यूपी में कड़ाके की ठंड में छुट्टा जानवरों से फसल बचाते हुए जान गँवा रहे हैं किसान- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, रणविजय सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
केस- 1:
मृतक किसान का नाम: नन्हा लोधी, उम्र 49 साल
गांव: देवराकला, उन्नाव, उत्तर प्रदेश
मौत का कारण: छुट्टा पशुओं से फसल बचाते हुए ठंड से मौत का दावा
नन्हा लोधी छोटी जोत के किसान थे. उनके पास आधा बीघा से भी कम ज़मीन थी, जिसमें उन्होंने गेहूं लगाया था.
इस फसल को छुट्टा पशुओं से बचाने के लिए खेत में ही मचान बनाकर रहते थे.
25 दिसंबर की रात घर से खाना खाकर फसल की रखवाली के लिए खेत पर चले गए. इसके बाद उनकी मौत की ख़बर घर आई.
नन्हा लोधी फसल की रखवाली के लिए बनाए गए मचान में ही मृत पाए गए. परिवार का कहना है - 'उनकी मौत ठंड लगने से हुई.'
केस 2:
मृतक किसान का नाम: राजू बरार, उम्र 45 साल
गांव: पिपरोखर, झांसी, उत्तर प्रदेश
मौत का कारण: छुट्टा पशुओं से फसल बचाते हुए ठंड से मौत का दावा
राजू बरार छोटे किसान थे. उनको सरकारी पट्टे से क़रीब 3 बीघा ज़मीन मिली थी.
इसी से परिवार का गुज़र बसर होता था. इस बार राजू ने मटर और गेहूं की फसल लगाई थी.
फसल को छुट्टा पशुओं से बचाने के लिए खेत पर ही बांस और कपड़े की एक झोपड़ी बना रखी थी.
7 जनवरी की रात फसल की रखवाली करने खेत पर गए. इसी झोपड़ी में सोए, लेकिन सुबह उठ न पाए, उनकी मौत हो गई.
परिवार का कहना है - 'राजू की मौत ठंड लगने से हुई.'
केस 3:
मृतक किसान का नाम: चंद्रभान पटेल, उम्र 59 साल
गांव: रुझाई, उन्नाव, उत्तर प्रदेश
मौत का कारण: खेत की रखवाली करते हुए छुट्टा पशु के हमले से मौत
चंद्रभान पटेल 4 जनवरी की रात छुट्टा पशुओं से फसल बचाने के लिए खेत पर गए थे.
यहाँ छुट्टा पशु ने उन पर हमला कर दिया. चंद्रभान के पैर की हड्डी टूट गई और वो खेत में लगे कटीले तारों में उलझ गए.
सर्दी की रात में घायल अवस्था में खेत पर पड़े रहे, मौत हो गई. घर वाले उनकी मौत के लिए छुट्टा पशुओं को दोषी मानते हैं.
इन तीन घटनाओं में मृतक किसान के नाम ज़रूर अलग हैं, लेकिन कहानी एक सी है और मौत के पीछे की प्रत्यक्ष या परोक्ष वजह भी एक है - छुट्टा पशु.
उत्तर प्रदेश (यूपी) का किसान इन दिनों छुट्टा पशुओं से खासा परेशान है.
आलम यह है कि फसल बचाने के लिए किसान ठंड की रात में खेत पर रहने को मजबूर है. ऐसी स्थिति में कई किसानों की ठंड से मौत भी हो गई.
यूपी में 11 लाख से ज़्यादा छुट्टा पशु
साल 2019 में आई 20वीं पशुगणना के मुताबिक़, यूपी में 11.8 लाख छुट्टा पशु हैं.
हालाँकि, यूपी सरकार के पशु पालन विभाग ने जून 2022 में छुट्टा पशुओं की वास्तविक संख्या जानने के लिए एक सर्वे कराया.
इस सर्वे के मुताबिक़, यूपी में कुल 11 लाख 13 हजार 35 छुट्टा पशु हैं.
इन आँकड़ों से ज़ाहिर है कि यूपी में कितनी बड़ी संख्या में छुट्टा पशु हैं.
यूपी सरकार की ओर से छुट्टा पशुओं की देखभाल के लिए गौशालाएँ चलाई जाती हैं.
उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग के अपर निदेशक (गोधन विकास), डॉ. राजेश कुमार ने बीबीसी हिंदी से बताया, "यूपी में 6,723 गौशालाएँ हैं, जिनमें क़रीब 9.58 लाख छुट्टा पशुओं को संरक्षित किया गया है. इसके अलावा क़रीब 1 लाख 54 हजार छुट्टा पशुओं को 'मुख्यमंत्री निराश्रित/बेसहारा गोवंश सहभागिता योजना' के तहत लोगों को दिया गया है."
'बेसहारा गोवंश सहभागिता योजना' के तहत अगर कोई व्यक्ति छुट्टा पशु को पालता है, तो उसे 30 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मिलते हैं.

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छुट्टा पशुओं के लिए किए गए इन तमाम जतन के बावजूद यूपी के गांवों में छुट्टा पशु यहाँ-वहाँ घूमते नज़र आ जाते हैं.
इन पशुओं से अपनी फसल बचाने के लिए किसान दिन रात खेत की रखवाली कर रहे हैं. हर खेत में मचान और झोपड़ी दिखना आम बात है.
फ़िलहाल ठंड का मौसम है, इसलिए किसानों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं. सर्द रात में जब पारा गिरता है, तब किसान फसल की रखवाली करने को खेत में रात गुज़ारने को मजबूर हैं.
उन्नाव ज़िले के देवराकला गांव के 49 साल के नन्हा लोधी भी इसी मजबूरी में खेत पर गए थे, उन्हें ठंड लगी और खेत पर ही मौत हो गई.
नन्हा लोधी अपने परिवार में इकलौते कमाने वाले व्यक्ति थे. वो अपने पीछे पत्नी, 4 बेटियाँ और एक 13 साल का बेटा छोड़ गए हैं, जिनके पास गुज़र बसर के लिए बस आधा बीघा ज़मीन है.
नन्हा लोधी के भतीजे 29 साल के नीरज कुमार बताते हैं, "हम लोग उन्हें मना करते थे कि ठंड में खेत पर मत जाइए, लेकिन वो कहते थे कि अगर खेत पर नहीं गया, तो जानवर सारी फसल चर जाएँगे और फिर परिवार को क्या खिलाऊंगा? लेकिन... अब तो जान ही चली गई."
किसान नन्हा लोधी की मौत पर उन्नाव सदर एसडीएम नूपुर गोयल ने मीडिया से कहा, "शीतलहर की वजह से किसान की मौत हुई है. पीड़ित परिवार को दैवीय आपदा के अंतर्गत चार लाख रुपए का मुआवज़ा, साथ ही मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना के अंतर्गत एक लाख रुपए का मुआवज़ा दिया जाएगा."
हालाँकि ख़बर लिखे जाने तक परिवार को यह मुआवज़ा नहीं मिला है.
नन्हा लोधी का परिवार बेहद ग़रीब है. इस परिवार तक सरकारी योजनाएँ भी नहीं पहुँच सकीं, न आवास है और न ही शौचालय. यह परिवार कच्चे मकान में रहता है.
मकान की छत काले रंग की तिरपाल से ढँकी हुई है, जो जगह-जगह से फटा हुआ है.
नन्हा लोधी की पत्नी तारावती बताती हैं- बारिश के मौसम में घर में जगह-जगह से पानी गिरता है तो इसमें रहना मुश्किल है. नन्हा लोधी की मौत के बाद अब प्रशासन परिवार को आवास, शौचालय और 'मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना' से पाँच लाख रुपए देने की बात कह रहा है.

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नन्हा लोधी की तरह ही झांसी ज़िले के पिपरोखर गांव के किसान राजू बरार (45) भी छुट्टा जानवरों से फसल बचाने खेत पर गए थे, जहाँ उनकी ठंड लगने से मौत हो गई.
राजू अपने पीछे परिवार में एक 70 साल की बूढ़ी माँ, 17 और 15 साल की दो बेटियाँ और 12 और 10 साल के दो बेटे छोड़ गए हैं.
इसके अलावा साहूकार का क़रीब 3 लाख का क़र्ज़ भी, जो अब राजू के परिवार को चुकाना होगा.
राजू की बड़ी बेटी 17 साल की अंजली बरार कहती हैं, "पापा रात में खेत पर जाते थे और सुबह लौटते थे. उस दिन काफ़ी देर तक वो लौटे नहीं. मैंने जाकर देखा तो उनके शरीर में कोई हरकत नहीं थी, उनकी मौत हो गई थी."
