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हैदरपोरा मुठभेड़ मामला: बेटे के शव के लिए अदालती जंग जीतने वाले पिता की आपबीती
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट ने बीते शुक्रवार को श्रीनगर के हैदरपोरा में विवादित एनकाउंटर में छह महीने पहले मारे गए आमिर मगरे के शव को क़ब्र से बाहर निकालने से संबधित आदेश केंद्रशासित प्रदेश के प्रशासन को जारी कर दिए हैं.
अदालत के इस आदेश के बाद आमिर मगरे के पिता मोहम्मद लतीफ़ मगरे ने अदालत को इसके लिए धन्यवाद किया है.
सोमवार को वो आदेश की कॉपी इंस्पेक्टर जनरल के दफ्तर में प्रॉस्क्यूटर के सुपुर्द करके आए हैं.
मोहम्मद लतीफ़ की वकील दीपका राजावत ने बताया कि सोमवार को उन्होंने इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (कश्मीर ज़ोन) के दफ्तर में सीनियर प्रॉस्क्यूटर को आदेश के कॉपी भिजवाई है.
उन्होंने ये भी बताया कि इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस के दफ्तर में तैनात सीनियर प्रॉसिक्यूटर से उन्होंने पूछा है कि शव निकलने के लिए वो क्या कर रहे हैं.
दीपिका राजावत के मुताबिक़ सीनियर प्रॉसिक्यूटर ने इसके लिए दो दिन का समय मांगा है और कहा है कि उन्हें दो दिन इन्तज़ार करना पड़ेगा.
उनका कहना था कि फ़ैसला आने के बाद दो दिन छुट्टी रही है और प्रॉसिक्यूटर कोई कार्रवाई कर नहीं पाए हैं.
'भीख मांगने वाली स्थिति हो गई है'
आमिर मगरे के परिवार का कहना है कि उनके लिए बीते छह महीनों का संघर्ष आसान नहीं रहा है.
अपने घर गुल से फ़ोन पर बात करते हुए आमिर मगरे के पिता मोहम्मद लतीफ़ मगरे ने बीबीसी से कहा, "बीते साल नवंबर से लेकर बीते हफ़्ते अदालत का आदेश आने तक, मुझे क़दम-क़दम पर संघर्ष करना पड़ा. अदालत का दरवाज़ा खटखटाने से पहले मैं कई सरकारी दफ्तरों में गया, लेकिन मुझे कहीं इंसाफ नहीं मिला."
वो कहते हैं, "मैं ग़रीब आदमी हूं. केस लड़ते-लड़ते मुझे ग़ुरबत ने पकड़ लिया, मुझे लोगों से उधार लेना पड़ा. अपने बेटे के शव को हासिल करने के लिए मुझे ये लड़ाई लड़नी ही थी. पूरा परिवार परेशान था. हमारी रातों की नींद उड़ गई थी. सिर्फ एक तमन्ना थी कि किसी तरह बेटे का शव मिल जाए और अपने घर के पास दफन कर सकें."
वो बताते हैं, "बीते छह महीनों में मुझे अपनी लड़ाई के लिए कभी कई-कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ा है. हम जहां रहते हैं, वो पिछड़ा इलाक़ा है, यहां रास्ते नहीं हैं, गाड़ी का अच्छा इंतज़ाम नहीं है. इसलिए श्रीनगर जाने में हमें मुश्किल होती थी. कई बार श्रीनगर जाकर गाड़ी में ही मैंने रात गुज़ारी. कई बार तो दिन में खाना तक नसीब नहीं हुआ. हम वैसे भी अब भीख मांगने के क़ाबिल हो गए हैं. बेटे की लड़ाई के लिए इलाक़े के कई लोगों से मैंने क़रीब तीन लाख रुपये तक की रक़म उधार ली है. अपने घर से श्रीनगर जाने के लिए मुझे दस-दस हज़ार का किराया गाड़ी को देना पड़ा है. कभी किराया नहीं होता था तो लोगों से पैसे मांग कर दिया. अभी तक मैंने उधार चुकाया नहीं है."
उनका ये भी कहना था कि एक तरफ बेटे की मौत से उनका हौसला टूटा तो दूसरी तरफ ग़रीबी से जंग ने उनकी कमर तोड़ दी. वो बताते हैं कि बेटा जो पैसा कमाता था उसी से उन्हें मदद मिलती थी.
मोहम्मद लतीफ़ ने ये भी बताया कि अगर क़ब्र में कुछ बचा नहीं होगा तो वो क़ब्र से थोड़ी मिट्टी उठाकर लाएंगे और उसी मिट्टी को अपने गांव में दफन करेंगे.
लतीफ़ कहते हैं कि उन्होंने खुद चरमपंथियों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी है और उनके ही बेगुनाह बेटे की चरमपंथी करार देकर मार डाला गया. वो कहते हैं कि उनका बेटा डॉक्टर के पास काम करता था.
