उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे: दशहरे की रैली बताएगी किसमें है कितना दम

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- Author, टीम बीबीसी मराठी
- पदनाम, नई दिल्ली
शिवसेना के दोनों गुटों में किसी को भी मुंबई के दशहरा मैदान में रैली की इजाज़त नहीं मिली, लेकिन अब दोनों गुट अलग-अलग रैलियां आयोजित करने वाले हैं. उद्धव ठाकरे की दशहरा रैली दादर के शिवाजी पार्क में होगी. वहीं मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का गुट अपनी रैली बांद्रा कुर्ला कॉम्पलेक्स के एमएमआरडीए मैदान में करेगा.
दोनों ही गुट इसे शक्ति-प्रदर्शन की तरह देख रहे हैं और मुंबई नगरपालिका चुनाव से पहले किसकी रैली में अधिक भीड़ इकट्ठा होगी, इस पर सभी का ध्यान है. इसी बीच मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. खुफ़िया विभाग के हवाले से दी गई जानकारी के मुताबिक़, उन्हें मारने की धमकी दी गई है.
उधर मुख्यमंत्री शिंदे ने कहा है कि उन्हें धमकियों से फ़र्क नहीं पड़ता. उन्होंने कहा, "मुझे कई धमकियों भरे फ़ोन आए हैं. इन धमकियों का मुझ पर कोई असर नहीं होता. मैं जनता का आदमी हूं. मुझे लोगों से पास जाने से कोई रोक नहीं सकता."
जितनी लड़ाई दशहरा रैली के आयोजन स्थल को लेकर थी, अब उतना ही संघर्ष भीड़ जुटाने को लेकर भी है. दोनों ही गुट ज़्यादा से ज़्यादा भीड़ जुटाना चाहते हैं और इसके लिए ज़ोर-शोर से तैयारी कर रहे हैं. ठाकरे गुट डेढ़ लाख लोगों को जुटाने की कोशिश में हैं. शिंदे इससे दोगुने लोग को इकट्ठा करना चाहते हैं.

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शिंदे गुट कैसी है तैयारी?
एकनाथ शिंदे गुट के हर विधायक को अपने क्षेत्र से लोगों को दशहरा रैली के लिए मैदान तक लाने की ज़िम्मेदारी दी गई है. ग्रुप लीडर और डिप्टी लीडर्स को भीड़ को लेकर प्लानिंग की ज़िम्मेदारी दी गई है. इसे लेकर कई रिव्यू मीटिंग की जा रही है.
इन लोगों को ढाई से तीन लाख लोगों को लाने का टार्गेट दिया गया है. सैकड़ों बसें और ट्रेन इसके लिए बुक कर दिए गए हैं. चार जगहों पर पार्किंग की सुविधा दी गई है. गाड़ियों पर अपने-अपने गुट के स्टीकर लगाए जाएंगे.
बीबीसी से बात करते हुए एकनाथ शिंदे गुट के किरण पावस्कर ने कहा, "बालासाहेब ठाकरे के सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी गई थी, अब ऐसा नहीं होगा. पूरे राज्य से लाखों लोग एमएमआरडीए मैदान में इकट्ठा होंगे और बाला साहेब ठाकरे के स्वर्णिम विचारों को अपनाएंगे.
"इस मैदान की क्षमता ठाकरे समूह के बुक किए गए मैदान की तुलना में दोगुनी है. इसलिए हमें उम्मीद है कि तीन लाख लोग आएंगे. मैदान पूरी तरह भरा रहेगा. शस्त्र पूजन या रावण दहन का अभी कोई कार्यक्रम नहीं है."

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उद्धव ठाकरे के गुट की तैयारियां
उद्धव ठाकरे को शिवाजी पार्क में चार दिनों के आयोजन की अनुमति दी गई है. यहां एक बार में डेढ़ लाख लोग जमा हो सकते हैं. पार्टी में इतना बड़ा विरोध होने के बावजूद ठाकरे गुट ये दिखाना चाहेगा कि मुंबई के लोग अभी भी उनके साथ हैं. मुंबई में उनके लोगों को शिवाजी पार्क को भरने की ज़िम्मेदारी दी गई है.
गुट ने नेताओं पर भीड़ जुटाने की ज़िम्मेदारी है. महिलाओं और युवाओं की भागीदारी पर ख़ास ज़ोर दिया जा रहा है और कई महिला संगठनों से साथ युवा सेना के लोग इस काम में लगे हुए हैं. हर साल की तरह शस्त्र पूजा और रावण दहन के कार्यक्रम भी प्लान किए गए हैं.
बीबीसी से बात करते हुए शिवसेना सांसद अनिल परब ने कहा, "हर साल मुंबई और आसपास के लोग दशहरा मेले के लिए इकट्ठा होते हैं. लेकिन इस साल पूरे महाराष्ट्र से लोग आएंगे. इसलिए इस साल का दशहरा मेला पहले से बड़ा और प्रभावशाली होगा.
लेकिन मैदान का साइज़ देखकर ये कहना चाहूंगा कि लोग एक-दूसरे के ऊपर तो नहीं बैठ पाएंगे. शिंदे गुट क्या करेगा इस पर मैं बहुत नहीं बोलना चाहता, लेकिन इस बात का भरासा है कि शिवाजी पार्क पूरी तरह से भरा रहेगा और लोग उद्धव ठाकरे के विचारों को सुनने आएंगे.

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आने वाले चुनाव के लिए शक्ति प्रदर्शन?
शिवसेना के नाम का मसला अभी चुनाव आयोग के पास है. कई मुद्दे जैसे व्हिप का पालन नहीं होना, विधायकों का निलंबन, उप-राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ नो कॉन्फ़िडेंस मोशन, सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं.
चुनाव आयोग के फ़ैसले से पहले दोनों ही गुट दशहरे के मौके पर शक्ति प्रदर्शन कर और एक-दूसरे पर आरोप लगाकर ख़ुद को असली शिवसेना साबित करना चाहते हैं.
लोकमत के असिस्टेंट एडिटर संदीप प्रधान कहते हैं, "जब से शिवसेना दो गुटों में बंटी है, तब से उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे ने अपनी ताक़त दिखाने का एक मौका भी नहीं छोड़ा है. दशहरा रैली एक पारंपरिक तरीका है शक्ति प्रदर्शन का, इसलिए दोनों ही गुट इस मौके को हाथ से जाने नहीं दे सकते."
वो कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला जब आएगा तब आएगा, लेकिन इससे पहले दोनों ही गुट अपनी ताक़त दिखाकर लोगों के दिमाग़ पर प्रभाव डालना चाहते हैं, भीड़ जुटाना सिर्फ़ एक हिस्साभर है. चुनाव से पहले भीड़ इकट्ठा करने से एक अच्छा संदेश जाता है. इसलिए ये जद्दोजहद हो रही है. लेकिन फ़ैसले लोगों की अदालत में होते हैं. अभी के शक्ति-प्रदर्शन से ज़्यादा मिलने वाले वोट ज़्यादा मायने रखते हैं."
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