विदेश मंत्री जयशंकर के हालिया बयान क्यों सुर्ख़ियाँ बटोर रहे हैं?

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भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर बिना लागलपेट के सीधे-सीधे और बेबाक अंदाज़ में अपनी बात कहने के लिए जाने जाते हैं. साल 2019 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें विदेश मंत्री बनाया तभी से वो इसी अंदाज़ में बात करते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनकी बातों में और तीखापन देखा जा रहा है.
पिछला एक हफ़्ता भी कुछ इसी तरह का रहा जब वो संयुक्त राष्ट्र महासभा के 77वें वार्षिक अधिवेशन में शामिल होने के लिए अमेरिका गए हुए थे.
इस दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनके भाषण और फिर अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन से उनकी मुलाक़ात के दौरान उन्होंने जो कुछ कहा उसने ख़ूब सारी सुर्ख़ियां बटोरी.
जयशंकर ने मंगलवार को अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकन, रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन और वाणिज्य मंत्री गीना रायमॉन्डो से मुलाक़ात की.
अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकन के साथ वो संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में भी शामिल हुए.
प्रेसवार्ता के दौरान पत्रकारों ने उनसे रूस-यक्रेन युद्ध समेत कई मुद्दों पर सवाल किए और जयशंकर ने सभी सवालों का बेबाकी से जवाब दिया.
'भारत का राष्ट्रहित सबसे अहम'
एस जयशंकर ने साफ़ कहा कि भारत तेल या हथियार किससे ख़रीदता है इसका फ़ैसला वो अपने राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए करता है.
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यहां यह बताना ज़रूरी है कि यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद अमेरिका और पश्चिमी देश भारत पर दबाव डाल रहे हैं कि वो रूसे से तेल नहीं ख़रीदे लेकिन भारत रूस से तेल ख़रीद रहा है और रूस इसके लिए भारत को रेट में काफ़ी छूट भी दे रहा है.
भारतीय विदेश मंत्री ने भारत के इस फ़ैसले का अमेरिकी धरती पर अमेरिकी विदेश मंत्री के सामने जमकर बचाव किया.
जयशंकर ने कहा, "तेल की क़ीमतों को लेकर हम भी चिंतित हैं. हमलोग 2000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाली अर्थव्यवस्था हैं. तेल की क़ीमतें हमारी कमर तोड़ रही हैं."
रूस से हथियार ख़रीदने के बारे में उन्होंने कहा, "हम अपना सैन्य साज़-ओ-सामान कहां से ख़रीदते हैं यह कोई नया मुद्दा नहीं है और ना ही भू-राजनीतिक हालात में बदलाव होने से उसमें कोई बदलाव हुआ है. हम वही विकल्प चुनते हैं जो हमारे राष्ट्रहित में होता है."
हथियार ख़रीदने के मामले में उन्होंने कहा, "सैन्य उपकरणों को हासिल करने के मामले में हमारी परंपरा है कि हम कोई देशों से सामान ख़रीदते हैं. और हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण यही है कि इस प्रतियोगी बाज़ार में हम बेहतर-से-बेहतर डील कैसे हासिल कर सकें."
यूक्रेन की स्थिति के बारे में उन्होंने भारत की स्थिति को दोहराते हुए कहा कि इसका सबसे बेहतर उपाय यही है कि इसको हल करने के लिए बातचीत और कूटनीति का सहारा लिया जाए.
इसके जवाब में ब्लिंकन ने कहा कि अमेरिका ने यूक्रेन संकट को कूटनीति के ज़रिये टालने की पूरी कोशिश की थी.
मुलाक़ात के दौरान जयशंकर ने कहा कि उग्रवाद, अतिवाद और कट्टरवाद के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ाई लड़नी होगी.

