सऊदी अरब, ईरान समेत मध्यपूर्व के संकट का समाधान बाइडन के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

    • Author, लाइस डूसेट
    • पदनाम, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संवाददाता

राष्ट्रपति का कार्यभार संभालने से पहले अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा था कि "ये हमारे लिए परीक्षा की घड़ी है."

बुधवार को हुए शपथग्रहण समारोह में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका पर ज़ोर दिया. लेकिन असल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्यमपूर्व से मसलों के हल तलाशना और वहां शांति बनाए रखना उनके लिए एक कठिन परीक्षा की तरह ही होगा.

जो बाइडन की टीम नई तो है लेकिन उनके पास पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का अनुभव है. इस पुराने अनुभव के साथ वो इस इलाके के पुराने मुद्दों को हल करने के लिए नए आदेशों का सहारा ले सकते हैं.

उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती उन नीतियों के लेकर होने वाली है जो बनाने में उन्होंने खुद मदद की थी. ये नीतियां अब पहले से बुरी शक्ल में हैं. हालाँकि कुछ जानकारों को लगता है कि इस कारण बाइडन के सामने नए मौक़े पैदा हो सकते हैं.

कार्नेगी एनडोमेन्ट फ़ॉर इंटरनैशल पीस में नॉन रेसिडेंट फेलो किम घटास कहती हैं, "मध्यपूर्व को लेकर ओबामा प्रशासन का जो रुख़ था वो कहाँ ग़लत साबित हुआ, इससे वो पहले ही काफी कुछ सीख चुके हैं. वो अपनी ग़लतियों से सीखे हैं, इस कारण वो चीज़ों को अलग दिशा में ले जा सकते हैं. एक कारण ये भी है कि अब मध्यपूर्व में स्थिति पहले से अधिक बदल चुकी हैं."

किम सऊदी अरब और ईरान के बीच के तनावग्रस्त संबंधों पर 'ब्लैक वेव' नाम की किताब लिख चुकी हैं.

बाइडन के नए प्रशासन के सामने फिलहाल सबसे अहम है ईरान को लेकर उनकी विदेश नीति. साल 2015 में हुए परमाणु समझौते से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बाहर जाने का फ़ैसला किया था और ईरान को दवाब बनाने के लिए उस पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे. कहा जा सकता है कि ये समझौता अब मौत की कग़ार पर है.

यमन में जारी युद्ध भी विनाशकारी साबित हुआ है. आंशिक रूप से अपने कट्टर-दुश्मन ईरान के साथ समझौते पर सऊदी अरब के गुस्से को कम करने के लिए शुरुआत में ओबामा इसके समर्थन में थे.

राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने 2017 में अपने पहले विदेशी दौरे के लिए सऊदी अरब को चुना जहाँ उन्होंने सऊदी के साथ 110 अरब डॉलर का हथियारों का सौदा किया. अमेरिकी इतिहास का ये सबसे बड़ा रक्षा सौदा था.

इसी के साथ उन्होंने मध्यपूर्व के लिए अपनी विदेश नीति पर काम करना शुरू कर दिया था जिसमें केंद्र में सऊदी अरब के साथ मधुर संबंध और ईरान को शत्रु मानते हुए उस पर "अधिकतम दवाब" डालना शामिल था. इससे मध्यपूर्व के खाड़ी देशों में उसके लिए एक नई धुरी बनने का रास्ता साफ़ हो गया जिसके केंद्र में इसराइल था.

मध्यपूर्व में हो रही हलचल पर नज़र रखने वाली पत्रिका न्यूलाइन्स के संपादक हसन हसन के अनुसार, "हो सकता है कि इस पूरे इलाक़े में ओबामा प्रशासन के दौरान काम कर चुके कुछ अनुभवी हाथों को काम में लाते हुए बनाई गई सक्रिय कूटनीति की ज़रूरत हो."

"खाड़ी के देश मानते थे कि वो अमेरिकी नेतृत्व के अभाव में अपने देश के राजनीतिक नक्शे को बदल सकने में सक्षम हो जाएंगे. लेकिन पाँच दशकों की इस तरह की कोशिशों के बाद अब वो ये समझ रहे हैं कि सीरिया, यमन, ईरान और क़तर जैसे छोटे देश को लेकर भी उनके पास कितना सीमित विकल्प हैं."

