नरोत्तम मिश्रा: माथे पर तिलक और तीखे बयानों के लिए चर्चित नेता, जो कभी आयोजित करते थे रोज़ा इफ़्तार

नरोत्तम मिश्रा

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    • Author, शुरैह नियाज़ी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, भोपाल से

सिर पर टोपी और माथे पर बिना तिलक लगाए, मध्यप्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की ये तस्वीर साल 2018 की है जब अपने विधानसभा क्षेत्र दतिया में उन्होंने रोज़ा इफ़्तार का आयोजन किया था.

ये वो समय था, जब नरोत्तम मिश्रा हर साल इस तरह के आयोजन में क्षेत्र के मुसलमानों का स्वागत करते थे.

ऐसे आयोजनों में शरीक़ हुए भोपाल के एक पत्रकार ने बताया, "ये तस्वीर आज के नरोत्तम मिश्रा की रोज़ाना टीवी चैनलों पर फ्लैश की जाने वाली तस्वीर से भले ही अलग हो, लेकिन ये इस बात की बानगी है कि पाँच सालों में काफी कुछ बदल गया है."

उन्होंने बताया कि उस समय यह आयोजन वो हर साल करते थे ताकि क्षेत्र के मुसलमान मतदाताओं के बीच एक अच्छा संदेश जाये. उन्होंने यह भी बताया कि वो कुछ इलाक़े के मुसलमान पत्रकारों को एक दिन पहले पहुंचने को बोलते थे ताकि वो वहां की तैयारी देख सकें और उनके रोज़ा इफ़्तार में कुछ कमी न रह जाए.

लेकिन अब नरोत्तम मिश्रा का अंदाज़ और मिज़ाज बदल गया लगता है. अब वो आये दिन अपने विवादित बयानों के लिये मीडिया की सुर्खियों में रहते है.

नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश सरकार में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बाद दूसरे नंबर की हैसियत रखते है. कई बार उनके बयान मुख्यमंत्री के बयान से ज़्यादा चर्चा में रहते हैं. हर सुबह उनके घर पर मीडिया वालों का इस उम्मीद में जमावड़ा होता है ताकि दिन भर चलाने के लिये उन्हें कोई ख़बर मिल जाए.

कई लोगों की राय है कि मुद्दा देश का हो या विदेश का, फिल्म का हो या धर्म का, राजनीति का हो या समाज का, नरोत्तम मिश्रा उस पर 'बयान देने के लिये तैयार रहते हैं.'

अगर मुद्दा बॉलीवुड या मनोरंजन या धर्म से जुड़ा हो तो वो इस पर बोलने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते हैं. अंतरराष्ट्रीय नेताओं से लेकर विपक्ष के बड़े नेता तक हमेशा उनके निशाने पर होते हैं. मिश्रा का बयान अगर कांग्रेस पर है तो यकीन मानिए घुमा फिराकर वह राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह की तीखी आलेचना पर ही ख़त्म होगा.

नरोत्तम मिश्रा विवाद

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वैसे तो नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश के गृह मंत्री है लेकिन कई लोगों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में प्रदेश की क़ानून व्यवस्था से ज़्यादा उनकी नज़र बॉलीवुड पर रही है.

शाहरुख़ ख़ान की अगले महीने रिलीज़ होने वाली फ़िल्म 'पठान' को लेकर वो एक बार फिर चर्चा में है. पिछले हफ्ते इस फ़िल्म के एक गाने पर निशाना साधते हुये मिश्रा ने कहा, "गाने में इस्तेमाल की गई वेशभूषा प्रथमदृष्टया बेहद आपत्तिजनक है."

इस गाने में दीपिका केसरिया रंग की बिकनी पहने नज़र आ रही है.

उन्होंने कहा, "साफ दिख रहा है कि दूषित मानसिकता के कारण फ़िल्माया गया यह गाना है. वैसे भी दीपिका पादुकोण जी टुकड़े-टुकड़े गैंग की समर्थक रही है जेएनयू वाले मामले में. इस वजह से मैं यह निवेदन करूंगा कि इसके दृश्यों को ठीक करें. वेशभूषा को ठीक करें अन्यथा मध्यप्रदेश में इस फ़िल्म को अनुमति दी जाए या न दी जाए, यह विचारणीय प्रश्न होगा."

