राजद्रोह क़ानून की समीक्षा पूरी होने तक कोई नई FIR नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हनुमान चालीसा का पाठ, भारत-पाकिस्तान मैच में पाकिस्तान ज़िंदाबाद का नारा, सोशल मीडिया पर पोस्ट या फिर कोई कार्टून- ये कुछ ऐसे काम है जिन्हें हाल के दिनों में अलग-अलग राज्य सरकारों ने राजद्रोह क़ानून में मुक़दमा दायर करने का आधार बनाया.

इस वजह से इस क़ानून के दुरुपयोग को लेकर भारत में बहस छिड़ गई और अब बात क़ानून की समीक्षा की हो रही है. तमाम विरोधों के बाद केंद्र सरकार अब इस क़ानून की समीक्षा के लिए तैयार हो गई है.

हालांकि इसकी समीक्षा की कोई टाइमलाइन तय नहीं की गई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई के दौरान इस पूरे मामले में 'आशा और उम्मीद' शब्द का इस्तेमाल करते हुए तीन अहम बातें कहीं :-

  • पहला - जब तक केंद्र सरकार क़ानून की समीक्षा नहीं कर लेती तब तक राजद्रोह क़ानून की धारा के तहत कोई नया एफ़आईआर दर्ज़ ना हो.
  • दूसरा - राजद्रोह क़ानून के तहत लंबित सभी मामलों में आगे कोई कार्रवाई ना हो.
  • तीसरा - इस धारा के तहत दर्ज़ मामले में जेल में बंद लोग ज़मानत के लिए कोर्ट जा सकते हैं.

इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई के तीसरे हफ़्ते में होगी.

केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने इस आदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अदालत को विधायिका और सरकार का सम्मान करना चाहिए और सरकार को अदालतों का. दोनों के कार्यक्षेत्र निर्धारित है. किसी को भी लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए.

राजद्रोह क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश

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सरकार की कभी हां, कभी ना

हालांकि केंद्र सरकार इस क़ानून की समीक्षा के लिए तुंरत ही तैयार हो गई हो, ऐसा भी नहीं है.

देश की सर्वोच्च अदालत में इस क़ानून की समीक्षा पर केंद्र सरकार से जब सवाल पूछा गया तो केंद्र सरकार का रुख़ दो अलग-अलग मौक़ों पर अलग नज़र आया.

नरेंद्र मोदी

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तारीख़ : 7 मई 2022

सुप्रीम कोर्ट में राजद्रोह क़ानून की संवैधानिक मान्यता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी.

केंद्र सरकार ने जवाब में सुप्रीम कोर्ट में अपना हलफ़नामा दायर किया.

इस हलफ़नामे में केंद्र सरकार ने कहा, "केदारनाथ बनाम बिहार राज्य मामले में दिया गया फ़ैसला एक अच्छा क़ानून है और इस पर पुनर्विचार करने की कोई ज़रूरत नहीं है. यह फ़ैसला एक नज़ीर बन गया है और अब इसमें आगे किसी संदर्भ की कोई ज़रूरत नहीं है. राजद्रोह क़ानून के दुरुपयोग के किसी एक उदाहरण को केदारनाथ मामले पर दोबारा विचार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता."

लेकिन दो दिन बाद, सरकार ने अपने ही हलफ़नामे पर यू-टर्न ले लिया.

तारीख़ : 9 मई 2022

केंद्र सरकार ने दोबारा से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की.

बदले हुए हलफ़नामे में केंद्र सरकार ने कहा कि राजद्रोह क़ानून की समीक्षा की जाएगी. प्रधानमंत्री मोदी ऐसा चाहते हैं. इस वजह से केंद्र ने कोर्ट से गुज़ारिश की कि वह राजद्रोह क़ानून के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर सुनवाई ना करे और केंद्र की ओर से पुनर्विचार की कवायद शुरू होने तक इंतज़ार करे.

ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर केंद्र सरकार ने दो दिन के अंदर ही राजद्रोह क़ानून पर यू-टर्न क्यों लिया?

क्या 7 मई के हलफ़नामे के बारे में प्रधानमंत्री को जानकारी नहीं थी?

'राजद्रोह क़ानून की समीक्षा प्रधानमंत्री के कहने पर की जा रही है' - क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ऐसा कह कर क़ानून की समीक्षा का पूरा क्रेडिट पीएम मोदी को देना चाह रहे हैं?

राजद्रोह क़ानून

क्या है राजद्रोह क़ानून?

इस पूरे संदर्भ को समझने के पहले राजद्रोह क़ानून को संक्षेप में समझने की ज़रूरत है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के अनुसार, जब कोई व्यक्ति बोले गए या लिखित शब्दों, संकेतों या दृश्य प्रतिनिधित्व द्वारा या किसी और तरह से घृणा या अवमानना या उत्तेजित करने का प्रयास करता है या भारत में क़ानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति असंतोष को भड़काने का प्रयास करता है तो वह राजद्रोह का अभियुक्त है.

