मानवाधिकारों को लेकर भारत ने चीन के ख़िलाफ़ वोट क्यों नहीं किया

भारत के प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चीन के शिनजियांग प्रांत में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे पर गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद यानी यूएनएचसीआर में बहस का एक प्रस्ताव लाया गया था.

यूएनएचसीआर के 47 सदस्य देशों में से 17 देशों ने इस मसौदे के प्रस्ताव के समर्थन में वोट किया जबकि 19 ने इसके ख़िलाफ़ वोट किया.

भारत ने इस मुद्दे पर चीन के ख़िलाफ़ नहीं जाने का फ़ैसला किया. इस पर विपक्षी दलों ने भारत सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाया है.

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने ट्वीट किया, "चीन के मुद्दे पर भारत सरकार के रुख़ में इतना अंतर क्यों है?"

शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने मोदी सरकार पर तंज कसते हुए ट्वीट किया, "हिंदी-चीनी भाई-भाई. लाल आंख से लेकर बंद आंख तक का सफ़र."

वहीं कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने ट्वीट किया, "पाकिस्तान के अब्दुल रहमान मक्की को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के भारत और अमेरिका के प्रस्ताव का चीन विरोध कर देता है, लेकिन भारत ने चीन के ख़िलाफ़ वीगर समुदाय के मानवाधिकारों के उल्लंघन के प्रस्ताव के मसौदे से ख़ुद को अलग रखा है."

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अपने फ़ैसले पर भारत ने क्या कहा?

बीबीसी हिंदी

शुक्रवार शाम को विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने चीन के शिनजियांग प्रांत का ज़िक्र किया और कहा कि इस स्वायत्त क्षेत्र के लोगों के हकों का "सम्मान किया जाना चाहिए" और उन्हें ये मिलना चाहिए.

माना जा रहा है कि पहली बार विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय रखी है.

संवाददाता सम्मेलन में जब उसने पूछा गया कि शिनजियांग में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे पर हुए बहस के प्रस्ताव पर भारत ने वोटिंग नहीं करने का फ़ैसला क्यों लिया, तो उन्होंने कहा कि ये लंबे वक्त से अपनाई गई भारत की नीति के अनुसार है.

उन्होंने कहा, "शिनजियांग वीगर स्वायत्त क्षेत्र में रहने वाले लोगों के मानवाधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए और उन्हें वो हक मिलना चाहिए. हमें उम्मीद है कि इस संबंध में स्थिति को निष्पक्ष तरीके से समझा जाएगा और समस्या का हल निकाला जाएगा."

उन्होंने कहा, "भारत मानवाधिकारों का सम्मान करता है. भारत ने इस मामले में वोट को लेकर जो फ़ैसला किया वो लंबे वक्त से अपनाई गई नीति के अनुसार है जिसके तरह हम मानते हैं कि किसी मुल्क संबंधी प्रस्ताव अधिक कारगर नहीं होते. इस तरह के मुद्दों को सुलझाने के लिए भारत दोनों पक्षों में बातचीत का समर्थक है."

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चीन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के क्या हैं आरोप

बीबीसी हिंदी

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में चीन पर उसके उत्तर-पूर्वी शिनजियांग प्रांत में 'मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन' के आरोप लगाए गए थे. हालांकि चीन ने इस बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट को जारी न करने की अपील की थी. चीन का कहना था कि ये पश्चिमी ताक़तों का 'फ़र्ज़ीवाड़ा' है.

इस रिपोर्ट में चीन के शिनजियांग प्रांत में अल्पसंख्यक मुसलमानों और दूसरे समुदाय के लोगों के दमन के आरोपों को लेकर की गई पड़ताल का ज़िक्र है.

चीन दमन की इन कार्रवाइयों से इनकार करता रहा है. लेकिन इन आरोपों की पड़ताल करने वालों का कहना है कि उन्हें इन समुदाय के लोगों को प्रताड़ित किए जाने के पुख़्ता सुबूत मिले हैं.

मानवाधिकार समूह पिछले कुछ समय से शिनजियांग में मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं के बारे में चिंता जताते रहे हैं.

