हबीब तनवीर: रंगमंच की दुनिया के लीजेंड को कितना जानती है आज की पीढ़ी?

हबीब तनवीर

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    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए

रायपुर शहर के बैजनाथपारा छोटापारा इलाके की तंग गलियों से गुज़रते हुए एक नौजवान को रोक कर पूछता हूं-"हबीब तनवीर साहब यहां रहते थे, आपको कुछ पता है उनके बारे में?"

एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले बग़ल की गली में रहने वाले उस नौजवान ने पूछा- "हबीब भाई? क्या करते हैं वो?"

मैं गली के तिराहे पर बंद पड़े खंडहरनुमा मकान की ओर इशारा करते हुए कहता हूँ- "थियेटर करते थे. अब नहीं रहे. इसी मकान में रहते थे." नौजवान हबीब तनवीर के बारे में कुछ भी नहीं जानने की बात कहते हुए कंधे उचकाता है और गली में गुम हो जाता है.

हबीब तनवीर अगर आज ज़िंदा होते तो इस साल एक सितंबर को 99 साल पूरे करने के बाद 100वें वर्ष में प्रवेश करते.

इस जन्म शताब्दी वर्ष की शुरुआत में उनकी जन्म स्थली रायपुर में एक सितंबर से, एक के बाद एक आयोजन हो रहे हैं. हालांकि राज्य बनने के बाद से, हमेशा की तरह अब तक राज्य सरकार की सूची में हबीब तनवीर के नाम पर एक भी आयोजन की कोई ख़बर नहीं है.

मोहम्मद युसुफ़

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हबीब तनवीर का घर गली के जिस तिराहे पर है, उसके एक तरफ़ मदरसा है. उसके ठीक सामने 74 साल के मोहम्मद यूसुफ का घर है.

गृह विभाग से सेवानिवृत्त मोहम्मद यूसुफ़ ने कहा- "जब हबीब साहब रहते थे तो यह घर गुलज़ार रहता था. कहां-कहां से लोग आते थे. पचासों लोग. दिन-दिन भर नाटक की रिहर्सल चलती रहती थी. हमलोग देखते थे. इंतक़ाल से एक साल पहले मेरी मुलाक़ात हुई थी. मेरी मां के निधन के समय यहीं कुर्सी डाल कर बैठे रहे. कैसी तबीयत थी, कैसे निधन हुआ, पूछते रहे."

मोहम्मद यूसुफ़ से पूछता हूं कि 2009 में हबीब तनवीर के निधन के बाद आपने आख़िरी बार उन्हें कब याद किया या किसी वाक़ये में उनका ज़िक़्र आया. वे बेहद साफ़गोई से कहते हैं- "याद नहीं आता. शायद उसके बाद तो कभी नहीं."

आसपास के कुछ लोग बताते हैं कि राज्य बनने के बाद हबीब तनवीर ने रायपुर में अपना ठिकाना बनाने के बजाय, न जाने क्यों भोपाल को चुना.

हमारी बातचीत सुन रहे उसी गली में रहने वाले 13 साल के मोहम्मद रमीज़ चिश्ती बताते हैं कि उनके पिता ने उन्हें हबीब साहब के बारे में बताया था. रमीज़ कहते हैं- "हबीब तनवीर बहुत बड़े फ़िल्म स्टार थे."

साहित्य अकादमी से सम्मानित देश के जाने-माने कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता है- बात राजधानी और हबीब तनवीर की/ दिल्ली को छोड़ा तो भोपाल गये/ आदतन उनके पीछे/ छत्तीसगढ़ भोपाल गया/ उनके इस छत्तीसगढ़ का/ कोई अलग प्रांत नहीं बना था/ और न रायपुर राजधानी.../ जब हबीब तनवीर/ तीन दिन के लिए अपने घर रायपुर छोटापारा आये/ तो तीन दिन के लिए/ छत्तीसगढ़ भी रायपुर आया.

