मोहम्मद ज़ुबैर पर क्या हैं आरोप और कौन सी धाराओं में हैं केस?

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फ़ैक्ट चेकिंग वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ के पत्रकार मोहम्मद ज़ुबैर को 27 जून देर रात दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था. इसके बाद से ये ख़बर लगातार सुर्खियों में बनी है.
मोहम्मद ज़ुबैर की गिरफ़्तारी के बाद उनकी कंपनी ऑल्ट न्यूज़ ने बताया कि ज़ुबैर को किसी अन्य मामले में पूछताछ के लिए बुलाया गया था और गिरफ़्तार किसी और मामले में कर लिया गया.
इसके क़रीब एक सप्ताह बाद 4 जुलाई को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में भी एक मामला दर्ज किया गया.
आइए समझते हैं कि क्या हैं मोहम्मद ज़ुबैर पर लगाए गए आरोप.


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2018 में ट्वीट का मामला

दिल्ली पुलिस ने कहा कि सोशल मीडिया मॉनिटरिंग के दौरान एक ट्विटर हैंडल से मिली जानकारी के बाद मोहम्मद ज़ुबैर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था.
दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ 2018 में मोहम्मद ज़ुबैर ने एक फोटो ट्वीट किया था जिसमें हनीमून होटल का नाम बदल कर एक हिंदू देवता का नाम लिख दिया था. एक ट्विटर यूज़र ने उस ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा कि इससे हिंदू देवता का अपमान हुआ है.
मोहम्मद ज़ुबैर ने अपने ट्वीट में उस फोटो को 2014 से पहले और बाद के शासन काल से जोड़ते हुए एक तरह से तंज़ कसा था. वैसे जिस फोटो को मोहम्मद ज़ुबैर ने ट्वीट किया था वो एक हिंदी फ़िल्म का सीन भी है.
लेकिन एक ट्विटर हैंडल ने मोहम्मद ज़ुबैर के एक ट्वीट पर लिखा कि एक ख़ास धर्म के अपमान के इरादे से उन्होंने तस्वीर पोस्ट की थी और उनके ख़िलाफ़ एक्शन होना चाहिए.
दिल्ली पुलिस ने ज़ुबैर को गिरफ़्तार करने के बाद बताया कि उन्हें आईपीसी की धारा 153 A ओर 295 के तहत गिरफ़्तार किया गया है.
इसके बाद पुलिस ने दो जुलाई को ज़ुबैर के ख़िलाफ़ दर्ज किए गए एफ़आईआर में कई नई धाराएं लगा दी थीं. इनमें आपराधिक साज़िश (120-बी), सबूत मिटाना (201) और फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेग्यूलेशन) एक्ट का सेक्शन 35 शामिल हैं.
एफ़सीआरए की धारा को एफ़आईआर में जोड़ने के बाद अब इस केस में एनफ़ोर्समेंट डायरेक्टरेट यानी ईडी की भी इंट्री हो गई है.
क्या हैं ये धाराएँ
जानी मानी वरिष्ठ वकील और लेखक नित्या रामाकृष्णन ने बीबीसी हिन्दी की सरोज सिंह को इस मामले पर बताया, "मोहम्मद जु़बैर ने जो ट्वीट किया है, हो सकता है कि वो किसी व्यक्ति विशेष को अच्छा ना लगे, लेकिन धारा 153 A लगाने के लिए और भी बातें साबित करनी होगी, जैसे इसके पीछे का उद्देश्य क्या ऐसा है कि दो समुदायों के बीच शत्रुता पैदा कर सके या आपसी सौहार्द ख़राब हो. केवल किसी व्यक्ति विशेष को किसी कि कोई बात अच्छी नहीं लगी, उस आधार पर 153 A नहीं लगाया जा सकता. ठीक उसी तरह से धारा 295 लगाने पर ये साबित करना होगा कि किस उपासना स्थल को नुकसान पहुँचाने का काम किया है."

