प्रशांत किशोर की पॉलिटिक्स कांग्रेस को हिट करेगी या फ्लॉप?

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कांग्रेस में प्रशांत किशोर की एंट्री पर सस्पेंस फिलहाल बरकरार है.
लेकिन इस बहाने प्रशांत किशोर और कांग्रेस दोनों पर चर्चा खूब हो रही है.
कांग्रेस की चर्चा इस बात के लिए हो रही है कि पार्टी में क्या कमियां हैं और उसे दूर करने के लिए प्रशांत किशोर ने अपनी प्रेजेंटेशन में क्या-क्या कदम सुझाए हैं, उस पर बात हो रही है.
प्रशांत किशोर की चर्चा इस बात के लिए हो रही है कि किन-किन नेताओं के साथ काम किया, किन-किन को जीत दिलाई.
कुछ दबी ज़ुबान से प्रशांत किशोर के उन प्रोजेक्ट की चर्चा भी कर रहे हैं, जिनमें उन्होंने काम तो किया, लेकिन सफलता वैसी नहीं मिली.

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प्रशांत किशोर का अब तक का करियर
चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत किशोर के करियर के हाईलाइट्स की बात करें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत, नीतीश कुमार-लालू गठबंधन की बिहार में जीत और 2021 में ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में जीत अहम है.
इसके अलावा उन्होंने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी और तमिलनाडु में डीएमके नेता एमके स्टालिन को अपनी प्रोफ़ेशनल सेवाएँ दी हैं. इन नेताओं के साथ भी उनकी सफलता की कहानियां चर्चा में रहती हैं.
लेकिन 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में राहुल और अखिलेश को साथ ला कर उन्होंने 'यूपी के लड़के' के साथ एक प्रयोग किया पर वो असफ़ल रहे.
ममता बनर्जी की पार्टी को इस साल गोवा चुनाव लड़ाने की सलाह भी उनकी ही बताई जाती है, लेकिन वो यहाँ भी टीएमसी की नैया पार नहीं लगा पाए.
ऐसे में कांग्रेस के भीतर और बाहर कई लोग सवाल पूछ रहे हैं - क्या कांग्रेस प्रशांत किशोर के साथ अपना पुराना अनुभव भूल गई है? क्या कांग्रेस इतनी बेचैन है कि प्रशांत किशोर की विफलताओं पर नज़र नहीं जा रही?
कांग्रेस के साथ प्रशांत किशोर की पॉलिटिक्स हिट रहेगी या फ्लॉप - पढ़िए दो वरिष्ठ पत्रकार शिवम विज और स्वाति चतुर्वेदी का विश्लेषण.

वरिष्ठ पत्रकार शिवम विज का विश्लेषण
"प्रशांत किशोर और कांग्रेस दोनों के चुनाव में सफलता का स्ट्राइक रेट देखें, तो प्रशांत किशोर का कांग्रेस से काफी बेहतर प्रदर्शन है.
पांच राज्यों में हार के बाद, कांग्रेस नेता सोनिया गांधी रोज़ बैठकों पर बैठकें कर रही है. प्रशांत किशोर की विफलताएं कांग्रेस को भी दिख रही होंगी. लेकिन बेचैनी कांग्रेस में ज़्यादा है. शायद कांग्रेस को प्रशांत किशोर की ज़्यादा ज़रूरत है.
फ़र्ज कीजिए कि आपने एक डॉक्टर के बारे में दोनों तरह की बातें सुनी हो - कि वो बहुत अच्छा डॉक्टर है या वो बुरा डॉक्टर है. ये जानने के बाद भी अगर आप अपना इलाज कराने उसी डॉक्टर के पास जाने का फ़ैसला करते हैं तो इसका मतलब आप बीमारी से ज़्यादा परेशान हैं. इसलिए उस डॉक्टर को एक मौका देना चाहते हैं.
यहां एक बात और ध्यान देने वाली है - प्रशांत किशोर की बात कांग्रेस से चल रही है, बीजेपी से नहीं. बीजेपी कह सकती है कि यूपी में हराया था. गोवा में हराया है.
पर बात कांग्रेस से चल रही है, जो 2019 के बाद से एक भी चुनाव नहीं जीती है.
अब बात 2017 के यूपी चुनाव के बारे में करते हैं. अगर डॉक्टर के पास जाते हैं, वो आपको दवाएं देता है, और उसे आप नहीं लेते तो डॉक्टर खराब है, ये दलील सही नहीं बैठती. प्रशांत किशोर ने ख़ुद कहा है कांग्रेस को जो कुछ उन्होंने कहा उसमें केवल एक किसान यात्रा का सुझाव उन्होंने माना.
इसी वजह से अभी भी दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही है, ताकि ये पहले ही साफ़ हो जाए कि डॉक्टर की दवाई इस बार ले पाएंगे या नहीं ले पाएंगे?
600 स्लाइड की प्रेजेंटेशन इस बार इसलिए दी गई है.
रही बात हार की, तो ऐसी तो कोई पार्टी नहीं है जो हर चुनाव जीतती हो. दिल्ली में ही बीजेपी आम आदमी पार्टी से दो बार हारी है. इस वजह से ये भी देखना होगा कि प्रशांत किशोर ने जहाँ सफलता हासिल की है वो कौन सी है.
पश्चिम बंगाल चुनाव में प्रशांत किशोर ने पहले ही कहा था कि बीजेपी 100 सीटों के अंदर रहेगी और वही हुआ भी. प्रशांत किशोर के आज के हाईप की असली वजह तो बंगाल चुनाव है. एकाध बड़े चुनाव प्रशांत किशोर की रणनीति में कोई हार जाए तो हाइप ख़त्म हो जाएगी."