बाइडन की नई टीम जिन मुद्दों पर विचार कर रहे हैं उनमें से एक अपने पारंपरिक मित्रों के साथ रिश्ते फिर से बेहतर करना शामिल है.

बाइडन प्रशासन में विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने हाल में सीनेट कंफर्मेशन हियरिंग में बार-बार ईरान का ज़िक्र किया और कहा कि, "ये बेहद ज़रूरी है कि हम इसराइल और खाड़ी देशों समेत इलाक़े में अपने पुराने सहयोगियों के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश करें न कि उन रिश्तों में तनाव पैदा करने की."

ब्लिंकन लंबे वक्त से बाइडन और ओबामा के साथ काम कर चुके हैं. उनका मानना है कि ईरान के साथ एक नया समझौता कर इलाक़े में उसकी "अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों" और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाई जा सकती है. ये दोनों ही पश्चिमी देशों के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

लेकिन बाइडन की टीम ये नहीं चाहेगी कि वो 2015 में ईरान से साथ हुए परमाणु समझौते से अपने हाथ खींच ले. बहुपक्षीय कूटनीति के मामले में इस समझौते को अभूतपूर्व सफलता माना गया था.

विदेशी मामलों की यूरोपीय काउंसिल की मध्यपूर्व और पूर्वी अफ़्रीका कार्यक्रम की उप-निदेशक ऐलि गेरानमाये कहती हैं, "अगर आप देखेंगे कि बाइडन की टीम ने विदेश नीति, परमाणु निरस्त्रीकरण और ट्रेज़री के पदों पर काम करने के लिए किन्हें चुना है. इनमें से अधिकतर ने पहले परमाणु समझौते की बातचीत और समझौते के कार्यान्वयन में काम किया है."

"बाइडन की टीम और ईरानी नेताओं में एक बात जो एक जैसी है वो ये कि दोनों ही पक्षों को परमाणु समझौते को पूरी तरह लागू करना होगा और इसका पालन करना होगा. उन्हें इस बात पर भी जल्द चर्चा करनी होगी कि वो इस राह में आगे कैसे बढ़ें."

वो कहती हैं कि अमेरिका ईरान के लिए विशेष दूत नियुक्त करने के बारे में विचार कर सकता है.

जब से डोनाल्ड ट्रंप ने परमाणु समझौते से पीछे हटने का फ़ैसला किया है तब से ईरान ने भी इस समझौते के लेकर अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करने से इनकार किया है. हाल में उसने घोषणा की कि वो 20 फ़ीसद तक की शुद्धता वाले यूरेनियम का उत्पादन शुरू कर रहा है. ईरान को हथियार बनाने से रोकने के लिए ये समझौते में दी गई मान्य सीमा से कहीं अधिक है. इस कारण ईरान और अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच तनाव बढ़ गया है.

ईरान के नेता बार-बार ये कह रहे हैं कि अगर अमेरिका इस समझौते का सम्मान करते हुए अपनी सभी प्रतिबद्धताएं पूरी करता है तो वो भी इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देंगे और समझौते का सम्मान करेंगे. लेकिन बीते चार सालों में जो कुछ हुआ उसके बाद अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को आगे बढ़ाने को लेकर ईरान संशय में है और उसके लिए ऐसा करना अब पहले की तरह आसान नहीं रहा.

देश के भीतर भी कठिन मुद्दे

अमेरिका के नए प्रशासन के सामने देश के भीतर भी चुनौतियां कम नहीं हैं. अमेरिकी कांग्रेस में चुन कर आए नए नेताओं में से कई विदेशी मामलों के जानकार रहे हैं और वो इस बात की ओर इशारा कर चुके हैं कि विदेशी मामलों में कांग्रेस की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए.

मध्यपूर्व में इसका मतलब ये होगा- ईरान समेत दूसरे देशों के साथ समझौते, सऊदी अरब के नेतृत्व में चल रहे यमन युद्ध में अमेरिका का सैन्य समर्थन वापस लेना, इसराइल और अरब देशों के बीच शांति समझौता कराना, मानवाधिकार क़ानूनों के उल्ल्घंन के मामले में सऊदी अरब के भूमिका के बारे में गंभीर विचार करना जिसमें जानेमाने पत्रकार जमाल खाशोज्ज़ी की तुर्की के सऊदी दूतावास में हत्या शामिल है.

