इप्टा के 75 साल: ये वक़्त की आवाज़ है मिलकर चलो

- Author, नसीरुद्दीन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
घड़ी की सुई रात के 12 बजाती है और मेहनतकशों का मजमा नाचने-गाने लगता है. एक आवाज़ हवा में लहराती है और सब उसके साथ-साथ झूमते हैं:
झूम-झूम के नाचो आज
गाओ ख़ुशी के गीत
झूठ की आख़िर हार हुई
सच की आख़िर जीत.
फिर आज़ाद पवन में अपना झंडा है लहराया
आज हिमाला फिर सर को ऊँचा कर के मुसकाया
गंगा-जमुना के होंठों पे फिर है गीत ख़ुशी के
इस धरती की दौलत अपनी इस अम्बर की छाया
झूम- झूम के नाचो आज…


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ये इप्टा के कलाकार थे जो मज़दूर स्त्री-पुरुषों के साथ मुंबई की सड़कों पर पूरी रात नाच-गाकर आज़ादी का स्वागत कर रहे थे.
ये गीत ख़ास इसी मौक़े के लिए लिखा गया था. इप्टा के सेंट्रल स्क्वॉड के प्रेम धवन की आवाज़ थी और धुन किसी और ने नहीं, उस दौर के लोग बताते हैं, पंडित रविशंकर ने बनाई थी.
इनके साथ मराठी के मशहूर गायक अमर शेख़ की पाटदार आवाज़ भी लोगों को झुमा रही थी.
ये देशभक्त संस्कृतिकर्मियों की टोली थी. इनके लिए देशभक्ति का मतलब, हमेशा से जीती जागती जनता रही है.

इप्टा यानी नए दौर की जन संस्कृति
इप्टा आज़ादी के आंदोलन के दौरान मेहनतकश अवाम की आवाज़ बनकर उभरा और देखते ही देखते अपने हुनर से कला के नए प्रतिमान गढ़ते चला गया.
इसे अंग्रेज़ी में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) कहा जाता है. हिन्दी में भारतीय जननाट्य संघ.
चालीस के दशक में पूरी दुनिया पर दूसरे विश्वयुद्ध के रूप में फ़ासीवाद का ख़तरा मंडरा रहा था और भारत में ब्रितानी साम्राज्यवाद की हुक़ूमत थी.
इसी दौर में जगह-जगह कलाकार-साहित्यकार-बुद्धिजीवी एक साथ आ रहे थे.
वे अपनी कला के माध्यम से लोगों में चेतना पैदा करने की कोशिश कर रहे थे.
ऐसे में पहले बेंगलुरू और फिर मुंबई में श्रीलंकाई मूल के अनिल डिसिल्वा ने पीपुल्स थिएटर की शुरुआत की.
पीपुल्स थिएटर का ये नाम वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने दिया था.
इसके बाद अलग-अलग जगहों पर काम कर रहे समूहों और लोगों का इप्टा के रूप में एक राष्ट्रीय मंच बना.

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इप्टा के शब्द
25 मई 1943 को प्रोफ़ेसर हिरेन मुखर्जी ने बंबई में इप्टा के स्थापना सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रतिनिधियों का आह्वान किया.
उन्होंने कहा कि आप सब, जो कुछ भी हमारे भीतर सबसे अच्छा है, उसे अपनी जनता के लिए अर्पित कर दें. लेखक और कलाकार आओ, आओ अभिनेता और नाटककार, तुम सारे लोग, जो हाथ या दिमाग से काम करते हो, आगे आओ और अपने आपको आज़ादी और सामाजिक न्याय का एक नया वीरत्वपूर्ण समाज बनाने के लिए समर्पित कर दो.
इस मौक़े पर एक प्रस्ताव भी पारित किया गया.
इसे इप्टा का घोषणा-पत्र कहना ज़्यादा उचित रहेगा.
इसमें कहा गया कि "भारतीय जननाट्य संघ के बैनर तले होने वाला ये सम्मेलन रंगमंच और परंपरागत कलाओं को फिर से ज़िंदा कर लोगों के सामने लाने और संगठन बनने के लिए पूरे भारत में जननाट्य आंदोलन तुरंत शुरू करने की ज़रूरत को स्वीकार करता है."
इप्टा के काम को आंकने के लिए उसके ये शब्द ही कसौटी बने थे और आज भी हैं.

