परमाणु ऊर्जा कितनी फ़ायदेमंद, कितनी ख़तरनाक? - दुनिया जहान

इस साल नवंबर महीने में भारत समेत 200 से ज़्यादा देश 'जलवायु परिवर्तन' पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में हिस्सा लेंगे.

ब्रिटेन में होने जा रहे इस सम्मेलन में इस बात पर चर्चा होगी कि पृथ्वी को गर्म करने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को तेज़ी से कैसे घटाया जाए.

बहुत से देश कई सारी कोशिशों के बावजूद जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार हानिकारक गैसों में कमी नहीं ला पा रहे. क्या उनके लिए न्यूक्लियर एनर्जी यानी परमाणु ऊर्जा मददगार साबित हो सकती है?

इस समय दुनिया भर में 10 प्रतिशत बिजली न्यूक्लियर रिएक्टर्स में पैदा हो रही है. मगर एक दशक पहले जापान के फुकुशिमा में हुए परमाणु हादसे के बाद से न्यूक्लियर एनर्जी को लेकर सरकारें अब ज़्यादा सावधान हो गई हैं.

जिस परमाणु ऊर्जा को कार्बन उत्सर्जन घटाने का हल माना जाता था, आज उसे लेकर कई सारे पर्यावरणविदों की राय भी बदल गई है.

अब सवाल है कि परमाणु ऊर्जा का भविष्य क्या है? क्या जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए हमें ज़्यादा न्यूक्लियर पावर स्टेशन बनाने चाहिए? कहीं ऐसा करना ख़तरनाक तो साबित नहीं होगा? इन सवालों पर हमने कुछ विशेषज्ञों से बात की.

परमाणु ऊर्जा से मोहभंग?

औद्योगिक क्रांति से विकास की राह पकड़ने वाले कई सारे देशों की तरह जर्मनी भी 1950 के दशक में ही परमाणु ऊर्जा तैयार करने की कोशिशों में जुट गया था. इरादा था- भविष्य के लिए ऐसे तरीके से ऊर्जा तैयार करना जिसमें कोयले का इस्तेमाल न हो और प्रदूषण भी कम हो.

लेकिन हमारे पहले एक्सपर्ट, डॉयचे वेले के पत्रकार येन्स टुहाओ बताते हैं कि लोगों के भारी विरोध के कारण जर्मनी में परमाणु ऊर्जा की संभावनाओं पर विराम लग गया. यहां परमाणु ऊर्जा का विरोध तभी से चल रहा है, जब 1969 में पहला कमर्शियल न्यूक्लियर रिऐक्टर शुरू हुआ था.

येन्स कहते हैं, "परमाणु ऊर्जा सही है या नहीं, इस पर जर्मनी में ऐतिहासिक बहस हुई. मगर 70 के दशक में लगभग पूरे जर्मनी में सामाजिक आंदोलनों की शक्ल में भारी प्रदर्शन हुए. ख़ासकर लोअर सेक्सॉनी राज्य में, जहां परमाणु कचरे को स्टोर किया जाना था."

जर्मनी में एक क़स्बा है- गोर्लेबन. एकीकरण से पहले पश्चिमी जर्मनी में मौजूद यह क़स्बा कम्यूनिस्ट पूर्वी जर्मनी के साथ लगता था. सरकार ने यहां बंद पड़ी नमक की एक खदान में परमाणु कचरे को स्टोर करने की योजना बनाई. लोगों ने विरोध किया मगर सरकार नहीं रुकी.

फिर, एक दशक से भी ज़्यादा समय बाद 1986 में जब चेर्नोबिल में परमाणु हादसा हुआ, तब फिर जर्मनी में परमाणु विरोधी आंदोलन शुरू हो गया. तत्कालीन सोवियत संघ में शामिल यूक्रेन के चेर्नोबिल प्लांट में बिजली गुल होने से कोर पिघल गया था और 30 लोगों की मौत हो गई थी. पूरे यूरोप के ऊपर रेडियोएक्टिव बादल छा गए. इस घटना के तीन साल बाद जर्मनी का एकीकरण हुआ और रातो-रात इस देश के पास वो छह परमाणु रिएक्टर भी आ गए जो सोवियत संघ की मदद से बनाए गए थे.