नरोत्तम मिश्रा विवाद

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नरोत्तम मिश्रा के चर्चा में रहे बयान

बीबीसी हिंदी

इसी महीने उन्होंने कहा कि प्रदेश के मदरसों में पढ़ाये जाने वाली सामग्री की स्क्रूटनी करवाने पर सरकार विचार कर रही है. यह बात उन्होंने तब कही जब प्रदेश के कुछ मदरसों में बच्चों को आपत्तिजनक कंटेट पढ़ाने से संबंधित विषय सामने आया.

इससे पहले अक्टूबर में उन्होंने महाकाव्य रामायण पर आधारित बॉलीवुड फ़िल्म 'आदिपुरुष' के निर्माताओं को चेतावनी दी थी कि अगर हिंदू धार्मिक हस्तियों को 'ग़लत' तरीके से दिखाने वाले दृश्यों को नहीं हटाया गया तो क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी.

इस साल जुलाई में, उन्होंने नाराज़गी के बाद फ़िल्म निर्माता लीना मणिमेकलाई की डॉक्यूमेंट्री 'काली' के एक पोस्टर को लेकर प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश दिये थे.

अप्रैल 2022 में खरगोन में हुये दंगे के बाद नरोत्तम मिश्रा ने कहा था, "जिस घर से पत्थर आए हैं, उन्हें पत्थर का ढेर बना देंगे". यह बात उन्होंने खरगोन में रामनवमी जुलूस के बाद कथित तौर पर हुई पत्थरबाज़ी की घटना के बाद कही थी.

पिछले साल ही मिश्रा ने कहा था कि अगर सनी लियोनी और संगीतकार साकिब तोशी तीन दिनों के भीतर सोशल मीडिया से 'मधुबन में राधिका नाचे' गाने के वीडियो को नहीं हटाते हैं तो राज्य सरकार उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी.

नवंबर 2021 में उन्होंने कहा था कि हास्य कलाकार वीर दास को राज्य में प्रस्तुति देने की अनुमति नहीं दी जाएगी जो 'आई कम फ़्रॉम टू इंडियाज़' को लेकर पुलिस की शिकायतों का सामना कर रहे थे.

उसी महीने डाबर कंपनी के 'करवा चौथ' विज्ञापन को निशाना बनाने के बाद मिश्रा ने डिज़ाइनर सब्यसांची मुखर्जी को मंगलसूत्र सहित आभूषणों की एक नई रेंज का एक विज्ञापन वापस लेने के लिए 24 घंटे का 'अल्टीमेटम' भी जारी किया था.

नरोत्तम मिश्रा विवाद

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नरोत्तम मिश्रा के बदलते सुर

लेकिन ऐसे बयानों से आख़िर नरोत्तम मिश्रा क्या हासिल करना चाहते हैं?

नरोत्तम मिश्रा की राजनीति को दशकों से क़रीब से देखने-जानने वाले ग्वालियर के पत्रकार देव श्रीमाली कहते हैं, "जिस तरह से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व एक विचारधारा को लेकर चल रहा है. उसे ही ध्यान में रखकर नरोत्तम मिश्रा यह सब कह रहे है."

उन्होंने आगे कहा, "मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि उदारवादी मानी जाती रही है इसलिये नरोत्तम अपने आप को आक्रमक दिखा कर अपनी ज़मीन बढ़ाने की कोशिश कर रहे है. उन्हें लगता है कि जिस तरह की छवि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा की है वो वैसी छवि मध्य प्रदेश में बना सकते है."

नरोत्तम मिश्रा 2005 में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौड़ के मंत्रिमंडल में पहली बार राज्यमंत्री बने. उन्हें विधि और विधायी कार्य, संसदीय कार्य, सहकारिता विभाग में राज्य मंत्री बनाया गया.

जब शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने भी मिश्रा को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया. इसके बाद में वो कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे.

वीडियो कैप्शन, मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्र से ख़ास बातचीत

2018 में भाजपा को विधानसभा चुनाव में हार के बाद विपक्ष में बैठना पड़ा.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस का साथ छोड़ने के बाद जब मध्य प्रदेश की सत्ता में भाजपा लौटी, तो नरोत्तम मिश्रा का नाम भी मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार के तौर पर सामने आया लेकिन आख़िर में शिवराज सिंह चौहान को ही मुख्यमंत्री बनाया गया.

तब से नरोत्तम मिश्रा प्रदेश में दूसरे नंबर के नेता के तौर पर गृह मंत्रालय चला रहे हैं.