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धारा 153 A क्या है?
आईपीसी की धारा 153 A के बारे में समझाते हुए नित्या रामाकृष्णन ने कहा, "दो अलग-अलग समुदायों के बीच धर्म, जाति, जन्मस्थान, भाषा आदि के आधार पर नफ़रत फैलाने के उद्देश्य से किए गए किसी भी चीज़ (बोल कर या लिखित में या सांकेतिक तौर पर) पर ये धारा लगाई जा सकती है. इसके तहत 3 साल से लेकर 5 साल की सज़ा का प्रावधान है. ये ग़ैर ज़मानती अपराध की श्रेणी में आता है.
धारा 295 क्या है?
आईपीसी की धारा 295 के बारे में नित्या कहती हैं, "किसी धर्म से जुड़े उपासना स्थल को क्षति पहुँचाने, अपमान करने या अपवित्र करने के उद्देश्य से कोई भी क़दम उठाया गया हो तो उस मामले में ये धारा लगाई जा सकती है.
इसमें अधिकतम दो साल की सज़ा है मगर इसमें ज़मानत का प्रावधान है. हालांकि नित्या यहाँ एक और अहम बात जोड़ती हैं.
नित्या रामाकृष्णन कहतीं हैं, "आईपीसी की कौन सी धारा ज़मानती है या ग़ैर ज़मानती है, इसके अलावा एक और कैटेगरी है जिसका ख़्याल रखना चाहिए. अगर किसी मामले में सात साल से कम की सज़ा हो तो गिरफ़्तारी नहीं होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार जजमेंट में ये बात कही है. पिछले दो-तीन फैसलों में इसे दोहराया भी है. सर्वोच्च न्यायलय ने ये भी कहा है कि अगर किसी ऐसे मामले में गिरफ़्तारी होती भी है तो वजहें ठोस होनी चाहिए और लिखना चाहिए कि गिरफ़्तारी क्यों हो रही है. साथ ही जिस व्यक्ति के ख़िलाफ़ आरोप है उसको एक नोटिस भी देना चाहिए ताकि वो पूछताछ के लिए बुलाया जा सके और वो जाँच में सहयोग कर सके."
एफ़सीआरए की सेक्शन 35 क्या है?
दो जुलाई को मोहम्मद ज़ुबैर के विरुद्ध जोड़े गए केस में एफ़सीआरए की सेक्शन 35 के तहत भी केस किया गया है.
इस धारा के तहत 'जो भी व्यक्ति, राजनीतिक पार्टी या संस्था, विदेशों से इस एक्ट की अवहेलना करते हुए फंडिंग लेता है उसे पांच साल तक जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
सेक्शन 35 के अनुसार, "जो कोई भी इस अधिनियम के तहत बनाए गए किसी भी नियम या आदेश के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करते हुए, किसी भी विदेशी योगदान या किसी विदेशी स्रोत से किसी भी मुद्रा या सिक्योरिटी को स्वीकार करने में किसी व्यक्ति, राजनीतिक दल या संगठन की सहायता करता है तो उसे दंडित किया जाएगा जिसकी अवधि पांच साल तक हो सकती है या उसपर जुर्माना लगाया जा सकता है या फिर दोनों हो सकती हैं.
ऑल्ट न्यूज़ का क्या कहना है
लेकिन ऑल्ट न्यूज़ ने एफसीआरए के तहत केस को ख़ारिज करते हुए एक बयान जारी किया है.
'ऑल्ट न्यूज़' ने कहा है, "पिछले कुछ दिनों में ऑल्ट न्यूज़ और पेरेंट कंपनी प्रावदा मीडिया फाउंडेशन पर कई तरह के आरोप लगाए गए हैं. इनमें दावा किया गया है कि हमने उन विदेशी स्रोतों से पैसा लिया है, जिनसे हम चंदा नहीं ले सकते हैं. ये आरोप पूरी तरह से ग़लत हैं."
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"हम जिस पेमेंट प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए चंदा लेते हैं, वो हमें विदेशी स्रोतों से पैसा लेने का विकल्प नहीं देता है और हमने केवल भारतीय बैंक खातों से पैसा लिया है. इन माध्यमों के ज़रिए जुटाई गई पूरी रकम कंपनी के बैंक खाते में जाती है."
"कंपनी से जुड़े कुछ लोगों ने अपने निजी खातों में पैसा लिया है, ये आरोप भी झूठ है क्योंकि कंपनी से जुड़े लोग केवल महीने का मेहनताना लेते हैं. ये सब कुछ उस महत्वपूर्ण कार्य को बंद करने की कोशिश है, जो हम करते हैं और हम लोग इसके ख़िलाफ़ लड़ेंगे और जीतेंगे."