बाइडन प्रशासन में नेशनल इंटेलिजेंस की निदेशक के लिए नामित एवरिल हेन्स से कंफर्मेशन हियरिंग में पूछा गया कि क्या वो डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की "अराजकता" को ख़त्म करेंगी और साल 2018 में सऊदी एजेंटों द्वारा की गई ख़ाशोज्जी की हत्या पर अमेरिकी कांग्रेस में एक अनक्लासिफाइड रिपोर्ट पेश करेंगी. इस पर उनका उत्तर था, "ज़रूर, हम क़ानून का पूरा पालन करेंगे."

ख़ुफ़िया सूत्रों के आधार पर की गई मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि सीआईए को "कुछ हद तक ये भरोसा" है कि सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने इस हत्या का आदेश दिया होगा. सऊदी युवराज इस आरोप का खंडन करते रहे हैं.

सऊदी लेखक और विश्लेषक अली शिहाबी कहते हैं, "अमेरिकियों को उन्हें संदेह का लाभ देना होगा, क्योंकि इसमें कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं. वो सीआईए हो या फिर विदेश मंत्रालय या पेंटागन, सच यही है कि इस क्षेत्र में कुछ भी करने में सक्षम होने के लिए ये बेहद महत्वपूर्ण है कि उन्हें सऊदी अरब के बारे में पूरी समझ हो."

दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों पर आपसी समझ बनने की संभावना है, जैसे यमन में विनाशकारी युद्ध को समाप्त करना. लेकिन अधिकांश मुद्दों की तरह इस पर काम करने के लिए आसान विकल्प नहीं के बराबर हैं.

इंटरनेशन क्राइसिस ग्रूप के यमन मामलों के वरिष्ठ विश्लेषक पीटर सैलिसबरी चेतावनी देते हैं, "सऊदी अरब को मिल रहा सैन्य समर्थन ख़त्म करना इतना आसान काम नहीं है. अगर अमेरिका को वहां शाति चाहिए तो उसे कूटनीतिक तौर पर और अधिक सक्रिय होना होगा."

कूटनीति के दौरान कई तरह की अजीबोगरीब बातें हो सकती हैं, ख़ासकर ऐसे प्रशासन के लिए जो मानवाधिकारों को अपने एजेंडे में रखता हो और इसका मतलब है कि सऊदी अरब से लेकर ईरान तक और मिस्र से लेकर अन्य देशों तक- हर तरफ अमेरिका के लिए राह मुश्किलों भरी है. कइयों को तो ये इंतज़ार रहेगा कि ज़मीनी स्तर पर बातचीत का कुछ नतीजा निकलता भी है या नहीं.

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यहाँ के मसलों से निपटने के लिए उन्हें नए रास्ते तलाशने होंगे जो पुराने अनुभवों पर ही आधारित हो सकते हैं.

अरब देशों के साथ इसराइल के कूटनीतिक रिश्ते मज़बूत करने वाले अब्राहम समझौते को लेकर ट्रंप की टीम को काफी प्रंशसा मिली थी. लेकिन एंटोनी ब्लिंकन पहले ही इशारा कर चुके हैं कि वो कुछ प्रतिबद्धताओं पर "कड़ी नज़र डाल सकते हैं." इसमें संयुक्त अरब अमीरात के साथ हथियारों का सौदा, पश्चिमी सहारा के विवादित इलाक़े में मोरक्को के कब्ज़े का दावा शामिल हो सकता है.

ईराक और सीरिया में स्थिति सामान्य न होना, इसराइल और फ़लस्तीन के बीच शांति बहाल करना, लेबनान में उभर रही नई चुनौतियां और सिर पर मंडराता अल-क़ायदा का ख़तरा- ये वो मुद्दे हैं जो बाइडन प्रशासन के सामने नई चुनौतियां पेश कर रही हैं और अमेरिका में भी ये बड़े मुद्दे हैं.

किम घटास कहती हैं, "मुझे लगता है कि ये अपने आप में बड़ा अवसर है. ये मुश्किल होने वाला है. लेकिन दुनिया में अमेरिका की भूमिका और मध्यपूर्व के पुनर्विचार के लिए अवसर का एक मौक़ा है."

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