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प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा को हाईकोर्ट ने किया बरी, नक्सलियों से संबंध रखने का था आरोप
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा को बरी करने के बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थगन आदेश देने से इनकार कर दिया है.
समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के थोड़ी देर बाद ही नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट ने इसे चुनौती दी.
हालांकि शीर्ष अदालत ने एनआईए को इस बात की इजाजत दी कि वो मामले की जल्द सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के पास आवेदन दे सकता है.
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वो बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक नहीं लगा सकते हैं क्योंकि मामले के दोनों पक्षकार की बात उन्होंने नहीं सुनी है.
तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से मामले की फौरन सुनवाई और हाई कोर्ट के फ़ैसले पर स्टे ऑर्डर देने की मांग की थी. बेंच ने ये भी कहा कि उसने न तो केस की फाइल देखी है और न ही हाई कोर्ट के फ़ैसले को पढ़ा है.
बेंच ने कहा, "आप इस मामले की अर्जेंट लिस्टिंग के लिए रजिस्ट्री के समक्ष आवेदन दाखिल करें."
इससे पहले नक्सलियों के साथ कथित संबंध के मामले में साल 2017 में गिरफ़्तार किए गए प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा को बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने रिहा कर दिया था.
बीबीसी के सहयोगी पत्रकार सुचित्र मोहन्ती ने जानकारी दी है कि शुक्रवार को न्यायाधीश जस्टिस रोहित देव और जस्टिस अनिल पंसारे की बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए ये निर्णय सुनाया है.
दिल्ली विश्वविद्यालय के निलंबित प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा को ट्रायल कोर्ट ने साल 2017 में नक्सलियों से संबंध का दोषी ठहराते हुए उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी.
प्रोफ़ेसर साईबाबा ने इस फ़ैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में चुनौती दी थी.
प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा समेत पांच अन्य को भी अदालत ने रिहा करने का आदेश दिया है.
प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा बतौर सामाजिक कार्यकर्ता, रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम की एक संस्था से भी जुड़े रहे हैं. वे 'रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट' के उपसचिव रहे हैं.
'रेवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट' माओवादियों से संबंध के लिए ख़ुफ़िया एजेंसियों के निशाने पर रहा है.
कोर्ट ने क्या कहा?
क़ानूनी मामलों को कवर करने वाली वेबसाइट लाइवलॉ के अनुसार, बॉम्बे हाई कोर्ट ने साईबाबा और पांच अन्य लोगों को कड़े यूएपीए क़ानून से जुड़े इस मामले में रिहा करते हुए उनके ख़िलाफ़ चलाए गए पूरे मुक़दमे को ही ख़ारिज कर दिया है.
हाई कोर्ट का कहना है कि 'इस मुक़दमे की कार्यवाही के लिए यूएपीए क़ानून की धारा 45 (1) के तहत ज़रूरी वैध अनुमति नहीं ली गई थी और इसके अभाव में मुक़दमा ख़ारिज किया जाता है.'
प्रोफ़ेसर साईबाबा के साथ और किन-किन को हुई सज़ा
प्रोफ़ेसर साईबाबा के साथ चार अन्य अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी.
इनमें जेएनयू के पूर्व छात्र हेम मिश्रा, स्वतंत्र पत्रकार एवं मानवाधारिकार कार्यकर्ता प्रशांत राही, आदिवासी महेश तिर्के और पांडु नारोट का नाम शामिल है.
इसके अलावा एक अन्य अभियुक्त विजय तिर्के को दस साल की सज़ा हुई थी.
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अब तक क्या-क्या हुआ
- 2013 में हेम मिश्रा और प्रशांत राही को गिरफ्तार किया गया था.
- पुलिस का कहना था कि वो माओवादी नेताओं से मुलाक़ात करने वाले थे और ये मुलाक़ात प्रोफ़ेसर साईबाबा की मदद से तय हुई थी.
- इसके बाद 2013 में प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा के घर पर गढ़चिरौली और दिल्ली पुलिस की संयुक्त टीमों ने छापा मारा.