वरिष्ठ पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी का विश्लेषण
"प्रशांत किशोर ने ख़ुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है. उनकी अपनी कोई विचारधारा नहीं है. वो कभी नरेंद्र मोदी के साथ रहते हैं तो कभी राहुल गांधी के साथ. इसका मतलब प्रशांत किशोर में ख़ुद एक 'कंट्राडिक्शन' है. वो 'अवसरवाद' की राजनीति कर रहे हैं.
अगर प्रशांत किशोर को लगता है कि वो किसी भी दाल में छोंक बन जाएंगे, तो उन्हें ये समझना होगा कि कभी कभी दाल ख़राब भी हो सकती है.
कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है. अगर कांग्रेस में इतना दिवालियापन आ गया है कि उन्हें एक चुनावी रणनीतिकार की ज़रूरत पड़ रही है, तो ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कांग्रेस के लिए.
प्रशांत किशोर ने गोवा में ममता बनर्जी को एक झुनझुना पकड़ाया कि वहाँ चुनाव लड़ने के बाद उनकी राष्ट्रीय स्वीकार्यता बढ़ेगी. गोवा का वोटर प्रोफाइल टीएमसी को सूट करता है.
लेकिन टीएमसी का गोवा में जो हाल हुआ, इस एक कदम से ममता बनर्जी की राष्ट्रीय स्तर की नेता बनने के सपने को झटका ज़रूर लगा. ये सब एक मार्केटिंग स्ट्रैटेजी थी.
नरेंद्र मोदी को 2014 में प्रशांत किशोर की ज़रूरत नहीं थी. ममता बनर्जी को 2021 में प्रशांत किशोर की ज़रूरत नहीं थी. तभी उन्होंने एक कंसलटेंट की भूमिका में रखा, पार्टी में नहीं ले लिया. पार्टी की 'ओनरशिप ट्रांसफर' नहीं की.
लेकिन गोवा की हार से उन्होंने एक तरह से बाद में पल्ला ही झाड़ लिया. ममता बनर्जी और उनके पार्टी काडर को इससे बहुत झटका लगा.
उसी तरह से 2017 का 'यूपी के लड़के' कैंपेन, अपने आप में कांग्रेस के लिए बुरा अनुभव था. ये बातें भले ही कांग्रेस आज भूल रही है लेकिन पार्टी को ये तो याद रखना चाहिए प्रशांत किशोर कोई 'जादू की छड़ी' नहीं हैं जिसे आप अपना सीईओ बना लें, तो सब ठीक हो जाएगा. गांधी उन्हें मालिक की तरह अपनी पार्टी 'आउटसोर्स' कर सकते हैं, लेकिन राजनीति आउटसोर्स करके नहीं चलती. नेता 'आउटसोर्स' नहीं हो सकते.
कांग्रेस के कई नेता दबी ज़बान से कह रहे हैं, आप एक चुनावी रणनीतिकार या मार्केटिंग स्ट्रेजिस्ट रखना चाहते तो आप रखें - लेकिन पूरी दुकान किसी और को चलाने दे देंगे - तो कहीं आगे चल कर दुकान ही ना बंद हो जाए.
2014 में केवल प्रशांत किशोर ने ही मोदी पर दांव नहीं लगाया, कई और पूंजीपतियों ने दांव लगाया, उस समय देश में जो माहौल था उसमें मोदी की जीत सुनिश्चित थी.
उसी तरह से 2021 में पश्चिम बंगाल की सड़कों पर जो माहौल था वो ममता के पक्ष में ही था. लेकिन जब जीत जाए तो छोंक ऊपर आ ही जाता है. उस समय नेता भी कहते हैं, घी गिरा खिचड़ी में."
(बीबीसी संवाददाता सरोज सिंह के साथ बातचीत पर आधारित)
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