गुजरात: नए चेहरों की बदौलत बीजेपी की 'आप' और कांग्रेस को मात देने की रणनीति

गुजरात चुनाव 2022

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इमेज कैप्शन, गुजरात में दिग्गज बीजेपी नेता विजय रूपाणी और नीतिन पटेल चुनाव नहीं लड़ेंगे
    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने 160 उम्मीदवारों की जो सूची जारी की है, जानकार उसका अलग-अलग ढंग से विश्लेषण कर रहे हैं.

अधिकतर जानकारों का मानना है कि चाहे आम चुनाव हों या फिर विधानसभा चुनाव, ऐसी चुनावी रणनीति बीजेपी के लिए कोई नई बात नहीं है. वहीं कई अन्य इसे नई रणनीति के रूप में देख रहे हैं.

गुजरात में बीजेपी ने अपने कई प्रमुख चेहरों को अलग कर दिया है जिसकी वजह से राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट ज़रूर पैदा हो गई है.

इनमें पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी, पूर्व शिक्षा मंत्री भूपेंद्र सिंह चुडासमा, पूर्व उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल और गुजरात के पूर्व गृह मंत्री प्रदीप सिंह जडेजा के नाम शामिल हैं.

वैसे पार्टी सूत्रों का कहना है कि इन प्रमुख नेताओं ने ख़ुद ही चुनाव नहीं लड़ने का फ़ैसला लिया था.

समाचार एजेंसी एएनआई से विजय रूपाणी ने कहा, "मैं सब के सहयोग से पांच सालों तक मुख्यमंत्री रहा. इन चुनावों की ज़िम्मेदारी नए कार्यकर्ताओं को दी जानी चाहिए. मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा, और इसकी इच्छा मैंने वरिष्ठों को जता दी है. अब जिन नए उम्मीदवारों का चयन पार्टी करेगी, मैं उनकी जीत के लिए काम करूंगा."

बीजेपी ने युवा चेहरों को तरजीह क्यों दी?

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रूपाणी, नितिन पटेल समेत दिग्गज़ नेताओं को टिकट क्यों नहीं दिया गया?

गुजरात के जाने माने राजनीतिक विश्लेषक मनीषी जानी ने बीबीसी से कहा कि बीजेपी ने जिस तरह टिकट का बंटवारा किया है, उससे गुजरात के चुनावी मैदान में एक नए खिलाड़ियों की मौजूदगी के साफ़ संकेत हैं.

बीबीसी से वो कहते हैं, "इस सूची से साफ़ दिख रहा है कि जो फेरबदल किए गए हैं, वो आम आदमी पार्टी के चुनावी मैदान में उतरने की वजह से किए गए हैं. आम आदमी पार्टी नए चेहरों के साथ मैदान में आई है तो बीजेपी उनका मुक़ाबला नए चेहरों के साथ करना चाहती है.

पंजाब में आम आदमी पार्टी को नए चेहरे उतारने का बहुत लाभ मिला और उसने वहाँ कांग्रेस और अकाली दल का एक तरह से सफ़ाया ही कर दिया. पंजाब के चुनावी परिणाम से बीजेपी को भी सीख मिली है."

हालांकि मनीषी जानी साथ में ये भी कहते हैं कि "बीजेपी चरणबद्ध तरीक़े से जनसंघ के समय के चेहरों को अलग-थलग करना चाहती है. इसलिए वो नए चेहरों को ला रही है ताकि उन पर नियंत्रण रखा जा सके."

विश्लेषकों का मानना है कि अपने 27 सालों के शासनकाल को देखते हुए बीजेपी कुछ नया करना चाहती है ताकि मतदाताओं को नए तरीक़े से लुभा सके.

राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत दयाल कहते हैं कि 'इससे पार्टी को अगर कोई सत्ता विरोधी लहर है तो उससे निपटने में कामयाबी हासिल होगी, साथ ही युवाओं को आगे लाने से संगठन में नया जोश पैदा होगा.'

182 सीटों वाली गुजरात विधानसभा में बीजेपी की 111 सीटें हैं. 160 सीटों पर प्रत्याशियों की सूची में जातीय सामंजस्य बैठाने की कोशिश भी दिख रही है.

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विधायकों के काम का आकलन किया गया

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बीबीसी से गुजरात बीजेपी प्रवक्ता किशोर मकवाना कहते हैं कि विधानसभा चुनाव में समाज के हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया है, फिर चाहे पिछड़ा वर्ग हो या पाटीदार या पटेल, जनजातीय समुदाय के लोग हों या फिर अगड़ी जाति के क्षत्रिय और ब्राह्मण ही क्यों न हों.

वे कहते हैं कि उम्मीदवारी तय करने में संगठन ने जिन बातों का ध्यान रखा उनमें एक है उम्र.

ज़्यादातर प्रत्याशी 40 से 55 वर्ष के बीच के हैं. कई 40 से कम उम्र के भी हैं. इनमें सबसे छोटे 29 वर्षीय प्रत्याशी हैं.

महिलाओं को भी टिकट दी गई है, लेकिन पहली सूची में इनका प्रतिशत केवल नौ है, जिसमें क्रिकेटर रवींद्र जडेजा की पत्नी रिवाबा भी शामिल हैं.

