पीएम मोदी से सीधे टकराने से क्यों हिचक रहे हैं राहुल गांधी

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कांग्रेस में नए अध्यक्ष की तलाश यूं तो 2019 से चल रही है.

लेकिन इस साल उदयपुर चिंतन शिविर में अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए तैयारियां ख़त्म करने की डेडलाइन सितंबर तय की गई है.

फिलहाल ये डेडलाइन सिर पर है पर कांग्रेसियों की तलाश ख़त्म होती नज़र नहीं आ रही.

राजस्थान के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने सोमवार को जयपुर में कहा, "अगर राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष नहीं बनते तो देश भर के कांग्रेस कार्यकर्ता निराश होंगे. लाखों कार्यकर्ताओं की भावना को समझते हुए राहुल गांधी को अध्यक्ष पद स्वीकार कर लेना चाहिए. "

साफ़ है कि ज़्यादातर कांग्रेसी राहुल गांधी के नाम पर अटके हैं और राहुल गांधी अध्यक्ष पद स्वीकार करने को तैयार नहीं दिख रहे.

ऐसे में सवाल उठता है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद स्वीकार करने से हिचक क्यों रहे हैं?

कांग्रेस की राजनीति को करीब से कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार मानते हैं कि राहुल गांधी की हिचक के पीछे कई कारण है.

कुछ कारण राजनीतिक हैं और कुछ व्यक्तिगत और कुछ पार्टी के कामकाज से जुड़े हुए.

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2019 की टीस

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कांग्रेस को सालों से कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकारऔरंगज़ेब नक़्शबंदी कहते हैं कि राहुल की हिचक के बारे में पता करने के लिए हमें थोड़ा इतिहास और थोड़ा वर्तमान दोनों खंगालने की ज़रूरत है.

2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. उस वक़्त उन्होंने चार पेज की एक चिट्ठी ट्वीट की थी जिसमें कुछ मुद्दे उठाए थे.

औरंगज़ेब कहते हैं उस चिट्ठी में अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के वजहें भी गिनाईं थी और कुछ ज़रूरी मुद्दे भी गिनाए थे.

मसलन उस चिट्ठी में उन्होंने एक जगह लिखा था कि इस प्रक्रिया के लिए पार्टी के विस्तार के लिए लोकसभा चुनाव की हार की ज़िम्मेदारी तय की जाने की ज़रूरत है. इसके लिए बहुत सारे लोग ज़िम्मेदार हैं. लेकिन अध्यक्ष के पद पर रहते हुए मैं ज़िम्मेदारी ना लूं और दूसरों को ज़िम्मेदार बताऊं ये सही नहीं होगा.

औरंगज़ेब कहते हैं, "इसका मतलब साफ़ था कि उनके इस्तीफे के बाद वो चाहते थे कई और जिम्मेदार पद पर बैठे लोग भी इस्तीफ़ा दें. लेकिन उनके अलावा कांग्रेस में और किसी बड़े नेता ने इस्तीफा नहीं दिया."

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टीम का साथ नहीं

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राहुल गांधी ने उस चिट्ठी में एक जगह लिखा था - मैं व्यक्तिगत तौर पर सीधे प्रधानमंत्री, आरएसएस और उन तमाम संस्थाओं के साथ जिस पर उन्होंने कब्ज़ा कर लिया है, अपने पूरे ज़ज्बे के साथ लड़ा.

औरंगज़ेब कहते हैं, "जिस तरह से राफेल घोटाले की बात राहुल गांधी ने उठाई थी या फिर चौकीदार चोर है को चुनाव में मुद्दा बनाया, इन मुद्दों पर उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का उस तरह से साथ नहीं मिला.

ऐसा लगता है कि यह टीस उनके मन में अब तक है. जिस पार्टी में बड़े नेताओं को उनकी ज़िम्मेदारी का अहसास तक ना हो, शायद वैसे नेताओं की पार्टी का नेतृत्व राहुल गांधी नहीं करना चाहते. ये हिचक इसलिए है."

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राहुल गांधी का व्यक्तित्व

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हालांकि कुछ जानकार मानते हैं कि राहुल गांधी पावर चाहते हैं. लेकिन उसके साथ ज़िम्मेदारी नहीं चाहते. ऐसा मानने वालों में वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता भी हैं.

बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "2004 में उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई थी. उस साल वो अमेठी संसदीय सीट से जीत कर लोकसभा पहुँचे थे. तब से चर्चा थी कि वो पार्टी के अध्यक्ष बनेंगे. लेकिन नहीं बने.

