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ग्रीन बिजली बन सकती है पेट्रोल और कोयले का विकल्प? - दुनिया जहान
ये साल 2019 में सितंबर का महीना था. जगह थी अमेरिका के मैरीलैंड का टकोमा पार्क.
यहां एक गैस स्टेशन को इलेक्ट्रिक वाहन चार्ज करने वाले केंद्र में तब्दील कर दिया गया था.
अमेरिका में ये इस तरह का पहला चार्जिंग स्टेशन था. यहां एक गाड़ी को पूरी तरह चार्ज होने में आधे घंटे का वक़्त लग सकता है लेकिन इसकी कीमत 10 डॉलर यानी करीब 740 रुपये है.
जिस वक्त ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए पूरी दुनिया कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधन का विकल्प तलाश रही है तब ये स्टेशन एक नया रास्ता दिखाता है. लेकिन दुनिया के कई देशों में बिजली हासिल करना भी एक बड़ी चुनौती है.
इस हफ़्ते दुनिया जहान में पड़ताल इसी सवाल की कि क्या हमारी दुनिया को बिजली के सहारे पूरी रफ़्तार में दौड़ा सकती है? हमने की कुछ विशेषज्ञों से बात.
रास्ते और चुनौती
कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर निक जेंकिन्स रिन्यूएबल एनर्जी के आला विशेषज्ञों में गिने जाते हैं. वो बीते 45 साल से इलेक्ट्रिक इंजीनियर के तौर पर काम कर रहे हैं.
प्रोफ़ेसर निक जेंकिन्स की उम्र जब 20 साल के करीब थी तब उन्होंने पाकिस्तान से अलग होकर नए देश बने बांग्लादेश में कुछ दिन काम किया था. प्रोफ़ेसर निक उस अनुभव के आधार पर कहते हैं कि बिजली के मामले में दुनिया के अलग-अलग हिस्से एक दूसरे से बहुत अलग हैं.
निक जेंकिन्स बताते हैं, " बांग्लादेश जाने से पहले मैं उत्तर पूर्वी इंग्लैंड के एक कैमिकल प्लांट में बिजली लगाने के काम से जुड़ा था. ये बहुत बड़ा प्लांट था. तब वो प्लांट जिस क्षमता के साथ तैयार हो रहा था, वो पूरे बांग्लादेश की बिजली क्षमता से ज़्यादा थी."
आंकड़ों के जरिए बात करें तो ब्रिटेन फिलहाल हर साल 326 टेरा वाट घंटे बिजली का इस्तेमाल करता है. बांग्लादेश की आबादी ब्रिटेन से ढाई गुना ज़्यादा है लेकिन वहां साल में सिर्फ़ 75 टेरा वाट घंटे बिजली की खपत होती है. एक टेरा वाट घंटे में एक ट्रिलियन वाट होते हैं. प्रोफ़ेसर निक बताते हैं कि ब्रिटेन में फिलहाल ऊर्जा की कुल ख़पत में बिजली का हिस्सा सिर्फ 20 फ़ीसदी ही है.
जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने के लिए ग्रीन इलेक्ट्रिसिटी का उत्पादन बढ़ाने की बात की जाती है. लेकिन इसके रास्ते में कई बाधाएं हैं.
निक जेंकिन्स कहते हैं, " पहली चुनौती तो इसे तैयार करने की है. इसके लिए पवन चक्की के तमाम फार्म तैयार करने होंगे या फिर रिन्यूएबल के ऐसे तरीकों की संख्या बढ़ानी होगी जिन्हें हम इस्तेमाल करना चाहते हैं. इलेक्ट्रिसिटी सिस्टम को कंट्रोल करना मुश्किल है. बिजली को एक से दूसरी जगह भेजने और इसका वितरण का काम भी चुनौतीभरा है. हमने चालीस साल से ज़्यादा वक्त में जो कुछ बनाया है अब उसे नया रूप देने होगा और विस्तार करना होगा. ये सब बड़ी चुनौतियां हैं."
निक जेंकिन्स बताते हैं कि ज़रूरत के मुताबिक क्षमता बढ़ाने के लिए ज़्यादा मोटी केबलों की ज़रूरत होगी. इन्हें ज़मीन के अंदर डालना भी आसान नहीं. सबकुछ बिजली से चलेगा तो पीक टाइम के दौरान बिजली खपत बढ़ जाएगी. फिर बिजली को स्टोर करना भी इंजीनियरों के लिए बड़ी चुनौती रहा है. वो आगाह करते हैं कि मांग बढ़ने के साथ आपूर्ति भी बढ़नी चाहिए. सिस्टम में संतुलन नहीं हुआ तो सब कुछ फेल हो सकता है.