येन्स टुआहो बताते हैं कि पूर्वी जर्मनी के परमाणु प्लांट्स की हालत बहुत ख़राब थी और उनका कचरा बहुत ज़्यादा था. ये भी वजह थी कि जर्मनी ने फैसला किया कि उसे भविष्य में न्यूक्लियर पावर नहीं चाहिए.

एक ओर लोग डरे हुए थे, दूसरी ओर नेता चिंतित थे कि देश चलाने के लिए बिजली कहां से लाएं? मौजूदा जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल की पार्टी भी शुरू में न्यूक्लियर एनर्जी की समर्थक थी. मगर उनके दूसरे कार्यकाल के पहले ही साल जापान के फुकुशिमा का न्यूक्लियर प्लांट सुनामी के कारण क्षतिग्रस्त हो गया.

पत्रकार येन्स टुआहो कहते है, "फ़ुकुशिमा के हालात देखने के बाद मर्केल ने तय किया कि अब इस दिशा में बढ़ना ठीक नहीं है. अधिकतर लोग तो पहले से ही न्यूक्लियर पावर के ख़िलाफ़ थे. मर्केल ने भी तय कर लिया उनकी पार्टी अकेली परमाणु ऊर्जा का समर्थन नहीं कर सकती."

जर्मनी अपने सभी 17 न्यूक्लियर पावर प्लांट बंद करने वाला है. लेकिन उसे, इसकी बड़ी क़ीमत चुकानी होगी. उसे प्रदूषण पैदा करने वाले कोयले जैसे ईंधन पर निर्भर होना पड़ेगा. इससे वो हर साल 3 करोड़ 36 लाख टन कार्बन अतिरिक्त पैदा करेगा. यानी अभी से पांच फीसदी ज्यादा.

यही नहीं, कोयले के इस्तेमाल से होने वाले प्रदूषण के कारण हर साल औसतन 1100 लोग मारे जाएंगे. यानी न्यूक्यिलर एनर्जी से दूर जाने पर जर्मनी को स्वास्थ्य के मामले में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकताहै.

सोच में बदलाव

हमारी दूसरी एक्सपर्ट हैं- कर्स्टी गोगन. वो कार्बन उत्सर्जन घटाने के तरीक़े तलाशने वाली संस्था 'टेरा प्राक्सिस' की सह-संस्थापक हैं.

वह कहती हैं, "अगर 10 साल पहले आप मुझे न्यूक्लियर एनर्जी का समर्थन करने को कहते तो मैं आपकी बात नहीं मानती. मगर अब ऐसा नहीं है. पर्यावरणविद के तौर पर मैं न्यूक्लियर एनर्जी या हथियारों के ख़िलाफ़ थी. लेकिन फिर मैंने जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा के क्षेत्र में काम किया. इस दौरान सोचा कि क्या पृथ्वी को बचाने के लिए हम कम समय के अंदर कार्बन उत्सर्जन घटा सकेंगे? क्या सिर्फ पवन और सौर ऊर्जा से ऐसा कर पाना संभव है? मैंने पाया कि ऐसा करना बहुत ही मुश्किल होगा."

लोगों की सबसे बड़ी चिंता है कि न्यूक्लियर पावर स्टेशन से बेहद ख़तरनाक रेडिएशन न लीक हो जाए. फ़ुकुशिमा हादसे को ही लें तो उस दौरान भूकंप और सुनामी के कारण 18 हजार से ज़्यादा लोगों की जान गई थी और डेढ़ लाख को घर छोड़कर जाना पड़ा था. मगर रिऐक्टर टूटने के कारण एक ही शख़्स की मौत हुई.

क्रिस्टी का मानना है कि लोगों के मन में डर इसलिए ज़्यादा बैठा क्योंकि उन्होंने भूकंप, सुनामी और न्यूक्लियर प्लांट हादसे को मिलाकर देखा.

