‘वो हमेशा परेशानी में ही बात किया करते थे कि लोग उन्हें जीने नहीं देंगे’ - ग्राउंड रिपोर्ट

    • Author, विष्णु नारायण
    • पदनाम, समस्तीपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए

पिछले पांच जून से सोशल मीडिया पर बिहार के एक परिवार की तस्वीर घूम रही है. इस तस्वीर में एक ही परिवार के पांच लोगों के शव घर के छप्पर से लटके दिखते हैं.

ये तस्वीर है समस्तीपुर जिले के विद्यापतिनगर थाना अन्तर्गत मऊ धनेशपुर गांव की. इस परिवार के सदस्य थे- 45 साल के मनोज झा, 40 साल की उनकी पत्नी सुंदर मणि देवी, 65 साल की उनकी मां सीता देवी, साल और आठ साल के उनके दो बच्चे सत्यम और शिवम. उनकी मौत को कुछ लोग हत्या बता रहे हैं तो कुछ लोग आत्महत्या.

वहीं, पांच दिन बीतने के बाद भी इस मामले में स्थानीय पुलिस का कहना है कि विसरा के फोरेंसिक जांच के बाद ही पोस्टमॉर्टम की फ़ाइनल रिपोर्ट मिल सकेगी.

ग़ौरतलब है कि मनोज झा और सुंदर मणि देवी के कुल चार बच्चे थे. दो लड़के और दो लड़कियां. उनकी दो लड़कियों काजल और निभा की शादी हो चुकी है और दोनों अभी जीवित हैं.

काजल की शादी पांच साल पहले हुई थी, वहीं निभा की शादी को कुछ महीने ही बीते हैं. घटना के दिन निभा और उनके पति आशीष मनोज के घर में ही मौजूद थे.

गांव पहुंचने के बाद हमारी मुलाक़ात सबसे पहले काजल के पति गोविंद झा से हुई. गोविंद ने हमसे कहा कि घटना के दिन उनके ससुर मनोज ने क़रीब साढ़े तीन बजे उन्हें फ़ोन किया था. वे पहली बार में फ़ोन नहीं उठा सके. जब 5 मिनट के बाद उन्होंने पलटकर फ़ोन किया तब उनकी बात हो सकी थी.

बकौल गोविंद मनोज झा बीते कई दिनों से परेशान चल रहे थे. वो बताते हैं, "उस दिन भी फ़ोन करके कहा कि वे गांव छोड़कर कहीं जा रहे हैं. वे फ़ोन के साथ ही और भी सामान घर में कहीं रख जाएंगे. कह रहे थे कि आके सारा सामान ले लें."

गोविंद ने बताया कि उन्होंने मनोज झा को फिर से फ़ोन किया लेकिन उनका फ़ोन स्विच ऑफ़ हो चुका था. तब उन्होंने अपनी पत्नी काजल को फ़ोन किया लेकिन उन्होंने भी फ़ोन नहीं उठाया. उनकी मां ने भी फ़ोन नहीं उठाया. तब उन्होंने गांव में रहने वाली एक और रिश्तदार रीना झा को फ़ोन किया और उनके साथ तमाम बातें साझा कीं.

जब हम गांव पहुंचे तो वहां काजल मौजूद थीं. उन्होंने कहा, "उनको रोज़ मेंटली टॉर्चर किया जाता था. वो हमेशा परेशानी में ही बात किया करते थे कि लोग उन्हें जीने नहीं देंगे. मार देंगे. हम लोग नहीं जिएंगे".

यह पूछे जाने पर कि आख़िर वे कौन से लोग हैं जो उनके पिता को टॉर्चर करते थे, काजल कहती हैं कि "वैसे तो वो मन्नू झा हैं लेकिन अब इसमें किसी और का नाम दे रहे हैं. उनकी पत्नी मेरे पिता को मारती थीं, बड़ा बेटा गाली देता था. पिता को घर से खींचकर मारता था. भाइयों को खींचकर ले जाता था, वही सब इन चीज़ों का कारण बनी. मेरे पिता को इस घटना के लिए मजबूर किया."