निक जेंकिन्स कहते हैं, "आम तौर पर इस समस्या का समाधान जीवाश्म ईंधन के जरूरत के मुताबिक कम या ज़्यादा इस्तेमाल के जरिए किया जाता है. कोयला और तेल ऊर्जा के बड़े भंडार हैं और ये इस्तेमाल में भी आसान हैं. आप जब चाहें इनके इस्तेमाल के जरिए ऊर्जा हासिल कर सकते हैं. रिन्यूएबल के साथ ऐसा नहीं है. इनके जरिए ऊर्जा उत्पादन मौसम पर निर्भर करता है. मसलन हवा और सूरज की रोशनी."
ऐसे में बैटरी काम आ सकती हैं. लेकिन प्रोफ़ेसर निक आगाह करते हैं कि यहां भी चुनौती खासी बड़ी है.
वो बताते हैं कि ब्रिटेन में सबसे बड़ा बैटरी प्लांट 100 मेगावाट का है. जबकि जीवाश्म ईंधन से चलने वाले एक औसत पावर स्टेशन की क्षमता दो हज़ार मेगावाट है.
अफ़्रीका की दिक्कत
अफ्रीका में सक्रिय क्लीन टेक हब की को-फाउंडर इफोमा मालो साल 2020 में पावर लीडरशिप अवॉर्ड जीत चुकी हैं. वो नाइजीरिया में रहती हैं और अफ़्रीकी देशों की बिजली से जुड़ी चुनौतियों से वाकिफ हैं. इफोमा बताती हैं कि उनके देश की सिर्फ़ 55 फ़ीसदी आबादी के पास बिजली है.
वहीं, अगर पूरी दुनिया की बात करें तो एक अनुमान के मुताबिक 77 करोड़ लोगों के पास बिजली नहीं है. इनमें से 58 करोड़ से ज़्यादा लोग अफ़्रीका में रहते हैं और जिनके पास बिजली है, उनसे से ज़्यादातर को जीवाश्म ईंधन के जरिए पैदा होने वाली बिजली मिलती है.
इफोमा मालो बताती हैं, "नाइजीरिया पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा जेनरेटर आयात करने वाला देश है. ये आंकड़ा बताता है कि हमारे यहां बिजली की स्थिति कितनी खराब है."
तथ्य ये भी है कि नाइजीरिया के लोग हर साल जेनरेटरों में तेल डालने पर 12 अरब डॉलर खर्च करते हैं.
इफोमा बताती हैं कि उनके देश में ग्रिड का रखरखाव भी ठीक से नहीं होता. देश की आबादी 20 करोड़ हो चुकी है लेकिन नए ग्रिड बनाने की रफ़्तार आबादी बढ़ने की रफ़्तार से मेल नहीं खाती है. यहां प्राकृतिक गैस के भंडार हैं और गैस से चलने वाले कई टर्बाइन हैं लेकिन गैस इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं होने से बिजली बनाने के लिए पर्याप्त गैस नहीं मिलती. नाइजीरिया की सरकार ने साल 2014 में बिजली का निजीकरण कर दिया. इसके जरिए सुधार आने की उम्मीद थी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका.
इफोमा मालो बताती हैं, "यहां भ्रष्टाचार भी एक बड़ा मुद्दा है. व्यवस्था सरकार से निजी हाथों में जाने के बाद भी अक्षमता बरकरार है."
इफोमा बताती हैं कि मूलभूत ढांचे, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा समेत हर क्षेत्र पर बिजली के होने या न होने का असर पड़ता है. नाइजीरिया में कोविड टीकाकरण जारी रखने में भी दिक्कत हुई. वहां ऐसे कोल्ड रूम नहीं थे जहां वैक्सीन को एक खास तापमान पर रखा जा सके. बिजली की कमी से एक और दिक्कत सामने है.
इफोमा मालो बताती हैं, " नाइजीरिया के बहुत से लोग बढ़ती असुरक्षा से परेशान हैं. इसकी वजह ये है कि लोगों के पास खाने के लिए कुछ नहीं है. उनके पास नौकरियां और कमाई के साधन नहीं हैं. ऐसे में कई युवा अपराध के रास्ते पर बढ़ जाते हैं. डकैती और अपहरण बढ़े हैं. बिजली नहीं है तो विकास नहीं है और उसी के ये नतीजे हैं."
