पुराने क़िले की सीढ़ियों से गिर कर हुई थी हुमायूँ की मौत

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हुमायूँ के बारे में कहानी मशहूर है कि एक बार वो बहुत बीमार पड़ गए. दिनोंदिन उनकी हालत ख़राब होती जा रही थी. उनके पिता बाबर ने उनकी पलंग के तीन चक्कर लगाए और प्रार्थना की, 'ऐ ख़ुदा अगर ज़िंदगी के बदले ज़िंदगी दी जा सकती हो, तो मैं बाबर, अपने बेटे हुमायूँ की ज़िंदगी के बदले अपनी ज़िंदगी देता हूँ.'
हुमायूँ की बहन गुलबदन हुमायूँ की जीवनी में लिखती हैं, 'उसी दिन से बाबर की हालत बिगड़ने लगी और हुमायूँ ठीक होते चले गए. बाबर बिस्तर पर पड़ गए. जब ये लगने लगा कि अब वो नहीं बचेंगे, तो हुमायूँ को सम्भल से बुलाया गया.
हुमायूँ अपने पिता की मौत से चार दिन पहले आगरा पहुंचे. बाबर ने अपने सारे सिपहसालारों को इकट्ठा कर कहा कि हुमायूँ मेरा वारिस होगा. आपको उसी तरह उसका ख़्याल रखना होगा जैसा आपने मेरा रखा है. हुमायूँ को उनकी सीख थी कि वो अपनी प्रजा और भाइयों का ख़्याल रखे और उनके साथ दया से पेश आए.'

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इब्राहिम लोदी के ख़िलाफ़ बाबर के अभियान में भाग लिया
हुमायूँ का जन्म 6 मार्च, 1508 को काबुल में हुआ था. जब वो भारत की गद्दी पर बैठे तो उनकी उम्र मात्र 27 साल थी. इस छोटी सी उम्र में ही उन्होंने वो सब अच्छे और बुरे गुण दिखा दिए, जो अंत तक उनके साथ रहे और जिनकी वजह से उन्हें कभी कामयाबी मिली तो कभी घोर निराशा. 12 साल की उम्र में बाबर ने हुमायूँ को बदक्शाँ का गवर्नर बनाया था. 17 साल की उम्र में भारत अभियान में हुमायूँ अपने पिता के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़े थे.
बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में लिखा, 'मैंने हुमायूँ को हिसार फ़िरूज़ा के गवर्नर के नेतृत्व में इब्राहिम लोदी की अग्रिम टुकड़ी का सामना करने को भेजा था. जब उसने लोदी के सैनिकों को हरा दिया, तो मैंने हुमायूँ को हिसार फ़िरूज़ा जागीर के तौर पर दे दी.
पानीपत में जीत के बाद मैंने उसे आगरा पर क़ब्ज़ा करने के लिए भेजा. वहाँ ग्वालियर के राजा के परिवार ने उसे एक बड़ा हीरा दिया, जिसकी क़ीमत से पूरी दुनिया के लोगों को ढाई दिन तक खाना खिलाया जा सकता था. जब मैं आगरा पहुंचा तो मेरे बेटे ने वो हीरा मुझे नज़्र किया, लेकिन मैंने वो हीरा उसे वापस कर दिया.'
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साम्राज्य मज़बूत बनाने की इच्छाशक्ति
बाबर की मौत के समय मुग़ल शासन अपने आप को इतना असुरक्षित महसूस कर रहा था कि तीन दिनों तक उनकी मौत की बात बाहरी दुनिया से छिपा कर रखी गई. 30 दिसंबर, 1530 को हुमायूँ भारत की गद्दी पर बैठे.
एसएम बर्के अपनी किताब, 'अकबर द ग्रेटेस्ट मुग़ल' में लिखते हैं, 'हुमायूँ को घुड़सवारी और तीरंदाज़ी में महारत हासिल थी, लेकिन उनके पास अपनी जीत को और मज़बूत बनाने की इच्छाशक्ति का अभाव था. उनमें नेतृत्व के करिश्मे की भी कमी थी और कई बार उनके साथियों ने उनका साथ तब छोड़ा, जब उन्हें उनके साथ की बहुत अधिक ज़रूरत थी. लेकिन हुमायूँ के पास बाधाओं के दौरान हिम्मत न हारने का गुण भी था, जिसकी वजह से आख़िर में वो अपनी खोई हुई गद्दी पाने में सफल हो गए थे.'
