मोहन भागवत ने धर्म आधारित जनसंख्या असंतुलन की बात की, लेकिन क्या कहते हैं आंकड़े

भारत में हिंदू आबादी क़रीब 80 फ़ीसद है जबकि मुसलमानों की आबादी क़रीब 14 फ़ीसद है.

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    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भारत को एक व्यापक जनसंख्या नीति की ज़रूरत है.

भागवत ने कहा कि धर्म आधारित जनसंख्या के 'असंतुलन' का मामला नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. उनके अनुसार जनसंख्या में 'असंतुलन' से भौगोलिक सीमा में बदलाव होता है.

बुधवार को दशहरे के मौक़े पर नागपुर में अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि जनसंख्या के 'असंतुलन' के कारण भारत ने गंभीर परिणाम भुगता है. उन्होंने 1947 में भारत के विभाजन और पाकिस्तान के बनने के लिए धर्मों के बीच जनसंख्या में कथित असंतुलन को ज़िम्मेदार ठहराया.

इस मौक़े पर उन्होंने ईस्ट तिमोर, दक्षिण सूडान और कोसोवो का उदाहरण देते हुए कहा कि जनसंख्या में असंतुलन के कारण ही यह नए देश बने हैं.

उन्होंने जन्म दर के अलावा कथित जबरन धर्म परिवर्तन और सीमा पार से अवैध प्रवासियों के भारत आने का भी ज़िक्र किया.

भागवत ने अपने भाषण में किसी धर्म का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया.

भारत में हिंदू आबादी क़रीब 80 फ़ीसद है जबकि मुसलमानों की आबादी क़रीब 14 फ़ीसद है.

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बयानों में विरोधाभास

इससे पहले भी संघ या बीजेपी के नेता इस तरह की बातें करत रहे हैं. हालांकि कई बार उनके बयानों में विरोधाभास भी देखा गया है.

पिछले साल (2021) जुलाई में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री डॉक्टर भारती प्रवीण ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कहा था, ''मोदी सरकार नेशनल फ़ैमिली प्लानिंग प्रोग्राम के ज़रिए ही भारत में जनसंख्या को नियंत्रित रखने का काम कर रही है, जो स्वैच्छिक है और जनता को परिवार नियंत्रण के कई विकल्प देती है. मोदी सरकार 'टू चाइल्ड पॉलिसी' लाने पर कोई विचार नहीं कर रही और ना ही किसी दूसरी नीति पर.''

उनके इस बयान को एक साल भी नहीं बीता था. मोदी सरकार के एक दूसरे मंत्री का जनसंख्या नियंत्रण क़ानून को लेकर इसी साल (2022) मई में एक नया बयान सामने आया.

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री प्रह्लाद पटेल ने रायपुर में कहा था कि जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए एक क़ानून जल्द लाया जाएगा.

संवाददाता सम्मेलन के दौरान उनसे जनसंख्या नियंत्रण क़ानून के बारे में पूछा गया था जिसके जवाब में उन्होंने कहा था, "इसे जल्द लाया जाएगा, चिंता न करें. जब इस तरह के मज़बूत और बड़े फ़ैसले लिए गए हैं तो बाक़ी को भी (पूरा) किया जाएगा."

मंत्री के बयान के क़रीब चार-पाँच महीने बाद जनसंख्या को लेकर संघ प्रमुख का यह ताज़ा बयान आया है.

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भारत में धर्म के आधार पर जनसंख्या

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की कुल आबादी एक अरब 20 करोड़ है.

हिंदू क़रीब 80 फ़ीसद हैं, जबकि मुसलमानों की आबादी 14.2 फ़ीसद है.

ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन कुल मिलाकर भारत की आबादी के छह फ़ीसद हैं.

2011 में क़रीब 30 हज़ार भारतीयों ने कहा था कि वो नास्तिक हैं.

80 लाख लोगों ने कहा था कि वो भारत के छह बड़े धार्मिक समूहों में से नहीं हैं.

