अदालतों की ऑनलाइन सुनवाई से कैसे खुलीं उम्मीदों की खिड़कियां

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- Author, मेरिल सेबेस्टियन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
एक मामले की सुनवाई के दौरान एक वकील के बिना शर्ट पेश होने से लेकर कार्यवाही के दौरान हुक्का पीने के नज़ारे तक- पिछले कुछ समय में कोर्ट की ऑनलाइन कार्यवाही ने कई बार लोगों को हँसने का मौक़ा दिया.
लेकिन इसका सबसे सकारात्मक प्रभाव तो यही रहा कि वकीलों, पत्रकारों और नागरिकों को ऐसा होने से एक तरफ बड़ी सहूलियत हुई तो, दूसरी तरफ कोर्ट तक उनकी पहुंच बेहतर हुई.
बार एंड बेंच वेबसाइट के सह संस्थापक शिशिर रुद्रप्पा का कहना है कि उन्होंने क़ानून से जुड़े मसलों के बारे में जानकारी देने वाले इस न्यूज़ वेबसाइट को इस उम्मीद में शुरू किया था कि, "एक दिन कोर्ट की ख़बरें अख़बारों के पहले पन्नों का बड़ा हिस्सा बनेंगी."
बीते एक दशक में देश में स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल तो बढ़ा ही है और सोशल मीडिया का भी दायरा बढ़ा है. साथ ही 'लाइव लॉ' और 'बार एंड बेंच' जैसे क़ानून से जुड़े मसलों पर रिपोर्ट देने वाली न्यूज़ वेबसाइट ने लीगल रिपोर्टिंग को बदला है.
एक दौर था जब इस तरह की रिपोर्टिंग केवल कोर्ट के फ़ैसलों या फिर जज के ऑब्ज़र्वेशन तक ही सीमित थी, अब कोर्ट में दो पक्षों के बीच क्या बात हुई, ये भी ख़बरों का हिस्सा बनने लगी है.
'लाइव लॉ' के प्रबंध संपादक मनु सेबेस्टियन कहते हैं, "इससे कोर्ट से जुड़े ख़बरों की कवरेज के बारे में जागरूकता बढ़ी है और लोगों को अब पहले से बेहतर पता है कि कोर्ट में क्या कुछ होता है."
बीते साल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि इस तरह के रीयल-टाइम अपडेट्स "एक तरह की खुली अदालत का वर्चुअल विस्तार ही है."
'पुरुषों का दबदबा'
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय अदालतों का कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग की इजाज़त साल 2018 में ही दे दी थी, लेकिन ये कोविड महामारी का वक्त था जिसने देश की क़ानून व्यवस्था को मामलों की सुनवाई के लिए वर्चुअल कोर्ट की व्यवस्था अपनाने के लिए उत्साहित किया.
केरल हाई कोर्ट के वकील पीवी उत्तरा कहती हैं कि साल 2020 में जब मामलों की सुनवाई ऑनलाइन शुरू हुई तब उन्होंने कोर्ट में पेश होना शुरू किया.
महिला वकीलों ने पहले भी इस बारे में लिखा है कि वो मानती हैं कि भारत में मुकदमा लड़ने के क्षेत्र में 'पुरुषों का दबदबा है,' और इस प्रोफ़ेशन में कदम जमाना महिलाओं के लिए बेहद मुश्किल है.
उत्तरा कहती हैं कि कोर्ट की ऑनलाइन सुनवाई में माहौल कम डराने वाला होता है, इससे वो कोर्टरूम के तौर-तरीके बेतहर सीख सकी हैं.
इस तरह की सुनवाई की व्यवस्था ने उन महिलाओं और युवा वकीलों को भी एक अच्छा विकल्प दिया है जिन्हें अक्सर कम पैसे मिलते हैं, साथ ही इस तरह के प्रोफ़ेशन में कोर्टरूम में पेश होने मे लगने वाला उनका वक्त और पैसा भी बचा है.
फ़िज़िकल सुनवाई का हाइब्रिड तरीका
उत्तरा कहती हैं आम लोगों को भी इससे सुविधा हुई है, जिनके लिए कोर्ट की सुनवाई में शामिल होना मुश्किल काम होता है. इससे उनके आने-जाने का खर्च तो बचा ही, कोर्ट परिसर में सुरक्षा की कई परतों से होकर गुज़रने में लगने वाला वक्त भी बचा.
वो कहती हैं कि जज के किसी आदेश को समझने के लिए मुवक्किलों को वकीलों या क़ानून के जानकारों की ज़रूरत होती है लेकिन वर्चुअल कोर्टरूम में अपने मामले की पैरवी होते देखने से उन्हें "राहत होती है" और इससे उन्हें "एक पर्सनल कनेक्शन" का अनुभव होता है.