लतीफ़ मगरे जम्मू और कश्मीर के जानेमाने चरमपंथ विरोधी कार्यकर्ता हैं. बेटे की मौत के बाद मोहम्मद लतीफ़ ने बीबीसी से कहा था कि अगर उनके बेटे की कोई ग़लती साबित हुई तो वो किसी भी सज़ा के लिए तैयार हैं.
क्या था पूरा मामला?
बीते साल नवंबर में पुलिस ने श्रीनगर के हैदरपोरा में विवादित एनकाउंटर में आमिर मगरे समेत चार लोगों को मारा था. पुलिस ने आमिर को पाकिस्तानी चरमपंथी का क़रीबी साथी बताया था.
पुलिस ने ये भी कहा था कि आमिर की गतिविधि से ज़ाहिर होता है कि वो भी एक चरमपंथी थे.
हैदरपोरा एनकाउंटर के बाद मारे गए तीन लोगों के घरवालों ने कहा था कि सुरक्षाबलों ने फ़र्ज़ी एनकाउंटर में इन लोगों को मारा था.
एनकाउंटर में आमिर मगरे के अलावा डॉक्टर मुदासिर गुल और अल्ताफ़ अहमद भट्ट की भी मौत हुई थी.
डॉक्टर मुदासिर गुल एक डेंटल सर्जन थे जबकि अल्ताफ़ अहमद भट्ट एक कारोबारी थे.आमिर मगरे डॉक्टर मुदासीर गुल के साथ एक चपरासी के रूप में काम करते थे.
डॉक्टर मुदासिर गुल और अल्ताफ़ अहमद भट्ट श्रीनगर के निवासी थे जबकि आमिर मगरे जम्मू के जिला रामबाण के गुल इलाक़े के रहने वाले थे.
पुलिस ने एनकाउंटर में मारे गए चारों लोगों को चरमपंथी बताया था. पुलिस ने ये भी बताया था कि मारे गए चार लोगों में से एक पाकिस्तानी चरमपंथी भी शामिल था.
एनकाउंटर के बाद बीते साल भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद डॉक्टर मुदासिर और अल्ताफ़ अहमद भट्ट के शव क़ब्र से निकलकर उनके परिवारवालों के हवाले किए गए थे.
लेकिन पुलिस ने आमिर मगरे के पिता को बेटे का शव देने से इनकार किया था.
जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट में जस्टिस संजीव कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने प्रशासन को 27 मई 2022 को आदेश जारी करते हुए कहा है कि आमिर मगरे के शव को क़ब्र से निकालकर उनके गाँव तक ले जाने का इंतज़ाम किया जाए.
लतीफ़ मगरे ने जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट में वकील दीपका राजावत के ज़रिए याचिका दाखिल की थी.
अदालत के आदेश पर दीपका राजावत का कहना था कि अदालत ने केंद्रशासित प्रदेश और भारत सरकार को आदेश देते हुए कहा है कि पिता की मौजूदगी में आमिर मगरे के शव को क़ब्र से निकला जाए और उनके सुपुर्द किया जाए ताकि वो शव को गाँव तक ले जा सकें और पूरे सम्मान के साथ उनका परिवार उनका अंतिम संस्कार कर सके.
अदालत ने ये भी कहा है कि अगर शव बहुत ज़्यादा ख़राब हो गया है या कब्र में कुछ रह नहीं गया है तो ऐसी स्थिति में परिवार उसी जगह अपने रीति रिवाज़ और अपने धार्मिक रस्म के मुताबिक़ आमिर को दफ़न कर उनका जनाज़ा पढ़ सकता है.
अदालत ने अपने आदेश में ये भी कहा है कि अगर परिवार शव को अपने गाँव नहीं ले जा पाता है तो परिवार को पांच लाख़ का मुआवज़ा दिया जाए.
डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस सुजीत कुमार के नेतृत्व में हैदरपोरा एनकाउंटर मामले की जांच के लिए जम्मू कश्मीर पुलिस की विशेष जांच टीम या एसआईटी का गठन भी किया गया था. जांच के दौरान सुजीत कुमार ने सुरक्षाबलों को किसी ग़लती का दोषी नहीं ठहराया था.
विशेष जांच टीम ने बताया था कि एक आम नागरिक, डॉक्टर और कारोबारी को या तो चरमपंथियों ने ढाल बनाया होगा या फिर एनकाउंटर में मार दिया होगा.
जम्मू और कश्मीर पुलिस की विशेष जांच टीम की रिपोर्ट को परिवारवालों ने ख़ारिज करते हुए मामले के न्यायिक जांच की मांग की थी.
साल 2020 से पुलिस ने कश्मीर में मुठभेड़ों में मारे जानेवाले चरमपंथियों के शव परिवार वालों को लौटना बंद कर दिया है.
पुलिस ने पहले ये तर्क देना शुरू किया कि कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के कारण शव नहीं दिए जा सकते, लेकिन महामारी के ख़त्म होने के बाद भी ये सिलसिला अभी जारी है.
हैदरपोरा एनकाउंटर में मारे गए लोगों को श्रीनगर से क़रीब 80 किलोमीटर दूर हिंदवाड़ा के वडेर पाईन में दफनाया गया था.
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