दिल्ली: द्वारका के लोगों ने ऐसा क्या किया कि इस जगह का धंसना बंद हुआ?

एक प्रवासी मज़दूर द्वारका में एक पानी के टैंकर से पानी ले जाता हुआ. तस्वीर 2015 की है.

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इमेज कैप्शन, एक प्रवासी मज़दूर दिल्ली के द्वारका में एक पानी के टैंकर से पानी ले जाता हुआ. तस्वीर 2015 की है.
    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तराखंड के जोशीमठ में सैंकड़ों इमारतों में दरार इसलिए पड़ी क्योंकि वहां निर्माण कार्य अंधाधुंध तरीक़े से जारी रहा और उस बीच वहां बेलगाम तरीक़े से पानी का दोहन किया जाता रहा, जिसके कारण ज़मीन में पानी का स्तर भी नीचे चला गया.

ज़ाहिर है, ज़मीन धंसने लगी और जानकारों को लगता है कई दूसरे शहरों का भी यही हश्र हो सकता है, लेकिन इस बीच पानी के लिए तरस चुकी दिल्ली की एक बड़ी कॉलोनी ने वो कर दिखाया जिससे न सिर्फ़ ज़मीन का धंसना बंद हुआ बल्कि ज़मीन के नीचे पानी के स्तर में सुधार भी आया.

सुधा सिन्हा और उनके परिवार ने भविष्य की प्लानिंग करते हुए 1998 में दिल्ली के द्वारका इलाक़े में बसने का फ़ैसला लिया था.

अब 54 साल की हो चुकीं सुधा और उनकी ज्वाइंट फ़ैमिली के इस फ़ैसले के पीछे दो बड़े कारण थे. एक तो द्वारका दिल्ली हवाईअड्डे के क़रीब था और दूसरा, यहां के प्लान में हरियाली पर काफ़ी ध्यान दिया जाना था.

लेकिन इस परिवार की ख़ुशी बहुत कम समय तक रही. सुधा कहती हैं, "हमें पता चला कि इलाक़े में सरकारी पानी की तो सप्लाई ही नहीं है और हमें बोरिंग से निकाले गए पानी को सुबह-शाम स्टोर करना पड़ता था क्योंकि बिजली भी खूब कटती थी उन दिनों."

सुधा सिन्हा
इमेज कैप्शन, पानी की किल्लत के ख़िलाफ़ स्थानीय निवासी और सुधा सिन्हा (बीच में) ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया.

जल संकट की शुरुआत

द्वारका के एक आधुनिक शहर की तर्ज़ पर स्थापना से पहले, यहां का अधिकतर क्षेत्र 'पप्पनकलां' के नाम से जाना जाता था.

भारत के पुरातत्व विभाग के मुताबिक़ इलाक़े में खुदाई से पता चलता है कि जहां अब द्वारका है, दिल्ली के लोधी शासकों के दौर में वहां 'लोहारहेड़ी' नाम का गांव था.

बहरहाल, इलाक़े में बढ़ती आबादी के चलते यहां पानी की ज़रूरत बढ़ती रही और पिछले 50 सालों में यहाँ हज़ारों बोरवेल डाले गए जिसमें से कुछ को तो 60 मीटर खुदाई के बाद पानी मिला.

सुधा सिन्हा के अपार्टमेंट में रहने वाले क़रीब चार दर्जन परिवार भी बोरवेल से निकाले गए पानी पर आश्रित थे.

लेकिन परिवार की मुश्किलें और गहराईं जब पानी का बुरा असर उनकी त्वचा पर दिखने लगा और उनके बाल झड़ने लगे. दरअसल, ज़मीन से निकाले गए पानी में टीडीएस, खनिज, नमक और लेड जैसी धातु बड़ी मात्रा में थे.

1991 से द्वारका में रहने वाले पूर्व पुलिस अधिकारी महेंद्र गलहन के मुताबिक़, "सभी की ज़िंदगियाँ बोरवेल के पानी पर ही टिकी थीं. हर दो-चार साल बाद जलस्तर नीचे जाता था और फिर से खुदाई होती थी. हमें भविष्य की चिंता सताने लगी थी".

बोरवेल के पानी पर दबाव बढ़ता गया तो जलस्तर भी घटता गया. इस बीच दिल्ली सरकार ने पानी के टैंकरों के माध्यम से अपार्टमेंट्स में पानी पहुँचाने का काम शुरू किया.