रायपुर में ही रहने वाले 86 वर्षीय विनोद कुमार शुक्ल ने बीबीसी से कहा- "लोक परंपराएं, लोकप्रियता से और स्वयं बनती रही हैं. अब नहीं बनेंगी. ऐसा लगने का समय आ गया है. इसका बड़ा उदाहरण यहां हबीब तनवीर हैं कि उनके मुहल्ले के लोग भी उनको नहीं जानते. अब सत्ता और राजनीति अपने दौर की लोक परंपराएं बनाने की कोशिश करती हैं, जो बदलती रहेंगी."

हबीब तनवीर और दीपक तिवारी

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नाटक का रायपुर घराना यानी हबीब तनवीर

रायपुर में 1 सितंबर, 1923 को जन्मे हबीब तनवीर ने पहली बार 11-12 साल की उम्र में लॉरी स्कूल में शेक्सपीयर के 'किंग जॉन' में राजकुमार आर्थर का अभिनय किया था.

पिता चाहते थे कि हबीब सिविल सेवा में जाएं. 1940 में पिता ने इस उम्मीद से नागपुर के मॉरिस कॉलेज में हबीब तनवीर का नाम लिखवाया. वहां से एमए की पढ़ाई के लिए हबीब अलीगढ़ चले गये.

सिविल सेवा में जाने के पिता के सपने की जगह अभिनय ने ले ली थी और हबीब अपनी एमए की पढ़ाई अधूरी छोड़ कर, अपनी तस्वीरों के साथ मुंबई जा पहुंचे. वहां पहले रेडियो में, फिर फ़िल्म इंडिया में और फिर फ़िल्मों के लिए उन्होंने काम करना शुरू कर दिया. इसी दौरान इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से भी हबीब तनवीर जुड़ चुके थे.

मुंबई में ही हबीब तनवीर ने अपना लिखा पहला नुक्कड़ नाटक 'शांतिदूत कामगार' का प्रदर्शन किया. उन्होंने इस दौर में कुछ पत्र-पत्रिकाओं का भी संपादन किया.

लेकिन मुंबई बहुत लंबे समय तक रास नहीं आई और हबीब तनवीर 1953 में दिल्ली पहुंचे. यहां उन्होंने एलिज़ाबेथ गौबा के मोंटेसरी स्कूल में नाटक पढ़ाने का काम शुरू किया.

जहां 1954 में उन्होंने नज़ीर अकबराबादी के लिखे को आधार बना कर 'आगरा बाज़ार' नाटक लिखा. 14 मार्च, 1954 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कला विभाग में पहली बार इस नाटक का मंचन किया गया. हबीब ने इसके बाद प्रेमचंद की कहानी पर आधारित 'शतरंज के मोहरे' नाटक का निर्देशन किया.

हबीब तनवीर के साथ लगभग दो दशक तक काम करने वाले रंगकर्मी अनूप रंजन पांडेय को हबीब तनवीर का पूरा सफ़र जैसे ज़ुबानी याद है- "1954 में हबीब तनवीर लंदन की रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामाटिक आर्ट्स में अभिनय सीखने चले गये. बाद में उन्होंने ब्रिस्टल के ओल्ड विक थिएटर स्कूल में निर्देशन सीखा. लगभग आठ महीनों तक उन्होंने ब्रेख़्त के बर्लिनेर एंसेंबल के नाटक देखे. भारत लौटने के बाद, उन्होंने बेगम कुदैसिया ज़ैदी के हिन्दुस्तान थियेटर के साथ मिलकर काम करना शुरू किया."

अनूप रंजन पांडेय बताते हैं कि बेगम कुदैसिया ज़ैदी के साथ शूद्रक के मृच्छकटिकम नाटक के हिंदी अनुवाद 'मिट्टी की गाड़ी' पर काम चल ही रहा था कि 1958 की गर्मियों में हबीब तनवीर अपने घर रायपुर लौटे.

हबीब तनवीर

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लोक कलाकारों के साथ मिलकर नाटक की प्रस्तुति

एक दिन उन्हें पता चला कि जिस लॉरी स्कूल में उन्होंने पढ़ाई की है, रात को उसी लॉरी स्कूल के मैदान में दाऊ रामचंद देशमुख के 'छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल' का नाचा होने वाला है. रामचंद देशमुख ने, लालूराम और मंदराजी दाऊ के संगठन रिंगनी-रवेली नाचा पार्टी के कलाकारों को लेकर अपनी नाचा पार्टी बनाई थी. हबीब तनवीर रात भर छत्तीसगढ़ी नाट्य विधा 'नाचा' देखते रहे.