किसान राजू बरार की मौत पर झांसी के मऊरानीपुर के एसडीएम मृत्युंजय मिश्रा ने कहा, "पंचनामे में लिखा गया है कि किसान की मौत ठंड लगने से हुई है, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण शॉक और दिल का दौरा पड़ना बताया गया है. ऐसी स्थिति में दैवीय आपदा के तहत मुआवज़ा मिलना मुश्किल है. हालाँकि हम प्रयास कर रहे हैं कि मुआवज़ा मिल जाए और इसके लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी को पत्र लिखकर पूछा है कि क्या ऐसी स्थिति में मुआवज़ा दिया जा सकता है."
उन्नाव के किसान नन्हा लोधी हों या झांसी के किसान राजू बरार, सबकी कहानी एक सी है.
छुट्टा पशुओं ने यूपी के ग्रामीण इलाक़ों में तबाही मचा रखी है. ग्रामीण इलाक़ों से ऐसी घटनाओं के सामने आने का एक कारण यह भी है कि यूपी का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में रहता है.
2011 की जनगणना के मुताबिक़, यूपी की आबादी 19.9 करोड़ है और इसका 77.73% हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में निवास करता है.
हाल के दिनों में यूपी के अलग-अलग ज़िलों से ऐसी ख़बरें भी आ रही हैं कि किसान छुट्टा पशुओं को घेरकर सरकारी कार्यालय और इमारतों में बांध रहे हैं.
मेरठ, उन्नाव, अमरोहा, बाराबंकी के साथ और भी कई ज़िलों से ऐसी ख़बरें आई हैं.
अमरोहा में तो किसानों पर सरकारी स्कूल में छुट्टा पशुओं को बंद करने के लिए मुक़दमा भी दर्ज किया गया है.

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यूपी चुनाव में था बड़ा मुद्दा
छुट्टा पशुओं की यह समस्या 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बनी थी. विपक्ष जहाँ इसे लेकर आक्रामक था, वहीं मौजूदा सरकार इसे लेकर नीतियाँ बनाने की बात कह रही थी.
ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने उन्नाव में एक चुनावी सभा में कहा था, "यूपी के किसानों को छुट्टा जानवरों से हो रही समस्याओं को हम गंभीरता से ले रहे हैं. हमने रास्ते खोजे हैं. 10 मार्च को आचार संहिता समाप्त होने के बाद, नई सरकार बनने के बाद, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उन सारी नई योजनाओं को हम लागू कर देंगे."
हालांकि, यूपी चुनाव के नतीजों को आए 10 महीने से ज़्यादा हो गए और अब भी छुट्टा पशुओं की समस्या जस की तस बनी हुई है.
इस समस्या को लेकर पशु पालन विभाग क्या कर रहा है?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग के अपर निदेशक (गोधन विकास), डॉ. राजेश कुमार से बात की.

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डॉ. राजेश कहते हैं, "ये छुट्टा पशु कहाँ से आए? यह उन्हीं किसानों के पशु हैं जो आज परेशान हैं. जब किसान पशुओं को छुट्टा छोड़ना बंद कर देंगे तो समस्या ख़ुद ख़त्म हो जाएगी. मेरे पास 11 लाख जानवर हैं, यूपी में 58 हजार से ज़्यादा ग्राम पंचायतें हैं. इस हिसाब से एक ग्राम पंचायत पर 18 से 20 जानवर हैं. इन 18 से 20 जानवरों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा 70-80 टोकरी घास चाहिए."
डॉ. राजेश कहते हैं अगर ग्रामीण मिलकर बचा कुचा घास भी इन जानवरों को दे दें तो समस्या का निदान हो जाएगा. आज किसान को जागरूक होने की ज़रूरत है, जब तक किसान जानवरों को छोड़ते रहेंगे यह समस्या बनी रहेगी.
लेकिन डॉ. राजेश के इस सुझाव के बाद भी कई अनदेखियाँ सरकार के स्तर पर भी है, जिसकी वजह से छुट्टा पशुओं का कोई स्थाई समाधान उत्तर प्रदेश में फ़िलहाल नज़र नहीं आ रहा है.
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