सुधा सिन्हा उस दौर को याद करते हुए बताती हैं, "तमाम नए अपार्टमेंट्स बन रहे थे, स्कूल बन रहे थे और सरकारी दफ़्तर द्वारका शिफ़्ट हो रहे थे. टैंकर से पानी आना शुरू तो हुआ लेकिन उसकी एक क़ीमत थी, जो आरडब्लूए को चुकानी पड़ती थी, फ़्लैट में रहने वालों को चुकानी पड़ती थी. टैंकर मालिकों ने अनाप-शनाप दाम भी रखने शुरू कर दिए थे".

पानी की कमी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

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एक साल में द्वारका 3.5 सेंटीमीटर धंसा

साल 2004 के आते-आते सुधा सिन्हा और उनकी तरह द्वारका में रहने वाले कई लोग अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने लगे. मांग एक ही थी, जैसा पूरी दिल्ली में होता है वैसे ही दिल्ली सरकार यहां भी स्वच्छ पानी की सप्लाई चालू करे.

धरने हुए, प्रदर्शन हुए और चुनावों को बहिष्कार करने तक की मांग हुई, लेकिन इस बीच एक बड़ी चिंता थी जिस पर अब तक कम लोगों का ध्यान गया था.

सरकारी रिपोर्टें इस बात पर इशारा कर रहीं थीं कि दिल्ली में जलस्तर तेज़ी से कम हो रहा है और इस लिस्ट में द्वारका भी शामिल है.

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और लैंसेट पत्रिका में छपे एक शोध ने इस बात को पुख़्ता कर दिया कि द्वारका में साल 2014 में ज़मीन 3.5 सेंटीमीटर तक नीचे धंसी थी और इसमें सबसे बड़ा हाथ, तेज़ी से ख़त्म हो रहे भूमिगत जलस्तर का था.

सालों तक चले आंदोलन के बाद जब 2011 में सरकार की तरफ़ से पानी की सीमित सप्लाई शुरू हुई, तब तक द्वारका की लगभग हर सोसायटी ने अपने कैम्पस में कम से कम 1 लाख लीटर पानी को स्टोर करने वाला टैंक भी बनवा लिया था.

इस बीच सरकार ने रेनवॉटर हार्वेस्टिंग को लेकर नए और सख़्त क़ानून भी लागू किए जिससे हर अपार्टमेंट, मार्केट या किसी कैंपस में पानी को सहेजा जा सके ताकि ग्राउंडवाटर स्तर बेहतर किया जाए.

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के पूर्व महानिदेशक अंजन चटर्जी के मुताबिक़, "मेरे जैसे हाईड्रो जियोलोजिस्ट के लिए ये ख़ुशी की ख़बर थी. इस तरह से ज़मीन धंसने को रोकने में ग्राउंड वॉटर के बढ़ते स्तर, ज़मीन पर दबाव का कम होना और उससे मिट्टी का फूलना ये दर्शाता है कि धंसाव रुक गया होगा".

2016 तक द्वारका में लगभग सभी बोरवेल बंद किए जा रहे थे और ज़मीन के नीचे वाले पानी पर निर्भरता कम हो रही थी.

द्वारका के आपार्टमेंटों में टैंकरों से पानी की आपूर्ति होती थी.

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इमेज कैप्शन, द्वारका के आपार्टमेंटों में टैंकरों से पानी की आपूर्ति होती थी.

कुछ इलाक़ों में हर साल 11 सेंटीमीटर तक धंसाव

एक तरफ़ बोरवेल बंद करने की सरकारी मुहिम जारी थी, तो दूसरी तरफ़ नागरिक समुदाय एकजुट होकर पानी जमा करने और ग्राउंड वॉटर को रीचार्ज करने वाले स्रोतों पर काम शुरू कर दिया था.

200 साल पुरानी और 119 एकड़ में फैली "नया झोड़" नाम की झील में दोबारा जान डालना इसमें एक अहम कदम था.

जानकारों को लगता है कि रेनवॉटर हार्वेस्टिंग न सिर्फ़ पानी की डिमांड और सप्लाई के बीच की दूरी को कम कर सकती है बल्कि आम नागरिकों में पानी के इस्तेमाल को लेकर जागरूकता भी बढ़ा सकती है.

