मोहाली धमाका: सिख फ़ॉर जस्टिस ने ली ज़िम्मेदारी- प्रेस रिव्यू

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पंजाब के मोहाली में पुलिस के इंटेलिजेंस हेडक्वॉर्टर पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी प्रतिबंधित संगठन सिख फ़ोर जस्टिस (एसएफ़जे) ने ली है.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब पुलिस ने अब तक इस मामले में 18 से 20 संदिग्धों की गिरफ़्तारी की है. आज प्रेस रिव्यू में सबसे पहले यही ख़बर पढ़िए.
सोमवार को पुलिस कार्यालय पर रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड यानी आरपीजी अटैक किया गया था, जिससे इमारत को नुक़सान पहुँचा था. इसके बाद से मोहाली में हाई अलर्ट है.
अख़बार ने पुलिस के हवाले से लिखा है कि एसएफ़जे के गुरपतवंत सिंह पन्नू की आवाज़ में एक कथित वॉयस मेसेज का सत्यापन कर लिया गया है. इस वॉयस मेसेज के ज़रिए ही एसएफ़जे ने हमले की ज़िम्मेदारी ली है.
मोहाली एसएसपी विवेकशील सोनी ने कहा, "हम जांच पूरी करने के बेहद क़रीब हैं."
फ़िलहाल, जांचकर्ता अधिक सबूत जुटाने के लिए मुख्यालय के क्षेत्र में मौजूद तीन मोबाइल टॉवर से '6 से 7 हज़ार मोबाइल डेटा डंप' की जांच कर रहे हैं.
सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पुलिस को शक है कि आरपीजी हमले के लिए शायद मारुति सुज़ुकी की स्विफ्ट कार का इस्तेमाल किया गया था.

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जांच में तेज़ी लाने के लिए एनआईए, एनएसजी और सेना के अधिकारियों ने इंटिलेजेंस यूनिट की बिल्डिंग का मुआयना किया. मंगलवार को डीजीपी वीके भवरा ने राज्य के खु़फ़िया अधिकारियों, एसएसपी सोनी और अन्य अफसरों के साथ बैठक की.
डीजीपी भवरा ने मीडिया से कहा, "हमारे पास लीड्स हैं और इस केस को जल्द सुलझा लेंगे. जांच जारी है और सही समय पर इससे जुड़ी जानकारी साझा की जाएगी."
ये पूछे जाने पर कि क्या पुलिस इसकी जांच एक आतंकी हमले के तौर पर कर रही है, डीजीपी ने कहा, "ग्रेनेड इमारत से टकराया और इसमें संभवतः टीएनटी विस्फोटक इस्तेमाल किया गया था. चूंकि हमला शाम के वक़्त हुआ, इसलिए कमरे में कोई भी नहीं था और दीवारें ही क्षतिग्रस्त हुईं."
मोहाली एसपी (हेडक्वॉर्टर) रविंद्र पाल सिंह ने कहा, "ये स्पष्ट हो चुका है कि इस हमले में शामिल आतंकवादियों ने पंजाब पुलिस के इंटेलिजेंस सिस्टम को निशाना बनाने के लिए साज़िश रची."
मोहाली पुलिस ने आईपीसी की धारा 307, यूएपीए एक्ट के सेक्शन 16 के तहत एफ़आईआर दर्ज की है. ये एफ़आईआर इंटेलिजेंस हेडक्वॉर्टर के सिक्योरिटी इन्चार्ज एसआई बालकर सिंह के बयान के आधार पर दर्ज की गई है.
राजपक्षे परिवार पर भारत ने क्या कहा

