संविधान की प्रस्तावना के इन दो शब्दों को लेकर उठते सवाल और उनके जवाब

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- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सोशलिस्ट और सेक्युलर ('समाजवादी और पंथ-निरपेक्ष')...भारतीय संविधान की प्रस्तावना में शामिल ये दो शब्द हमेशा बहस के केंद्र में रहते हैं. प्रस्तावना से इन दो शब्दों को हटाने से जुड़ी एक जनहित याचिका की सुनवाई आगामी 23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होनी है. ये सुनवाई मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित की पीठ करेगी.
ये याचिका दो साल पहले दिसंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी.
इसके याचिकाकर्ता बीजेपी नेता डॉ सुब्रमण्यम स्वामी और सुप्रीम कोर्ट के वकील सत्या सभरवाल हैं.
साल 2020 में ऐसी ही एक और जनहित याचिका दायर की गई थी. दोनों याचिका को जोड़ दिया गया है.

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सवाल : जनहित याचिका का आधार क्या है?

जवाब :
जनहित याचिका सोशलिस्ट और सेक्युलर ('समाजवादी और पंथ-निरपेक्ष') इन्हीं दो शब्दों को प्रस्तावना में जोड़े जाने की वैधानिकता को चुनौती देती है.
भारतीय दक्षिणपंथी सांस्कृतिक संगठन 'विराट हिंदू संगम' नाम के एक यूट्यूब चैनल पर इस जनहित याचिका के महत्व को समझाते हुए सुब्रमण्यम स्वामी और सत्या सभरवाल कहते हैं कि संविधान सभा कभी भी इन दो शब्दों को प्रस्तावना में शामिल करने के पक्ष में नहीं था. वहीं ये 44 साल पुराने केशवानंद भारती केस के उस ऐतिहासिक फैसले का उल्लंघन है, जो कहता है कि संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता.
हालांकि ये पहली बार नहीं है जब कोर्ट के सामने ऐसी कोई याचिका प्रस्तावित की गई हो या संसद में संविधान की प्रस्तावना में शामिल इन दो शब्दों को हटाने की मांग उठी हो.

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सवाल : इससे पहले कब उठी ऐसी माँग?

जवाब :
साल 2008 में कोलकाता के एक एनजीओ गुड गवर्नेंस फाउंडेशन ने भी प्रस्तावना से समाजवादी शब्द को हटाने से जुड़ी एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी.
कोर्ट ने इस अर्ज़ी को ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि 'समाजवाद' शब्द का अर्थ "नागरिकों के लिए कल्याणकारी उपाय" है और इसकी व्याख्या कम्युनिस्टों द्वारा दी गई परिभाषा के रूप में नहीं की जानी चाहिए.
साल 2021 में बीजेपी सांसद केजे अल्फोंस ने राज्यसभा में प्राइवेट मेंबर बिल लाकर प्रस्तावना से 'समाजवादी' शब्द हटाने का प्रस्ताव पेश किया था, वहीं साल 2020 में बीजेपी सांसद राकेश सिन्हा ने भी ऐसी ही मांग करते हुए राज्यसभा में एक प्रस्ताव पेश किया था. दोनों ही प्रस्ताव बेनतीजा रहे.
साल 2015 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने विज्ञापन में संविधान की संशोधित प्रस्तावना की जगह एक पुरानी प्रति का इस्तेमाल किया था, जिसमें सोशलिस्ट और सेक्युलर ('समाजवादी और पंथ-निरपेक्ष') शब्द नहीं थे.
इसकी ख़ूब आलोचना की गई, लेकिन तत्कालीन कानून मंत्री रवि संकर प्रसाद ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि ये शब्द इमरजेंसी के दौरान प्रस्तावना में जोड़े गए थे. इस पर बहस करने में अब क्या दिक्कत है? हमने देश के सामने मूल प्रस्तावना की प्रति पेश की है.

सवाल : क्या होती है संविधान की प्रस्तावना?

जवाब :
बाकी किताबों के प्रीफेस यानी प्रस्तावना की तरह ही संविधान की भी अपनी एक प्रस्तावना है, जो बताती है कि संविधान का मूल क्या है. ये किन सिद्धांतो पर आधारित है और इसके माध्यम से हमने एक कैसे समाज, राज्य या देश की परिकल्पना की है. प्रस्तावना एक तरह से संविधान की आत्मा है, उसका सार तत्व है और जो बातें प्रस्तावना के अनुरूप नहीं हैं उन्हें मोटे तौर पर संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल माना जाता है.

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सवाल : प्रस्तावना में कौन से शब्द कहां से लिए गए?

जवाब :
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की प्रेरणा अमेरिकी संविधान से ली गई है. जैसे अमेरिका के संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत 'वी द पीपुल ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स' से होती है, वैसे ही भारत के संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत 'वी द पीपुल ऑफ इंडिया' यानी 'हम भारत के लोग' से होती है.
प्रस्तावना में शामिल तीन शब्द 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुता' को फ्रांस के संविधान से लिया गया है.
प्रस्तावना के शुरुआती पांच शब्द (प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, सेक्युलर, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य) संविधान के स्वरूप की ओर इशारा करते हैं. ये बताते हैं कि भारत एक समाजवादी, सेक्युलर, लोकतांत्रिक और गणतंत्र राष्ट्र है.
तो वहीं अंतिम चार शब्द (न्याय,समानता,स्वतंत्रता और बंधुता ) ये दर्शाते हैं कि यह देश के सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वंत्रता, समानता और बंधुता को सुरक्षित रखता है.