पीड़ित परिवार की ओर से मन्नू झा पर लगाए गए आरोपों के संदर्भ में हमने उनसे संपर्क करने की कोशिश की. ये दोनों परिवार लगभग आमने-सामने ही रहते हैं, लेकिन वे हमें अपने घर पर नहीं मिले.

परिवार के परिजनों के अनुसार वे कहीं बाहर गए थे और साथ में फ़ोन भी नहीं रखते. हालांकि वाकये के तुरंत बाद स्थानीय मीडिया से बातचीत में उन्होंने इन तमाम आरोपों को निराधार बताया था. पुलिस के मुताबिक़ वे फ़रार हैं.

क्या करता था मृतक का परिवार?

गोविंद झा ने बताया कि परिवार चलाने के लिए मनोज ऑटो चलाया करते थे और सड़क किनारे खैनी भी बेचा करते थे.

वो कहते हैं, "उनके पास एक पिकअप वैन थी, जिसे उन्होंने एक लाख रुपये में गिरवी रख दिया था- गाड़ी की 17 किश्तें बाक़ी थीं. इसके अलावा उनके पास एक और ऑटो था जिसे वे 20,000 रुपये में ख़रीदा था, लेकिन जब वे किश्तें नहीं जमा कर सके तो एजेंसी वाले उसे उठा ले गए."

अभी उनके पास सिर्फ एक ऑटो था, जिसे वे खुद ही चलाया करते. गोविंद कहते हैं कि उस ऑटो को अभी वो एहतियातन अपने घर ले गए हैं.

वहीं मनोज झा की मां सीता देवी गांव में एक जीविका समूह से जुड़ी थीं. क़रीब 6 महीने पहले मनोज झा के पिता रतिकांत झा की मौत हो गई थी जिसके बाद से सीता देवी घर चलाती थीं. एफ़आईआर के लिए दिए गए आवेदन में उनके हवाले से भी तीन लाख रुपये का उधार लेने की बात कही गई है.

इसके अलावा दोनों बेटियों के दामाद गोविंद और आशीष भी ट्रांसपोर्ट लाइन से जुड़े हैं. दोनों शादी के पहले से एकदूसरे के रिश्तेदार हैं. बकौल गोविंद उन्होंने ही आशीष और निभा की शादी कराई है.

हत्या या आत्महत्या?

ग़ौरतलब है कि पीड़ित परिवार के पांच सदस्यों के फांसी पर लटकने की तस्वीर ने ढेरों सवाल खड़े हो गए हैं- आख़िर एक ही परिवार के पांच सदस्य एक ही कमरे में फांसी पर कैसे झूल सकते हैं? बच्चे फांसी पर खुद-ब-खुद लटके या किसी ने लटकाया? क्या बच्चों को फांसी पर लटकाने से पहले ज़हर खिलाया गया? या फिर उन्हें जान से मारने के बाद लटका दिया गया?

घटना के दिन मौक़े पर ली गई तस्वीरों से बच्चों और मृत मनोज झा और उनकी मां के मुंह से कुछ झाग जैसी चीज़ भी इन सवालों को जन्म दे रही है.

मनोज झा के दामाद आशीष मिश्र सवाल पर कहते हैं कि उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उस रात ऐसा कुछ होगा. वे रात साढ़े 9 बजे तक मछली-भात खाने के बाद पत्नी के साथ सोने के लिए सामने के कमरे में चले गए.

सुबह सात से साढ़े सात बजे के बीच उनकी नींद पत्नी का 'रोना' सुनकर ही खुली. उन्होंने देखा कि ससुर समेत परिवार के दूसरे लोगों के शव सामने वाले कमरे में लटके हुए हैं.

लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि ऐसा कैसे संभव है कि समूचा परिवार फंदे पर लटक गया और पास के कमरे में मौजूद बेटी और दामाद को भनक तक नहीं लगी.

हालांकि घटना के अगले दिन काजल द्वारा एफ़आईआर के लिए थाने में दिए गए आवेदन के हिसाब से मन्नू झा और उनके बेटे मुकुन्द झा के साथ ही कुछ और अज्ञात लोगों ने इस घटना को अंजाम दिया है.

मौक़े पर पहुंचने के बाद हमने पाया कि ज़मीन से छप्पर की दूरी लगभग साढ़े सात फीट है. 6 फीट का व्यक्ति आसानी से छप्पर और छप्पर को संभालने के लिए बीचोंबीच लगी बल्ली को छू सकता है.

कई प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि बच्चों के अलावा तीन 'शवों' के पैर ज़मीन छू रहे थे. परिजनों के अनुसार, कमरे में सबकुछ जस का तस ही है. ऐसे में सवाल है कि क्या कोई शख्स ऐसी परिस्थितियों में आत्महत्या कर सकता है जब उसके पैर जमीन से छू रहे हों?

शवों के पैरों के जमीन छूने की पुष्टि तो खुद परिवार के रिश्तेदार रीना झा और उनके पति सुनील चौधरी भी कर रहे हैं, जो घटना की सूचना मिलने के बाद खगड़िया से समस्तीपुर पहुंचे हैं. फोरेंसिक टीम द्वारा स्पॉट से सैंपल लेने तक और फिर शव फंदे से उतारने तक वो वहीं मौजूद थे.

वहीं मनोज झा की नज़दीकी रिश्तेदार व पड़ोसी रश्मि देवी कहती हैं कि घटना के रोज़ काजल ने लगभग साढ़े पांच बजे उन्हें फ़ोन पर बताया कि पिताजी का फ़ोन स्विच ऑफ़ है, वो घर जाकर पता करें कि क्या हो रहा है?

वो मनोज के पड़ोसी हैं. जब वो मनोज के घर गईं तो उनसे उनकी मुलाक़ात हुई. इसके अलावा इस दौरान दोनों बच्चे उनकी दुकान से बिस्कुट भी खरीदने आए थे.

उधारी का दबाव या सूद का भंवरजाल?

मनोज की बेटियां और दामाद इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि उन पर तीन लाख रूपये के आसपास का कर्ज़ा था, जो उन्होंने अलग-अलग लोगों से अलग-अलग समय पर लिया था. इसको लेकर उन पर भारी दबाव था.

इस कर्जे़ के एवज़ में उनके घर की जमीन के काग़ज़ात देनदार ले गए थे. यहां तक कि देनदार घर से गैस सिलेंडर और चूल्हा तक उठा ले गए. एफ़आईआर के लिए दिए गए आवेदन में भी परिजनों ने पहले तीन लाख रूपये और फिर बाद में दो लाख रूपये के कर्ज़ का ज़िक्र किया है.

इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. विपक्ष सरकार पर हमलावर है.

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस पूरे मामले पर ट्वीट करते हुए लिखा, "समस्तीपुर में एक ग़रीब परिवार के सभी पांच सदस्यों ने ग़रीबी, भुखमरी, आर्थिक तंगी, महंगाई, बेरोज़गारी और बदहाली से त्रस्त होकर सामूहिक आत्महत्या कर ली. यह कथित डबल इंजन सरकार के बड़बोलेपन पर करारा तमाचा एवं काला धब्बा है."

भाकपा (माले) की टीम भी पीड़ित परिवार से मुलाक़ात करने पहुंची. पार्टी के राज्य सचिव कुणाल ने बीबीसी से कहा, "यह बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि कर्जे़ और तगादे की वजह से परिवार सामाजिक और आर्थिक दबाव में था. ग़रीब ब्राह्मण का परिवार था. उनके पास रहने के लिए आज भी खपरैल का घर है. मनोज के पिता ने कुछ महीने पहले आत्महत्या की थी. पुलिस से शिकायत के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हुई. सरकार की तमाम योजनाएं उन तक नहीं पहुंच सकी हैं."

