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कम्युनिस्ट चीन को वापस समाजवाद की राह पर ले जा रहे शी जिनपिंग
- Author, स्टीफ़न मैक्डोनेल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
चीन ने पिछले कई दशकों तक पूंजीवाद के अपने वर्जन को फलने-फूलने की पूरी छूट दे रखी थी और वहां ज़िंदगी की गाड़ी इसी के इर्द-गिर्द चल रही थी.
भले ही चीन तकनीकी तौर पर एक 'साम्यवादी' देश है लेकिन इसके बावजूद सरकार ने अर्थव्यवस्था के उस मॉडल पर भरोसा जताया जिसमें अमीर उद्योगपतियों को इस उम्मीद से प्रोत्साहित किया जाता है ताकि उसका फ़ायदा समाज के मध्य वर्ग और निचले तबकों तक पहुंचे.
चीन को लगा कि रईस लोगों को और दौलतमंद होने की इजाजत देने से समाज के सभी तबकों का फायदा होगा और चेयरमैन माओ की सांस्कृतिक क्रांति के दलदल से जितनी जल्दी संभव हो सके, उन्हें निकाल लिया जाएगा.
कुछ हद तक चीन की ये सोच कामयाब भी रही. देश में एक बड़ा मध्य वर्ग उभरा और समाज के सभी तबकों के लोगों के जीवन स्तर में पहले की तुलना में काफी सुधार देखा गया.
आर्थिक विषमता
सत्तर के दशक की आर्थिक निष्क्रियता के दौर से उबर कर चीन उस मुकाम पर पहुंच गया, जहां वो दुनिया की आर्थिक महाशक्ति अमेरिका को चुनौती दे रहा है. लेकिन इसके लिए उसे क़ीमत भी चुकानी पड़ी. चीन में आर्थिक ग़ैरबराबरी की खाई गहरी होती चली गई.
ये ग़ैरबराबरी उन बच्चों में साफ़ तौर से देखी जा सकती है, जिनके मां-बाप सही समय पर सही जगह पर मौजूद थे. अस्सी के दशक में जो लोग फैक्ट्रियों में काम कर रहे थे, उन्हें इसका बेहिसाब फायदा हुआ.
आज उनके बच्चे चमकदार शहरों में तड़क-भड़क वाली स्पोर्ट्सकार में सवारी करते हैं. और जब इस पीढ़ी को आज के कंस्ट्रक्शन वर्कर देखते हैं तो उन्हें लगता है कि क्या वे कभी अपने लिए एक अदद घर भी ख़रीद पाएंगे.
'कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चीन' की कड़ी नज़र से बचने का चीन में एक तरीक़ा निकाला गया कि आप 'चीनी गुणों को आत्मसात कर' लें, इस कदर कि आप 'पक्के चीनी' लगें.
'चीनी गुणों वाले' साम्यवाद की इस अवधारणा ने सरकार को ऐसा समाज चलाने की छूट दी जो कई अर्थों में समाजवादी नहीं था. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि पार्टी के महासचिव शी जिनपिंग ने ये फ़ैसला कर लिया है कि जो चल रहा था, वो स्वीकार्य नहीं होगा.
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन की सरकार ने कम्युनिस्ट पार्टी में साम्यवाद को फिर से लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. और ये बात कुछ हद तक सही भी है. इसके लिए 'सामूहिक समृद्धि' का नारा दिया गया है.
हालांकि अब तक ये नारा सड़क किनारे लगाए जाने वाले प्रोपेगैंडा पोस्टर्स में जगह नहीं बनाया पाया है लेकिन वो दिन भी ज्यादा दूर नहीं है. चीन का नेतृत्व जो कर रहा है, ये उसकी बुनियाद है.
रोजमर्रा की ज़िंदगी और सरकारी कार्रवाई
समृद्ध लोगों पर टैक्स एजेंसियों की नज़र और उनकी जांच-पड़ताल की बात समझ में आती है. प्राइवेट एजुकेशन कंपनियों पर पाबंदियों को शिक्षा के क्षेत्र में बराबरी लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
देश के टेक्नोलॉजी सेक्टर की बड़ी कंपनियों पर चल रही कार्रवाई को भी इसी योजना के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है. तो क्या राष्ट्रपति शी जिनपिंग सचमुच किसी कम्युनिस्ट प्रोजेक्ट के आइडिया पर यकीन करने लगे हैं और उस पर आगे भी बढ़ रहे हैं.