उपाध्यक्ष बने 2013 में जाकर और अध्यक्ष पद की कमान 2017 में संभाली और 2019 में छोड़ दी. 2004 में मनमोहन सिंह जब पीएम बने तब भी उनके पास किसी एक मंत्रालय में मंत्री पद का खुला ऑफर था. लेकिन वो भी उन्होंने नहीं स्वीकार किया.

ये तमाम बातें उनके व्यक्तित्व के अहम पहलू को उजागर करती हैं. वो आधिकारिक तौर पर किसी जिम्मेदारी को स्वीकार करने से हमेशा हिचकते रहे हैं. ये उनके स्वभाव में है."

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संगठन का काम

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स्मिता एक और अहम बात यहाँ कहती हैं.

उनके मुताबिक़ "2019 में इस्तीफे के बाद से अब तक पार्टी के महत्वपूर्ण फैसले वो ही लेते आए हैं. इससे साफ़ होता है कि पार्टी के अहम फैसलों में वो अपने लिए एक रोल भी चाहते हैं."

स्मिता की मानें तो अध्यक्ष ना रहते हुए भी राहुल बैक सीट पर बैठ कर ड्राइवर सीट की मज़ा लेना चाहते हैं.

वो कहती हैं, "उपाध्यक्ष पद के दिनों से देखें तो राहुल गांधी पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर सालों से हैं. पार्टी को मजबूत करने के दावे भी सालों से कर भी रहे हैं. लेकिन पार्टी को उस बुलंदी तक पहुँचाने के लिए जिस तरह की लगन और मेहनत चाहिए वो उनमें नहीं है. किसी एक आइडिया को वो अंजाम तक नहीं पहुँचा पा रहे."

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ग़ैर गांधी अध्यक्ष

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अध्यक्ष पद से इस्तीफा देते हुए राहुल गांधी ने ये भी लिखा था कि वो चाहते हैं कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष चुनाव से तय किया जाए और इस वजह से जाते जाते वो किसी का नाम इस पद के लिए आगे नहीं रख रहे.

उनकी मंशा ग़ैर-गांधी अध्यक्ष से थी.

2019 की उस चिट्ठी के बाद से कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए राहुल गांधी ने अभी तक अपना स्टैंड नहीं बदला है. कम से कम सार्वजनिक मंच से उनका इस पद के लिए कोई बयान नहीं आया है.

इस वजह से अगर राहुल गांधी दोबारा से अध्यक्ष पद स्वीकार कर लेते हैं तो उनकी कथनी और करनी में अंतर के तौर पर देखा जाएगा.

वैसे भी पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेता कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाते रहते हैं. इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से भी परिवारवाद का मुद्दा दोहराया.

राहुल कांग्रेस का अध्यक्ष पद स्वीकार कर बीजेपी को दोबारा से एक बना बनाया मुद्दा नहीं देना चाहते हैं.

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अशोक गहलोत के बयान के मायने

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हालांकि सोमवार को ही अशोक गहलोत ने ग़ैर गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के सवाल पर कहा, "अध्यक्ष पद के लिए ग़ैर गांधी या गांधी पर विवाद क्यों. ये तो संगठन का काम है. कोई प्रधानमंत्री पद का चुनाव थोड़े ही है. 32 साल से इस परिवार का कोई आदमी ना तो प्रधानमंत्री बना, ना तो मुख्यमंत्री और ना ही कोई मंत्री बना. तो फिर मोदी जी इस परिवार से डरते क्यों हैं?"

उनके इस बयान को पीएम मोदी के परिवारवाद के बयान से जोड़ कर भी देखा जा रहा है.

स्मिता गुप्ता कहती हैं, " राहुल गांधी दोबारा अध्यक्ष पद स्वीकार करें, अशोक गहलोत के इस बयान की टाइमिंग भी अहम है. अब कांग्रेस में राहुल गांधी को अध्यक्ष पद के लिए चुनौती देने वाला कोई नहीं है.

ये मुफीद वक़्त है राहुल को अध्यक्ष बनाने के लिए. वैसे भी G23 धीरे धीरे बिखरता नज़र आ रहा है. इस गुट के कई नेता पार्टी से चले गए. आनंद शर्मा और गुलाम नबी की नाराज़गी जग जाहिर है.

G23 वैसे भी यही चाहते थे कि जो भी पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी ले तो फुल टाइम ले. पार्ट टाइम ना ले. कार्यकारी अध्यक्ष कोई और डी-फैक्टो अध्यक्ष कोई और. ऐसा नहीं होना चाहिए."

स्मिता ये भी कहती हैं कि नेशनल हेराल्ड के मामले में जिस तरह से दोनों वरिष्ठ नेताओं से पूछताछ हुई है, ऐसे वक़्त में किसी गांधी का पार्टी की कुर्सी पर नहीं रहना, उन्हें और जोखिम वाली स्थिति में पहुँचा सकता है.

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