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भारतीय मांग को अमेरिका का समर्थन
जयशंकर ने इस अवसर पर भारतीयों के लिए वीज़ा का भी मुद्दा उठाया. ब्लिंकन ने जयशंकर को विश्वास दिलाया कि अमेरिका इस मामले में काफ़ी संवेदनशील है और उसे सुलझाने के लिए काम कर रहे हैं. ब्लिकंन ने कहा कि भारतीय नागरिकों को वीज़ा मिलने में देरी की वजह कोविड महामारी है.
अमेरिका के विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकन ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) को और अधिक समावेशी बनाने की ज़रूरत तथा वैश्विक संस्था में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया.
भारत लगातार संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद में लंबित सुधारों पर कार्रवाई तेज़ करने को लेकर ज़ोर देता रहा है. उसने स्थायी सदस्यता पाने को लेकर भी अपनी दावेदारी पेश की है.
अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने मंगलवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को कही गई इस बात से अमेरिका पूरी तरह सहमत है कि ''यह समय युद्ध का नहीं है."
अमेरिकी विदेश मंत्री के इस बयान को भारतीय विदेश नीति की सफलता के रूप में देखा जा रहा है और ज़ाहिर है भारत के इस नए आक्रामक विदेश नीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर दोनों की भूमिका की सराहना होती है.

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संयुक्तराष्ट्र महासभा में संबोधन
अमेरिकी मंत्रियों से मुलाक़ात से पहले एस जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र की 77वीं महासभा में भी ज़ोरदार भाषण दिया था जिसकी ख़ूब चर्चा हुई थी.
शुक्रवार (24 सितंबर) को जयशंकर ने यूएन महासभा को संबोधित किया था.
अपने 15-16 मिनट के भाषण में जयशंकर ने रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर संयुक्त राष्ट्र में भारत को बड़ी ज़िम्मेदारी दिए जाने, चरमपंथ और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारत का पक्ष ज़ोरदार तरीक़े से रखा था.
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रूस-यूक्रेन युद्द का ज़िक्र करते हुए जयशंकर ने कहा, "इस संघर्ष का जल्द से जल्द समाधान निकालना संयुक्त राष्ट्र के अंदर और बाहर हम सभी के सामूहिक हित में है."
इस मामले में भारत की स्थिति का ज़ोरदार बचाव करते हुए एस. जयशंकर ने कहा था, "जैसा कि यूक्रेन संघर्ष जारी है, हमसे अक्सर पूछा जाता है कि हम किस ओर हैं? तो हर बार हमारा सीधा और ईमानदार जवाब होता है कि भारत शांति के साथ है और वो वहाँ पर हमेशा रहेगा. हम उस पक्ष के साथ हैं जो यूएन चार्टर और इसके संस्थापक सिद्धांतों का पालन करता है. हम उस पक्ष के साथ हैं जो बातचीत और कूटनीति के ज़रिए ही इस हल को निकालने की बात करता है.''
संयुक्त राष्ट्र में भाषण के दौरान एस. जयशंकर ने भारत की लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग को भी उठाया. हालांकि उन्होंने सीधे-सीधे इस पर कुछ नहीं बोला. उन्होंने भारत को बेहद ज़िम्मेदार देश बताते हुए कहा कि वो बड़ी ज़िम्मेदारियां लेने के लिए तैयार है.
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि 'दुनिया में दक्षिण (देशों) के साथ हो रहे अन्याय को सही तरीक़े से देखा जाए.'

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भारत की इस मांग का रूस के विदेश मंत्री ने समर्थन किया. इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी सुरक्षा परिषद के विस्तार की बात का समर्थन किया था.
जयशंकर ने सीधे तौर पर किसी भी देश का नाम तो नहीं लिया लेकिन इशारों-इशारों में उन्होंने पड़ोसी देशों को कठघरे में खड़ा किया.
उन्होंने पाकिस्तान और चीन का नाम लिए बिना सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा भी इस दौरान उठाया.
'ख़ून के धब्बों को नहीं धोया जा सकता है'
उन्होंने कहा, "कई दशकों से सीमा पार आतंकवाद का ख़मियाज़ा भुगतने के बाद, भारत इसको लेकर 'ज़ीरो टॉलरेंस' के दृष्टिकोण का दृढ़ता से समर्थन करता है. हमारा मानना है कि आतंकवाद को हम किसी भी आधार पर उचित नहीं ठहरा सकते हैं. कोई भी लफ़्फ़ाज़ी ख़ून के धब्बों को नहीं धो सकती है."
"संयुक्त राष्ट्र आंतकवाद का जवाब उसके साज़िशकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाकर देता है. जो लोग कभी-कभी घोषित आतंकवादियों का बचाव करने की हद तक यूएनएससी 1267 प्रस्ताव का राजनीतिकरण करते हैं, वे अपने जोखिम पर ऐसा कर रहे हैं. मेरा विश्वास करिए कि इसके ज़रिए वे न तो अपने हितों को आगे बढ़ाते हैं और न ही अपनी प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाते हैं."
जयशंकर के इस बयान को सीधे तौर पर पाकिस्तान और चीन पर निशाना माना जा रहा है.
हाल के महीनों में कई बार ऐसा हुआ है कि सुरक्षा परिषद के रिज़ॉल्यूशन 1247 के तहत पाकिस्तान की धरती पर सक्रिय चरमपंथियों को ब्लैकलिस्ट करने और उन्हें ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करने के लिए भारत, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश कई बार यूएन में प्रस्ताव लाए लेकिन हर बार चीन ने संयुक्त राष्ट्र में वीटो का इस्तेमाल करके उसपर रोक लगा दी.
सितंबर महीने की शुरुआत में चीन ने लश्कर-ए-तैय्यबा के एक चरमपंथी साजिद मीर को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करवाने के प्रस्ताव पर रोक लगा दी थी.
इस प्रस्ताव को अमेरिका ने भारत के सहयोग से संयुक्त राष्ट्र में पेश किया था. साजिद मीर को मुंबई हमलों (2008) के एक मास्टरमाइंड में शुमार किया जाता है और अमेरिकी संस्था एफ़बीआई ने साजिद मीर पर 50 लाख डॉलर का इनाम रखा है.

