बुख़ार की गोली डोलो-650 जिसका ज़िक्र सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, क्या है पूरा मामला

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"कोरोना में मुझे भी डोलो-650 खाने का सुझाव दिया गया था. जो आप कह रहे हैं ये सुनने में अजीब लग रहा है. पर ये गंभीर मामला है."
सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान जब जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने डोलो-650 का नाम लेकर ऐसा कहा, तो ये दवा मीडिया रिपोर्ट्स में एक बार फिर सुर्ख़ियों में आ गई.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, डोलो-650 बनाने वाली दवा कंपनी ने डॉक्टरों को फ़्री-बी (मुफ़्त उपहार) देने के लिए 1000 करोड़ रुपये ख़र्च किया है.
इन रिपोर्ट्स का आधार इनकम टैक्स की तरफ़ से जारी एक प्रेस रिलीज़ थी, जिसका हवाला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दिया गया.
डोलो-650, 'माइक्रो लैब्स लिमिटेड' बनाती है. बीबीसी से बातचीत में माइक्रो लैब्स लिमिटेड के एग्ज़ीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग), जयराज गोविंद राजू ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया है.
इससे पहले कोरोना महामारी के दौरान डोलो-650 की रिकॉर्ड तोड़ बिक्री के दौरान भी ये दवा सुर्ख़ियों में आई थी.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में जिस याचिका पर सुनवाई के दौरान डोलो दवा का ज़िक्र हुआ, उस याचिका को डोलो के लिए दाख़िल नहीं किया गया था.
चूंकि ये दवा कोरोना महामारी के बाद घर-घर में इस्तेमाल हुई, इस वजह से जहाँ भी इसका ज़िक्र आता है, आम लोगों की दिलचस्पी इसमें बढ़ जाती है.

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याचिका किस बारे में है?
जिस याचिका की सुनवाई के दौरान डोलो दवा का ज़िक्र हुआ वो याचिका फ़ेडरेशन ऑफ़ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेज़ेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने दायर की थी.
याचिका इस बारे में है कि दवा कंपनियों के लिए मार्केटिंग प्रैक्टिस और फ़ॉर्मूलेशन के लिए यूनिफ़ॉर्म कोड लाया जाए जिसकी वैधानिक मान्यता हो यानी उनको मानना अनिवार्य हो. अगर सरकार इस पर क़ानून नहीं ला रही तो सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल दे और केंद्र को इस बारे में निर्देशित करे.
याचिकाकर्ता की दलील थी कि दवा कंपनियां अपनी दवाइयों को प्रमोट करने के लिए मार्केटिंग पर काफ़ी ख़र्च करती हैं जिसके दबाव में डॉक्टर इन दवाओं को मरीज़ों को प्रिस्क्राइब करते हैं.
याचिकाकर्ता के वकील संजय पारीख ने बीबीसी से कहा, "दवा लिखने के लिए कंपनियां डॉक्टरों को कई तरह के मुफ़्त उपहार का लालच देती हैं. ये घूस देने की तरह का मामला है. जिस तरह से घूस लेते हुए कोई आदमी पकड़ा जाए तो उसे सज़ा हो जाती है, लेकिन घूस देने वाले पर कार्रवाई नहीं होती. दवा कंपनियां भी घूस देने वालों जैसा काम कर रही हैं. डॉक्टरों को मुफ़्त उपहार देना, घूस देने जैसा मामला है. इस मामले में कार्रवाई दोनों पर होनी चाहिए. इस वजह से हम दवा की क़ीमतों और फ़ॉर्मूलेशन दोनों के लिए यूनिफ़ॉर्म कोड की बात कर रहे हैं. हम ये माँग साल 2008-2009 से कर रहे हैं."