हालांकि इस पर पूरी तरह से यकीन करना मुश्किल लगता है कि लेकिन कुछ विश्लेषकों की राय में ऐसा ही हो रहा है. अतीत की तुलना के लिहाज से देखें तो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चीन के कई अधिकारी इससे सहमत नहीं दिखते.
समृद्धि और संसाधनों के फिर से बंटवारे के साम्यवादी रास्ते पर आगे बढ़ने के साथ-साथ शी जिनपिंग लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में पार्टी की उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश भी करते हुए दिख रहे हैं.
चीन में बच्चे आलसी हो रहे हैं. वे अपना समय वीडियो गेम खेलने में बर्बाद कर रहे हैं? पार्टी उनके बचाव के लिए आगे आती है और कहती है कि आप तीन घंटे से ज़्यादा वीडियो गेम नहीं खेल सकेंगे.
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चीन
किशोर उम्र के बच्चों के मन में टीवी की वजह से 'डरपोक किस्म के धार्मिक स्वभाव वाले' किरदारों की जो छवि घर कर गई थी? पार्टी उससे भी बचाने के लिए आगे आती है और कहती है कि 'डरपोक किस्म के किरदारों वाले प्रोग्राम' टीवी पर नहीं दिखाए जाएंगे.
जनसंख्या का मुद्दा भी चीन के लिए विस्फोट की शक्ल ले सकता है. पार्टी ने इसका समाधान निकाला है: सबके लिए तीन बच्चे! फुटबॉल, सिनेमा, म्यूजिक, फिलॉसफी, बच्चे, भाषा, विज्ञान... कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चीन के पास हर सवाल का जवाब है.
हालांकि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पिता इन तौर-तरीकों पर यकीन नहीं रखते थे. शी जिनपिंग आज जिस मुकाम पर है, उसे समझने के लिए आप को उनकी पृष्ठभूमि को समझना होगा. शी जिनपिंग के पिता शी झोंग्शुन एक 'वॉर हीरो' थे.
उन्हें उदारवादी माना जाता था लेकिन माओ जेडांग के जमाने में उन्हें पार्टी के पदों से हटा दिया गया था और उनका उत्पीड़न किया गया था, यहां तक कि उन्हें जेल भी भेजा गया. उस वक्त शी जिनपिंग की मां को अपने पति से संबंध तोड़ने के लिए मजबूर किया गया.
साल 1978 में आधिकारिक तौर पर वापस मुख्यधारा में आने के बाद शी झोंग्शुन ने गुआंगडोंग प्रांत में आर्थिक उदारीकरण की मांग का समर्थन किया. कहा जाता है कि उन्होंने चीन के सबसे प्रगतिशील नेताओं में से एक हु याओबांग का भी समर्थन किया था.
शी जिनपिंग के पिता
शी झोंग्शुन के साथ पार्टी के कट्टरपंथियों ने ये देखते हुए कि उनका झुकाव सुधारों की तरफ़ है, जिस तरह का बर्ताव किया था, ये सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर शी जिनपिंग पार्टी को उस रास्ते पर क्यों ले जा रहे हैं, जो उनके पिता के विचारों से मेल नहीं खाता है?
इसके कई संभावित जवाब हो सकते हैं. शायद इसकी वजह ये भी हो सकती है कि शी जिनपिंग अपने पिता के राजनीतिक विचारों से सहमत न हों. या वे ऐसी योजना पर आगे बढ़ने का इरादा रखते हों, जो भले ही उनके पिता की प्राथमिकताओं से अलग हो लेकिन ये रास्ता चीन को माओ के दौर की नीतियों की तरफ़ भी न ले जाता हो.