सुबह उन्होंने इस नाचा मंडली में शामिल मदनलाल, ठाकुर राम, बाबूदास, भुलवाराम और मोहरी बजाने वाले जगमोहन को हबीब तनवीर ने दिल्ली साथ चलने का न्यौता दिया. राजनांदगांव में भी ऐसे ही एक आयोजन में उनकी मुलाकात लालूराम से हुई. इन्हीं छह कलाकारों को लेकर उन्होंने दिल्ली में पहली बार 'मिट्टी की गाड़ी' की प्रस्तुति दी.

एक 'क्लासिक' नाटक में 'लोक' के इस हस्तक्षेप की कहीं सराहना हुई तो कहीं इसे कला को भ्रष्ट करने वाला कहा गया. इस बीच हबीब तनवीर ने मोनिका मिश्रा के साथ हिन्दुस्तान थियेटर को अलविदा कहा, एक दूसरे का साथ मिलकर घर बसाया और अपना 'नया थियेटर' भी बनाया.

लोक कलाकार जुड़ते चले गये. कलाकारों को महीने की तनख्वाह दी जाती और प्रति शो के हिसाब से अतिरिक्त रक़म भी. 'नया थियेटर' में काम करनेवाले कलाकार खेती के दिनों में अपने घर लौट जाते और जब बुलावा होता, नाटक की तैयारी और प्रदर्शन के लिए पहुंच जाते.

कोई 40 बरस बाद, एक बातचीत में हबीब तनवीर ने मुझसे कहा- "मैंने 'नया थियेटर' को इंस्ट्यूशनलाईज़ नहीं किया है. मतलब फ्री, ओपन किस्म का है. मुझे नहीं लगता है कि पूरी दुनिया में आपको ऐसी मिसाल मिलेगी कि कोई संस्था अगर चली तो चली. सबसे पहले 1953 में आए, फिर 1958 में आए, फिर 1973 से लगातार चल रही है. कोई चला एक-दो साल, कोई पाँच साल के भीतर ख़त्म हो गया.... हमारे यहां तो चल रहा है."

हबीब तनवीर

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छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी

हबीब तनवीर ने 1973 के जिस साल का ज़िक्र किया, असल में यह वही दौर था, जब हबीब तनवीर ने रायपुर में महीने भर का नाचा वर्कशॉप किया.

हबीब तनवीर के नाटक 'चरणदास चोर' में चोर की भूमिका निभाने वाले अमर सिंह लहरे बताते हैं कि कैसे उस वर्कशॉप में, उनकी नाचा कंपनी के साथ-साथ चार अलग-अलग नाचा मंडलियों के कलाकार शामिल हुए और हबीब तनवीर का 'नया थियेटर' पूरी तरह से छत्तीसगढ़िया थियेटर में बदल गया.

इस थियेटर में छत्तीसगढ़ का नाचा था, गम्मत था, पंथी नृत्य था, राउत नाच, पंडवानी थी और इस तरह पूरे छत्तीसगढ़ का लोक था. इसी वर्कशॉप में 'मोर नाव दामाद, गांव के नाम ससुराल' नाटक तैयार हुआ.

अमर सिंह लहरे ने एक आयोजन में बताया- "हबीब साहब केवल इतना भर करते थे कि वो किसी अभिनय या दृश्य को क्रमश: इंप्रोवाइज़ करते जाते थे. मैंने बरसों उनके साथ काम किया. उनका जादू था इंप्रोवाइज़ेशन. 1973 के महीने भर तक चले वर्कशॉप के बाद तैयार हुआ नाटक- मोर नाव दामाद, गांव के नाम ससुराल."

अमर सिंह लहरे कहते हैं कि हबीब साहब ने नाचा के कलाकारों के स्वाभाविक अभिनय को बरकरार रहने दिया, बीच-बीच में सुविधानुसार संवाद में हेर-फेर की भी छूट दी, लेकिन उसमें लगातार बेहतरी की जगह वे तलाशते रहते थे.