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डोलो का ज़िक्र कोर्ट में क्यों हुआ?
भारत में फ़ार्मा कंपनियों के लिए मार्केटिंग प्रैक्टिस के लिए यूनिफ़ॉर्म कोड की ज़रूरत क्यों हैं, इसके लिए याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में बहस के दौरान कई उदाहरण पेश किए.
इन उदाहरणों में अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला दिया गया.
ऐसे ही एक उदाहरण में याचिकाकर्ता के वकील ने कोरोना के दौरान ख़ूब इस्तेमाल हुई दवा डोलो-650 का ज़िक्र किया.
उन्होंने मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा कि डोलो-650 के निर्माताओं पर भी आरोप है कि डॉक्टरों को उन्होंने 1000 करोड़ की फ़्री-बी ( मुफ़्त उपहार) बांटी है.
मीडिया रिपोर्ट में ये ख़बर इनकम टैक्स की 13 जुलाई की एक प्रेस रिलीज़ के हवाले से छपी थी.
इस रिलीज़ में इनकम टैक्स ने माइक्रो लैब्स का नाम बिना लिए लिखा था कि बेंगलुरु की एक बड़ी फ़ार्मा कंपनी पर इनकम टैक्स की रेड हुई. रेड में सेल्स और प्रमोशन के नाम पर डॉक्टरों को 1000 करोड़ तक बांटे जाना का पता चला है. पूरे मामले में जाँच जारी है.
समाचार एजेंसी पीटीआई ने इस कंपनी का नाम माइक्रो लैब्स बताया था.
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डोलो-650 बनाने वाली कंपनी का पक्ष
बीबीसी ने माइक्रो लैब्स से इस पूरे मामले में उनका पक्ष जानना चाहा.
माइक्रो लैब्स लिमिटेड के एग्ज़ीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग) एंड कम्यूनिकेशन, जयराज गोविंद राजू ने कहा, " सुप्रीम कोर्ट में जिस याचिका पर सुनवाई हो रही थी, उसमें डोलो-650 दवा का ज़िक्र कहीं नहीं था. 1000 करोड़ की फ़्री-बी डॉक्टरों को बांटने की बात दुष्प्रचार करने जैसा है जिसका कोई आधार नहीं है.
कोरोना महामारी के दौर में डोलो दवा बेच कर हमारी कमाई 350 करोड़ की हुई थी. ऐसे में 1000 करोड़ एक साल में किसी दवा के मार्केटिंग पर ख़र्च करने का सवाल ही बेतुका है. जिस दवा को बेच कर हम 350 करोड़ ही कमा रहे हैं उसके प्रचार में आप ही सोचिए कि 1000 करोड़ एक साल में कैसे कोई कंपनी ख़र्च कर सकती है."
गोविंद राजू आगे कहते हैं, " भारत में डोलो-650 दवा प्राइज़ कंट्रोल रेगुलेशन के तहत बनती है. ये कहना कि हम प्राइज कंट्रोल रेगुलेशन के अंदर नहीं आते, ये बात ग़लत है.
हमने सरकार द्वारा निर्देशित दाम से ऊपर अपनी दवा के दाम नहीं बढ़ाए हैं. हमारी दवा की क़ीमत सालों से 2 रुपये प्रति टैबलेट है. आज भी दवा इसी दाम पर बिकती है."
"कोरोना के समय दवा बनाने के लिए ज़रूरी कच्चे माल की क़ीमतें भी आसमान छू रही थीं. उस वक़्त हमने ये सुनिश्चित किया कि दवा जनता को मिलती रहे, दवा की कमी ना हो और दाम ना बढ़े. आईसीएमआर की कोविड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल में इस दवा का नाम लिखा गया था, इस वजह से दवा लोकप्रिय हुई." गोविंद राजू ने ये भी बताया.
हालांकि ये भी सच है कि आईसीएमआर ने कोविड के ट्रीटमेंट में जिन दवाओं का नाम लिखा था, कोरोना महामारी के दौरान सभी दवाओं की बिक्री में इज़ाफा हुआ.
गोविंद राजू ने ये माना कि जुलाई में उनके यहां इनकम टैक्स की रेड हुई थी और इनकम टैक्स विभाग वाले कई सालों की फ़ाइल अपने साथ ले गए थे. 1000 करोड़ मार्केटिंग पर ख़र्च करने का आंकड़ा केवल एक साल का नहीं सालों का है.
हालांकि, उन्होंने ये नहीं बताया कि ये आंकड़ा कितने सालों का है.

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दवाओं की मार्केटिंग, फ़ॉर्मूलेशन और प्रमोशन के लिए क्या है क़ानून
भारत में दवाओं की मार्केटिंग और प्रमोशन के लिए वॉलेंटरी कोड लागू है, जो फ़ॉर्मा कंपनियों ने ख़ुद बनाया है.
12 दिसंबर 2014 को केंद्र सरकार ने कहा था कि फ़ार्मा कंपनियों अपनी तरफ़ से अगले 6 महीने के लिए इस दिशा में वॉलेंटरी कोड बनाए. बाद में केंद्र सरकार ने इस कोड की समीक्षा कर लीगल फ़्रेमवर्क बनाने की बात कही थी.
याचिकाकर्ता के वकील का दावा है कि केंद्र सरकार ने इसको अपनी तरफ़ से क़ानूनी जामा पहनाने के लिए ड्राफ़्ट भी तैयार कर लिया है, सुझाव भी मांगे गए, लेकिन क़ानून नहीं बनाया गया.
इस साल अगस्त में लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि दवाओं की मार्केटिंग, प्रमोशन और फ़ॉर्मूलेशन के लिए वॉलेंटरी कोड को ही आगे भी जारी रखा जाएगा.
इस दिशा में केंद्र सरकार कोई नया बाध्यकारी क़ानून बनाए - ऐसा सुझाव या प्रस्ताव किसी सिविल सोसाइटी या पेटेंट ग्रुप की तरफ़ से सरकार तक नहीं पहुँचा है.
अपने जवाब में केंद्र सरकार ने ये भी कहा कि दवाओं के प्रमोशन और मार्केटिंग के लिए वॉलेंटरी कोड के अलावा दो और क़ानून मौजूद है. चूंकि एक मामला कोर्ट में भी चल रहा है इस वजह से इस दिशा में बाध्यकारी क़ानून बनाने की ज़रूरत नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से 10 दिनों के अंदर जवाब माँगा है.
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