उनका कहना है कि यहां वीगर समुदाय के दस लाख लोगों को रीएजुकेशन कैंप में ट्रेनिंग देने के नाम पर हिरासत में रखा गया है.

चीन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का क्या है आरोप

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इमेज कैप्शन, भारत ने चीन के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में लाए गए एक प्रस्ताव में चीन के ख़िलाफ़ वोटिंग न करने का फ़ैसला किया है

चीन के ख़ि़लाफ़ नहीं गया भारत, क्या है वजह?

बीबीसी हिंदी

भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में क़रीब दो साल से गतिरोध बना हुआ है. ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि भारत के इस क़दम के क्या मायने हैं?

ये समझने के लिए हमने भारत-चीन मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह से बात की. स्वर्ण सिंह फ़िलहाल वैंकूवर में ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैं.

उनके मुताबिक़, "यह भारत की पुरानी नीति रही है. पंचशील के सिद्धांतों में इसका ज़िक्र है कि भारत और चीन एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दख़ल नहीं देंगे. इसलिए भारत 'वन चाइना पॉलिसी' को भी मानता है. ऐसे में भारत अपनी पुरानी नीति को बदलकर चीन के साथ अपने संबंधों को और ख़राब नहीं करना चाहता."

वहीं जेएनयू में सेंटर फ़ॉर चाइनीज़ एंड साउथ ईस्ट एशिया स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर बीआर दीपक का मानना है, "मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा एक गंभीर मामला है. पश्चिमी लोकतांत्रिक देश इसे 10 लाख़ से ज़्यादा वीगर समुदाय के लोगों से जोड़ कर देखते हैं".

"लेकिन यह भारत के लिए भी गंभीर मामला है. अगर भारत ऐसे मुद्दे पर चीन के ख़िलाफ़ जाता है तो चीन भी कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों के मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठा सकता है. इसलिए न तो भारत ने कभी मानवाधिकार के मुद्दे पर चीन की आलोचना की है और न ही चीन ने कभी भारत के बारे में ऐसी बात की है."

17 ने इस मसौदे के समर्थन में वोट किया है, जबकि 19 ने इसके ख़िलाफ़ वोट किया

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बीआर दीपक के मुताबिक़ दोनों ही देश इस मामले में सावधानी बरतते हैं.

वो कहते हैं कि भारत और चीन दोनों ही आपसी रिश्तों को और नहीं बिगाड़ना चाहते हैं, इसलिए पश्चिमी देशों का एक धड़ा जब चीन में लोकतंत्र को लेकर बात करता है तो भारत इससे ख़ुद को अलग रखता है.

वहीं प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि चीन से जुड़े मानवाधिकार के ऐसे मुद्दे पर बड़े मुस्लिम देश भी आमतौर पर चुप रहते हैं.

इसी मसले पर इंडोनेशिया ने भी वोटिंग में भाग नहीं लिया जो कि दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है. उनका मानना है कि चीन के ख़िलाफ़ मौजूदा प्रस्ताव ऐसे देशों का है जिनको चीन के आगे बढ़ने से ख़तरा है.

वीगर मुसलमानों के मामले में चीन पर दबाव

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चीन कई मुद्दों पर रहा है भारत के ख़िलाफ़

बीबीसी हिंदी

चीन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार भारत के ख़िलाफ़ खड़ा होता रहा है. इसलिए भी यह सवाल उठ रहे हैं कि भारत ऐसे मौक़े पर चीन के ख़िलाफ़ क्यों नहीं गया.

इसी साल अगस्त के महीने में विवादित बयानों के लिए जाने जाने वाले पाकिस्तान के धार्मिक नेता मौलाना मसूद अज़हर के भाई अब्दुल रऊफ़ अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादियों की सूची में शामिल कराने के लिए अमेरिका और भारत की तरफ़ से कोशिश की गई थी. लेकिन चीन ने इस कोशिश को जानकारी की कमी का हवाला देते हुए टाल दिया.

फिर सितंबर के महीने में संयुक्त राष्ट्र में भारत और चीन एक बार फिर टकराए थे. मुद्दा था 2008 के मुंबई हमले के मुख्य अभियुक्तों में शामिल लश्कर-ए-तैयबा के चरमपंथी साजिद मीर को आतंकवादियों की ब्लैकलिस्ट में डालना.