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POCSO के तहत केस

अगस्त 2020 में दिल्ली पुलिस ने मोहम्मद ज़ुबैर पर यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण के क़ानून POCSO के तहत एक केस दर्ज किया था. ये केस नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) प्रमुख प्रियंका कानूनगो की शिकायत पर दर्ज किया गया था.
NCPCR ने अपनी शिकायत में मोहम्मद ज़ुबैर द्वारा एक ट्वीट का ज़िक्र है जिसें उन्होंने छह अगस्त 2020 को पोस्ट किया था. उस ट्वीट में एक नाबालिग़ लड़की की तस्वीर थी जिसमें उसका चेहरा ब्लर किया गया था.
लेकिन उसी वर्ष सितंबर में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से मोहम्मद ज़ुबैर के ख़िलाफ़ इस मामले में कोई सख़्त क़दम उठाने पर रोक लगा दी थी.
इस साल फ़रबरी में दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस ने अब तक हुई जांच पर एक स्टेटस रिपोर्ट दायर करने को कहा था. मई में दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया था कि मोहम्मद ज़ुबैर का ट्वीट संज्ञेय अपराध की श्रेणी में नहीं आता.
ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिन्हा का कहना है कि ज़ुबैर को 27 जून को इसी केस में तफ़्तीश के लिए बुलाया गया था लेकिन बाद में दूसरा मुकदमा दर्ज कर दिया.
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सीतापुर में दर्ज केस

मोहम्मद ज़ुबैर के ख़िलाफ़ चार जुलाई को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में भी एक केस दर्ज हुआ है.
सीतापुर के एक संगठन राष्ट्रीय हिन्दू शेर सेना के राष्ट्रीय संरक्षक महंत बजरंग मुनि के ख़िलाफ़ एक ट्वीट के सिलसिले में ज़ुबैर को पाँच जून को सीतापुर की अदालत में पेश किया गया. अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है.
सीतापुर के एडिशनल एसपी नरेंद्र प्रताप सिंह ने बीबीसी को बताया, "उनकी 14 दिन की जुडिशियल कस्टडी का आदेश हुआ है लेकिन इनको हम फिर यहाँ लेकर आएंगे. सुनवाई की अगली तारीख 16 जुलाई तय हुई है. हमने उनकी पुलिस कस्टडी रिमांड भी दे रखी है लेकिन उस पर अभी फ़ैसला नहीं हुआ है. हमें उनकी पुलिस कस्टडी चाहिए."
मामला शिकायतकर्ता भगवान शरण (हिंदू शेर सेना के ज़िलाध्यक्ष) की तहरीर पर एक जून को दर्ज हुआ है.
इस एफ़आईआर में मोहम्मद ज़ुबैर पर आरोप लगा था कि 27 मई 2022 को ट्विटर पर उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल से एक ट्वीट किया था जिसमें, "बड़ी संगत थाना खैराबाद राष्ट्रीय हिंदू शेर सेना के राष्ट्रीय संरक्षक पूज्यनीय प्रबंधक महंत बजरंग मुनी जी को हेट मॉन्गर्स जैसे अपशब्द से संबोधित किया गया. उसी ट्वीट में मोहम्मद जुबैर ने यति नरसिंहानंद सरस्वती और स्वामी आनंद स्वरूप को भी अपमानित किया."
मोहम्मद ज़ुबैर ने ही बजरंग मुनि का एक वीडियो ट्वीट कर उन पर हेटस्पीच देने का आरोप लगाया था. मीडिया और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद सीतापुर पुलिस ने मुक़दमा दर्ज कर महंत बजरंग मुनि को गिरफ़्तार किया था.
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