वह कहती हैं, "जिस भूकंप के कारण फुकुशिमा प्लांट तबाह हुआ, उसी भूकंप के कारण पृथ्वी की धुरी पर इतना असर हुआ कि दिन पहले से लंबा हो गया. तो ये एक अचानक आई आपदा थी. इसी आपदा के कारण परमाणु संयंत्र को नुक़सान पहुंचा था और इसी कारण लोगों को एहतियातन वहां से ले जाना पड़ा ताकि वे सुरक्षित रहें."

इस हादसे के 10 साल बाद, इसी साल मार्च में संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट मे कहा कि फ़ुकुशिमा के बाशिंदों को रेडिएशन से किसी तरह का सीधा नुक़सान नहीं पहुंचा है. क्रिस्टी की राय है कि न्यूक्लियर पावर को लेकर फैले डर को दूर करने की ज़रूरत है.

क्रिस्टी गोगन कहती हैं, "सच्चाई ये है कि अगर मुझे पूरा जीवन फ़ुकुशिमा के प्रतिबंधित इलाक़े में गुज़ारना पड़े तो वहां पर लंदन की तुलना में मैं शायद ज्‍यादा समय तक जीऊं. क्योंकि मुझे लंदन में वायु प्रदूषण से ज़्यादा ख़तरा है."

लेकिन फ़ुकुशिमा की घटना ने लोगों के ज़हन पर असर तो डाला है. ऐसे में परमाणु ऊर्जा का भविष्य क्या है? इस सवाल के जवाब में क्रिस्टी कहती हैं, "बात परमाणु या अक्षय ऊर्जा के बीच मुक़ाबले की नही है. हमें सौर और पवन ऊर्जा की क्षमता को लगतार बढ़ाना चाहिए और ऊर्जा की बर्बादी भी रोकनी चाहिए. मगर ऐसा करने के बाद भी ट्रांसपोर्ट, शिपिंग और एविएशन के लिए हमें कोयले और तेल पर निर्भर रहना पड़ेगा. ऐसे में न्यूक्लियर एनर्जी, विंड और सोलर एनर्जी के साथ मिलकर अहम भूमिका निभा सकती है."

पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर करके लगभग 200 देशों ने इस सदी से मध्य तक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगभग ख़त्म करने का वादा किया है. लेकिन चिंता जताई जा रही है कि अकेले सौर और पवन ऊर्जा से ऐसा कर पाना संभव नहीं हैं. इस तरह से सोचें तो लगता है कि जल्द से जल्द जलवायु परिवर्तन रोकना है तो परमाणु ऊर्जा बेहतर विकल्प है. लेकिन क्या ये तर्क पूरी तरह सही है?

'महंगा सौदा' है परमाणु ऊर्जा

जलवायु परिवर्तन से निपटने में परमाणु ऊर्जा बहुत मददगार साबित हो सकती है. लेकिन इसके साथ कुछ ऐसी चिंताएं भी पैदा होती हैं, जो पवन या सौर ऊर्जा के साथ नहीं होतीं. जैसे कि परमाणु कचरा. साथ ही, न्यूक्यिलर एनर्जी से और भी कई सारे ख़तरे जुड़े हुए हैं.

हमारे अगले एक्सपर्ट हैं- वॉशिंगटन डीसी के एडविन लाइमन जो 'यूनियन ऑफ़ कन्सर्न्ड साइंटिस्ट्स' संगठन में न्यूक्लियर पावर सेफ़्टी डायरेक्टर हैं. वो कहते हैं कि परमाणु संयंत्र को डिज़ाइन और तैयार करने में भारी-भरकम खर्च होता है और फिर उससे तैयार ऊर्जा भी काफ़ी महंगी होती है.

लाइमन कहते हैं, "अमेरिका और कई सारे देशों में न्यूक्लियर पावर काफ़ी महंगी है. फ़ॉसिल फ़्यूल से ही नहीं, सौर और पवन ऊर्जा से भी. अमेरिका में कई सारे न्यूक्लिर पावर प्लांट घाटे में है और वो अपने लाइसेंस एक्सपायर होने से पहले ही बंद हो रहे हैं."