एक नाटक का उल्लेख करते हुए अमर सिंह लहरे बताते हैं कि उन्हें उस नाटक के दृश्य में रंजीत कपूर से उनका सामान छीनना था. इस क्रम में गुंडा बने अमर सिंह लहरे का पैर फिसला और वे गिर पड़े. लेकिन बिना एक पल गंवाए गुलाटी खाते हुए वे परदे के पीछे ओझल हो गए. दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट ने बता दिया कि उनकी ग़लती छुप गई थी.

अगले दिन फिर नाटक का शो था और इस दृश्य को बिना किसी विघ्न के पूरा कर अमर सिंह परदे के पीछे पहुंचे तो हबीब तनवीर नाराज़ हो गये. उन्होंने पूछा- आज गुलाटी क्यों नहीं खाई? अमर सिंह को समझ में आ गया कि अब इस नाटक के उस दृश्य में गुलाटी को भी शामिल करना होगा.

आगरा बाज़ार, शतरंज के मोहरे, लाला शोहरत राय, मिट्टी की गाड़ी, मोर नाव दामाद गांव के नाम ससुराल जैसे नाटकों के बीच ही हबीब तनवीर ने अपनी छत्तीसगढ़ी मंडली के साथ ही 'चरणदास चोर' नाटक तैयार किया, जिसने नाटकों की एक नई परिभाषा गढ़ी. 1982 में एडिनबरा ड्रामा फेस्टिवल में 'चरणदास चोर' के लिए जब हबीब तनवीर को एडिनबरा फ्रिंज अवार्ड मिला तो पूरी दुनिया का ध्यान हबीब तनवीर की ओर गया.

कवि और साहित्य-कला के समालोचक अशोक बाजपेयी 'चरणदास चोर' को लेकर अक्सर ये बात रेखांकित करते हैं कि एडिनबरा में पुरस्कार उस आधुनिकता को नहीं मिला था, जो इब्राहिम अलकाज़ी ने विकसित की थी. ये पुरस्कार उस संयमित आधुनिकता को भी नहीं मिला था जो शंभु मित्र ने विकसित की थी. ये पुरस्कार उस कच्ची ऊबड़-खाबड़ बीहड़ आधुनिकता को मिला था, जो हबीब तनवीर ने किसी हद तक खोजी थी, किसी हद तक विन्यस्त की थी और किसी हद तक विकसित की थी.

हबीब तनवीर और दीपक तिवारी

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दुनिया भर में सम्मान

13 साल की उम्र से हबीब तनवीर की 'नया थियेटर' में काम करने वाली पूनम तिवारी की उम्र 58 साल है. उनके पति दीपक तिवारी ने भी बरसों नया थियेटर में काम किया.

चरणदास चोर, लाला शोहरत राय, मिट्टी की गाड़ी, आगरा बाजार, देख रहे हैं नैन, कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना, जिन लाहौर नहीं वेख्या, बहादुर कलारिन और हिरमा की अमर कहानी जैसे नाटकों में बरसों मुख्य पात्र का अभिनय करने वाले दीपक तिवारी को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. दीपक तिवारी का पिछले ही साल अप्रैल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया.

नवंबर 2019 में जब पूनम तिवारी के 30 साल के जवान बेटे सूरज का निधन हुआ तो उन्होंने नया थियेटर के प्रसिद्ध गीत "चोला माटी के राम, एकर का भरोसा" गाकर अपने बेटे को विदा किया था. यह दृश्य सोशल मीडिया पर ख़ूब चर्चित हुआ था.

राजनांदगांव में रहने वाली पूनम तिवारी कहती हैं- "पुराने दिनों का एक-एक दृश्य मुझे याद है. मैंने हबीब तनवीर के साथ दुनिया भर में काम किया. हमारा पूरा परिवार थियेटर करता रहा. दुनिया भर में हमलोगों ने अपनी प्रस्तुति दी, लेकिन आर्थिक स्थिति हमेशा खराब बनी रही. मेरी मां, मेरी बड़ी मां, पिताजी, पति, बेटे... सब ने अपनी ज़िंदगी कला में खपा दी. कई बार हबीब साहब के साथ मतभेद हुए, हमने अपना अलग संगठन बनाया- रंग छत्तीसा. ख़ुशी इस बात को लेकर होती है कि हबीब साहब के कारण हमारी कला को, छत्तीसगढ़ को दुनिया भर में सम्मान मिला."

