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कोयले की कमी और बढ़ती गर्मी ने भारत के बिजली संकट को कैसे बढ़ाया
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक महीने से ज्यादा समय से राजधानी दिल्ली के पास संदीप मल की फैक्ट्री को बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है. कभी कभी ये बिजली कटौती दिन में 14 घंटे तक हो जाती है.
संदीप मल की फैक्ट्री हरियाणा के फरीदाबाद के एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब में है. जहां फैक्ट्री में लगी 50 मशीनें एरोनॉटिक्स, ऑटोमोबाइल, खनन और निर्माण उद्योगों के लिए उत्पाद बनाती हैं.
संदीप मल कहते हैं, "हर बार जब बिजली जाती है तो मशीनें बंद हो जाती हैं जिसके कारण प्रोडक्ट पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाता. ये उत्पाद खारिज हो जाता है और हमें फिर से शुरू करना पड़ता है."
ऐसा तब होता है जब वे फैक्ट्री को चालू रखने के लिए डीजल जनरेटरों को चलाते हैं. उनका कहना है कि फैक्ट्री को डीजल पर चलाना बिजली कंपनियों को पैसा देने से तीन गुना ज्यादा महंगा है.
"इससे हम मार्केट में मुकाबला नहीं कर पाते, क्योंकि मुनाफे में सीधा कटौती होती है. ये बहुत परेशान करने वाला है. दस सालों में ये सबसे खराब बिजली कटौती में देख रहा हूं."
अप्रैल में शुरू हुई बिजली कटौती का सामना आज पूरा भारत कर रहा है. इसके चलते कारखानों में काम धीमा पड़ गया है. स्कूलों को बंद करना पड़ रहा है और प्रदर्शन तेज हो रहे हैं.
मतदान एजेंसी लोकलसर्किल ने एक सर्वे किया है जिसमें 322 जिलों के 21 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया है.
सर्वे के अनुसार तीन घरों में से दो घरों ने कहा कि उन्हें बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है.
वहीं, तीन में से एक घर ने बताया कि हर दिन दो घंटे या उससे अधिक समय के लिए बिजली गुल रहती है.
बिजली कटौती के मुख्य कारण
हरियाणा समेत कम से कम 9 राज्य लंबे समय से बिजली संकट का सामना कर रहे हैं. बिजली की इतनी कम आपूर्ति का मुख्य कारण कोयले की कमी है.
कोयले के उत्पादन और उसके उपभोक्ता के रूप में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है. जीवाश्म ईंधन की वजह से देश रौशन रहता है.
जितनी बिजली बनती है उसका तीन चौथाई हिस्सा कोयले के इस्तेमाल से बनता है. भारत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कोयले का भंडार है.
भारत दुनिया की सबसे बड़ी कोयला खनन कंपनी का दावा करता है. लेकिन भारत में प्रति व्यक्ति खपत अभी भी कम है.
भारत अपनी खपत के एक चौथाई से थोड़ा कम आयात करता है. इसमें ज्यादातर कोकिंग कोयला है.
इस कोयले का इस्तेमाल स्टील बनाने के लिए ब्लास्ट फर्नेस में किया जाता है. ये घरेलू स्तर पर उपलब्ध नहीं होता है. इसकी लगातार कमी है.
पिछले साल अक्तूबर में भारत बिजली संकट के कगार पर पहुंच गया था. तब देश के 135 कोयले से चलने वाले संयंत्रों में से आधे से ज्यादा के स्टॉक ने चिंता बढ़ा दी थी.
इन संयंत्रों में कोयले का स्टॉक सामान्य रूप में जितना रहना चाहिए उसका 25 प्रतिशत से नीचे चला गया था.
अब कहा जाता है कि 173 बिजली संयंत्रों में से 108 में कोयले का स्टॉक बहुत कम है. यूक्रेन में युद्ध ने कोयले और प्राकृतिक गैस की कीमतें वैश्विक स्तर पर बढ़ा दी हैं.
ऐसे में कोयले का आयात करना काफी महंगा और मुश्किल हो गया है.
दिल्ली के एक थिंक टैंक, सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस के सीनियर फेलो राहुल टोंगिया कहते हैं, "इस बार का बिजली संकट पिछली बार की तुलना में और ज्यादा बढ़ा है, क्योंकि असल में मांग बहुत ज्यादा है. एक गंभीर स्थिति बन चुकी है और इसके लिए कई कारण हैं"
गर्मी ने कैसे बढ़ाई बिजली की खपत
उत्तर और मध्य भारत में अप्रैल महीने में उम्मीद से अधिक लू चल रही है. अप्रैल महीने में औसत तापमान 120 सालों में सबसे अधिक है जिसने बिजली की मांग को रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ा दिया है.
कोविड महामारी के बाद अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने के बाद बिजली की मांग अपने शीर्ष पर है.