जिन लोगों के सामने बीमारी या विकलांग होने जैसे दूसरी चुनौतियां थीं उनके लिए भी कोर्ट की कार्यवाही ऑनलाइन होने से कोर्टरूम तक उनकी पहुंच बढ़ी.
वो कहती हैं, "विकलांगों के लिए हमारी अदालतों में अधिक अधिक सुविधाएं नहीं हैं" सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए एक सर्वे में भी ये बात सामने आई है.
इस साल केरल हाई कोर्ट ने वर्चुअल और फ़िज़िकल सुनवाई करने का हाइब्रिड तरीका अपनाया. इससे पीवी उत्तरा को अपना काम जारी रखने में मदद मिली. अपने परिवार और बामीर मां की देखभाल की ज़िम्मेदारी उन्हीं पर है.
लाइवस्ट्रीमिंग की इजाज़त
साल 2020 में गुजरात हाई कोर्ट पहला ऐसा कोर्ट बना जिसने मामलों की सुनवाई की लाइवस्ट्रीमिंग की इजाज़त दी. इसके कुछ महीनों बाद कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी इसी दिशा में कदम उठाया.
फरवरी 2022 में कोर्ट ने राज्य के स्कूलों और कॉलेजों में विवादित हिजाब बैन के मामले की सुनवाई की लाइवस्ट्रीमिंग की.
दोनों पक्षों के वकीलों की दलील सुनने के लिए हज़ारों दर्शकों ने कोर्ट के आधिकारिक यूट्यूब चैनल को देखा.
सोशल मीडिया पर लोगों ने कोर्टरूम में लोगों के व्यवहार पर चर्चा की और इस पर बात की कि जो उन्होंने देखा क्या कोर्ट में सामान्य तौर पर वैसा ही होता है.
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लेकिन बढ़ती आलोचना का हमेशा स्वागत नहीं होता.
इसी सप्ताह दिल्ली हाई कोर्ट ने समलैंगिक विवाह के एक मामले की लाइवस्ट्रीमिंग का विरोध कर रही एक याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा के लिए सरकार को फटकार लगाई.
न्यूज़ रिपोर्ट्स में सरकार के हवाले से कहा गया था कि इस मामले के याचिकाकर्ता "जनहित के नाम पर भ्रम पैदा करना और मामले को सनमसनीखेज़ बनाने" के इरादे से मामले को "अनावश्यक तूल" दे रहे हैं.
चीफ़ जस्टिस एनवी रमन्ना ने कोर्ट की कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग को "दोधारी तलवार" कहा था, हालांकि उन्होंने जजों को इसके बारे में चेताया था. उन्होंने कहा, "बहुमत की क्या राय है, इससे जजों को प्रभावित नहीं होना चाहिए."

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मीडिया सर्कस
अमेरिका में अभिनेत्री एम्बर हर्ड के ख़िलाफ उनके पूर्व पति रहे जॉनी डेप्प के मानहानि के मामले की लाइवस्ट्रीमिंग के इर्द-गिर्द मीडिया सर्कस और घरेलू हिंसा पीड़ितों पर उसके असर को लेकर चिंता जताई जा रही थी.
लेकिन भारत में वकीलों का कहना है कि यौन हिंसा और एचआईवी संक्रमित व्यक्ति से जुड़े मामलों जैसे व्यक्तिगत प्रकृति वाले मामलों में व्यक्ति की निजता की सुरक्षा से जुड़े नियम पहले से मौजूद हैं.
उदाहरण के तौर पर कर्नाटक हाई कोर्ट वैवाहिक और तलाक, यौन हिंसा, बाल शोषण और जुवेनाइल जस्टिस क़ानून से जुड़े मामलों में कोर्ट के कार्यवाही का सीधा प्रसारण नहीं करता.
कोर्ट जजों और वकीलों के बीच हो रही बातचीत और याचिकाकर्ता से संबंधित निजी जानकारी देने के वक्त कार्यवाही म्यूट भी कर सकता है. साथ ही याचिकाकर्ता कोर्ट से दरख़्वास्त कर सकते हैं कि उनके मामले की कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग न की जाए.
उत्तरा कहती हैं, "भारतीय अदालतों में और भारत की क़ानून व्यवस्था में इस तरह की व्यवस्था है, ये नई बात नहीं है."
सेबेस्टियन कहते हैं केवल कुछ कोर्ट में ही कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग की व्यवस्था है, ऐसे में पत्रकारों द्वारा कोर्टरूम से मिल रहे अपडेट्स और ट्वीट्स बेहतर विकल्प साबित हुए हैं.
वो कहते हैं कि क़ानून व्यव्सथा को सभी भारतीय नागरिकों की पहुंच तक पहुंचा पाना अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है.
इन बदलावों को प्रभावी बनाने के लिए केवल मीडिया को ही नहीं बल्कि नीति निर्धारकों, विधायिका और सरकार को भी कोशिश करनी होगी.
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