क़रीब 83 अलग-अलग छोटे-छोटे धार्मिक समूह हैं जिनके कम से कम 100 लोग मानने वाले हैं.

भारत में हर महीने क़रीब 10 लाख नए लोग जुटते हैं और अगर यही दर जारी रही तो 2030 में भारत, चीन को पछाड़ कर सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जाएगा.

(स्रोत 2011 का जनगणना और प्यू रिसर्च सेंटर)

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एक ही डीएनए तो असंतुलन कैसा: ओवैसी

भारत में हिंदू आबादी क़रीब 80 फ़ीसद है जबकि मुसलमानों की आबादी क़रीब 14 फ़ीसद है.

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भागवत के भाषण पर हैदराबाद से लोकसभा सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदउद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है.

ओवैसी ने अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए दो ट्वीट किए.

भागवत इससे पहले कह चुके हैं कि हिंदू और मुसलमान दोनों के डीएनए एक ही हैं. ओवैसी ने इसी पर तंज़ करते हुए कहा, ''जब हिदू और मुसलमान का डीएनए एक ही है तो फिर इसमें असंतुलन की बात कहां से आई.''

ओवैसी ने कहा, "जनसंख्या नियंत्रण की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि हमने पहले ही रिप्लेसमेंट रेट हासिल कर लिया है. चिंता का विषय है उम्र दराज़ लोगों की बढ़ती आबादी और बेरोज़गार नौजवान जो कि अपने बुज़ुर्गों की मदद नहीं कर पा रहे हैं. मुसलमानों के फ़र्टिलिटी रेट में सबसे तेज़ गति से कमी आई है."

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ओवैसी ने भागवत पर हमला करते हए कहा, "मोहन (भागवत) के लिए यह वार्षिक हेट स्पीच का अवसर है. जनसंख्या असंतुलन का डर दिखाकर दुनियाभर में नरसंहार और नस्लीय हिंसा हुई है."

भागवत की स्पीच का स्वागत: एसवाई क़ुरैशी

हाल ही में मुसलमानों के एक पाँच सदस्यीय दल ने मोहन भागवत से मुलाक़ात की थी.

मिलने वालों में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी, दिल्ली के पूर्व उप-राज्यपाल नजीब जंग, भारतीय सेना के पूर्व उप-प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल ज़मीरुद्दीन शाह (रिटार्यड), उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार शाहिद सिद्दीक़ी और एक बिज़नेसमैन साद शेरवानी शामिल थे.

एसवाई क़ुरैशी ने मोहन भागवत की स्पीच का स्वागत करते हुए कहा कि उन्होंने बहुत ही अच्छी बात की है.

क़ुरैशी ने हाल ही में इस मुद्दे पर एक किताब भी लिखी - 'द पॉपुलेशन मिथ : इस्लाम, फ़ैमिली प्लानिंग एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया'. भागवत से मुलाक़ात के दौरान उन्होंने अपनी इस किताब भी उन्हें दी थी.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "भागवत ने मुसलमानों का नाम नहीं लिया. उन्होंने इस तरह की कोई बात नहीं की कि मुसलमान जान-बूझकर आबादी बढ़ा रहे हैं ताकि राजनीतिक सत्ता हासिल कर सकें. उन्होंने जनसंख्या के संबंध में शिक्षा, सेवाएं और आमदनी की बात की है. उन्होंने बहुत ही संतुलित बात की है. उनकी बातों का मुख्य बिंदु यही है कि हर समाज, हर मज़हब के लोगों को फ़ैमिली प्लैनिंग करनी चाहिए."

क़ुरैशी ने कहा कि भागवत से मुलाक़ात के वक़्त उन लोगों की जो बात हुई थी और भागवत की बुधवार की स्पीच में कोई फ़र्क़ नहीं है.

मुसलमान महिलाएं

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लेकिन जब कुछ ठीक ही है तो फिर भागवत को इस जनसंख्या नीति लागू करने की बात करने की क्यों ज़रूरत पड़ी, इस सवाल के जवाब में कु़रैशी ने कहा, "भागवत ने जनसंख्या नीति की बात की है ना कि जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की. नीति का मतलब शिक्षा देना, स्वास्थ्य सेवाएं देना और ग़रीबी दूर करना भी है."