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सवाल : दोनों शब्दक्यों नहीं थे शुरुआत में प्रस्तावना का हिस्सा ?

जवाब :
प्रोफेसर के.टी शाह ने 15 नवंबर,1948 को संविधान सभा से प्रस्तावना में तीन शब्द - सेक्युलर, संघीय और समाजवादी को शामिल करने की मांग की थी, लेकिन कई अन्य सदस्यों के साथ ही डॉ भीम राव अंबेडकर ने भी इसे प्रस्तावना में शामिल करने से इनकार कर दिया.
अंबेडकर ने इसके पीछे की दो मुख्य वजहें गिनाईं.
उन्होंने कहा,''राज्य की नीति क्या होनी चाहिए, समाज को उसके सामाजिक और आर्थिक पक्ष में कैसे संगठित किया जाना चाहिए, यह ऐसे मामले हैं जो समय और परिस्थितियों के अनुसार लोगों को स्वयं तय करने होंगे. इसे संविधान में ही निर्धारित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के ख़िलाफ है.''
दूसरी वजह गिनाते हुए वे कहते हैं कि भारतीय संविधान के भाग IV की धाराओं में राज्य के कुछ नीति निर्देशक सिद्धांतों का उल्लेख है जो पूरी तरह समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित है. इसलिए अलग से संविधान की प्रस्तावना में इसे शामिल करना ग़ैर-ज़रूरी है.

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सवाल :प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है या नहीं?

जवाब :
संविधान सभा ने प्रस्तावना को संविधान का एक अहम हिस्सा माना था, लेकिन साल 1960, 'बेरुबाड़ी यूनियन केस' में जस्टिस गजेंद्रगडकर ने विशेष रूप से कहा कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं है.
फिर साल 1964, 'सज्जन सिंह बनाम गर्वनमेंट ऑफ राजस्थान' केस में जस्टिस मधोलकर ने बेरुबाड़ी यूनियन मामले में सुप्रीम कोर्ट की दी गई राय पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत को रेखांकित किया.
आख़िरकार साल 1973 के 'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल' मामले में मुख्य न्यायधीश एस.एम सिकरी की अध्यक्षता वाली 13 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए ये माना कि प्रस्तावना संविधान की ही एक हिस्सा है. सात जजों के बहुमत से फैसला दिया गया कि संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता. कोई भी संशोधन प्रस्तावना की भावना के ख़िलाफ़ नहीं हो सकता.

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सवाल :प्रस्तावना में कब और कैसे शामिल हुए ये दो शब्द?

जवाब :
प्रस्तावना में सोशलिस्ट और सेक्युलर, ये दोनों ही शब्द संविधान के 42वें संशोधन के ज़रिए साल 1976 में जोड़े गए थे. तत्कालीन कानून मंत्री एच.आर. गोख़ले ने इस संशोधन को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पेश किया था.
तब अधिकांश विपक्षी नेता जैसे जेपी नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी आदि सलाखों के पीछे थे और प्रेस को आपातकाल के नियमों के तहत सेंसर कर दिया गया था.सं विधान संशोधन के पीछे यह तर्क दिया गया था कि देश को धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर विकसित करने के लिए इन संशोधनों की ज़रूरत है.
वहीं आलोचक कहते हैं कि इंदिरा का ये कदम उनके पॉलिटिकल पोस्चरिंग का हिस्सा था. वे समाजवादियों को खुश और मुस्लिम वोट बैंक को मज़बूत करना चाहती थीं.

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सवाल:प्रस्तावना सेये दो शब्द हटे तो क्या असर होगा ?

जवाब :
हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर चंचल कुमार का मानना है कि इसका कुछ ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि इन शब्दों के हट जाने से भी संविधान की मूल भावना नहीं बदलेगी.

सवाल : प्रस्तावना से ये दो शब्द कैसे हट सकते हैं ?

जवाब :
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं, ''भारत के संविधान के अनुच्छेद 243,246 और 248 के अनुसार संविधान में संशोधन का अधिकार केवल और केवल संसद को है. दोनों ही सदनों में से किसी भी एक में, संविधान संशोधन विधेयक लाकर, विशेष बहुमत के साथ संशोधन किया जा सकता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट चूंकि फाइनल कोर्ट ऑफ अपील है, इसलिए वे चाहे तो फैसला कर सकती है. ''
हालांकि वे मानते हैं कि ये न्यायसंगत नहीं होगा.
वहीं प्रोफेसर चंचल कुमार कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों की सुनवाई का संवैधानिक अधिकार नहीं है क्योंकि कोर्ट विधायिका को संविधान में संशोधन के लिए निर्देशित नहीं कर सकती है. ये कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर का मामला है.''
दूसरी तरफ़ संविधान और कानून विशेषज्ञ फैज़ान मुस्तफ़ा का मानना है कि ये दो शब्द संविधान की प्रस्तावना से हटाए ही नहीं जा सकते क्योंकि ये संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं.
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