दुरुपयोग की आशंका

इसके अलावा बड़ी चुनौती परमाणु संयंत्रों को हमलों से बचाने की भी है. एडविन लाइम के मुताबिक़, न्यूक्लियर पावर प्लांट चलाना है तो सुरक्षा पर भी भारी भरकम खर्च करना पड़ता है. अमेरिका की न्यूक्लियर पावर इंडस्ट्री सुरक्षा पर होने वाले भारी भरकम खर्च को घटाना चाहती है. लेकिन ऐसा करना ख़तरनाक हो सकता है.

यही नहीं, चिंता की बात ये भी है कि जिस तकनीक से परमाणु ऊर्जा तैयार की जाती है, उससे परमाणु हथियार बनाने का भी रास्ता खुलता है.

लाइमन कहते हैं, "उत्तर कोरिया और ईरान समेत कई मामलों में हमने देखा है कि परमाणु ऊर्जा केंद्रों में परमाणु हथियार बनाने की कोशिश हो सकती है. और अगर कोई देश ऐसा करना चाहे तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहकर भी उसे नहीं रोक सकता. न्यूक्लियर पावर के साथ जुड़े इस ख़तरे को कम तो किया जाता है मगर पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता."

190 से ज़्यादा देशों ने अंतरराष्ट्रयीय परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हैं मगर सभी इसका पालन नहीं कर रहे.

कचरे को लेकर चिंता

परमाणु ऊर्जा से राजनीति अछूती नहीं हैं. जर्मनी के गोर्लेबन में परमाणु कचरे को लेकर दो दशक से भी पहले प्रदर्शन हुए थे. मगर आज तक परमाणु कचरे के निपटारे का स्थायी हल नहीं मिल सका है.

न्यूक्लियर पावर सेफ़्टी के विशेषज्ञ एडविन लाइमन कहते हैं, "परमाणु कचरे की समस्या को तकनीकी के बजाय राजनीतिक समस्या ज़्यादा माना जाता है. गहरी खुदाई करके इस कचरे को इस तरह से सुरक्षित रखना होता है ताकि ये कम से कम 1000 साल तक भूजल के संपर्क में न आए. तकनीकी रूप से ऐसा करना मुश्किल नहीं है मगर कहीं के भी लोग नहीं चाहेंगे कि उनके नज़दीक ऐसा कोई कचरा स्टोर किया जाए. अभी तक इस समस्या का हल नहीं तलाशा गया है."

न्यूक्लियर वेस्ट को रीसाइकल तो किया जा सकता है मगर एक पेचीदा प्रक्रिया के बाद. रीकाइकल किए जाने के बाद बचा कचरा कम ख़तरनाक होता है. फ्रांस में 59 परमाणु संयंत्र हैं जो कई दशकों से ऐसा कर रहे हैं.

अभी परमाणु ईंधन की क्षमता का पांच फ़ीसदी ही इस्तेमाल होता है और उसकी 95 फ़ीसदी क्षमता बची रहती है. ऐसे में, कचरे को कहीं पर जमा करने की बजाय कई सारे देश इसे रीसाइकल कर रहे है.

नई तकनीक बढ़ाएगी भरोसा?

लोगों को जो बात शायद सबसे ज़्यादा परेशान करती है, वो ये कि रिऐक्टर ख़ुद में कितने सुरक्षित हैं. ये साफ़ हो चुका है कि चेर्नोबिल में ख़राब डिज़ाइन और मानवीय चूक के कारण हादसा हुआ. ऐसे ही फ़ुकुशिमा में जो हुआ, वो प्राकृतिक आपदा थी. लेकिन क्या लगातार बेहतर होती तकनीक... परमाणु ऊर्जा केंद्रो की लागत घटाने और और उन्हें सुरक्षित बनाने में मददगार होगी?

हमारी आख़िरी एक्सपर्ट हैं- रीटा बैर्नवाल. वो अमेरिका के इलेक्ट्रिक पावर रिसर्च इंस्टिट्यूट में चीफ़ न्यूक्लियर ऑफ़िसर हैं.