राजद्रोह एक ग़ैर-ज़मानती अपराध है और इसमें सज़ा तीन साल से लेकर आजीवन कारावास और जुर्माना है.

जिस केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य मामले की बिनाह पर केंद्र सरकार ने 7 मई को कहा था कि इस क़ानून के दोबारा दुरुपयोग की ज़रूरत नहीं है, वो साल 1962 का मामला है.

उस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 124ए के बारे में कहा था कि इस प्रावधान का इस्तेमाल "अव्यवस्था पैदा करने की मंशा या प्रवृत्ति, या क़ानून और व्यवस्था की गड़बड़ी, या हिंसा के लिए उकसाने वाले कार्यों" तक सीमित होना चाहिए.

लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस क़ानून का इस्तेमाल सही संदर्भ में नहीं हो रहा, इस बारे में रह रह कर कई क़ानून के जानकारों ने सवाल उठाए हैं और इशारों-इशारों में अपनी बात रखी है.

राजद्रोह क़ानून

प्रधानमंत्री मोदी और जस्टिस रमन्ना की एक जैसी सोच

सबसे ताज़ा उदाहरण भारत के मुख्य न्यायधीश जस्टिस एन वी रमन्ना का ही है.

20 जून 2021 को जाने-माने क़ानूनविद 'न्यायमूर्ति पीडी देसाई स्मृति ट्रस्ट' द्वारा आयोजित - 'क़ानून का शासन' विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था-

"जो रोज़मर्रा के राजनीतिक संवाद होते हैं या जो चुनावी प्रक्रिया होती है और जिनके दौरान विरोध और आलोचना भी होती है, वो मूलतः लोकतांत्रिक ढाँचे का ही महतवपूर्ण और अभिन्न अंग है. सिर्फ़ इतना ही मान लेना कि आख़िरकार जनता ही संप्रभु है, ये काफ़ी नहीं है. इस बात को 'मानवीय गरिमा और स्वायत्तता के विचार' में भी परिलक्षित होना चाहिए. तार्किक और सही सार्वजनिक संवाद को भी 'मानवीय गरिमा के एक महत्वपूर्ण पहलू' की तरह ही देखा जाना चाहिए क्योंकि यह 'ठीक से काम करने वाले लोकतंत्र' के लिए बेहद ज़रूरी है."

उनके इस बयान को राजद्रोह क़ानून के जोड़ कर देखा गया.

इतना ही नहीं एक सुनवाई के दौरान उन्होंने सार्वजनिक तौर पर सवाल पूछा था कि क्या आज़ादी के 75 साल बाद भी भारत को राजद्रोह क़ानून की ज़रूरत है.

अब जब भारत के क़ानून मंत्री 'पीएम मोदी' का हवाला देकर 'आज़ादी के अमृत महोत्सव' में पुराने औपनिवेशिक क़ानूनों को ख़त्म करने की बात कह रहे हैं, तो माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश एक ही तरह की सोच रखते हैं.

राजद्रोह क़ानून

समीक्षा से क्या हासिल होगा?

अब जब प्रधानमंत्री मोदी और चीफ़ जस्टिस रमन्ना एक जैसी सोच रखते हैं और केंद्र सरकार ने हलफ़नामा बदल कर राजद्रोह क़ानून की समीक्षा की बात की है तो क्या इसका मतलब ये निकाला जाए कि मोदी सरकार राजद्रोह क़ानून में बदलाव की तैयारी में है.

वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने बीबीसी से बातचीत में कहा, " मेरे ख़्याल से केंद्र सरकार द्वारा हलफ़नामा बदलने को बहुत अहमियत दिए जाने की ज़रूरत नहीं है. सरकार समीक्षा की बात तो कर रही है, लेकिन समीक्षा किस बात की करेगी, ये अभी किसी को पता नहीं है. मैं नहीं समझता की राजद्रोह क़ानून वापस लेने की तरफ़ केंद्र सरकार विचार कर रही है या ये क़ानून वापस लिया जाएगा.

हो सकता है ये पूरी कवायद इस बात की कोशिश हो कि किसी तरह से सुप्रीम कोर्ट से कुछ समय और माँग लिया जाए. या फिर केंद्र सरकार को लगता हो कि इस बीच कोर्ट का रुख़ थोड़ा और नरम हो जाएगा. लेकिन मैं नहीं मानता की इस पूरी कवायद से कोई ठोस बात निकल कर सामने आने वाली है."

उन्होंने सरकार पर इस क़ानून के दुरुपयोग का आरोप भी लगाया.

