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कड़ी बंदिशों के बीच सैयद अली शाह गिलानी का अंतिम संस्कार
- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, श्रीनगर
कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी का अंतिम संस्कार श्रीनगर के स्थानीय क़ब्रिस्तान में हैदरपुरा में तड़के कर दिया गया है.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि सुबह पौने पाँच बजे गिलानी के परिजनों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.
लंबे समय से बीमार चल रहे 92 वर्षीय गिलानी का निधन बुधवार की रात तकरीबन साढ़े दस बजे हैदरपुरा स्थित उनके घर में हुआ.
उनके निधन के बाद कश्मीर घाटी में मोबाइल डेटा और मोबाइल कॉलिंग पर रोक लगा दी गई है, सिर्फ़ बीएसएनएल के फ़ोन नेटवर्क काम कर रहे हैं.
महबूबा मुफ़्ती और सज्जाद लोन सहित कश्मीर के प्रमुख नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है.
क़ब्रिस्तान को लेकर आशंका
गिलानी ने सार्वजनिक तौर पर यह इच्छा ज़ाहिर की थी कि उन्हें श्रीनगर के उस कब्रिस्तान में दफ़न किया जाए जिसे "शहीदों का कब्रिस्तान" कहा जाता है क्योंकि अलगाववादी और चरमपंथी आंदोलन से जुड़े कई नेता वहाँ दफ़नाए गए हैं, जिन्हें स्थानीय लोग शहीद कहते हैं.
लेकिन स्थानीय प्रशासन ने उनका अंतिम संस्कार उस कब्रिस्तान में करने की अनुमति नहीं दी जिसके बाद उन्हें हैदरपुरा के कब्रिस्तान में दफ़न कर दिया गया.
बीमारी की वजह से गिलानी ने पिछले साल अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस छोड़ दिया था, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस भारत विरोधी अलगाववादी संगठनों का एक समूह है.
गिलानी के पद छोड़ने के बाद अशरफ़ सेहरी को हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस का अध्यक्ष बनाया गया था, सेहरी की मौत कोविड संक्रमण के कारण इस साल के शुरू में जेल में हो गई थी.
गिलानी 15 वर्षों तक विधायक रहे थे और वे जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जमात-ए-इस्लामी के प्रतिनिधि थे. जब जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी विद्रोह शुरू हुआ तो अपने चार साथियों के साथ 1989 में उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया था.
1993 में बीस से अधिक धार्मिक और राजनीतिक दलों ने मिलकर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की स्थापना की थी जिसके वे अहम नेता रहे, वे बाद में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष भी चुने गए थे.
हुर्रियत में फूट
पाकिस्तान के तत्कालीन सैनिक शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने जब कश्मीर समस्या के हल के लिए एक चार सूत्री फ़ॉर्मूला सुझाया तो हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस में इस बात को लेकर मतभेद था कि भारत सरकार से बातचीत की जाए या नहीं.
हुर्रियत के अध्यक्ष मीर वाइज़ उमर फारुक़ बातचीत के पक्ष में थे जबकि गिलानी ने बातचीत का विरोध करने का फ़ैसला किया जिससे हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस दो टुकड़ों में टूट गई, गिलानी धड़ा हुर्रियत से अलग हो गया और उसे '2003' के नाम से जाना जाने लगा.
इसके बाद हुर्रियत (जी) का गठन हुआ, सैयद अली शाह गिलानी को इसका आजीवन अध्यक्ष चुना गया.
सैयद अली शाह गिलानी संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह से पहले विधानसभा चुनाव कराए जाने के ख़िलाफ़ रहे और उन्होंने सभी विधानसभा चुनावओं का बहिष्कार किया.
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