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चीन में बिजली की क़िल्लत, सारी दुनिया पर क्यों पड़ सकता है असर
चीन बिजली की भारी कटौती से जूझ रहा है और वहां लाखों घर और कारखाने इस मुसीबत का सामना कर रहे हैं. पावर ब्लैकआउट यहां असामान्य नहीं है लेकिन इस साल कई अन्य वजहों ने बिजली आपूर्तिकर्ताओं के लिए मुसीबत को और भी बड़ा कर दिया है.
बिजली की भारी कटौती का सामना कर रहे चीन के पूर्वोत्तर हिस्से के 'इंडस्ट्रियल हब' में यह समस्या और भी गंभीर होती जा रही है क्योंकि सर्दी आ रही है और यह कुछ ऐसा है जिसका प्रभाव दुनिया के बाकी हिस्सों पर भी पड़ सकता है.
चीन में बिजली की कमी क्यों हो गई?
बीते वर्षों के दौरान चीन ने बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाने में संघर्ष किया है जिसकी वजह से चीन के कई प्रांतों में बिजली की कटौती का संकट पैदा हुआ.
गर्मियों और सर्दियों के दौरान बिजली की जब सबसे अधिक मांग होती है तो कटौती की यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है.
लेकिन साल 2021 में और भी कई ऐसे मुद्दे आए जिसने इस समस्या को और भी विकराल बना दिया.
कोरोना महामारी के बाद जैसे जैसे पूरी दुनिया एक बार फिर खुलने लगी चीन के सामानों की मांग भी बढ़ने लगी और उन्हें बनाने वाले चीन के कारखानों को इसके लिए अधिक बिजली की ज़रूरत पड़ी.
2060 तक देश को कार्बन मुक्त बनाने के लिए चीन ने जो नियम बनाए है उसकी वजह से कोयले का उत्पादन पहले से धीमा पड़ा है, इसके बावजूद अपनी आधे से अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए चीन आज भी कोयले पर ही निर्भर है. और जैसे जैसे बिजली की मांग बढ़ी है, कोयला भी महंगा हो रहा है.
लेकिन चीन की सरकार वहां बिजली की कीमतों को सख्ती के साथ नियंत्रित करती है, ऐसे में कोयले से चलने वाले पावर प्लांट घाटे में काम करने के लिए तैयार नहीं हैं और उनमें से कई ने तो अपने उत्पादन में कटौती कर डाली है.
ब्लैकआउट से किसपर असर पड़ रहा है?
इसकी वजह से चीन के कई प्रांतों और इलाक़ों में घरों और व्यवसायों पर असर पड़ा जहाँ बिजली की आपूर्ति सीमित हो गई है.
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स के अनुसार चार प्रांतों- दक्षिण चीन के ग्वांग्डोंग और पूर्वोत्तर चीन के हेइलोंगजियांग, जिलिन और लिआओनिंग में बिजली चली जा रही है.
देश के अन्य हिस्सों में भी पावरट होने के समाचार मिल रहे हैं.
उद्योगों वाले इलाक़ों में कई कंपनियों से कहा जा रहा है कि वो पीक टाइम में बिजली के इस्तेमाल में कटौती करें या फिर अपने काम के दिन कम कर दें.
इस्पात, एल्युमिनियम, सीमेंट और उर्वरक से जुड़े उद्योगों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा है जहाँ बिजली की काफ़ी ज़रूरत होती है.
चीन की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा है?
आधिकारिक आँकड़े दिखाते हैं कि सितंबर 2021 में चीन के कारखानों में फ़रवरी 2020 के बाद से काम सबसे कम हो गया है जब कोरोना संक्रमण के बाद हुए लॉकडाउन ने देश की अर्थव्यवस्था को ठप्प कर दिया था.
बिजली आपूर्ति को लेकर जताई जा रही चिंताओं के बाद अंतरराष्ट्रीय निवेश बैंकों ने अपने अनुमानों में चीन के आर्थिक विकास की दर को घटा दिया है.
गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक़ पावरकट की वजह से चीन की औद्योगिक गतिविधि 44% तक कम हो गई है. बैंक का अनुमान है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इस वर्ष 7.8% की दर से विकास करेगी, जबकि पहले उसने इसके 8.2% रहने का अनुमान लगाया था.
चीन के इस संकट का असर सारी दुनिया पर पड़ सकता है, ख़ास तौर पर वर्ष के अंत में होनेवाले ख़रीदारी के मौसम में सामानों की सप्लाई प्रभावित हो सकती है.
कोरोना के कारण बंद कारोबार के दोबारा खुलने के बाद से ही माँग में अचानक आए उछाल की वजह से दुनिया भर में विक्रेताओं को पहले ही मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है.
चीन संकट के हल के लिए क्या कर रहा है?
चीन की आर्थिक योजनाकार संस्था एनडीआरसी ने कई उपाय सुझाए हैं जिनमें आनेवाले ठंड के मौसम में पूर्वोत्तर चीन में बिजली की सप्लाई करने को मुख्य प्राथमिकता देना तय किया गया है.
इन उपायों के तहत उत्पादन बढ़ाने के लिए बिजली उत्पादक कंपनियों के साथ मिलकर काम करने की बात की गई है जिसके लिए कोयले की अबाधित सप्लाई करना और बिजली की राशनिंग जैसे क़दम शामिल हैं.
चीन में बिजली उत्पादक कंपनियों के संगठन ने भी कहा है कि कोयले से बिजली बनानेवाली कंपनियाँ अब किसी भी कीमत पर कोयले की आपूर्ति को बढ़ा रही हैं ताकि जाड़े में बिजली की सप्लाई जारी रहे.
लेकिन कोयले की आपूर्ति बढ़ाना इतना सहज नहीं है.
रूस जहाँ पहले से ही यूरोप के अपने ग्राहकों पर ध्यान दे रहा है, वहीं इंडोनेशिया में भारी बारिश से कोयले की सप्लाई पर असर पड़ा है और पास का देश मंगोलिया सड़क के रास्ते ढुलाई को लेकर पहले से ही जूझ रहा है.
दुनिया भर में हो रही बिजली की क़िल्लतों का क्या आपस में कोई संबंध है?
चीन में पावरकट, ब्रिटेन में पेट्रोल स्टेशनों के बाहर लंबी क़तारें, यूरोप में ईंधन के दाम में वृद्धि और थोक बाज़ारों में तेल, गैस और कोयले की क़ीमतों में आए उछाल से ये सोचा जा सकता है कि क्या दुनिया भर में ईंधन की कोई कमी हो रही है.
मगर ये इतना सीधा नहीं है - दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह की चीज़ें हो रही हैं.
उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में पेट्रोल पंपों पर तेल इसलिए ख़त्म हो गया क्योंकि लोग ये सोच घबराकर गाड़ियों में पेट्रोल भरवाने लगे कि टैंकर ड्राइवरों की कमी से तेल की सप्लाई भी कम हो जाएगी.
उधर, यूरोप में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए स्थानीय कारण ज़िम्मेदार हैं, जिनमें कच्चे तेल का कम स्टॉक, पवनचक्कियों और सौर ऊर्जा से होने वाले उत्पादन का घटना और मेन्टेनेन्स के कामों की वजह से काम का रूकना जैसे कारण शामिल हैं.
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