हालाकि कुछ महीने पहले बीबीसी संवाददाता सरोज सिंह से बात करते हुए एसवाई क़ुरैशी ने कहा था, "भारत को जनसंख्या नियंत्रण पर क़ानून की ज़रूरत आज से 30 साल पहले थी. आज नहीं. जनसंख्या वृद्धि दर, प्रजनन दर, रिप्लेसमेंट रेशियो और गर्भनिरोधक के तरीक़ों की डिमांड सप्लाई का अंतर बताता है कि सरकार को जनसंख्या नियंत्रण पर क़ानून की ज़रूरत नहीं है."

मोहन भागवत से मिलने वालों में शामिल पत्रकार शाहिद सिद्दीक़ी ने भी भागवत की स्पीच का स्वागत किया है.

बीबीसी बांग्ला से बात करते हुए उन्होंने कहा, "बढ़ती आबादी को लेकर मोहन भागवत की चिंता की मैं सराहना करता हूं. लेकिन मेरा मानना है कि आज भारत की आबादी संतुलित है और असंतुलित बढ़ोतरी को लेकर चिंतित होने की कोई ज़रूरत नहीं है."

लेकिन मोहन भागवत से कुछ मामलों में असहमति जताते हुए शाहिद सिद्दीक़ी ने कहा, "उन्होंने इस विषय पर और गहराई से अध्ययन करना चाहिए. क्योंकि भारत में कोसोवो जैसे हालात बनने का कोई सवाल ही नहीं है. भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जनसंख्या वृद्धी दर में फ़र्क़ क़रीब-क़रीब ख़त्म होता जा रहा है."

मोहन भागवत ने भले ही अपनी स्पीच में जनसंख्या नीति का ज़िक्र किया है, जनसंख्या नियंत्रण क़ानून का नहीं. लेकिन राजनीतिक विश्वलेषकों का मानना है कि मोहन भागवत या संघ और बीजेपी के कोई नेता जब जनसंख्या विस्फोट की बात करते हैं तो इसका एक राजनीतिक अर्थ होता है.

ख़ुद एसवाई क़ुरैशी कहते रहे हैं, "भारत में जनसंख्या वृद्धि को लेकर सबसे बड़ी भ्रांति ये है कि मुसलमान ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं और उनकी वजह से जनसंख्या ज़्यादा बढ़ रही है. लेकिन ये पूरी तरह से तथ्य से परे है."

मोहन भागवत ने अपने बयान के पक्ष में ना कोई आंकड़ा दिया और ना ही कुछ और तथ्य सामने रखे.

आंकड़े कुछ और कहते हैं

जनगणना और एनएफ़एचएस के आंकड़ों के आधार पर

भारत में 2021 में जनगणना नहीं हुई, इसलिए जो भी आधिकारिक आंकड़ें हैं वो 2011 की जनगणना और नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफ़एचएस) के आंकड़े हैं.

नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे किसी भी राज्य में प्रजनन दर, फ़ैमिली प्लानिंग, मृत्यु दर, जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य से जुड़े ताज़ा आँकड़े उपलब्ध कराने के नज़रिए से कराया जाता है.

अमेरिका स्थित थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर ने भी सितंबर, 2021 में भारत में अलग-अलग धर्मों की जनसंख्या से जुड़ी एक रिपोर्ट जारी की थी. लेकिन उनके अध्ययन का भी मुख्य स्रोत जनगणना और एनएफ़एचएस के आंकड़े ही हैं.

लेकिन चाहे किसी भी आधिकारिक आंकड़े को लिया जाए उससे यह साफ़ है कि मुसलमान किसी भी हालत में हिंदुओं से आगे नहीं निकल सकते हैं.

एनएफ़एचएस के आंकड़ों के आधार पर

एनएफ़एचएस-5 के आँकड़े भी बताते हैं कि भारत में हर दशक में जनसंख्या बढ़ने की दर कम हो रही है.

