भारतीय खाने की विदेश में क्यों मचने लगी है धूम

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- Author, ज़ोया मतीन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
मास्टरशेफ ऑस्ट्रेलिया के 14वें सीज़न में भी पिछले सीज़न की तरह भारतीय व्यंजनों की धूम देखने को मिली.
दो सप्ताह पहले ख़त्म हुए इस लोकप्रिय टीवी शो की रनर अप रहीं सारा टोड ने भारतीय व्यंजनों का ज़ायक़ा बेहद शानदार अंदाज़ में परोसा, इसमें गोवा के तीखे और मसालेदार व्यंजन पोर्क विंदालू भी शामिल था.
मास्टशेफ ऑस्ट्रेलिया, भारत में भी बेहद लोकप्रिय टीवी शो है. इस टीवी प्रतियोगिता में भारतीय मूल के खानसामों की भागीदारी और उनका भारतीय जुड़ाव, इस शो को और भी ज़्यादा लोकप्रिय बना रहा है.
इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि यह भारत में, इसके भारतीय वर्जन से कहीं ज़्यादा देखा जाता है.
इतना ही नहीं सालों से इसमें हिस्सा लेने वाले शेफ भारतीय परंपरागत व्यंजन पेश कर जजों को प्रभावित करते रहे हैं, कई बार ये परंपरागत भारतीय व्यंजन में आधुनिक पश्चिमी शैली का तड़का भी लगाते हैं.

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भारतीय ज़ायक़े का तड़का
मास्टरशेफ ऑस्ट्रेलिया के पांचवें सीज़न, 2013 में चौथे स्थान पर रहे ऋषि देसाई ने जजों को पालक पनीर बनाकर प्रभावित किया था. इसके बाद से प्रत्येक सीज़न में भारतीय व्यंजनों का तड़का कमोबेश नज़र आया है.
दुनिया के किसी भी कोने में भारतीय व्यंजनों को लोग जानते हैं. लेकिन इस टीवी शो में हिस्सा लेने वाले कुछ शेफों ने भारतीय व्यंजनों की वैरायटी और स्वाद के रेंज को बखूबी पेश किया है.

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सीज़न 11 में हिस्सा ले चुके शेफ संदीप पंडित बताते हैं, "मास्टरशेफ ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया को बताया है कि भारतीय व्यंजनों में बटर चिकन और नान ही मौजूद नहीं हैं, बल्कि कई तरह के व्यंजन मौजूद हैं और उन सबके स्वाद का परिचय कराया है."
पंडित ने अपने व्यंजनों को बनाने के लिए पूरे भारत से अलग अलग व्यंजनों का आइडिया लिया और उन सबको मिलाकर एकदम नए तरह का व्यंजन परोसा और उनका लॉबस्टर मसाला तो काफी मशहूर हुआ.
उन्होंने बताया, "मैं हमेशा से जानता था कि अगर में हर राउंड में एक भारतीय व्यंजन बनाता तो भी सभी व्यंजनों को नहीं दिखा सकता था."
मास्टरशेफ ऐसा टीवी बन गया है जो खान-पान के व्यंजनों को बेहतरीन अंदाज़ में टीवी के परदे पर दिखाता है, इतना ही नहीं इसमें हिस्सा लेने वालों को खाना बनाने के अनुभव को भी बेहतरीन ढंग से प्रज़ेंट करने के लिए प्रोत्साहित करता है.
इससे एक सवाल यह भी उभरता है कि क्या भारतीय व्यंजन इटालियन और फ्रेंच व्यंजनों के सामने कहीं ठहरते हैं? या फिर यह अपने अनोखे स्वाद के चलते अलग ही हैं, जिसे कभी कभी लोग देसी व्यंजन भी कहते हैं?
स्टाइलिश व्यंजनों में गिने जाने लगे हैं भारतीय व्यंजन