सम्राट के रूप में अपने पहले अभियान में 1531 में हुमायूँ ने जौनपुर के पास महमूद लोदी को हराया था. सन् 1534 में उन्हें शेरशाह की बढ़ती ताक़त को कुचलने के लिए पूर्व में जाना पड़ा था. लेकिन इससे पहले कि वो वहाँ पहुंच पाते उन्हें बहादुर शाह के ख़तरे से निपटने के लिए वापस लौटना पड़ा था. इसका नतीज़ा ये रहा कि शेरशाह की ताक़त पहले से कहींअधिक बढ़ गई. सन 1534-35 में हुमायूँ ने मालवा और गुजरात पर जीत दर्ज की.
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चौसा की लड़ाई में हुमायूँ की हार
मार्च 1537 में शेरशाह पर नियंत्रण पाने के लिए हुमायूँ एक बार फिर पूर्व की ओर चले. उन्होंने बंगाल की राजधानी गौड़ पर क़ब्ज़ा भी कर लिया. उस ज़माने के मशहूर इतिहासकार जौहर आफ़ताबची अपनी किताब 'तज़किरात-उल-वक़ीयत' में लिखते हैं, 'गौड़ पर क़ब्ज़े के बाद हुमायूँ ने अपने आप को अपने हरम में क़ैद कर लिया और काफ़ी समय तक उससे बाहर ही नहीं आए. तब तक शेरशाह ने बनारस और जौनपुर पर क़ब्ज़ा कर लिया और राजधानी लौटने के हुमायूँ के रास्ते पर रोड़े अटका दिए.'
वे लिखते हैं, '7 जून, 1539 को चौसा में हुई लड़ाई में हुमायूँ की हार हुई. इस लड़ाई में हुमायूँ ने ख़ुद भाग लिया और उसकी बाँह में एक तीर भी लगा. जब उन्होंने अपने सैनिकों को आगे बढ़ने का आदेश दिया तो किसी भी सैनिक ने उनका आदेश नहीं माना. हुमायूँ को अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा. गंगा को पार करते समय उनका घोड़ा नदी की तेज़ धार में बह गया. एक भिश्ती ने अपनी मुश्क देकर हुमायूँ को डूबने से बचाया. बाद में हुमायूँ ने उस भिश्ती को आधे दिन के लिए अपनी गद्दी पर बैठाकर उसका एहसान चुकाया.'
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कन्नौज में भी हार का स्वाद चखा
अगले साल हुमायूँ अपनी हार का बदला लेने निकले, लेकिन उनके कई साथियों ने उनका साथ छोड़ दिया और 17 मई, 1540 में कन्नौज में शेरशाह सूरी के हाथों उनकी एक बार फिर हार हुई, जबकि हुमायूँ के सैनिकों की संख्या शेरशाह के सैनिकों से कहीं अधिक थी.
जौहर आफ़ताबची लिखते हैं, 'अफ़गान सैनिक, हुमायूँ की आँखों के सामने उनके तोपख़ाने को लूट रहे थे. तभी हुमायूँ ने एक पुराने हाथी को देखा जो एक ज़माने में उनके पिता के पास हुआ करता था. वो उस हाथी पर बैठ गये, लेकिन तभी उन्हें लगा कि हाथी का महावत उन्हें दुश्मन के ख़ेमे की तरफ़ ले जा रहा है. हौदे में छिपे हुए एक किन्नर ने हुमायूँ से फुसफुसा कर कहा कि वो महावत का सिर अपनी तलवार से कलम कर दें. लेकिन हुमायूँ को हाथी पर सवारी करना नहीं आता था और महावत के बिना वो आगे नहीं बढ़ पाते. लेकिन किन्नर ने उनसे कहा कि वो थोड़ा बहुत हाथी पर सवारी करना जानता है और उन्हें सुरक्षित जगह पर ले जाएगा. हुमायूँ ने अपनी तलवार से महावत का सिर धड़ से अलग कर दिया.'
अकबरनामा में अबुल फ़ज़ल ने भी इस घटना को बताया है, लेकिन उन्होंने हौदे में मौजूद किन्नर का कोई ज़िक्र नहीं किया है. हैदर मिर्ज़ा दोग़लत अपनी किताब 'तारीख़-ऐ- रश्बिदी' में लिखते हैं, 'उस दिन हुमायूँ के साथ 17,000 सैनिक लड़ रहे थे. लेकिन जब वो वहाँ से भागे तो वो अकेले थे. उनके सिर पर न तो कोई टोपी थी और न ही पैर में जूते. जूतों के साथ-साथ उनका आत्मविश्वास भी ठंडा पड़ गया था.'
