You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
चीन की बैसाखी के सहारे क्या तालिबान अफ़ग़ानिस्तान को संभाल लेगा?
- Author, जॉन सिम्पसन
- पदनाम, वैश्विक मामलों के संपादक
ख़ैबर पास वो जगह है जिसने दुनिया के कई बड़े हमलावरों को अपने इलाके से गुज़रते देखा है. अफ़ग़ान बॉर्डर से पेशावर की घाटी को जोड़ने वाला 20 मील लंबा ख़ैबर पास डरावना, खड़ी ढाल वाला और बहुत जोख़िम भरा इलाक़ा है.
तीन हज़ार साल तक अलग दौर में सेनाएं इस संकरी पथरीली घाटी से गुज़रने की कोशिश करती रहीं. इसकी घाटी में फ़ौजियों ने पड़ाव डाले. आप सड़क के किनारे आज भी ब्रितानी दौर के सैनिक प्रतीक चिह्न देख सकते हैं.
इन्हें आज के दौर में भी बड़ी एहतियात के साथ बरकरार रखा गया है. सड़कों पर ऊपर बने क़िलों से निगरानी रखी जाती थी और उसकी हिफ़ाज़त की जाती थी. ऊपर, चट्टानों पर बैठे हथियारबंद पश्तून कबायली यहां से गुज़रने वाले सैनिकों पर अचूक निशाना लगा सकते थे.
उनके हाथों में लंबी बैरल वाली जेज़ैल (एक तरह की बंदूक़) या फिर फ़्लिंटलॉक राइफ़लें हुआ करती थीं.
अब इन घुमावदार रास्तों से ट्रक गुजरते हैं. उन पर अफ़ग़ानिस्तान के कृषि उत्पाद होते हैं. कई बार लोग इन ट्रक वालों से लिफ़्ट ले लेते हैं. इन रास्तों से तस्करी का सामान भी गुज़रता है.
'डर और अफ़रा-तफ़री का माहौल'
ख़ैबर पास का रास्ता तोरख़म पर आकर ख़त्म हो जाता है. ये पाकिस्तान से लगने वाली अफ़ग़ानिस्तान की सबसे व्यस्त सीमा चौकी है. कई साल पहले पाकिस्तानी सरकार ने इस सीमा चौकी का पूरी तरह से कायापलट कर दिया था.
अब यहां इंतज़ार कर रही भीड़ पर पहले से कहीं बेहतर नज़र रखी जा सकती है और उनका अच्छे से इंतज़ाम किया जा सकता है. लेकिन इस सीमा चौकी पर इन दिनों डर और अफ़रा-तफ़री का मौहाल है.
तालिबान से बचने के लिए लोग अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर इस सीमा चौकी के रास्ते पाकिस्तान पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. आप इन्हें पाकिस्तान की तरफ़ से देख सकते हैं.
दिन की झुलसाती गर्मी में सरहद के उस पार बड़ी भीड़ इकट्ठा है. हाथ उठाकर दस्तावेज़ लहराते, इस पार आने की इजाज़त मांगने के लिए मिन्नतें करते लोग दिख जाते हैं.
इनमें से जिन लोग को मेडिकल ग्राउंड पर अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने की इजाज़त है, उन्हें अपने परिवारवालों के साथ पाकिस्तान आने दिया जा रहा है.
तालिबान के सुरक्षा गार्ड से सवाल
इस लंबी क़तार में व्हील चेयर पर बैठे लोग हैं, लोगों के हाथ सूटकेस हैं. भीड़ आहिस्ता-आहिस्ता अलग-अलग चौकियों से होते हुए आगे की ओर खिसक रही है.
सड़क पर जहां से असली बोर्डर शुरू होता है, कुछ पाकिस्तानी सैनिक तैनात हैं. उनकी दूसरी तरफ़ वर्दी पहने तालिबानी गार्ड दिख जाते हैं. तालिबान के सुरक्षा गार्ड को मुझसे बात करने में कोई परेशानी नहीं थी. मैंने उनमें से एक से बात की. वो एक लंबा-चौड़ा शख़्स था.
फैली हुई दाढ़ी पर फ़ेस-मास्क लगाए हुए उस गार्ड से मैंने पूछा कि सीमा चौकी पर अफ़ग़ानिस्तान का हरा और लाल रंग वाला राष्ट्रीय झंडा क्यों नहीं फहरा रहा है. इस झंडे की जगह पर तालिबान ने अब सफ़ेद रंग का अपना झंडा लगा लिया है.