वहीं प्रदेश सरकार में शिक्षा मंत्री और स्थानीय विधायक विजय कुमार चौधरी ने मीडियाकर्मियों के सवाल पर कहा, "यह मामला मेरे निर्वाचन क्षेत्र का है. घटना के प्रकाश में आने और पुलिस के पहुंचने के कुछ ही देर बार मैं खुद वहां पहुंचा. उस समय तक आई बात के अनुसार मनोज पर कर्ज़ लौटाने का दबाव था. पुलिस जांच कर रही है. पूरा मामला हत्या का है या आत्महत्या का तो यह तो अंतिम रिपोर्ट से पता चलेगा."

उन्होंने ये भी कहा कि पीड़ित परिवार के प्रमुख मनोज के पिता ने भी पिछले साल आत्महत्या कर ली थी. गांव के कई लोगों ने हमें भी इस संदर्भ में दबी जुबान ऐसी ही बातें बताईं थी. हालांकि पीड़ित गौतम झा ऐसे किसी भी सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए.

क्या कहना है सिविल सर्जन और पुलिस-प्रशासन का?

बीबीसी के साथ बातचीत में विद्यापतिनगर थाने के थानाध्यक्ष प्रसुंजय कुमार कहते हैं, "अभी पोस्टमॉर्टम की प्राथमिक रिपोर्ट आई है लेकिन उसमें कोई ओपिनियन नहीं दी गई है. रासायनिक जांच के लिए विसरा को फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफ़एसएल) भेजा जा रहा है."

वो कहते हैं, "इस मामले में अभी तहकीकात जारी है लेकिन अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है. आरोपी अपने घरों से फ़रार हैं."

वहीं इस मामले पर दलसिंहसराय के डीएसपी दिनेश कुमार पांडे ने हमें बताया "अभी पोस्टमॉर्टम की फ़ाइनल रिपोर्ट नहीं आई है. विसरा के फोरेंसिक जांच के बाद ही फाइनल रिपोर्ट मिल सकेगी."

स्थानीय मीडिया में यह भी कहा जा रहा है कि पीड़ित परिवार ने तीन लाख का कर्ज़ लिया था वह अब सूद समेत 17 लाख रुपये का हो चुका था. हालांकि इसकी पुष्टि अब तक नहीं हो पाई है.

डीएसपी दिनेश कुमार पांडे से इस पूरे मामले में एफ़आईआर में नामजद लोगों और '3 लाख के बजाय 17 लाख' मांगने के संदर्भ में कहा, "यह तो स्पष्ट बात है कि उस परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. लेकिन सारी चीजें अनुसंधान का विषय हैं."

हत्या या आत्महत्या के सवाल पर समस्तीपुर ज़िले के सिविल सर्जन डॉक्टर सत्येन्द्र कुमार गुप्ता बीबीसी से कहा, "पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट हमने पुलिस को भेज दी है. वो अभी गोपनीय है ताकि जांच किसी तरह से प्रभावित न हो."

वो कहते हैं कि "मौत के कारण की बात करें को वह गर्दन पर दबाव पड़ने और उसके बाद हृदयगति के रुक जाने से हुई लगती है. वो हत्या भी हो सकता है और आत्महत्या भी हो सकता है. ये जांच का विषय है. प्रथमदृष्टया कुछ भी कह पाना अभी संभव नहीं. विसरा में अप्राकृतिक गंध थी इसलिए हमने इस मामले में 'विसरा प्रिजर्व' किया है. इसे जांच के लिए आगे भेज दिया गया है."

शुरुआती तौर पर यह घटना 'ओपन एंड शट' नहीं लग रही है. कई गुत्थियां सुलझनी अभी बाकी हैं.

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