दरअसल, अमेरिका संयुक्त राष्ट्र में साजिद मीर को 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी' घोषित करने का प्रस्ताव लाया था. भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था.

लेकिन चीन ने अपने 'वीटो' पावर का इस्तेमाल करते हुए इस प्रस्ताव पर रोक लगा दी. प्रस्ताव के तहत मीर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की (1267 अल क़ायदा प्रतिबंध) समिति के अंतर्गत 'अंतरराष्ट्रीय आंतकवादी' घोषित किया जाना था.

इसके अलावा भारत का न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप का सदस्य बनने के रास्ते में भी चीन का रवैया टालमटोल करने वाला रहा है. जबकि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के मामले में चीन का रवैया कुछ ऐसा ही रहा है.

भारत के प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति

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बड़े मुद्दों पर भारत के साथ कौनसे देश

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प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह का कहना है, "आतंकवादियों से जुड़ा मुद्दा किसी व्यक्ति को लेकर है, जबकि मानवाधिकारों के मुद्दे पर अगर भारत चीन के ख़िलाफ़ जाता है तो यह एक देश पर भारत की तरफ से गंभीर आरोप होगा. ऐसे में आने वाले समय में चीन भी भारत पर इस तरह के आरोप लगा सकता है."

वो कहते हैं, "जबकि सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता या एनएसजी की मेंबरशिप जैसे मुद्दों पर बड़े देशों का रवैया भी भारत के बहुत ज़्यादा समर्थन वाला नहीं होता है. अमेरिका, रूस जैसे देश जानते हैं कि अंत में चीन इस पर अपना वीटो लगा ही देगा, इसलिए वो भी घुमा-फिरा कर बात करते हैं, चीन भी यही करता है."

प्रोफ़ेसर बीआर दीपक इस मामले में थोड़ी अलग राय रखते हैं. उनका कहना है, "पाकिस्तान के साथ गहरी मित्रता की वजह से कई मुद्दों पर चीन भारत का साथ नहीं देता है. लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता है, जैसे साल 2019 में मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने के मामले में चीन ने कई बार विरोध किया लेकिन बाद में उसने इसे मान लिया था."

भारत साल 2009 से मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने की मांग कर रहा था, भारत को यह मांग मनवाने में पूरे 10 साल लग गए थे.

बीआर दीपक कहते हैं, "सीमा विवाद से अलग भी भारत और चीन के संबंध हैं. चीन भी चाहता है कि भारत जैसा बड़ा लोकतंत्र शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स में रहे."

भारत-चीन सीमा पर क़रीब दो साल से तनाव बरक़रार

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चीन और भारत के बीच व्यापारिक संबंध

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भारत-चीन के बीच साल 2020 से सीमा पर गतिरोध जारी है. हालांकि इसके बावजूद भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध अब तक के उच्चतम स्तर पर हैं.

भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों से यह साफ़ तौर पर ज़ाहिर होता है कि चीन से आयात पर भारत की निर्भरता लगातार बढ़ रही है.

मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021-22 में दोनों देशों के बीच क़रीब 115 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जो पिछले साल की तुलना में बढ़ा है. पिछले साल यह 86 अरब डॉलर था.

इसके साथ ही चीन से भारत का आयात भी बढ़ा है. इस साल जहां ये 94 अरब डॉलर रहा है, वहीं बीते साल ये 65.3 अरब डॉलर था.

ऐसे में भारत और चीन दोनों अपने संबंधों को बनाकर रखना चाहते हैं. वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध, कोरोना महामारी या आतंकवाद जैसे बड़े मुद्दे पर भी भारत और चीन की नीति एक जैसी रही है.

हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि भारत और चीन के बीच रिश्ते तब तक सामान्य नहीं होंगे जब तक दोनों देशों की सीमा पर हालात सामान्य नहीं होंगे.

स्वर्ण सिंह इसे एक बड़ा बयान मानते हैं और कहते हैं कि इससे ज़्यादा आगे जाकर अगर भारत अपनी पुरानी नीति में बदलाव करता है तो यह चीन के साथ विवाद को और बढ़ा सकता है.

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