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बंगाल के अकाल पीड़ितों की आवाज़
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बंगाल का भीषण अकाल हो या जापान का हमला या फिर आज़ादी की लड़ाई. इप्टा ने अपने गीतों और नाटकों को लोगों की आवाज़ बनाया.
पूरब देस में डुग्गी बाजी, फैला दुख का जाल
दुख की अग्नी कौन बुझाए, सूख गए सब ताल
जिन हाथों ने मोती रोले, आज वही कंगाल
रे साथी, आज वही कंगाल
भूखा है बंगाल रे साथी, भूखा है बंगाल.


वामिक़ जौनपुरी का ये गीत इप्टा के ज़रिए पूरे देश में बंगाल के अकाल पीड़ितों की आवाज़ बना.
1943-44 के आसपास इप्टा की बंगाल शाखा ने बंगाल स्कवॉड तैयार किया. इस दल ने पंजाब, बंबई, महाराष्ट्र और गुजरात में घूम-घूम कर अपने कार्यक्रमों के ज़रिए बंगाल के अकाल पीड़ितों के लिए दो लाख रुपये से ज़्यादा पैसा इकट्ठा किया.
दल की कई महत्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ थीं. इस दल के कार्यक्रमों ने बंगाल के अकाल के प्रति देश के दूसरे हिस्सों में बंधुत्व का भाव पैदा किया.
किसानों, मजदूरों और मध्यम वर्ग को तकलीफ़ झेल रही बंगाल की जनता से जोड़ा.

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राजनीति से उपजे दर्द
ऐसे ही एक कार्यक्रम का ज़िक्र करते हुए भीष्म साहनी कहते हैं, "बंगाल के भीषण अकाल के दिनों में मैंने इप्टा की पहली प्रस्तुति देखी थी. जो मेरे गृह नगर रावलपिंडी में कोलकाता से आये पाँच-छह मंच कलाकारों ने पेश की थी. उन्होंने बंगाल की रोंगटे खड़े कर देने वाली, अत्यंत करुण तस्वीर पेश की थी. इसी का नतीजा था कि जब नाटक ख़त्म होने के बाद कलाकारों ने दर्शकों के बीच जाकर दान एकत्र करना शुरू किया, तो मेरे पास बैठी एक युवती ने अपने सोने के कर्णफूल उतारकर दे दिए. आज भी उस मंचन को याद करता हूँ तो अंदर तक हिल जाता हूँ."
इसी क्रम में बनाये गए इप्टा के 'नबान्न', 'ये किसका ख़ून है' या फिर 'ज़ुबैदा' जैसे नाटकों ने कहानी, डिज़ाइन, अभिनय, प्रस्तुति के स्तर पर आधुनिक भारतीय रंगमंच की तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया.
आज़ादी से पहले हो या आज़ादी के बाद इप्टा ने हमेशा ऩफरत की राजनीति से उपजे दर्द को सबका दर्द बनाया है.
यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि इक़बाल की रचना सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा, को हम सब आज भी जिस धुन पर गाते हैं, वो धुन इप्टा के लिए पंडित रविशंकर ने ही बनाई थी.
ये एक और उदाहरण है कि इप्टा के कलाकारों के लिए देश से मोहब्बत कितना अहम रहा है.

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ईदगाह का मंचन रोकने की कोशिश
मगर ये सब करते हुए इप्टा को आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद सरकारी दमन का भी सामना करना पड़ा.
बंबई और कई जगहों पर उसके कई गीतों और कार्यक्रमों पर रोक लगी. लखनऊ में तो प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' के नाट्य रूपांतर पर रोक का आदेश, ठीक मंचन के बीच में आ गया.
इसका नाट्य रूपांतर रज़िया सज्जाद ज़हीर ने किया था और मशहूर उपान्यसकार अमृत लाल नागर इसके निर्देशक थे.
इन पर आरोप लगा कि इन्होंने अपने राजनैतिक विचारों के हिसाब से ईदगाह की स्क्रिप्ट को तोड़ा मरोड़ा है.
हालांकि, बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया और सरकार की कार्रवाई को संविधान की भावना के विरुद्ध माना.
क्या इप्टा किसी पार्टी का संगठन है?
ये सच है कि इप्टा को शक्ल देने में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पी सी जोशी का भी मज़बूत समर्थन रहा.
वे कला-संस्कृति को सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का मज़बूत ज़रिया मानते थे. अपने विचारों की वजह से संस्कृतिकर्मियों के बीच काफ़ी लोकप्रिय भी थे.
मगर ये भी उतना ही बड़ा सच है कि इप्टा किसी पार्टी की शाखा नहीं था.
मशहूर अभिनेता बलराज साहनी ने एक बार कहा था कि ''भारतीय जन नाट्य संघ न तो किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा है. न किसी गुट से. इप्टा सभी राजनीतिक दलों और गैर-राजनीतिक लोगों का स्वागत करता है. इस संघ का सदस्य होने की एकमात्र शर्त है- देशभक्ति, अपनी जन संस्कृति पर गर्व.''
आज जब इप्टा के 75 साल पूरे हो चुके हैं तो ज़ाहिर है कि वो किसी पार्टी विशेष की शाखा बनकर नहीं मनाई जा रही है.
अगर ऐसा होता तो अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले अनेक सांस्कृतिक संगठन, स्वतंत्र बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता इसके समारोह में शिरकत के लिए नहीं आते.

