दिल्ली की ये लड़ाई मुग़ल अंग्रेज़ों से हारे थे

अंग्रेज़ों की लड़ाई

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    • Author, आर.वी. स्मिथ
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

सितंबर आते ही दिल्ली दो सालगिरह मनाती है. 10 सितंबर को दिल्ली की लड़ाई लड़ी गई और ब्रिटिश ताकतों ने वापस दिल्ली को 19 सितंबर पर कब्ज़ा कर लिया, जिसके बाद ब्रिगेडियर-जनरल जॉन निकलसन ने अंतिम सांस ली. दिल्ली की लड़ाई 214 साल पहले 1803 में लड़ी गई थी.

इसी तरह दिल्ली में कई लड़ाइयां लड़ी गईं जो 1191-92 में शुरू हुईं. इसमें मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच लड़ी गई लड़ाई है. साथ ही मंगोलों और अलाउद्दीन ख़िलजी के बीच की लड़ाई है. पानीपत में तीन लड़ाइयां लड़ी गईं बाबर और इब्राहीम लोधी के बीच, अकबर और हेमू के बीच और मराठों और नादिर शाह के उत्तराधिकारी अहमद शाह अब्दाली के बीच.

पानीपत की लड़ाइयां हालांकि दिल्ली पर कब्ज़े के लिए लड़ी गई थीं और भी कई ऐतिहासिक तथ्य इस शहर के साथ जुड़े हुए हैं. इन सभी लड़ाइयों में आक्रामणकारियों की जीत हुई. हालांकि, अलाउद्दीन खिलजी मंगोलों का पीछा करने में सफ़ल रहे थे.

दिल्ली का कश्मीरी गेट

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इमेज कैप्शन, दिल्ली के कश्मीरी गेट के पास है तीस हज़ारी

मराठों और अंग्रेज़ों की लड़ाई

शाह आलम के कार्यकाल में तीस हज़ारी में दिल्ली पर हमला करने के इरादे से बघेल सिंह के नेतृत्व में 30 हज़ार सिखों ने डेरा डाला था, लेकिन उनको वापस लौटना पड़ा. बेग़म सुमरू की चालाकी का शुक्रिया जो उन्होंने सम्राट को अपमानित होने से बचा लिया. इसके बाद उन्हें सम्राट की प्रिय बेटी के ख़िताब से नवाज़ा गया.

हालांकि, इतिहास में 'दिल्ली की लड़ाई' सिंधिया के मराठों और अंग्रेज़ों के बीच हुए युद्ध के रूप में दर्ज है. मुग़ल सम्राट की ओर से लड़ने का ढोंग भी किया जा रहा था क्योंकि शाह आलम ख़ुद हिचकिचा रहे थे कि वह किसका समर्थन करें.

यह लड़ाई उत्तर पूर्वी दिल्ली में 11 सितंबर 1803 को लड़ी गई, जो इलाका आज के पटपड़गंज इलाके में आता है. यह इलाका युद्ध स्थल था.

परसिवल स्पीयर अपनी किताब 'ट्वाइलाइट इन दिल्ली' में लिखते हैं, ''ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेज़ली का लक्ष्य मुग़ल सम्मान की रक्षा करना था और वह भी अपने उच्चाधिकारियों को बिना बताए. वहीं, शाह आलम अपने शाही अभिमान को किसी भी कीमत पर बरकरार रखना चाहते थे.''

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लॉर्ड वेलेज़ली की झूठी ज़बान

लॉर्ड वेलेज़ली के एजेंट ब्रिटिश कमांडर इन चीफ़ लॉर्ड लेक थे और उनके दिल्ली में एजेंट सैयद रज़ा ख़ान थे. जुलाई और अगस्त के बीच शाह आलम ने मराठों को मदद और शिकायत के पत्र लिखे जिसमें उन्होंने ब्रितानी व्यवहार और युद्ध के भविष्य पर बात की थी. दरअसल, शाह आलम एक तरह से आभासी तौर पर मराठों के कैदी बने हुए थे.

27 जुलाई 1803 को वेलेज़ली ने निजी पत्र में शाह आलम को आश्वासन दिया कि अगर वह उनकी शरण स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें हर सम्मान दिया जाएगा, उनके और उनके परिवार के लिए ब्रिटिश सरकार पूरा समर्थन देगी और उनको पर्याप्त सुविधाएं दी जाएंगी.

स्पीयर ऐसा भी कहते हैं कि गवर्नर जनरल ने जो भरोसा दिलाया था वह झूठी ज़बान थी. सम्मान और व्यक्तिगत सुरक्षा देने के अलावा वह चाहते थे कि लेक शाह आलम से आग्रह करें और उनके उत्तराधिकार अकबर-द्वितीय को बंगाल के मुंगेर (अब बिहार में) भेजें.

हालांकि, सिंध के विजेता सर चार्ल्स नेपियर का कहना था कि सम्राट को माफ़ी देकर अकबर द्वारा बसाई गई राजधानी फ़तेहपुर सीकरी भेज दिया जाए जो वहां वह एक ग़ुमनाम सम्राट की तरह रहें.

लाल क़िला

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अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ही लड़ाई छेड़ दी

शाह आलम ने 29 अगस्त को अंग्रेज़ों से समर्थन मांगा, लेकिन एक सितंबर को फ़्रांस के पत्र के आधार पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई का एलान कर दिया. इसके बाद युद्ध शुरू हुआ और गुरिल्ला युद्ध भी लड़ा गया. इसमें फ्रेंच कमांडर और दिल्ली के स्थानीय सैनिक थे जिन्होंने जंग में हिस्सा लिया. गलियों और मोहल्लों में भाले और तलवारों के साथ जंग लड़ी गई.

दिल्ली के लोग और यहां तक लाल किले में मौजूद सम्राट और उनका परिवार किसी जादू की कल्पना कर रहे थे, लेकिन तब तक दिल्ली पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो चुका था जो अगस्त 1947 तक रहा. यह एक घटना है जिसे दिल्ली के इतिहास में कई सालों तक याद नहीं किया गया.

हालांकि, 19 सितंबर को इस लड़ाई में मारे गए अपने पूर्वजों को कुछ ब्रिटिश पर्यटक श्रद्धांजलि देने आते हैं. इसके 44 साल बाद 1857 में अंग्रेज़ों ने फ़िर एक बार दिल्ली की ओर कूच किया था.

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