वह कहती हैं, "ऐसा माना जाता है कि कार्बन को घटाने का 80 प्रतिशत लक्ष्य सौर और पवन जैसी अक्षय ऊर्जा से पूरा किया जा सकता है. लेकिन बाकी के 20 प्रतिशत को हासिल करने के लिए परमाणु ऊर्जा पर भी विचार करना चाहिए. नए रिऐक्टर्स बनाकर इनमें आर्टिफ़िशल इंटेलिजेंस इस्तेमाल करके लागत घटाई जा सकती है."

रीटा बताती हैं कि नई तकनीक से तैयार रिऐक्टर छोटे होते हैं और इन्हें कहीं पर भी आसानी से लगाया जा सकता है. ज़रूरत के हिसाब से इनकी संख्या भी बढ़ाई जा सकती है.

रीटा उदाहरण देकर समझाती हैं, "मान लीजिए कहीं पर ज़रूरत के हिसाब से 50 मेगावॉट का एक मॉड्यूल लगाया जाता है. भविष्य में अगर वहां आबादी बढ़ने के कारण बिजली की ज़रूरत बढ़ती है तो एक-दो और मॉड्यूल वहां लाए जा सकते हैं. लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब लोग भी इसके लिए तैयार हों. जैसे कि अमेरिका में नए न्यूक्लियर प्लांट लगाने की प्रक्रिया में हम लोगों को भी शामिल करते हैं. तो दुनिया को इस बारे में सोचना चाहिए."

रेडिएशन का कितना ख़तरा?

परमाणु ऊर्जा से जुड़ी चिंताओं को लेकर एक अहम सवाल ये भी है कि परमाणु रिऐक्टर ख़ुद कितने सुरक्षित हैं? ख़ासकर उनके लिए, जो वहां पर काम करते हैं.?

इसके जवाब में रीटा बैर्नवाल कहती हैं, "अमेरिका ही नहीं, दुनिया भर में इस इंडस्ट्री में हर काम पूरे नियमों के साथ किया जाता है. शुरू से लेकर आख़िर तक, ईंधन लाने से लेकर कचरे के निपटान तक बहुत ज़्यादा सावधानी बरती जाती है. साथ ही, अब ऐसे डिज़ाइन तैयार हैं जिनसे परमाणु संयंत्र पहले से ज़्यादा सुरक्षित हो गए हैं."

लेकिन एक समस्या ये भी है कि पृथ्वी को गरम होने से बचाने के लिए कोयले और पेट्रेलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल जल्द रोकना होगा. लेकिन परमाणु प्लांट बनाने में लंबा वक़्त लगता है.

रीटा बार्नवेल कहती हैं, "ये दिक्कत तो है लेकिन अच्छी बात ये है कि दुनिया भर में कई सारे न्यूक्लियर पावर प्लांट हैं जो आगे भी काम करते रहेंगे. उन्हें चालू रखते हुए अगर आधुनिक संयंत्र बनाए जाएंगे तो मुझे लगता है कि अगले पांच से दस साल में काफ़ी परमाणु ऊर्जा पैदा की जा सकती है."

1960 और 70 के दशक में परमाणु ऊर्जा को लेकर काफ़ी उत्साह देखा गया था, मगर चेर्नोबिल और फुकुशिमा की घटनाओं की वजह से इसमें कमी आई है. फिर भी दुनिया में कई जगह नए परमाणु प्लांट बन रहे हैं. दुनिया प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों से दूरी बनाते हुए... अब अक्षय ऊर्जा के साथ-साथ न्यूक्लियर एनर्जी को भी अपना रही है.

तो क्या ज़्यादा परमाणु ऊर्जा केंद्र बनाने से हमें जलवायु परिवर्तन को रोकने में मदद मिलेगी?

अगर पर्यावरण को साफ़ करना है और कार्बन उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य समय पर पूरे करने हैं.. तो मजबूरी में ही सही, इस सवाल का जवाब है- हां.

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