तालिबान के बॉर्डर गार्ड ने बड़े फ़्रख़्र से मुझे जवाब दिया, "हमारा मुल्क अब एक इस्लामिक अमीरात है और ये पूरे देश के लिए सही झंडा है."
पाकिस्तान-तालिबान के रिश्ते
यहां तनाव के मौके कभी-कभार ही आते हैं. ज़्यादातर समय तालिबान और पाकिस्तान के गार्ड बिना किसी परेशानी के एक-दूसरे का सामना करते हैं.
हालांकि अभी दोस्ती जैसी कोई बात नहीं दिखाई देती है.
लेकिन बहुत से अफ़ग़ान तालिबान की कामयाबी के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
उनका ये साफ़ तौर पर मानना रहा है कि चरमपंथियों को पाकिस्तान ने, ख़ासकर उसकी बदनाम ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने तैयार किया है.
साल 2018 में इमरान ख़ान के प्रधानमंत्री बनने के बाद पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते अच्छे नहीं रहे हैं और तालिबान पर उसका असर काफ़ी कम हुआ है.
चीन की ताक़त
कई देशों की सरकारें फ़िलहाल तालिबान से संबंध स्थापित करने के लिए स्पष्ट रूप से सकुचा रही हैं. इस चरमपंथी गुट के सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य देशों से संबंध रहे हैं, हालांकि वे उतने क़रीबी नहीं कहे जा सकते हैं.
जिस एक देश के साथ तालिबान का रिश्ता सबसे नज़दीकी वाला कहा जा सकता है, वो चीन है जिसने तालिबान को लेकर जरा सा भी संकोच नहीं दिखाया.
जिस तरह से आम अफ़ग़ान लोग देश छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, ये तय है कि अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था धाराशायी होने जा रही है. साल 1996 से 2001 के बीच तालिबान जब सत्ता में थे, तब भी ऐसा ही हुआ था.
ऐसे हालात में अफ़ग़ानिस्तान की गाड़ी को पटरी पर रखने के लिए उसे चीन की आर्थिक मदद की ज़रूरत पड़ेगी.
इसका मतलब ये होगा कि तालिबान की नीतियों पर चीन का ख़ासा असर होने जा रहा है.
भारत की परेशानी
ये बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि चीन अपनी मुस्लिम आबादी और वीगर लोगों के साथ किस तरह का बर्ताव करता है, तालिबान उसे इन मुद्दों पर चुनौती नहीं देगा.
पिछले बीस साल तक अफ़ग़ानिस्तान की मदद करने वाले अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस और दूसरे देशों के लिए तालिबान का सत्ता में आना दुर्भाग्यपूर्ण साबित हुआ है.
इस बदलाव ने भारत की अफ़ग़ान नीति को भी ऐसे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां से आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता है.
भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में काफ़ी निवेश कर रखा है. हामिद करज़ई और अशरफ़ गनी की सरकार पर भारत का अच्छा प्रभाव रहा था. दोनों ही नेताओं ने पाकिस्तान को साधने के लिए भारत का सहारा लिया था.
लेकिन अब ये सब कुछ ख़त्म हो गया है.
अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था
पिछली बार तालिबान जब सत्ता में थे तो अंतरराष्ट्रीय ताक़तों का रवैया उसे लेकर अछूत की तरह था.
अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था इस हालत में पहुंच गई थी कि उसके पास तेल ख़रीदने के लिए भी पैसे नहीं थे.
सड़कों पर जो मुट्ठी भर गाड़ियां रह गई थीं, वो भी खड़ी हो गई थीं.
ज़्यादातर लोग जेनरेटर का ख़र्च उठा नहीं सकते थे और बिजली की समस्या पूरे देश में थी.
सड़कों पर अंधेरा, रात में ख़ामोशी का मंज़र था. दिन में भी लोग घर की चहारदीवारी के भीतर रहना पसंद करने लगे थे क्योंकि बाहर तालिबान के डरावने लड़ाकों का आतंक था.
क्या इस बार भी ऐसा होगा?
इस बार जो बात अलग है वो है चीन. अगर चीन ये फ़ैसला करता है कि उसे अफ़ग़ानिस्तान में आर्थिक और राजनीतिक बढ़त हासिल करनी है तो तालिबान का निज़ाम अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा.
अगर चीन ये फ़ैसला नहीं करता है तो तालिबान की सरकार में अफ़ग़ान लोग अपने हाल पर रहेंगे.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)