इफोमा बताती हैं कि उनकी कोशिश बिजली की कम खपत करने वाले गांवों और कस्बों तक पावर सप्लाई पहुंचाने की है. इसके लिए सौर ऊर्जा वाले माइक्रो और मिनी ग्रिड इस्तेमाल हो रहे हैं. इससे किसी इलाके के करीब 200 घरों तक बिजली पहुंचाई जा सकती है. फोन और लैपटॉप चार्ज हो सकते हैं. घर में बिजली जल सकती है और छोटे व्यापार चल सकते हैं.
सरकारों को ऊर्जा नीति पर सलाह देने वाली इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि विकासशील देशों को इस दशक के अंत तक क्लीन एनर्जी पर सालाना खर्च सात गुना बढ़ाना होगा.
इफोमा कहती हैं कि अगर बिजली ज़्यादा लोगों तक पहुंचती है तो ज्यादा बिजनेस शुरू हो सकेंगे और सरकार को टैक्स देने वालों की संख्या बढ़ेगी. जिससे देश का ज़्यादा विकास होगा.
परिवहन क्षेत्र की चुनौती
अमेरिका के कोलोराडो स्थित नेशनल रिन्यूएबल एनर्जी लैब के वरिष्ठ शोधकर्ता मात्तेओ मुरातोरी कहते हैं, " परिवहन के क्षेत्र में ऊर्जा की विविधता के लिहाज से सबसे कम काम हुआ है. इस क्षेत्र में हम काफी हद तक पेट्रोलियम पर निर्भर हैं. इस क्षेत्र में दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाली कुल ऊर्जा का 90 फ़ीसदी हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों से हासिल होता है. अमेरिका में ये आंकड़ा 95 प्रतिशत है."
वो बताते हैं कि अमेरिका में परिवहन ही कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत है.
इलेक्ट्रिक कारें और दूसरे वाहन इस दिशा में बदलाव का रास्ता दिखाते हैं. लेकिन अभी अमेरिका की कुल कारों में से सिर्फ़ दो प्रतिशत इलेक्ट्रिक हैं. दुनिया में फिलहाल जितने भी इलेक्ट्रिक वाहन हैं, उनमें से आधे अकेले चीन में हैं. इलेक्ट्रिक कारें कम होने की वजह है कि इन्हें खरीदने के रास्ते में एक मनोवैज्ञानिक बाधा है.
मात्तेओ मुरातोरी कहते हैं, "कार खरीदने वालों को फिक्र होती है कि उनकी ट्रिप पूरी भी होगी या नहीं. कहीं वो रास्ते में ही फंसकर तो नहीं रह जाएंगे. हमें लगता है कि लोग जैसे जैसे इस तकनीक को आजमाएंगे, उनकी सोच बदलेगी और इस दिशा में सुधार आएगा."
अगर चार्जिंग से जुड़ी चिंता का समाधान हो जाता है तो स्थितियां बदल सकती हैं.
मात्तेओ कहते हैं, "कल्पना कीजिए एक पेड़ बिजली के तार पर गिरता है और आपके घर की बिजली चली जाती है. अगर आपके पास इलेक्ट्रिक कार है तो समाधान मिल सकता है. जब तक बिजली नहीं आती तब तक आपका वाई फाई, टीवी और फ्रिज चलता रह सकता है. इलेक्ट्रिक कार बैकअप पावर सिस्टम की तरह कुछ दिन बिजली सप्लाई कर सकती है."
जब कारें और बसें इलेक्ट्रिक हो चुकी हैं तब ये सवाल भी सामने आता है कि क्या बड़े ट्रक और कार्गो शिप भी बिजली से चल सकते हैं?
मात्तेओ मुरातोरी कहते हैं, " हम मानकर चलते हैं कि भविष्य में परिवहन के लिए कई तरह की तकनीक और उपाय आजमाए जाएंगे. उदाहरण के लिए हाइड्रोजन और बायो फ्यूल विकल्प बन सकते हैं."
बायो फ्यूल और ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करने में भी बिजली की ज़रूरत होती है. सवाल विमानों को लेकर भी है.
मात्तेओ मुरातोरी कहते हैं, " जब आप एक बड़े 747 विमान के दुनिया के एक से दूसरे कोने तक जाने की बात करते हैं तब तरल फ्यूल ही प्रभावी दिखता है. कार्बन को हटाने के लिए सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल एक विकल्प हो सकता है."