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पंडित कहते हैं, "देखिए चाहे वह स्टाइलिश अंदाज़ में छोटे छोटे बर्तनों में पेश किया जाने वाला भोजन हो या फिर दुनिया भर के कुलीन एवं शाही लोगों की रसोई और खाने की मेज़ हो, भारतीय व्यंजन हर मौके के लिए मुफ़ीद हैं."
सीज़न 13 में हिस्सा ले चुकीं दीपेंदर छिब्बर जब पहली बार भारतीय व्यंजन पेश कर रही थीं तो काफ़ी घबरायी हुई थीं. तड़के वाली लस्सी और कढ़ाई पनीर से जजों को प्रभावित करने वाली 30 साल की दीपेंदर बताती हैं, "घबराने की वजह ये थी कि हम अपने घर के बने व्यंजनों को कमतर आंकते हैं जबकि इनका स्वाद शानदार और सबसे जुदा होता है. लेकिन जजों को मेरा घरेलू भारतीय व्यंजन पसंद आया था."
दीपेंदर छिब्बर के मुताबिक हमलोग खुद से भारतीय व्यंजनों पर लिमिटेशन थोपते हैं. उन्होंने कहा, "जबकि भारतीय व्यंजनों के स्वाद के साथ काफी कुछ प्रयोग किया जा सकता है."
भारतीय व्यंजन दुनिया भर में स्थापित हो रहे हैं, इसको लेकर अब कोई शक नहीं होना चाहिए.
एक समय ऐसा भी था जब सारे भारतीय व्यंजन कढ़ी के नाम पर ख़त्म हो जाते थे. जिसे काफी मसालेदार और गंधयुक्त व्यंजन माना जाता था और उसमें किसी तरह की कलात्मकता की उम्मीद भी नहीं थी.

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लेकिन पिछले कुछ सालों में भारतीय शेफों ने परंपरागत व्यंजनों और तकनीकों को ढूंढ निकाला है और उसे अद्वितीय व्यंजनों में तब्दील कर दिया है.
भारत के सबसे प्रसिद्ध शेफों में गगन आनंद की भी गिनती होती है. उनका मानना है कि भारतीय व्यंजन उम्दा भोजन नहीं हो सकते, ये एक ग़लत धारणा है.
उन्होंने अपने ख़ास अंदाज़ में बताया, "हमें यह पूछना भी नहीं चाहिए क्योंकि मैंने यह साबित किया कि भारतीय व्यंजन उम्दा भोजन अनुभव हो सकते हैं."
गगन आनंद की शैली में आधुनिकता का प्रभाव और लयबद्ध सौंदर्य भी दिखता है लेकिन इनमें कोलकाता की संस्कृति गहरे तक शामिल है, जहां गगन पले बढ़े थे. इस वजह से ही बैंकाक स्थित उनका रेस्त्रां मिश्रित व्यंजनों का ठिकाना बन कर उभरा. वे खुद एक लीजेंड शेफ के तौर पर स्थापित हुए. उन्हें फूड गॉड यानी 'भोजन देवता' भी कहा जाता है.
दुनिया भर के खाने के शौकीन उनके रेस्त्रां तक पहुंचते हैं. 2019 में दुनिया के 50 सबसे बेहतरीन रेस्त्रां में उनका रेस्त्रां चौथे स्थान पर था. यहां आने वाले लोगों को ऐसे मिश्रित व्यंजनों का ज़ायक़ा मिलता है, जिन्हें आसानी से अलग करना संभव नहीं होता. उनका एक व्यंजन ऐसा है जिसे दही-धमाका कहा जाता है, जिसमें दही के एक बड़े टुकड़े में जिलेटिन की परत होती है जो आपके मुंह में जाते ही विस्फोट करता है और मुंह में मिश्रित स्वाद घुलने लगता है.
क्रिएटिव होने की गुंजाइश कितनी है

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लेकिन आनंद मानते हैं कि उनके जैसे कुछ शेफ भारतीय व्यंजनों के साथ पूरा न्याय नहीं कर सकते. वे इसके लिए भारतीय फूड इंडस्ट्री के ताक़तवर लोगों में क्रिएटिविटी की कमी को दोषी ठहराते हैं. हालांकि साथ ही वे यह भी जोड़ते हैं कि जो शेफ कुछ नया करने की कोशिश करते हैं उनका धंधे में टिक पाना बहुत मुश्किल होता है.
आनंद कहते हैं, "अगर कोई शेफ कलात्मक रुझान के साथ आता भी है तो इस पूंजीवादी व्यवस्था में उसे जगह बनाने में काफी मुश्किलों का सामना करना होता है."
आनंद के मुताबिक इस पूरी संस्कृति को बदले जाने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा, "इसका मतलब यूरोपीय कपड़े पहनकर भारतीय व्यंजन परोसना नहीं है, बल्कि खाने की प्लेटों में हमें हमारी समृद्ध विरासत और संस्कृति को पेश करना है."