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भाइयों से मतभेद
हुमायूँ ने कन्नौज से आगरा तक का सफ़र उधार लिए हुए घोड़े पर बैठ कर तय किया. लेकिन उनकी हार की ख़बर उनसे पहले ही आगे की तरफ़ पहुंच चुकी थी. जौहर लिखते हैं कि 'आगरा के आधे रास्ते में भानगाँव के पास क़रीब 3,000 ग्रामवासियों ने हुमायूँ को रोक लिया. इन गाँव वालों को हारी हुई सेना से लूटपाट करने में महारत हासिल थी. हुमायूँ ने अपने भाइयों हिंदाल और अस्करी से इन गाँववालों से निपटने के लिए मदद माँगी, लेकिन वे लोग आपस में ही लड़ने लगे. किसी तरह हुमायूँ उन गाँववालों से पार पा आगरा पहुंचने में सफल रहे.'
लेकिन जुलाई, 1540 में अपने पिता के मरने के 10 साल बाद हुमायूँ को आगरा भी छोड़ना पड़ा.
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जब हुमायूँ आगरा से भागने लगे तो शेरशाह ने उनका पीछा करने के लिए अपने राजपूत सिपहसालार बह्मदत्त गौड़ को एक बड़े दस्ते के साथ लगा दिया.
अब्बास सरवानी लिखते हैं, गौड़ को निर्देश थे कि वो हुमायूँ से लड़ने के बजाए सिर्फ़ उनका पीछा करें. हुमायूँ का पीछा करने का उद्देश्य उन्हें पकड़ना नहीं, उन्हें हिंदुस्तान से खदेड़ देना था. हिंदाल और अस्करी दोनों शेरशाह के ख़िलाफ़ पहले अभियान में हुमायूँ के साथ गए थे, लेकिन गौड़ में हिंदल ने उनका साथ छोड़ कर आगरा लौटने का फ़ैसला किया था.
वहाँ उसने हुमायूँ की अनुपस्थिति में सत्ता संभाल ली थी और वहाँ उसके नाम से ख़ुतबा पढ़ा जाने लगा. हुमायूँ ने शेरशाह से लड़ने के लिए अपने भाइयों के सामने एकता का प्रस्ताव रखा, लेकिन उसे उनके भाई कामरान ने नहीं माना. वो अपने सैनिक लेकर लाहौर के लिए रवाना हो गया.
गुलबदन बेगम लिखती हैं, 'लाहौर से हुमायूँ ने शेरशाह के लिए संदेश भेजा, मैंने पूरा हिंदुस्तान आपके लिए छोड़ दिया है. मुझे कम से कम लाहौर में तो रहने दीजिए. शेरशाह का जवाब था, मैंने तुम्हारे लिए काबुल छोड़ रखा है. तुम वहाँ क्यों नहीं चले जाते? अगले 15 साल हुमायूँ ने दिल्ली की गद्दी से दूर ईरान, सिंध और अफ़ग़ानिस्तान में बिताए.
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भारत पर हमला
मई 1545 में शेरशाह का एक विस्फोट में निधन हो गया. सन् 1553 में उसके बेटे की भी मौत हो जाने के बाद साम्राज्य बिखरने लगा. सन् 1554 में काबुल में ख़बरें आने लगीं कि सलीम शाह सूरी का देहांत हो गया और उनके बेटे को उनके चाचा ने मार डाला. तभी हुमायूँ ने भारत पर हमला कर अपना खोया हुआ साम्राज्य फिर से पाने का मन बनाया.
जब नवंबर के मध्य में हुमायूँ ने काबुल से भारत के लिए कूच किया तो उनके पास 3,000 सैनिक थे. जब हुमायूँ ने भारत पर चढ़ाई करने के अभियान के दौरान दिसंबर 1554 में सिंधु नदी पार की, तब तक सूरी वंश के तीन दावेदार हो चुके थे. उनमें सबसे प्रमुख था सिकंदर शाह, जिनका दिल्ली से लेकर पंजाब में रोहतास तक नियंत्रण था. इस अभियान में भाग लेने के लिए हुमायूँ ने कंधार से बैरम ख़ाँ को बुलवा भेजा था. उसके साथ उनका 12 साल का बेटा अकबर भी था.
24 फ़रवरी, 1555 को जब हुमायूँ ने लाहौर में प्रवेश किया तो उन्हें किसी विरोध का सामना न करना पड़ा. सरहिंद में हुई लड़ाई में अकबर ने एक डिवीज़न का नेतृत्व किया. सिकंदर लड़ाई के मैदान से भाग खड़ा हुआ और पंजाब के जंगलों में छिप गया. 23 जुलाई, 1555 को हुमायूँ की सेना ने दिल्ली में प्रवेश किया. लेकिन भाग्य ने बहुत दिनों तक उनका साथ नहीं दिया.
