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ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बनी हुई है चिंता, बाइडन भी ट्रंप के रास्ते पर
- Author, प्रवीण शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बीच पिछले कुछ वक़्त में ऐसा लग रहा था कि अमेरिका में नई सरकार ईरान को प्रतिबंधों से राहत दे सकती है और उसके साथ 2015 में हुए परमाणु समझौते को फिर से अपना सकती है.
लेकिन, ट्रंप के जाने और जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद भी इस मसले का जल्द ही कोई हल निकलता नहीं दिख रहा है.
हाल में दिए एक इंटरव्यू में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि जब तक ईरान 2015 के परमाणु समझौते की शर्तों का पालन नहीं करता, तब तक उसके ख़िलाफ़ लगाए गए प्रतिबंध हटाए नहीं जाएँगे.
दूसरी ओर, ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई ने कहा है कि पहले अमेरिका को ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाना होगा उसके बाद ही ईरान इन शर्तों का पालन करेगा.
अमेरिका और उसके कई सहयोगी देशों को लगता है कि ईरान ने अगर परमाणु हथियार बना लिए तो वह पूरे इलाके में अस्थिरता पैदा कर सकता है.
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर चिंता
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हमेशा से एक चिंता रही है. ओबामा प्रशासन के साथ 2015 में परमाणु समझौता होने के बाद ऐसा लग रहा था कि यह संकट अब ख़त्म हो जाएगा.
लेकिन 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को रद्द कर दिया और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए.
इसके बाद ईरान ने एक बार फिर से यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम में तेज़ी ला दी.
ट्रंप के शासनकाल के दौरान ईरान और अमेरिका के संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे हैं. ईरान के शीर्ष सैनिक कमांडर क़ासिम सुलेमानी की इराक़ में हत्या और उसके बदले में ईरान का इराक़ में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलों से हमला, इन्हीं लगातार बढ़ते तनावपूर्ण संबंधों की कड़ी का हिस्सा है.
क्या हो पाएगी डील?
लेकिन, अमेरिका में ट्रंप की विदाई और जो बाइडन के आने से ईरान को उम्मीद जगी कि उस पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएँगे.
दूसरी ओर, जो बाइडन के लिए भी ईरान संकट का समाधान एक उच्च प्राथमिकता में दिखाई देता है. लेकिन, ईरान की चुनौती से निबटना इस लिहाज़ से भी आसान नहीं होगा, क्योंकि सऊदी अरब और इसराइल हमेशा से ईरान के साथ किसी भी नरमी के पक्ष में नहीं रहे हैं.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं कि ईरान और अमेरिका दोनों ही पिछले कुछ समय से इस डील में वापस लौटने के लिए दिलचस्पी दिखा रहे हैं. लेकिन, दोनों ही अपनी-अपनी पोज़िशन पर टिके हुए हैं.
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, "अमेरिका इस डील में वापसी के संकेत पिछले कुछ वक़्त से दे रहा था. इसके अलावा, बाइडन प्रशासन बैलिस्टिक मिसाइल, यमन में हूतियों को ग़ैर-चरमपंथी संगठन मानने जैसे मसलों पर बातचीत के लिए भी संकेत दिए हैं. दूसरी ओर, ईरान भी यूरेनियम संवर्धन के मसले पर शर्तों को मानने के लिए इच्छुक दिखाई दिया है."
हालाँकि, वे कहते हैं कि इसराइल और सऊदी अरब इस डील में अमेरिका के फिर से शामिल होने का विरोध कर रहे हैं.
फ़ैसला आसान नहीं
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने और राष्ट्रपति चुने जाने तक ऐसा लग रहा था कि जो बाइडन ईरान के साथ परमाणु समझौते को फिर से बहाल कर देंगे और ईरान को प्रतिबंधों से राहत दे दी जाएगी. लेकिन, राष्ट्रपति बनने के बाद ऐसा हुआ नहीं है.
दूसरी ओर, ऐसा भी माना जा रहा है कि बाइडन ने भले ही चुनावों के पहले ईरान के साथ परमाणु समझौते में फिर से शामिल होने का वादा किया था, लेकिन मौजूदा परिस्थिति में उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा.
दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ओआरएफ़) के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम के निदेशक प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं कि हाल में आई यूएन की एक रिपोर्ट से स्पष्ट है कि ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को बढ़ा दिया है.
पंत कहते हैं, "चुनावों में वादा करना आसान होता है, लेकिन नए हालातों में बाइडन के लिए ईरान के साथ दोबारा से इस समझौते में जुड़ना आसान नहीं है. ऐसे में अब बाइडन इससे बचने के लिए शर्तें रख रहे हैं. मिसाल के तौर पर, पहले ईरान समझौते की शर्तों का पालन करे."
पंत कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु मसले पर जल्द ही फिर से डील हो पाएगी."
