मौर्य राजवंश की स्थापना की थी.

हाईडेलबर्ग यूनिवर्सिटी के मानव शास्त्र विभाग के विलियम सैक्स इस क्षेत्र की लंबी छानबीन के बाद राज जात यात्रा पर एक विस्तृत क़िताब लिख चुके हैं.

वो नेशनल जियोग्राफ़िक के टीवी शो के सिलसिले में उत्तराखंड के दौरे पर आए थे. वो कहते हैं "पूरा मामला समझ से परे है."

नंदा देवी

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इमेज कैप्शन, नंदा को पहाड़ों की बेटी माना जाता है, जिनका विवाह हिंदू देवता महादेव के साथ हुआ

प्रकृति के कोप का मर्म

साल 1808 तक नंदा देवी को दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ समझा जाता था. 'ग्रेट ट्राइगोनोमेट्रिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया' के बाद ये दुनिया में 23वें स्थान पर आ गया. मगर स्टेफ़न ऑल्टर के अनुसार उसकी पवित्रता को लेकर जो भावना जनमानस के मन में है उसमें किसी तरह की कमी नहीं आई.

पर्वतारोही पहली बार नंदा देवी की चोटी पर 1936 में पहुंच पाए थे. कहते हैं उसके बाद गढ़वाल और कुमांऊ में भयंकर बाढ़ आई थी. कुछ स्थानीय लोग मानते हैं कि ऐसा देवी के प्रकोप के कारण हुआ.

जानेमाने पर्यवरणविद् चंदी प्रसाद भट्ट इन बातों के बारे में कहते हैं, "ये उंगली से चाँद दिखाने जैसा है, बहुत सारे लोगों को उसमें उंगली दिखती है चांद नहीं. यानी इन कहानियों के गंभीर मर्म को समझना चाहिए."

वे मानते हैं कि मानवीय गतिविधियों की वजह से प्रकृति का कोप नया नहीं है. जोशीमठ का दरकना भी ऐसी अंतिम घटना नहीं है.

अप्रैल 1976 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को चंदी प्रसाद भट्ट ने कुछ पत्र लिखे थे. इसके बाद महेश चंद्र मिश्र कमेटी का गठन हुआ था, जिसने भौगोलिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में बड़ी परियोजनाओं पर मनाही की सिफ़ारिश की थी. कमेटी ने जंगल लगाने जैसे कई दूसरे सुझाव भी दिए थे.

चंदी प्रसाद भट्ट 1970 के दशक में हुए चिपको आंदोलन के अहम नेताओं में से एक थे. आंदोलन जुलाई 1970 में आए भंयकर बाढ़ के बाद ज़ोर पकड़ता गया था.

लाखों साल पहले भारत और यूरेशिया के भूगर्भीय परतों के टकराने से बनी 2900 किलोमीटर लंबी एक पट्टी बनी थी जिसमें हिमालय के निचले हिस्से आते हैं. इसमें भारत, तिब्बत और नेपाल के हिस्से आते हैं. यहां पर हमेशा भूकंप की आशंका बनी रहती है.

यही वजह है कि यहाँ निर्माण पर रोक की सलाह 'जियोग्राफ़िकल सर्वे ऑफ़ इंडिया' से लेकर कई दूसरी संस्थाओं की तरफ़ से आती रही है. लेकिन हाल के सालों में पनबिजली परियोजनाओं से लेकर, उत्तराखंड में हर मौसम में चालू रह सकने वाली सड़कों का काम तेज़ी से बढ़ा है.

जोशीमठ

लगातार जारी हैं प्रोजेक्ट

यह लगातार चलने वाली बहस है जिसमें विकास और पर्यावरण का संरक्षण, दोनों पक्षों की तरफ़ से ढेर सारी दलीलें दी जाती हैं. न तो विकास की ज़रूरत से इनकार किया जा सकता है और न ही पर्यावरण बचाने की ज़रूरत से. सारा मतभेद इस बात को लेकर होता है कि सही संतुलन क्या है.

उत्तराखंड सरकार की बेवसाइट के अनुसार चार धाम सड़क परियोजना के तहत बारह हज़ार किलोमीटर सड़कों का जाल बिछेगा जिससे गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ जाना बेहद आसान होगा. सामरिक दृष्टि से भी ये बेहद अहम होगा क्योंकि तिब्बत का एक इलाक़ा उत्तराखंड की सीमा से लगता है.

प्रधानमंत्री ने इस प्रोजेक्ट के बारे में कहा था, "ये 2013 की केदारनाथ त्रासदी में जान गंवा चुके लोगों को श्रद्धांजलि है."

2013 की बाढ़ को उस समय के अख़बारों और मीडिया ने हिमालय की सुनामी नाम दिया था. सुनामी जैसा ये था भी, क्योंकि इसमें मंदिरों से लेकर घर, इमारतें, गाड़ियां और इंसान तिनकों की तरह बह गए थे.

उत्तराखंड के लोगों के लिए ये सिलसिला 1880, 1936, 1978 की बाढ़, 1991, 1999 जैसे भूकंप के रूप में बार-बार जारी रहा है. स्थानीय लोग यही मानते हैं कि यह सभी आपदाएँ नंदा देवी का अनादर करने से आती हैं.

2021 की तपोवन त्रासदी को लेकर ये भी कहा गया कि ये उस 'रेडियोएक्टिव सेंसर' के कारण हुआ था जिसे नंदा देवी पर लगाया जाना था ताकि चीन पर नज़र रखी जा सके.

लेकिन अचानक आए तूफ़ान के कारण बीच में ही परियोजना को रोकना पड़ा. बाद में एक टीम वहाँ गई तो वह सेंसर भी नहीं मिल सका. शायद वह बर्फ़ में दफ़न हो गया.

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