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क्या इप्टा ख़त्म हो गया है?
ये सच है कि लगभग दो दशक तक इप्टा का राष्ट्रीय स्तर पर सांगठनिक ढाँचा आज जैसा नहीं था.
मगर ऐसा कभी नहीं रहा कि इप्टा की इकाइयाँ नहीं थीं या वे काम नहीं कर रही थीं. साल 1985 में राष्ट्रीय स्तर पर संगठन दोबारा खड़ा हुआ.
यही वजह है कि जन्म से लेकर अब तक इप्टा के चौदह राष्ट्रीय सम्मेलन हो चुके हैं.
आज लगभग पौने दो सौ जिलों में इप्टा की इकाइयाँ हैं. मगर क्या इप्टा में वह बात बची है?
अस्सी के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर पुर्नगठन के बाद इप्टा ने एक नया स़फर शुरू किया. इसी दौर में संगीत नाटक अकादमी ने एक योजना शुरू की थी.
इसके तहत वे क्षेत्रीय स्तर पर चुनिंदा बेहतरीन नाटकों को प्रस्तुति के लिए बुलाते थे. इस क्षेत्रीय समारोह से फिर राष्ट्रीय समारोह के लिए नाटकों का चयन किया जाता था.
ये काफ़ी प्रतिष्ठित समारोह माना गया और उसमें प्रस्तुति के लिए चुना जाना, बड़ी बात थी.
आमतौर पर आज भी जब कुछ लोगों से इप्टा की बात होती है तो बात आज़ादी तक आते-आते सिमटने लगती है.
उनके लिए ये एक ऐसी ख़बर है जो चौंकाती है. इप्टा ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर नाट्य प्रस्तुति के अलग-अलग आयामों पर न सिर्फ अलग करके दिखाया बल्कि राष्ट्रीय नाट्य परिदृश्य पर अपनी गहरी छाप भी छोड़ी.
ये सब इस नारे के ईद गिर्द ही हो रहा था या है- इप्टा की नायक जनता है.
यानी राष्ट्रीय स्तर पर संगठन का ढाँचा न होना, इप्टा के रंगकर्म को ख़त्म नहीं कर सका.
ये बात जितनी शिद्दत से कही जानी चाहिए, उतनी कही नहीं जाती है. यही नहीं, इन समारोहों से इतर इप्टा के नाटक लगातार चर्चा में रहते हैं.
चाहे वो पटना इप्टा का तनवीर अख़्तर के निर्देशन में भिखारी ठाकुर का 'गबरघिचोरन की माई' हो या मुंबई इप्टा का रमेश तलवार के निर्देशन में देवाशीष मजुमदार का लिखा नाटक 'कशमकश' हो.

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इप्टा 'इतिहास' नहीं है
इप्टा 75 साल का जवाँ धड़कता हुआ संगठन है.
फ़र्क इतना है कि 40 के दशक में अकेले इप्टा था जिसने संस्कृति के ज़रिए जनता की तकलीफ़ों को आवाज़ दी.
आज ऐसे कई संगठन और समूह देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करते हुए देखे जा सकते हैं.
ये इप्टा की परंपरा के वाहक हैं. इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल है कि इप्टा अपने जैसे काम करने वाले संगठनों और व्यक्तियों के साथ व्यापक मंच की ज़मीन तैयार कर सकता है या नहीं?
हालांकि, इप्टा के कलाकार तो यही गाते हैं:

हम होंगे कामयाब एक दिन
मन में है विश्वास पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन
और वे अपील कर रहे हैं कि ये वक़्त की आवाज़ है मिल के चलो.
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