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सीढ़ियों पर पैर फिसला
24 जनवरी, 1556 को हुमायूँ ने गुलाब जल मंगवा कर अफ़ीम की आख़िरी ख़ुराक ली. दोपहर उसने हज यात्रा से वापस आए कुछ लोगों से मुलाक़ात की. उन्होंने उन्हें लाल पत्थर से बने अपने पुस्तकालय में मिलने के लिए बुलाया जो छत पर था. छत पर मिलने का एक कारण और भी था कि बग़ल की मस्जिद में जुमे की नमाज़ के लिए इकट्ठा हुए लोग अपने बादशाह की झलक पा सकें. मुलाक़ात के बाद हुमायूँ ने अपने गणितज्ञ को इस बात की पुष्टि करने के लिए तलब किया कि उस दिन आसमान में शुक्र ग्रह दिखाई देगा, ताकि वो इस पवित्र मौक़े पर कुछ लोगों के प्रमोशन के आदेश जारी कर सकें.
गुलबदन बेगम हुमायूँ की जीवनी में लिखती हैं, 'उस दिन ठंड ज़्यादा थी और तेज़ हवा चल रही थी. हुमायूँ ने सीढ़ियों से नीचे उतरना शुरू किया. अभी वो दूसरी सीढ़ी पर पहुंचे ही थे कि तभी पास की एक मस्जिद से अज़ान की आवाज़ सुनाई दी, 'अल्लाह हो अकबर.' हुमायूँ एक धार्मिक शख़्स थे. जैसे ही उनके कानों में अज़ान की आवाज़ सुनाई दी, उन्होंने झुक कर सजदे में बैठने की कोशिश की. तभी उनका पैर उनके जामे के घेरे में फंस गया. उनका पैर फिसला और सम्राट सिर के बल सीढ़ियों पर गिरते चले गए. उनके साथ चल रहे उनके सहायकों ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हुए. जब वो सब भागते हुए नीचे पहुंचे तो हुमायूँ ज़मीन पर पड़े हुए थे. उनके सिर पर गहरी चोट लगी हुई थी और उनके दाहिने कान से ख़ून की एक धार बह रही थी.'
हुमायूँ ने फिर अपनी आँखें नहीं खोली. गिरने के तीन दिनों बाद सुल्तान की मौत हो गई.
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किताबों के शौक़ीन थे हुमायूँ
हुमायूँ की नेतृत्व करने की क्षमता हमेशा सवालों के घेरे में रही, लेकिन उनमें कुछ दूसरे गुण थे. उन्हें पढ़े लिखे-लोगों और शायरों का साथ बहुत पसंद था. दक्षिण में अपने अभियान के दौरान वो अपने साथ कई दुर्लभ किताबें ले कर गए थे.
अबुल फ़ज़ल लिखते हैं, 'उश्तर ग्राम में जीत के बाद जब उन्हें किपचक के पास हार के दौरान खोई हुई अपनी कुछ किताबें मिलीं, तो हुमायूँ खुशी से झूम उठे. ईरान में रहने के दौरान उनके दल में हमेशा एक लाइब्रेरियन रहता था. जहाँ कहीं भी शाही शिविर लगता था, वहाँ लाइब्रेरियन की उपस्थिति ज़रूरी रहती थी.'
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ज्योतिष में हुमायूँ का बहुत विश्वास था. वो हर दिन ग्रहों के रंग के हिसाब से कपड़े पहनते थे.
अल बदाऊँनी अपनी किताब 'मुंतख़बुत तवारीख़' में लिखते हैं, 'चलना शुरू करने से पहले हुमायूँ अपना दाहिना क़दम सबसे पहले बढ़ाते थे. अगर कोई शख़्स उनके कक्ष में बायां क़दम बढ़ा कर प्रवेश करता था तो वो उससे बाहर जाकर दोबारा दाहिने क़दम के साथ अंदर आने के लिए कहते थे.'
प्रकृति और कला के प्रति हुमायूँ की दिलचस्पी इस हद तक थी कि एक बार सिंध में जब एक सुंदर पक्षी उनके तंबू में घुस गया, तो उन्होंने तंबू का दरवाज़ा बंद करवा दिया और एक चित्रकार को बुलवाकर उस पक्षी की तस्वीर बनवाई. तस्वीर बन जाने के बाद उन्होंने उस पक्षी को छुड़वा दिया.
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