- उस समय प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा ने कहा था कि पुलिस उनका लैपटॉप, चार पेन ड्राइव, चार एक्सटर्नल हार्ड-डिस्क, कुछ किताबें अपने साथ ले गई.
- 2014 में प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा को दिल्ली में उनके घर से महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार किया था.
- इसके बाद उन्हें यूनिवर्सिटी ने निलंबित कर दिया था.
- महाराष्ट्र की गढ़चिरौली अदालत ने यूएपीए के सेक्शन 13, 18, 20 और 39 के तहत प्रोफ़ेसर साईबाबा को दोषी पाया था.
- प्रोफ़ेसर साईबाबा पक्षाघात के मरीज़ हैं और 90 प्रतिशत विकलांगता की श्रेणी में आते हैं.
- सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बिगड़ती सेहत के आधार पर उन्हें जुलाई 2015 में जमानत पर रिहा किया गया था.
- लेकिन इसके बाद हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत रद्द करते हुए उन्हें आत्मसमर्पण करने को कहा था.
कोर्ट के आदेश पर कैसी है प्रतिक्रिया
प्रोफ़ेसर साईबाबा पर कोर्ट के आदेश को लेकर सोशल मीडिया पर कई लोग टिप्पणियां कर रहे हैं.
जाने-माने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने लिखा, "अच्छी ख़बर है. हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया है. उन्हें अब रिहा कर दिया जाएगा. वो विकलांग हैं और उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है. इसके बावजूद उन्हें एक छोटे से जेल में रखा गया."
एआईएमआईएम नेता असदउद्दीन ओवैसी ने कहा, "यूएपीए क़ानून के कारण प्रोफ़ेसर साईबाबा सालों तक जेल में परेशान होते रहे और उनके क़रीबी हताशा के साथ उन्हें देखते रहे. यूएपीए एक ऐसा राक्षसी क़ानून है जिसे बीजेपी और कांग्रेस ने बनाया है. इसके तहत जिन्हें जेलों में डाला गया है उनमें मुलसमान, दलित, आदिवासी और सरकार के विरोध में आवाज़ उठाने वाले शामिल हैं."
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, "इस क़ानून के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों में से केवल तीन फीसदी लोगों को ही सज़ा हुई है, जबकि इसके तहत गिरफ्तार किए गए मासून लोग सालों तक जेल में सड़ते रहे हैं."
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कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी प्रोफ़ेसर साईबाबा को लेकर आए कोर्ट के आदेश का स्वागत किया.
उन्होंने लिखा, "पांच साल बाद प्रोफ़ेसर साईबाबा को जेल से मिली रिहाई इस बात का सबूत है कि पीएम के समर्थकों ने 'अर्बन नक्सल' नाम का जो शब्द बनाया था वो पूरी तरह बकवास है.
कई और लोगों को भी ग़लत तरीके से कस्टडी में रखा गया है. दूसरों पर आरोप लगाने के इन तरीकों से बचना चाहिए. अगर प्रधानमंत्री मुझे भी इस नाम से पुकारें तो मुझे इस पर आश्चर्य नहीं होगा."
सीपीआईएम ने भी उनकी रिहाई का स्वागत किया है और कहा है कि सभी राजनीतिक बंदियों को जल्द रिहा किया जाए और यूएपीए क़ानून को खत्म किया जाए.
कम्युनिस्ट नेता बृंदा करात ने एक वीडियो जारी करते हुए कहा, "जिस मामले में उन्हें उम्र कैद की सज़ा दी गई थी उसी मामले में उन्हें अब रिहा कर दिया गया है. आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि 90 फीसदी विकलांग प्रोफ़ेसर कई सालों तक जेल में रहे.
क़ानून का इस्तेमाल करने के लिए जिन धाराओं का पालन किया जाना था वो नहीं हुआ. ये दिखाता है कि राजनीति से प्रेरित होकर ग़ैरक़़ानूनी तरीके से लोगों पर दवाब बनाने के लिए क़ानून का इस्तेमाल किया जा रहा है. मैं इस आदेश का स्वागत करती हूं."
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