दूसरी ओर, ईरान ने यूरोपीय संघ को बैंकिंग और फ़ाइनेंशियल सेक्टरों पर लगे प्रतिबंधों को हटाने पर बातचीत करने के लिए 21 फ़रवरी तक का समय दिया है.
पंत कहते हैं कि जब ट्रंप ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए थे, उस समय यूरोपीय संघ ने कहा था कि वह अपने दम पर इस डील को बरकरार रखेगा, लेकिन बाद में अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के चलते यूरोपीय संघ के देश कुछ कर नहीं पाए.
ईरान का परमाणु कार्यक्रम
ईरान दशकों से अपने परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहा है. हालाँकि, ईरान में कई परमाणु ठिकाने मौजूद हैं, लेकिन उसका ध्यान दो ठिकानों- नतांज़ और फोर्डो पर रहा है.
शुरुआत में ईरान ने इन दोनों ठिकानों को दुनिया से छिपाए रखा और इससे ये चिंता पैदा हुई कि शायद ईरान ख़ुफ़िया तौर पर परमाणु बम बनाने की कोशिश कर रहा है.
अब इन दोनों ठिकाने पर अमेरिका समेत कई देशों और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की कड़ी नज़र है.
नतांज़ के बारे में पहली बार 2002 में पता चला था. हालिया, सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि इस परमाणु ठिकाने में कई बड़े बदलाव हुए हैं. 2020 तक यहाँ बेहतर सड़कें और कई बिल्डिंग्स बन गई हैं.
दूसरी तरफ, फोर्डो पहाड़ों में स्थित है और इसका पता पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने 2009 में लगाया था. यहाँ पर भी आपको नई बिल्डिंग्स और सड़कें नज़र आएँगी.
इन ठिकानों की ख़ासियत ये है कि यहाँ यूरेनियम संवर्धन होता है.
यूरेनियम संवर्धन क्या है?
यह एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें यूरेनियम गैस को मशीनों में डाला जाता है. इन्हें सेंट्रीफ्यूज़ कहते हैं.
ये सिल्वर के पतले सिलेंडर होते हैं. सेंट्रीफ्यूज़ यूरेनियम को बेहद तेज़ रफ़्तार से घुमाते हैं. इससे हल्के यूरेनियम-235 एटम, भारी यू-238 एटम से अलग हो जाते हैं.
कम संवर्धित यूरेनियम में आपको 3-5 फ़ीसदी यू-235 मिलते हैं. इसका इस्तेमाल किसी भी न्यूक्लियर पावर प्लांट में किया जा सकता है.
अगर आप इसका संवर्धन जारी रखते हैं, तो ज़्यादा संवर्धित होने पर (क़रीब 20 फ़ीसदी) इसका इस्तेमाल रिसर्च और मेडिकल एप्लिकेशंस में किया जा सकता है.
अगर आप इसे और संवर्धित करके 90 फ़ीसदी तक ले जाते हैं, तो इसका इस्तेमाल न्यूक्लियर बम बनाने में किया जा सकता है.
ईरान ज़ोर देता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण मक़सद के लिए है. लेकिन, दूसरे देशों का मानना है कि ईरान परमाणु हथियार बनाना चाहता है.
परमाणु समझौते के समय ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने कहा था, "आज इस मसले पर यह उम्मीदों का अंत हो सकता था, लेकिन हम उम्मीदों का नया अध्याय शुरू कर रहे हैं."
समझौते की शर्तें
2015 में एक अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ. इसके तहत ईरान के यूरेनियम के भंडार को सीमित कर दिया गया और इसमें तय किया गया कि ईरान कम स्तर का ही यूरेनियम संवर्धन कर सकता है, जो 5 फ़ीसदी से कम होगा.
इसमें सेंट्रीफ्यूज़ की संख्या को सीमित करके 5,000 कर दिया गया और यह तय किया गया कि ईरान अपने परमाणु ठिकाने का निरीक्षण करवाएगा, ताकि यह साबित हो सके कि वह समझौते के नियमों का पालन कर रहा है.
ये पाबंदियाँ 15 साल के लिए तय की गई थीं. इसके बदले में ईरान से वादा किया गया था कि उस पर लगाई गई पाबंदियाँ हटा ली जाएँगी.
समझौते से नाराज़गी
ईरान के साथ हुए समझौते से हर कोई ख़ुश नहीं था.
अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक मुसीबत कहा था. 2018 में ट्रंप ने अमेरिका को इस डील से अलग कर लिया. ट्रंप ने इसे ख़ामियों भरा बताया था. इसके बाद ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को रफ़्तार दे दी.
इसके अलावा इसराइल और सऊदी अरब भी ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से खुश नहीं थे.
कभी ख़ुफ़िया रहे ईरान के परमाणु ठिकाने लंबे वक़्त से जारी संकट के केंद्र में रहे हैं.
और यहाँ होने वाली गतिविधियों से तय होगा कि इस संकट का निबटारा कब और कैसे होगा.
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