अक्सर इस क़ानून के दुरुपयोग का आरोप लगाने वाले इस धारा में हुई गिरफ़्तारियों और उसमें कम लोगों को हुई सज़ा को इसका आधार बताते हैं.

राजद्रोह क़ानून

एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक़ 2014 से 2019 के बीच कुल 559 मामले में राजद्रोह के तहत गिरफ़्तारियां हुईं, लेकिन दोषी केवल 10 मामले में पाए गए.

इसी आधार पर दुष्यंत दवे आगे कहते हैं, " ये सरकार वो नहीं जो अपनी इमेज की परवाह करती हो. सरकार जो मनमानी करना चाहती है वो करती है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी भारत की सरकार पर कोई दबाव नहीं बना पा रहा है. किसी अंतरराष्ट्रीय समुदाय या संस्था ने भारत के ख़िलाफ़ कभी कुछ नहीं कहा है. ये सरकार इन सभी चीज़ों से ऊपर है."

राजद्रोह क़ानून

मोदी सरकार की छवि

हाल ही में प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों की लिस्ट में भारत 142वें स्थान से लुढ़ककर 150वें स्थान पर पहुँच गया. साल 2016 में भारत इस इंडेक्स में 133वें स्थान पर था.

इस साल अप्रैल के महीने में अमेरिकी कांग्रेस के एक निकाय ने धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर भारत को 'विशेष चिंता वाले देश' की श्रेणी में रखा था.

हालांकि इन सूचकांकों का राजद्रोह क़ानून से सीधा संबंध नहीं है, लेकिन ये सूचकांक नागरिक स्वतंत्रता से ज़रूर जुड़े हैं.

इन तमाम तथ्यों के बारे में उल्लेख करते हुए इतिहासकार मृदुला मुखर्जी कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी रिपोर्ट और सूचकांक की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि ख़राब ज़रूर होती है.

बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "राजद्रोह क़ानून की समीक्षा करके सरकार क्या हासिल कर पाएगी, इसके बारे में कोई सीधा जवाब देना तब तक मुश्किल है जब तक समीक्षा का परिणाम सामने नहीं आ जाता. सरकार का इरादा क्या है, इस बारे में भी कुछ सटीक नहीं कहा जा सकता. लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि इस बारे में उच्च स्तर पर 'दोबारा विचार' ज़रूर किया गया है.

इस 'री-थिंकिंग' के पीछे असल वजह क्या है ये समझने की ज़रूरत है. क्या ये इसलिए हुआ कि पूरे मामले को और कुछ दिनों के लिए टाला जा सके या इस वजह से कि भारत के पास इन मामलों से डील करने के लिए दूसरे क़ानून हैं जो काफ़ी हैं या फिर इस वजह से कि क़ानून रद्द कर देने से राजनीतिक फ़ायदा हो सकता है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो भारत की किरकिरी हो रही है उससे बचा जा सकता है. सरकार चाहे तो क़ानून रद्द कर, इस तथ्य को अपने पक्ष में और विरोधियों को शांत करने में इस्तेमाल कर सकती है. इस कारण समीक्षा के पीछे भारत सरकार की सोच के बारे में अभी से कुछ कह पाना थोड़ा मुश्किल है."

मृदुला मुखर्जी का मानना है कि भारत को राजद्रोह क़ानून की ज़रूरत नहीं है.

नरेंद्र मोदी

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क़ानून की समीक्षा से ज़्यादा ज़रूरी, पुलिस सुधार

हालांकि विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी के सीनियर रेज़िडेंट फ़ेलो आलोक प्रसन्ना इस क़ानून की समीक्षा पर मृदुला मुखर्जी और दुष्यंत दवे दोनों से इतर राय रखते हैं.

उनके मुताबिक़, क़ानून की समीक्षा के बाद भी कोई बड़ा बदलाव नहीं होने वाला और ना ही कोई फ़र्क़ पड़ने वाला है.

उनका तर्क है कि ''भारत की पुलिस स्वतंत्र नहीं है, क़ानून के मुताबिक़ वो काम नहीं करती. पुलिस वही करती है जो उनके राजनीतिक आका कहते हैं. इस वजह से क़ानून में कोई बदलाव करने का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक सिस्टम में बदलाव नहीं होता.

इस क़ानून की समीक्षा के साथ पुलिस को ज़्यादा जवाबदेह बनाना चाहिए. साथ ही न्यायपालिका को और ज़्यादा संजीदगी से उनके सामने आने वाले मामलों को सुनने की ज़रूरत है, ख़ास तौर पर निचली अदालतों को. इन दोनों बदलाव के साथ ही राजद्रोह क़ानून की समीक्षा का कोई मतलब है वरना नहीं."

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