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पंडित के मुताबिक भारतीय शेफ को लगता है कि उनके व्यंजनों में सूक्ष्म अंतर का पता नहीं चलता जबकि वास्तविकता यह है भारतीय व्यंजन अपने आप में एक पूरी दुनिया हैं.
उन्होंने बताया, "हम भारतीयों को भोजन में हर संभव प्रयोग करके उसका दायरा बढ़ाना पसंद है. इसलिए हमलोग खाने पकाने में मिर्च, टमाटर, घी, चॉकलेट, चाय इत्यादि को शामिल किया है और हमारे मसाले भी हैं. मसालों में अदरक, हल्दी, इलायची और तड़का लगाने वाले दूसरे मसालों का दुनिया भर के व्यंजनों में इस्तेमाल अपने आप में केस स्टडी है."

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खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाली कई मसालों का ठिकाना भारत है. साथ ही भारतीय किसी भी संस्कृति के व्यंजन को अपने अनोखे अंदाज़ में अपना बना सकते हैं, उदाहरण के लिए भारतीयों ने चीन के व्यंजनों के साथ किया है. चीन के व्यंजन आपको आलीशान रेस्त्रां से लेकर सड़क किनारे लगने वाले स्टॉल में मिल जाएंगे, जिसमें भारतीय कढ़ी बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों का इस्तेमाल होता है.
संदीप पंडित बताते हैं, "पहले से मौजूद किसी व्यंजन को नए सिरे से अविश्वसनीय रूप में तैयार कराना ही, भारतीय व्यंजनों की असली ख़ासियत है."
वहीं दीपेंदर छिब्बर बताती हैं कि भारतीय व्यंजन, और वह भी मास्टरशेफ़ जैसे प्रतिस्पर्धी टीवी शो में, परोसना हमेशा आसान नहीं होता है.
उन्होंने बताया, "कई मौकों पर मैं भारतीय व्यंजन नहीं परोस सकी. उदाहरण के लिए इटालियन टीम चैलेंज के दौरान मुझे पास्ता के साथ परोसने के लिए हल्का मीठा बनाना पड़ा था."
मानसिकता बदलनी होगी

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वहीं कई बार जजों ने यह भी देखने की कोशिश की कि प्रतिस्पर्धी अपने अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलते हैं या नहीं. छिब्बर बताती हैं, "मेरे लिए भारतीय व्यंजन कंफर्ट ज़ोन थे."
13वें सीजन की विजेता जस्टिन नारायण भी कई बार याद करते हैं, वे थोड़े घबरा से गए थे. फिजी और भारतीय विरासत वाले शेफ जस्टिन नारायण बताते हैं, "भारतीय व्यंजनों का मेरे जीवन में इतना असर रहा है और मेरे परिवार का इतिहास भी है, इसलिए मास्टरशेफ जैसे मंच पर उसे प्रदर्शित करना बड़े सम्मान की बात थी."

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लेकिन उन्हें जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मिलीं वह उत्साह बढ़ाने वाली थीं. उन्होंने बताया, "ज़्यादा से ज़्यादा लोग मौलिक स्वाद के व्यंजन खाना चाहते हैं." उनका मानना है कि मास्टरशेफ ने भारतीय व्यंजनों को दुनिया के बेहतरीन व्यंजनों के समकक्ष ला दिया है.
इस तर्क से आनंद भी सहमत हैं. लेकिन वे यह भी कहते हैं कोई केवल टीवी शो के लिए शेफ नहीं बनता. उन्होंने कहा, "विजेताओं को भी शेफ का पहनावा पहनने के लिए काफ़ी मेहनत करनी होती है."

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उनका मानना है कि असली मुश्किल ये है कि देश में इंजीनियर और डॉक्टर तैयार करने की होड़ है और दूसरी राह चुनने वालों को खारिज कर दिया जाता है. वो कहते हैं, "भारतीय कुकिंग की दुनिया में वास्तविक क्रांति तभी होगी जब यह मानसिकता बदलेगी."
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