मध्य प्रदेश के दतिया से ताल्लुक़ रखने वाले नरोत्तम मिश्रा, शिवराज सिंह चौहान के प्रतिद्वंदी माने जाते है और दावा ये भी किया जाता है कि वो ख़ुद को शिवराज सिंह चौहान का विकल्प भी मानते हैं.

दतिया ग्वालियर के पास है और भोपाल से लगभग 400 किलोमीटर की दूरी पर है. दतिया विधानसभा क्षेत्र की आबादी तक़रीबन तीन लाख 35 हज़ार है, जहां मुसलमानों की आबादी चार फ़ीसदी के आसपास है.

ग्वालियर के एक और वरिष्ठ पत्रकार राकेश पाठक नरोत्तम मिश्रा की राजनीति को शुरु से देखते रहे है.

उनका कहना है, "वे ऐसे कट्टरपंथी शुरु में नहीं थे. अंदर से अब भी हैं कि नहीं, हम नहीं जानते. लेकिन हां, अभी जो भाजपा की राजनीति है जिसमें हर नेता हिंदू कोर वोटर को लुभाने के लिए लालयित है. इसलिए वो भी यह सारी बातें कह रहे हैं."

उनका यह भी दावा है, "नरोत्तम मिश्रा मन ही मन शिवराज सिंह चौहान से स्पर्धा रखते है. चौहान उतने कट्टरपंथी नहीं माने जाते हैं और यही वजह है कि बदले हुए माहौल में नरोत्तम अपनी ऐसी छवि गढ़ना चाहते है और कोई मौक़ा नही छोड़ना चाहते है जिसमें वो अपने आप को हिंदुओं के ज़्यादा क़रीब बता पाएं."

राकेश पाठक के मुताबिक़ वो यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत कर रहे है.

वीडियो कैप्शन, सनी लियोनी ने 'मधुबन' गाने को लेकर विवाद पर क्या कहा?

अमित शाह से क़रीबी

नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश की सियासत में बीजेपी का बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं. मध्य प्रदेश में जब भी सत्ता परिवर्तन को लेकर चर्चा तेज़ होती है तो देखा गया है कि उस समय नरोत्तम मिश्रा फ़ौरन दिल्ली का रुख़ करते है.

वो केंद्र में गृह मंत्री अमित शाह के क़रीबी माने जाते है.

वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली का कहना है कि उन्हें जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ ज़िम्मेदारियां दी गई उसके बाद से वो अमित शाह के क़रीबी माने जाने लगे.

राकेश पाठक का भी कहना है, "जो प्रतीत होता है वो यह है कि नरोत्तम, अमित शाह के जितना करीब हैं उतना करीब वो नरेंद्र मोदी से नज़र नहीं आते हैं."

वो कहते है कि जब अमित शाह एक बार भोपाल में आये थे तब भी वो एक समय भोजन करने उनके घर तक गए थे.

उस भोज की चर्चा मध्य प्रदेश की राजनीति में आज तक होती है. 2017 में अमित शाह भोपाल आये थे तो तब मीडिया के संपादकों के लिये एक भोज का आयोजन उनके साथ किया गया था.

यह भोज नरोत्तम मिश्रा ने अपने घर पर रखा था. अमित शाह ने उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में कानपुर लोकसभा सीट का प्रभारी नियुक्त किया था. इसके बाद से माना जाता रहा है कि प्रदेश में नरोत्तम मिश्रा, अमित शाह के सबसे क़रीबी हैं.

नरोत्तम मिश्रा

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नरोत्तम मिश्रा का सियासी सफ़र

ग्वालियर में जन्मे नरोत्तम मिश्रा एम.ए , पीएचडी है और पढ़े-लिखे परिवार से आते है. बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी पीएचडी का विषय "भारतीय लोकतंत्र में विधायक की भूमिका" रहा है. विषय से साफ़ हो जाता है कि छात्र जीवन से ही उनकी दिलचस्पी राजनीति में रही है.

  • उन्होंने 1977-78 में ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति से सियासी सफ़र की शुरुआत की
  • उसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा से जुड़े.
  • पहली बार 1990 में भाजपा उम्मीदवार के तौर पर डबरा सीट से चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे.
  • नरोत्तम मिश्रा ने डबरा विधानसभा सीट से 1993, 1998 और 2003 का चुनाव भी लड़ा.
  • अगर 1993 को छोड़ दें तो वो हर चुनाव जीतते रहे.
  • 1993 में हुए चुनाव में नरोत्तम मिश्रा तीसरे स्थान पर रहे थे. बहुजन समाज पार्टी के जवाहर सिंह रावत चुनाव जीते थे जबकि कांग्रेस के सीताराम दुबे दूसरे स्थान पर रहे थे.
  • 2008 में डबरा सीट आरक्षित हो गई और उसके बाद उन्होंने पड़ोस में दतिया की ओर रुख किया.
  • 2008 से वो दतिया से चुनाव जीत रहे हैं और इस समय छठी बार विधानसभा में पहुंचे है.