दिल्ली जल बोर्ड में हायड्रोलिक्स और वाटर बॉडीज़ के एडवाइज़र अंकित श्रीवास्तव के मुताबिक़, "सूखी पड़ी झीलों, तालाबों और वॉटर बॉडीज़ को एक नया जीवन देते हुए हमने उस इलाक़े में ग्राउंड वॉटर टेबल को 20 से 16 मीटर तक पहुँचा दिया".

उनके मुताबिक़, "ये भी तय किया गया कि पब्लिक पार्क और खुले मैदानों में सिंचाई के लिए सिर्फ़ उसी पानी का इस्तेमाल होगा जिसे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से साफ़ कर के वापस लाया जा रहा है. इसके चलते पार्कों में बोरिंग पर पूरा बैन लग गया था".

सैटलाइट ट्रैकिंग के ज़रिए 2014-2020 के बीच दिल्ली के गिरते हुए जलस्तर को कैम्ब्रिज विश्विद्यालय और आईआईटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने अपनी प्राथमिक रिसर्च का हिस्सा बनाया.

उनमें से एक वैज्ञानिक शगुन गर्ग ने बीबीसी को बताया, "हमने InSAR तकनीक यानी सैटलाइट इमेज के ज़रिए से इस बात को प्रमाणित किया कि जहां कापसहेड़ा-फ़रीदाबाद जैसे इलाक़ों में ज़मीन का धंसाव 11 से लेकर 4 सेंटीमीटर सालाना देखा गया, वहीं द्वारका ने इसे पलट कर बेहतर कर दिखाया".

दिल्ली के कई इलाक़े ऐसे हैं जहां नलों से पानी की आपूर्ति नहीं होती है.

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इमेज कैप्शन, दिल्ली के कई इलाक़े ऐसे हैं जहां नलों से पानी की आपूर्ति नहीं होती है.

पानी के दोहन से धंसती धरती

अर्बन प्लानर विकास कनौजिया के मुताबिक़, "अगर हम खुली जगहों पर पानी स्टोर करने, उन पर प्रेशर न बनाने और सूखते हुए तालाबों, नहरों और कुंओं को एक नई ज़िंदगी देने का वादा कर लें तो सभी की ज़िंदगी बेहतर हो सकेगी".

वैसे दिल्ली में होने वाली बारिश के आँकड़ों पर नज़र डालें तो 1984 to 2017 के बीच इलाक़े में न सिर्फ़ पानी कम बरसा बल्कि ज़मीन के भीतर वाले पानी की आपूर्ति भी कम हुई.

दिल्ली यमुना नदी के तट पर बसी है तो यहां की मिट्टी रेतीली है और उस पर बढ़ती आबादी का दबाव भी है. बेहिसाब तरीक़े से निकल गए ग्राउंड वॉटर का विपरीत असर भी दिख रहा है क्योंकि कुछ इलाक़ों में ज़मीन धँसनी शुरू हो गई है.

क्योंकि भारत एक कृषि-प्रधान देश है जो मौजूदा हालात में अमेरिका और चीन को मिला देने के बाद भी उनसे ज़्यादा पानी ज़मीन से निकाल रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भूजल स्तर के लगातार घटने के कारण दिल्ली में ज़मन धंसने की घटनाएं होती रही हैं.

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इमेज कैप्शन, विशेषज्ञों का कहना है कि भूजल स्तर के लगातार घटने के कारण दिल्ली में ज़मन धंसने की घटनाएं होती रही हैं.

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन सटेलेटमेंट के डीन, जगदीश कुमारस्वामी' के मुताबिक़, "भारत के कई शहरों में ज़मीन का धंसना इस वजह से देखा जा सकता है कि वहां ज़मीन के भीतर से पानी को निकालने की दर बारिश के पानी ज़मीन के अंदर जाने की दर से दोगुनी पहुँच सकती है."

कैम्ब्रिज विश्विद्यालय और आईआईटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने भी अपनी रिसर्च में इस बार पर ज़ोर दिया है कि दिल्ली के क़रीब 100 वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा धीमे-धीमे ही सही लेकिन धंस रहा है.

जोशीमठ, उत्तराखंड में आई आपदा ने एकाएक प्रकृति पर निर्भरता के सवाल दोबारा खड़े कर दिए हैं.

अहमदाबाद की सीईपीटी यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रुतुल जोशी का मानना ही कि, "शहरों के विकास के लिए सही प्रणाली अपनाई जानी चाहिए. ज़मीन के भीतर का पानी तो हमारे लिए एक आशीर्वाद है."

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