प्रजनन दर में भी कमी आ रही है और सभी धर्म के लोगों के बीच ऐसा हो रहा है.

एनएफ़एचएस-5 के आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में राष्ट्रीय स्तर पर कुल प्रजनन दर 2.1 से कम हो गई है जो प्रतिस्थापन स्तर (रिप्लेसमेंट रेशियो) से कम हो गई है.

प्रजनन दर एक अहम पैमाना है जिससे जानकार पता लगाते हैं कि किसी राज्य में जनसंख्या विस्फोट की स्थिति है या नहीं.

रिप्लेसमेंट रेशियो 2.1 का मतलब है, दो बच्चे पैदा करने से पीढ़ी दर पीढ़ी वंश चलता रहेगा. (प्वाइंट वन इसलिए क्योंकि कभी-कभी कुछ बच्चों की मौत छोटी उम्र में हो जाती है.)

रिप्लेसमेंट रेशियो का दो से नीचे जाना, आगे चल कर चिंता का सबब भी बन सकता है. एसवाई क़ुरैशी कहते हैं कि केंद्र सरकार को इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि रिप्लेसमेंट रेशियो 2.1 के आसपास ही बना रहे.

मुसलमानों में प्रजनन दर

एनएफ़एचएस के आंकड़ों के आधार पर

एनएफ़एचएस के पिछली पाँच रिपोर्ट के आँकड़े बताते हैं कि हिंदू और मुसलमानों में बच्चे पैदा करने का अंतर एक बच्चे से ज़्यादा कभी नहीं रहा. साल 1991-92 में ये अंतर 1.1 का था, इस बार ये घट कर 0.3 का रह गया है. ये बताता है कि मुस्लिम महिलाएं तेज़ी से फ़ैमिली प्लानिंग के तरीक़े अपना रही हैं. गर्भनिरोधक तरीक़ों की डिमांड भी उनमें ज़्यादा है जो पूरी नहीं हो रही.

पिछले दो दशकों में हिंदुओं के फ़र्टीलिटी रेट में 30 फ़ीसद की कमी आई है जबकि मुसलमानों में यह रेट 35 फ़ीसद है. मुसलमानों में जनसंख्या वृद्धि की दर में कमी हिंदुओं की तुलना में ज़्यादा है. और ऐसा माना जा रहा है कि साल 2030 तक हिंदू और मुसलमानों में फ़र्टीलिटी रेट लगभग बराबर हो जाएगी.

प्यू रिसर्च सेंटर की 2021 की एक रिपोर्ट के अनुसार 1992 से लेकर 2015 तक मुसलमानों में फ़र्टीलिटी रेट 4.4 से घटकर 2.6 हो गया जबकि हिंदुओं में यह 3.3 से घटकर 2.1 हो गया.

चीन का उदाहरण

मोहन भागवत ने अपने भाषण में चीन का भी ज़िक्र किया. उन्होंने कहा, "हमारा पड़ोसी चीन बूढ़ा हो रहा है. वो जल्दी बूढ़ा हो जाएगा. सिंगल चाइल्ड पॉलिसी की वजह से यह स्थिति उत्पन्न हो रही है. वो अब दो बच्चों पर आ गए हैं, लेकिन स्थिति सुधर नहीं रही है."

हालांकि उन्होंने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि जनसंख्या बहुत कम हो गई तो समाज और भाषा ही लुप्त हो जाती है.

चीन की बात की जाए तो वहां की 'एक बच्चा नीति' दुनिया के सबसे बड़े परिवार नियोजन कार्यक्रमों में से एक थी. इस नीति की शुरुआत साल 1979 में हुई थी और ये क़रीब 30 साल तक चली. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक़, चीन की फ़र्टिलिटी रेट 2.81 से घटकर 2000 में 1.51 हो गई और इससे चीन के लेबर मार्केट पर बड़ा प्रभाव पड़ा.

चीन की सरकार को अपनी एक बच्चा नीति पर पुनर्विचार करना पड़ा.

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