मात्तेओ कहते हैं कि हाइड्रोजन और बायो फ्यूल के जरिए ग्रीन बिजली बनाकर स्थितियां बदली जा सकती हैं.
पूरे परिवहन क्षेत्र में पट्रोलियम की जगह साफ ईंधन का विकल्प तलाशा जा सकता है.
भरोसेमंद विकल्प
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी की रिसर्च एसोसिएट क्रिस्टन स्मिथ एनर्जी सिस्टम को कार्बन मुक्त करने के लिए शोध करती हैं.
पूरी दुनिया कार्बन उत्सर्जन घटाने की कोशिश के तहत ही बिजली पर ज़्यादा ध्यान दे रही है. अभी ग्रीन बिजली बनाने के लिए विंड टर्बाइन, सोलर पैनल, जियोथर्मल और न्यूक्लियर पावर की तकनीक मौजूद हैं. इनके जरिए कोयले और तेल के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से हटाने और उत्सर्जन घटाने में मदद मिली है. लेकिन यहां तकनीक के साथ भौगोलिक स्थितियों पर भी ध्यान देना होता है.
क्रिस्टन स्मिथ कहती हैं, " कई इलाकों में पानी के स्रोत होते हैं जबकि कई जगह नहीं होते हैं. हवा और सूरज की रोशनी से चलने वाले संयंत्रों की कामयाबी भी इलाके पर निर्भर करती है. वहां मौसम और प्राकृतिक संसाधन कैसे हैं. इसी से तय होता है कि आप कार्बन उत्सर्जन को किस हद तक रोक सकते हैं."
इसके मायने ये हैं कि एशिया, अमेरिका और यूरोप में समाधान अलग-अलग हो सकते हैं. एक देश के अलग-अलग हिस्सों में भी भौगोलिक स्थिति अलग हो सकती हैं. एक ही तकनीक हर जगह कारगर नहीं हो सकती है.
क्रिस्टन स्मिथ कहती हैं कि अगर आप बड़े सोलर फार्म तैयार करते हैं तो इसके लिए काफी ज़मीन की ज़रूरत होगी. लोगों की पंसद को ध्यान में रखते हुए रिहाइशी इलाके में छोटे पैनल लगाने होंगे. उद्योग जगत की ज़रूरतें अलग हैं.
क्रिस्टन स्मिथ बताती हैं, " कई उद्योगों में बहुत ऊंचे तापमान की ज़रूरत होती है. जब आप स्टील बनाते हैं तो आपको 1100 डिग्री सेंटिग्रेट तापमान की जरूरत होती है. सीमेंट सेक्टर के लिए 1400 डिग्री सेंटिग्रेट तापमान चाहिए होता है. इतना तापमान हासिल करने के लिए बिजली का इंतजाम करना काफी महंगा होगा."
यानी कुछ तकनीकों को अमल में लाने के लिए काफी धन चाहिए. उन्हें ज़मीन पर उतारने और जेब के माकूल बनाने के लिए सरकारी नीतियों के समर्थन की भी ज़रूरत होगी. इस दिशा में कामयाबी के लिए तकनीक, वित्तीय इंतजाम, बेहतर नीतियां, सही भौगोलिक स्थितियां और थोड़ा किस्मत का भी साथ चाहिए.
क्रिस्टन स्मिथ कहती हैं, " कुछ तकनीक के इस्तेमाल के लिए अलग जतन की जरूरत होगी लेकिन हर रास्ते में रूकावटें भी मौजूद हैं. हालांकि, लक्ष्य हासिल करने के रास्ते में समस्या महात्वांकाक्षा की नहीं बल्कि नीतियां तैयार करने को लेकर है."
दुनिया को बिजली के सहारे दौड़ाने और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर पूरी तरह से रोक लगाने के लिए कई जरूरी तकनीक पहले से मौजूद हैं. लेकिन जरूरत सही जगह पर सही तरीके आजमाने और सिस्टम में संतुलन लाने की है. इसके लिए निवेश, सही राजनीतिक सोच और काफी संसाधनों की भी ज़रूरत है.
शायद इतने पर भी हर जगह इस्तेमाल के लिए माकूल और सस्ती बिजली न मिल पाए. क्लीन हाइड्रोजन और बायो फ्यूल कुछ हद तक जरूरत की भरपाई कर सकते हैं. इसके बीच हमें समझना होगा कि आज दुनिया भर के करोड़ों लोग प्रदूषण रहित स्रोत से सस्ती बिजली हासिल करने का इंतज़ार कर रहे हैं.
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