इसके अलावा भारतीय रेलवे माल ढुलाई के साथ साझा पटरियों पर अधिक यात्रियों को यात्रा करवा रहा था जिसके चलते देश भर में कम वैगनों में कोयले की ढुलाई हुई.
राहुल टोंगिया कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि भारत में पूरी तरह से कोयला खत्म हो गया है. हम यकीनन भंडार समस्या का सामना कर रहे हैं, और ये नया नहीं है. हमारे पास जो सिस्टम है उसे कमी की देखभाल करने और जोड़ने के प्रबंधन के लिए बनाया गया है. इसे दक्षता और जोखिम के समय आवंटन को देखते हुए नहीं बनाया गया है."
विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली की मांग मौसमी है. भंडार बनाने में अधिक पैसा खर्च होता है और इसमें समय लगता है.
भारत की ऊर्जा सुरक्षा
भारत ने परंपरागत रूप से कोयले का आयात करके आपूर्ति को मजबूत किया है.
राहुल टोंगिया कहते हैं, "महीनों से अधिक आपूर्ति के साथ स्टॉक जमा होने की स्थिति को आसानी से ठीक नहीं किया जा सकता है."
सरकार का कहना है कि वह आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वह सब कर रही है जो वह कर सकती है.
कोयला मंत्रालय के अनुसार दुनिया की सबसे बड़ी कोयला खनन कंपनी कोल इंडिया ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करते हुए उत्पादन में 12 प्रतिशत की वृद्धि की है.
कोल इंडिया ने अप्रैल में बिजली पैदा करने वाली कंपनियों को 49.7 मिलियन मीट्रिक टन कोयला भी भेजा है, जो पिछले साल अप्रैल महीने की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक है.
इसके साथ ही रेलवे ने ईंधन की कमी से जूझ रहे संयंत्रों तक ज्यादा कोयला पहुंचाने के लिए एक हजार से अधिक ट्रेनों को रद्द किया है.
कोयला कमी से जूझते बिजली संयंत्र
कोयल केंद्रीय और राज्य सरकारों के लिए अच्छा खासा राजस्व पैदा करता है.
लेकिन सीएसईपी के एक ऊर्जा विशेषज्ञ दलजीत सिंह के अनुसार, भारत में कोयला और बिजली के बीच खराब संबंध इस मामले में मदद नहीं करता.
उनका कहना है कि भारत के बिजली संयंत्र कई चैनलों के माध्यम से कोयले की खरीद करते हैं जिसमें उसकी कीमत काफी अहम होती है.
एक ही जगह पर एक ही कोयले की कीमत किसी संयंत्र के लिए अलग अलग हो सकती है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि संयंत्र प्राइवेट है या वो सरकारी है.
जब से 'बिजली खरीद समझौते' के आधार पर इसे शुरू किया गया है तब से बिजली वितरण करने वाली ज्यादातर कंपनियां कर्ज में डूबी हुई हैं.
वे कहते हैं, "ये सरकारी बिजली संयंत्रों के पक्ष में झुका हुआ है."
रिन्यूएबल एनर्जी
भारतीय रेलवे यात्री किराए को कम रखने के लिए कोयले की ढुलाई पर ज्यादा शुल्क लेते हैं.
राहुल टोंगिया कहते हैं कि ये बस एक उदाहरण मात्र है. कई खराबियां जो कोयले के इको सिस्टम में विजेता या किसी को हराती हैं वो परिवर्तन को मुश्किल बना देती हैं"
भारत ने कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए 2030 तक रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता को 450 गीगावाट तक बढ़ाने का वादा किया है.
लेकिन रिन्यूएबल एनर्जी का बढ़ना कोयले के बढ़ने को रोकने के लिए काफी नहीं है.
राहुल टोंगिया कहते हैं, "भारत की प्राथमिकता अपने कोयले को कम करने की बजाय खत्म करने की होनी चाहिए."
भारतीय कोयले में राख की मात्रा करीब 35 प्रतिशत है जो काफी अधिक है. जिसके चलते ये इसे काफी प्रदूषित बनाता है.
ग्रीनपीस के अनुसार, कोयला उत्सर्जन हर साल 1 लाख भारतीयों की मौत के लिए जिम्मेदार है.
फरीदाबाद में फैक्ट्री चलाने वाले संदीप मल कहते हैं, उन्होंने 27 साल पहले अपनी फैक्ट्री शुरू की थी.
इतने सालों में उन्होंने एक भी दिन ऐसा नहीं देखा जब बिजली की कटौती ना हुई हो. लेकिन अब लगातार हो रहे ब्लैकआउट ने संदीप मल को पूरी तरह से थका दिया है.
वे कहते हैं, "ये बिजनेस करने का तरीका नहीं है. नौकरियां और टैक्स देने के बाद ये है जो हमें मिलता है?"
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