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संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद
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विदेश मंत्री जयशंकर का तेवर अमेरिका में क्या होगा इसका अंदाज़ा उसी समय हो गया था जब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ज़ोरदार भाषण दिया.
सुरक्षा परिषद में यूक्रेन पर हुई ब्रीफ़िंग के दौरान अपने भाषण में उन्होंने चीन का नाम तो नहीं लिया लेकिन उसपर जमकर हमला किया.
यूक्रेन के मुद्दे पर उन्होंने भारत के रुख़ को स्पष्ट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान को दोहराया जो मोदी ने पुतिन से मुलाक़ात के दौरान कही थी.
मोदी ने समरकंद में एससीओ की बैठक के दौरान रूस के राष्ट्रपति पुतिन से मुलाक़ात के दौरान कहा था कि 'यह युद्ध का युग नहीं है.'
भारतीय पक्ष को और मज़बूती से रखते हुए जयशंकर ने यूएन में कहा था, "भारत पूरी दृढ़ता के साथ इस बात को दोहराता है कि ज़रूरत इस बात की है कि यूक्रेन में जारी युद्ध को रोका जाए और बातचीत और कूटनीति की तरफ़ लौटा जाए. संघर्ष की स्थिति में भी मानवाधिकारों या अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन को सही नहीं ठहराया जा सकता है. भारत ने बूचा की घटना की स्वतंत्र जांच का समर्थन किया था."
'सुरक्षा परिषद को भी सोचना चाहिए'
लेकिन इसी बहाने उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्यों और ख़ासकर चीन पर हमला किया.
उन्होंने कहा, "जवाबदेही से बचने के लिए कभी राजनीति का सहारा नहीं लेना चाहिए. दोषी को दंड से बचाने के लिए भी नहीं. दुखद है कि हमने हाल में इसी परिषद में ऐसा होते देखा है जब दुनिया के कुछ सबसे ख़तरनाक आतंकवादियों पर पाबंदी लगाने की बात हुई थी. यदि दिन के उजाले में किए गए भयानक हमलों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है और उनको इसकी सज़ा नहीं दी जाती है तो इस परिषद को ज़रूर सोचना चाहिए कि हम इससे क्या संदेश दे रहे हैं. यदि हम विश्वसनीयता सुनिश्चित करना चाहते हैं तो हमें हर मामले में एक जैसा व्यवहार करना होगा."
दरअसल एस जयशंकर इस बात पर सबसे ज़्यादा ज़ोर देते आए हैं कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र है और भारत किसी एक गुट का हिस्सा नहीं है. एस जयशंकर का मानना है कि भारत अपने राष्ट्रीय हित को देखते हुए कोई भी फ़ैसला करेगा. इसलिए चाहे रूस से तेल या हथियार ख़रीदना हो या मानवाधिकार के मुद्दे पर अमेरिका को आईना दिखाना हो जयशंकर पूरी बेबाकी से अपनी बात रखते हैं.
(कॉपीः इक़बाल अहमद)
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