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भारत ने मंगलवार को राजपक्षे परिवार की अगुवाई वाली श्रीलंका सरकार से दूरी बनाते हुए वहाँ की जनता को समर्थन देने की प्रतिबद्धता जताई.
प्रधानमंत्री पद से महिंदा राजपक्षे के इस्तीफ़े के एक दिन बाद, भारत ने श्रीलंका के घटनाक्रम पर बयान जारी किया है. इसमें कहा है, "क़रीबी पड़ोसी देश के रूप में भारत श्रीलंका में लोकतंत्र, स्थिरता एवं आर्थिक स्थिति के पटरी पर आने का पूरा समर्थन करता है."
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, तीन पैराग्राफ़ के बयान में न तो 'श्रीलंका सरकार' का ज़िक्र है और न ही राजपक्षे परिवार का.
साथ ही 'लोकतांत्रिक प्रक्रिया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके भारत ने ये भी संकेत दिया है कि वो शांतिपूर्वक प्रदर्शन और चुनाव के समर्थन में है. भारत ने ये इशारा किया है कि प्रदर्शनकारियों पर सरकारी कार्रवाई या सत्ता में बने रहने के लिए अलोकतांत्रिक तरीके अपनाने पर उसका समर्थन श्रीलंकाई सत्ता को मिलना मुश्किल है.
इस बीच श्रीलंका में भारतीय उच्चायोग ने महिंदा राजपक्षे और उनके परिवार के हेलिकॉप्टर से भारत आने की अफ़वाहों को ख़ारिज कर दिया है.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बाग़ची ने कहा,"ऐतिहासिक संबंधों के साथ श्रीलंका के क़रीबी पड़ोसी देश के रूप में भारत वहाँ लोकतंत्र, स्थिरता एवं आर्थिक स्थिति के पटरी पर आने का पूरा समर्थन करता है." उन्होंने कहा कि भारत हमेशा श्रीलंका के लोगों के सर्वश्रेष्ठ हित में काम करेगा.
श्रीलंका में चीजों की बढ़ती क़ीमतों और बिजली कटौती को लेकर पिछले महीने से लगातार विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. 1948 में ब्रिटिश हुक़ूमत से आजादी मिलने के बाद से श्रीलंका अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना कर रहा है. यह संकट मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा की कमी के कारण पैदा हुआ है, जिसके चलते देश मुख्य खाद्य पदार्थों और ईंधन के आयात के लिए भुगतान नहीं कर पा रहा है.
सोमवार को विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया. श्रीलंका में सरकार समर्थकों और विरोधियों के बीच हुई झड़प में मारे गए लोगों की संख्या बढ़कर मंगलवार को आठ हो गई और 200 से अधिक लोग घायल हो गए.
हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने का मामला: SC ने केंद्र को दी साढ़े तीन महीने की मोहलत

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सुप्रीम कोर्ट ने राज्य स्तर पर हिंदुओं समेत अन्य अल्पसंख्यकों की पहचान करने से जुड़े मामले पर केंद्र के अलग-अलग रुख को लेकर नाराज़गी जताई और उसे साढ़े तीन महीने में राज्यों के साथ इस मामले में विचार-विमर्श करने का निर्देश दिया.
इससे पहले, केंद्र ने सोमवार को न्यायालय से कहा था कि अल्पसंख्यकों को अधिसूचित करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है और इस संबंध में कोई भी फैसला राज्यों और अन्य संबंधितों के साथ चर्चा के बाद लिया जाएगा.
अंग्रेज़ी अख़बर टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर के अनुसार, जस्टिस संजय किशन कौल और एमएम सुंदरेश की पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार इसपर जल्द कार्रवाई करे और राज्यों पर इस मसले को न छोड़े. शीर्ष न्यायायलय ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि अगर सरकार इसे करने में असफल रहती है तो अदालत इसको लेकर फैसला करेगी.
केंद्र ने मार्च महीने में कहा था कि जिन हिंदू समुदायों और अन्य समुदायों की संख्या कम है, उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने या नहीं देने का फैसला राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को करना है.
पीठ ने कहा कि इस तरह के मामले में एक हलफ़नामा दाखिल किया गया है कि केंद्र और राज्य, दोनों के पास शक्तियां हैं.
पीठ ने कहा, "बाद में आप कहते हैं कि केंद्र के पास शक्ति है. हमारे जैसे देश में, जहां इतनी विविधता है, हमें अधिक सावधानी बरतनी चाहिए. ये हलफ़नामे दाखिल होने से पहले, सब कुछ सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध होता है, जिसके अपने अलग परिणाम निकलते है. इसलिए आप जो कहते हैं, आपको उसे लेकर सावधानी बरतनी चाहिए."
शीर्ष अदालत ने कहा कि ये ऐसे मामले हैं, जिनके समाधान की जरूरत है और हर चीज पर फैसला नहीं सुनाया जा सकता.
अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका के जवाब में दाखिल हलफ़नामे में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने कहा कि केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक समुदायों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम-1992 की धारा-2 सी के तहत छह समुदायों को अल्पसंख्यक के रूप में अधिसूचित किया है.
हलफ़नामे में कहा गया है, "रिट याचिका में शामिल प्रश्न के पूरे देश में दूरगामी प्रभाव हैं और इसलिए हितधारकों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श के बिना लिया गया कोई भी फैसला देश के लिए एक अनापेक्षित जटिलता पैदा कर सकता है."
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