अलग राज्य बनने के बाद हबीब तनवीर छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी के साथ, ज्यादातर समय भोपाल में बने रहे. बीमारी के बाद 2009 में निधन तक, उनका रायपुर आना-जाना लगा रहा. निधन के बाद उनकी बेटी नगीन तनवीर और उनकी मंडली के वरिष्ठ रंगकर्मी रामचंद्र सिंह 'नया थियेटर' भोपाल से ही चला रहे हैं.

रायपुर के बुज़ुर्गों से बात करें तो उनके ज़ेहन में हबीब तनवीर की थियेटर वाली छवि के अलावा भी कई स्मृतियां हैं.

बैजनाथपारा के अरमान टेलर से, गली और घर का पता पूछ लेने का सुझाव देने वाले हबीब तनवीर को कोई राही, फ़ुटपाथ, गांधी, ये वो मंज़िल तो नहीं, हीरो हीरालाल, प्रहार: द फाइनल अटैक, द बर्निंग सीज़न, सरदार, मंगल पांडे, ब्लैक एंड व्हाइट जैसी फ़िल्मों के कलाकार के तौर पर याद करता है, तो कोई एक उम्दा शायर के तौर पर. कुछ लोग यह याद दिलाना नहीं भूलते कि हबीब तनवीर ने बतौर पत्रकार और संपादक कैसा काम किया था.

किसी रंगकर्मी से बात करें तो वो बताएगा कि कैसे 'आगरा बाज़ार' और 'जिन लाहौर नहीं वेख्या' जैसे एक-दो नाटकों को छोड़ कर हबीब तनवीर को भारी-भरकम सेट की कभी ज़रूरत नहीं पड़ी. किसी की शिकायत है कि पद्मश्री, पद्मभूषण मिलने और राज्यसभा में रहने के बाद भी हबीब तनवीर अपने थियेटर में ही उलझे रहे, जबकि वे इससे अधिक कुछ कर सकते थे.

हबीब तनवीर का घर

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लेकिन यह आम शिकायत है कि छत्तीसगढ़ी को पूरी दुनिया भर में पहली बार पहुंचाने वाले हबीब तनवीर को छत्तीसगढ़ की सरकार ने कभी महत्व नहीं दिया. हबीब तनवीर के नाम पर रायपुर में एक गली तक का नामकरण नहीं किया गया. उनके सम्मान में कभी कोई सरकारी आयोजन नहीं होता.

उनके घर के पास की मस्जिद में नमाज़ अदा कर बाहर निकल रहे अशफ़ाक़ कहते हैं कि हबीब तनवीर का यह घर दो मंज़िला था लेकिन अब धीरे-धीरे खंडहर में बदल रहा है. कितना अच्छा होता कि राज्य सरकार हबीब तनवीर की स्मृति में इस घर को बचा कर एक स्मारक का स्वरूप दे देती.

हबीब तनवीर के बंद पड़े घर के सामने एक गुब्बारा वाला आवाज़ लगा कर गुब्बारे बेच रहा है. एक बच्चा धीरे-धीरे गुब्बारे वाले को देखते हुए जा रहा है और सामने से बुर्के में एक औरत आ रही है. ढल रही शाम में जैसे किसी नाटक की रिहर्सल चल रही हो और पुराना मकान चुपचाप इन दृश्यों का गवाह हो.

साथ में खड़े फ़िल्मकार देवेंद्र शुक्ल कहते हैं- "हम खुशकिस्मत हैं, हमने हबीब तनवीर को देखा है."

वीडियो कैप्शन, तेलंगाना का एक ऐसा मूवी थियेटर, जहां फिल्में तो सभी देखते हैं पर इसे चलाती हैं महिलाएं.

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