क्या जानवरों पर क़ानून का डंडा चलाया जा सकता है?

इमेज स्रोत, ROB ELLIOTT/AFP/Getty Images
- Author, विभुराज
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के जालौन ज़िले में गधों को चार दिन तक कथित तौर पर 'हिरासत' में रखने और फिर उनकी रिहाई का मामला पिछले कुछ दिनों से लगातार सुर्खियों में रहा.
हालांकि जालौन मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपनी किसी भूमिका से इनकार किया है.
लेकिन भारत में किसी जानवर को इस तरह से 'हिरासत' में लेने का ये पहला मामला नहीं है.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त
पिछले बरस अक्टूबर में एक कबूतर को पठानकोट पुलिस ने 'गिरफ़्तार' किया था.
इस कबूतर पर 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पाकिस्तान से धमकी भरा संदेश' लाने का इल्ज़ाम लगाया गया था.
इससे पहले मई, 2015 में जम्मू और कश्मीर की पुलिस ने एक 'जासूस कबूतर' को 'गिरफ्तार' किया था.
पुलिस ने कबूतर से उर्दू में लिखे मैसेज भी 'बरामद' करने का दावा किया था.

इमेज स्रोत, PTI
क्रिमिनल लॉ
लेकिन सवाल ये उठता है कि आख़िर ये कैसे मुमकिन है? क्या क़ानून किसी पशु-पक्षियों को कटघरे में खड़ा करने की इज़ाजत देता है.
क़ानून के जानकार इस पर क्या कहते हैं?
दिल्ली यूनिवर्सिटी में लॉ के प्रोफ़ेसर विकास कुमार सिंह कहते हैं, "ऐसा नहीं हो सकता. क्रिमिनल लॉ केवल इंसानों पर लागू होता है."
तो जानवरों को पकड़ने के मामले में पुलिस की कार्रवाई को क्या कहा जाए?
प्रोफ़ेसर विकास कुमार सिंह की राय में, "क़ानून की जानकारी की कमी इसकी एक वजह है. कई बार तो ये गलती से होता है और कई बार किसी बाहरी दबाव में."
लेकिन पशुओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट नरेश कादयान का कहना है, "पुलिस पब्लिक के बीच किसी उपद्रव को रोकने के लिए आईपीसी की धारा 268 और 289 के तहत पशु के मालिक को हिरासत में ले सकती है लेकिन जानवर को तब भी गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता है."

इमेज स्रोत, PTI
बकरी वाला मामला
फरवरी, 2016 में छत्तीसगढ़ के कोरिया ज़िले में ऐसा ही एक मामला तब सामने आया जब पुलिस ने एक बकरी और उसके मालिक को 'घुसपैठ के आरोप में गिरफ़्तार' कर लिया.
बकरी पर उसके मालिक के साथ-साथ ये आरोप था कि उसने जज की कोठी में बिना इजाज़त के दाखिल होने (सेक्शन 447, आईपीसी) और बंगले की बागवानी और रहने वाले लोगों, दोनों को नुक़सान (सेक्शन 427, आईपीसी) पहुंचाया. बाद में दोनों 'ज़मानत' पर रिहा कर दिए गए.
हिरासत में लिए जाने वाले जानवरों के देखभाल के सवाल पर नरेश कादयान कहते हैं, "जानवर जिस किसी के भी नियंत्रण में रहेगा, उसके देखभाल की जिम्मेदारी उसी की बनती है और इसके लिए प्रिवेंशन ऑफ़ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट है."
ख़बरों की दुनिया में सुर्खियां बटोरने के लिहाज से ऐसे मामलों में तमाम मसाले होते हैं.
विकास सिंह का कहना है, "कुछ मामलों को तो मीडिया बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है. पुलिस पशुओं के ख़िलाफ़ आने वाली शिकायतों पर उन्हें गिरफ़्तार नहीं करती. हां, कुछ मामलों में उन्हें पकड़कर बांध जरूर देती है. कानून और व्यवस्था लागू करना तो उनकी जिम्मेदारी है. शिकायत मिलने पर उन्हें कार्रवाई तो करनी होगी."

इमेज स्रोत, Getty Images
सिविल कोर्ट
लेकिन अगर जानवर इंसानों को नुक़सान पहुंचाए तो क्या रास्ता बचता है?
जवाब इतना ही है कि अगर पशु पालतू है तो आप उसके मालिक से सिविल कोर्ट में नुक़सान की भरपाई के लिए मुआवज़े की मांग कर सकते हैं और आवारा पशुओं की हरकतों के लिए सरकारी विभागों की जिम्मेदारी तय की जा सकती है.
नरेश कादयान कहते हैं, "दुनिया की किसी अदालत में किसी जानवर के ख़िलाफ़ इसलिए भी मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता क्योंकि वे बोल नहीं सकते क्योंकि फ़ेयर ट्रायल की ज़रूरी शर्त उसके मामले में पूरी नहीं की जा सकती.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