मकवाना का कहना था कि "बहुत से ऐसे विधायक हैं जो 1990 से ही चुनाव लड़ते आ रहे हैं. अब उनकी जगह नए चेहरों को लाया जा रहा है. इसमें शक़ नहीं कि विधायकों के काम का आकलन किया गया और जिसने अपने विधानसभा क्षेत्र में जितना काम किया उसी के हिसाब से उम्मीदवारी तय की गई है."

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इमेज कैप्शन, क्रिकेटर रवींद्र जडेजा की पत्नी रिवाबा (दाएं से दूसरी) को बीजेपी ने टिकट दिया है

मौजूदा विधायकों के टिकट काटने का कारण क्या?

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पहली सूची में जिन 160 सीटों के लिए उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की गई है, उनमें बीजेपी ने पिछले चुनाव में जीते हुए 38 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए गए हैं.

मकवाना कहते हैं, "38 मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जाने का कारण ये भी है कि काम न करने वाले विधायकों के ख़िलाफ़ आक्रोश को कम किया जा सके."

वो यह भी कहते हैं कि "उम्मीदवारी का अहम मानदंड तो यही है कि टिकट उसे ही दिया जा रहा है जिसमें चुनाव जीतने की क्षमता है और उसने अपने क्षेत्र में काम भी किया है."

पहली सूची में सबसे अधिक टिकटें अन्य पिछड़ा वर्ग को दी गई हैं.

उसी तरह पाटीदार समाज, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, क्षत्रिय, ब्राह्मण और जैन समुदाय के लोगों को उम्मीदवार बनाया गया है.

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इमेज कैप्शन, पाटीदार आंदोलन ( फाइल फोटो)

कांग्रेस से आए नेताओं का क्या?

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हालांकि पहली सूची से ये स्पष्ट नहीं है कि टिकट को लेकर कांग्रेस से बीजेपी में आए 20 नेताओं की उम्मीवारी की स्थिति क्या है.

मकवाना कहते हैं, "वो कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हो गए थे और अपने नए संगठन और क्षेत्र के लोगों के लिए उन्होंने काफ़ी काम भी किया है."

उधर, विश्लेषक प्रशांत दयाल कहते हैं, "बीजेपी ने ज़्यादातर वैसे कांग्रेस विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल किया गया है जिन्हें पूरा ज़ोर लगाने के बावजूद वो हरा नहीं सकी थी."

वे कहते हैं, "कांग्रेस के ये वो विधायक रहे हैं जो अपने बूते चुनाव जीतते रहे हैं और जिन्हें हराना बीजेपी के लिए भी चुनौती ही बना रहा था. ये वो विधायक भी हैं जो नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री के कार्यकाल और बाद में मोदी लहर के बावजूद गुजरात में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतते रहे हैं."

प्रशांत दयाल ने जामनगर से विधायक राघवजी पटेल और राजकोट ग्रामीण के विधायक जगेश रादिग्या का उदाहरण देते हुए कहा कि बीजेपी की रणनीति हमेशा यही रही है कि कभी भी चुनावी मैदान में सामने तगड़ा प्रतिद्वंद्वी न हो.

बीजेपी के लिए मुश्किल बढ़ी

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इमेज कैप्शन, बीजेपी के लिए मुश्किल बढ़ी

मोरबी के विधायक पर भी गाज़ गिरी

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वे ये भी कहते हैं कि मोरबी के विधायक पर ज़रूर गाज गिरी है जो पहले कांग्रेस में थे और बीजेपी में आने के बाद मंत्री भी बने थे. उनकी जगह पुराने कार्यकर्ता और पूर्व विधायक कांतिलाल अमृतिया को उम्मीदवार बनाया गया.

अमृतिया ने मोरबी में पुल के हादसे के बाद कई जानें बचाई थीं.

बीजेपी की पहली सूची से कांग्रेस के लिए भी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं क्योंकि लगभग 30 सीटें ऐसी हैं जहाँ कांग्रेस विधायक 5,000 या उससे कम वोटों से जीते थे.

पत्रकार जयदीप बसंत बीजेपी की इस सूची का अलग तरीक़े से विश्लेषण करते हैं.

वो कहते हैं कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति से भी काफ़ी सीख या सबक़ लिया है जो इस सूची से साफ़ तौर पर झलकता है.

उनका कहना था कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का पतन सिर्फ़ इसलिए ही हुआ क्योंकि दशकों तक वही चेहरे चुनाव लड़ रहे थे, जीत रहे थे और मंत्री भी बन रहे थे.

वो कहते हैं, "वाम मोर्चा सिर्फ़ बुज़ुर्गों का गठजोड़ बन कर रह गया था. चाहे बुद्धदेब भट्टाचार्य हों या उनसे पहले ज्योति बसु. अगली पंक्ति के नेता भी सब वही चेहरे थे जो 25 सालों से चुनाव लड़ रहे थे और जीत रहे थे. यही वजह रही कि तृणमूल कांग्रेस ने नए चेहरों को उतारा और वाम मोर्चे का सफ़ाया कर दिया."

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