कम से कम सोचसमझ तो ऐसा नहीं किया जा रहा है. जब शी जिनपिंग के पिता को जेल भेजा गया था, तो वे 15 साल के थे, वे खेतों में काम करते थे, गुफ़ा जैसे घरों में रहते थे. उस उथल-पुथल भरे समय ने साफ़ तौर से उन्हें सख्त किस्म का व्यक्ति बना दिया.
चीन पर नज़र रखने वाले कुछ विश्लेषकों का कहना है कि शी जिनपिंग इस बात पर यकीन रखते हैं कि केवल मजबूत नेता ही इस बात की गारंटी दे सकता है कि चीन 60 और 70 के दशक की अराजकता की तरफ़ न बढ़े.
और चीन में वो नियम आज भी लागू हैं कि जब तक वे चाहें सत्ता में बने रह सकते हैं. हम इन बातों का अंदाजा इसलिए लगा रहे हैं क्योंकि शी जिनपिंग जो कर रहे हैं, वे कभी अपने फ़ैसलों के बारे में कुछ बताते हुए नहीं दिखाई देते हैं.
नई पाबंदियां और दिशानिर्देश
चीन के नेता कभी इंटरव्यू नहीं देते हैं, यहां तक कि पार्टी के नियंत्रण वाले मीडिया आउटलेट्स को भी. शी जिनपिंग ग्रामीण इलाकों का दौरा करते हैं, जिन्हें टेलीविजन पर दिखाया जाता है. भीड़ उनका उत्साह बढ़ाती है.
वे मक्के की खेती और अपने अनुभवों के बारे में बताते हैं और फिर चले जाते हैं. इसलिए चीन में आर्थिक गतिविधियों पर कौन से नए नियम, कौन सी नई पाबंदियां और दिशानिर्देश लागू किए जाएंगे और इस बार ये किस हद तक होगा, इसका पहले से अंदाजा लगाना मुश्किल है.
हाल के समय में चीन में शायद ही ऐसा कोई हफ़्ता बीता हो जब सरकार ने कोई बड़ा बदलाव न लागू किया हो. सच कहें तो इनकी लगातार खोज ख़बर रखना बहुत मुश्किल है. इनमें से कई बदलाव अचानक से लागू किए गए हैं.
ऐसा नहीं है कि चीन में उत्पादन की प्रक्रिया पर सरकार का नियंत्रण कोई स्वाभाविक समस्या है. अर्थशास्त्री इस पर बहस करते रहे हैं कि कौन सी प्रक्रिया ज्यादा प्रभावशाली है. समस्या ये है कि चीन में एक अनिश्चितता का माहौल है.
चीन में कोई निवेश का फ़ैसला किस भरोसे पर लेगा अगर उसे ये मालूम नहीं हो कि कौन सा नियम महीने भर में बदल जाएगा? हालांकि ऐसे लोग भी हैं जो ये मानते हैं कि चीन आगे बढ़ रहा है, और ये सब कुछ उसकी यात्रा का प्राकृतिक पहलू है.
'सामूहिक समृद्धि' का नारा
चीन में आर्थिक गतिविधियों और जन जीवन के जो हिस्से सरकारी नियमन के दायरे में नहीं आए हैं, उनके लिए क़ायद-ए-क़ानून करने की ज़रूरत है. अगर ये बात है तो शॉक ट्रीटमेंट की ये प्रक्रिया एक अस्थाई बात हो सकती है.
उम्मीद की जा रही है कि जैसे-जैसे नियम स्पष्ट होंगे, स्थिति शांत हो जाएगी. लेकिन इन क़ायदे क़ानूनों का पैमाना क्या होगा, ये अभी तो साफ़ नहीं है. एक बात स्पष्ट है कि जो भी बदलाव हो रहे हैं, उन्हें शी जिनपिंग के 'सामूहिक समृद्धि' के नारे के चश्मे से देखा जाना चाहिए.
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चीन इसके अमल में लाने के दौरान अपनी शक्तियां रत्ती भर भी कम नहीं करने वाली हैं. चीन में कोई चाहे तो वो इस सफ़र का हिस्सा बन सकता है और अगर वो रास्ते में आया तो कुचल दिए जाने का खतरा है.
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