हालांकि उनके क्षेत्र के भाजपा नेताओं का दावा है कि वो अपने क्षेत्र में अपने समकक्ष किसी को भी पनपने नही देते.

लेकिन राकेश पाठक का कहना है, "राजनीति में यह सामान्य बात है और हर नेता यही करता है कि वो अपने सामने किसी को खड़े नही होने देता है."

उनके क्षेत्र के भाजपा नेताओं से जब हमने उनके बारे में पूछा तो ज़्यादातर नेताओं ने बात करने से इंकार कर दिया. वजह किसी ने साफ़ नहीं बताई. लेकिन अनौपचारिक तौर पर जो बात निकल कर सामने आई उसका मतलब यही है कि अंदर ही अंदर भाजपा से जुड़े स्थानीय नेता जानते है कि नरोत्तम मिश्रा उनके प्रतिद्वंद्वी हैं और बात करेंगे तो उनकी तारीफ ही करनी पड़ेगी.

कांग्रेस से भाजपा का दामन थामने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आयी इमरती देवी ने पिछली चुनाव डबरा से लड़ा था और वो चुनाव हार गई थी. आरोप लगे कि उनकी हार के पीछे नरोत्तम मिश्रा ही जिम्मेदार थे. जानकार बताते हैं कि उन्हें डर कि इमरती देवी उनके इलाक़े में उनके लिए नई चुनौती ना बन जाए.

इसके बाद से इमरती देवी के साथ उनका शीतयुद्ध चल रहा है. जानकार दावा करते हैं कि फिलहाल इमरती देवी की बात पर मुख्यमंत्री ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं. हाल ही में डबरा के थाना प्रभारी विनायक शुक्ला के ट्रांसफ़र के मामले में नरोत्तम मिश्रा की नहीं बल्कि इमरती देवी की चली, और विनय शुक्ला का आखिरकार ट्रांसफर हो गया.

नरोत्तम मिश्रा और शिवराज सिंह चौहान

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विवादों से नाता

यह बताना ज़रूरी है कि नरोत्तम मिश्रा के लिये विवाद नए नहीं हैं. जब उन्होंने 2008 का विधानसभा चुनाव लड़ा था तो उन्हें 'पेड न्यूज़' से जुड़े आरोपों का सामना करना पड़ा

उस वक़्त उन्होंने जो कंटेंट और हेडिंग छपवाई थी वो लगभग सभी अख़बारों में एक सी थी. सभी अख़बारों में जो हेडलाइन थी "तो इसलिए सबसे अलग है नरोत्तम". उस समय ऐसी 42 ख़बरों को 'पेड न्यूज़' की शक्ल में छपवाया गया था.

विपक्षी कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी राजेंद्र भारती ने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की थी. चुनाव आयोग ने पाया था कि ये ख़बरें पैसे देकर छपवाई गई थीं. चुनाव आयोग ने 2017 में उन्हें चुनाव लड़ने से तीन साल के लिये प्रतिबंधित कर दिया था.

हालांकि, बाद में नरोत्तम मिश्रा को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत मिल गई. लेकिन चुनाव आयोग ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया.

मिश्रा ने 2018 के चुनाव में जीत हासिल की और गृह मंत्री बन गए.

इस मामले में इनके ख़िलाफ़ चुनाव लड़े राजेंद्र भारती कहते हैं कि यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और इस पर फ़ैसला आना बाकी है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "इस मामले में चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई का प्रयास करना चाहिये वरना चुनाव आयोग के इस क़ानून का मतलब ही नहीं रह जाएगा."

राजेंद्र भारती दतिया जिले के एक ऐसा नेता है जिन्होंने नरोत्तम मिश्रा के विरोध में आवाज़ उठाई.

लेकिन नरोत्तम मिश्रा का प्रभाव उनके क्षेत्र के साथ ही प्रदेश में लगातार बढ़ता रहा है. मशहूर भजन गायिका लक्ष्मी दुबे ने हाल में नरोत्तम मिश्रा की जीवन की कहानी, गीत के रूप में दुनिया के सामने पेश भी किया है.

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