क्या मोदी के कारण महिलाएं बीजेपी को वोट देती हैं?

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    • Author, गीता पांडे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक कहावत है- हर कामयाब आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है.

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी को हालिया विधानसभा चुनाव में मिली कामयाबी के पीछे लाखों महिलाओं का हाथ है.

हाल के दो अध्ययनों के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने बीजेपी को ज़्यादा वोट दिया है. फ़रवरी-मार्च में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को पांच में से चार राज्यों में जीत मिली जिसमें उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा राज्य भी शामिल है.

1962 के बाद से चुनाव आयोग ने आम चुनावों में जेंडर के आधार पर मतदान के आंकड़े देने शुरू किए तब से लोकसभा चुनावों में महिलाएं कांग्रेस के साथ रहीं.

लेकिन साल 2019 में पहली बार बीजेपी सबसे ज़्यादा महिलाओं का वोट पाने वाली पार्टी बन गई.

लेकिन इसके पार्टी की महिलाओं के प्रति कोई विशेष नीति ज़िम्मेदार नहीं लगती. पार्टी के नेताओं ने कई बार महिला-विरोधी बयान दिए हैं, बीजेपी शासित प्रदेश महिलाओं के रेप के मामलों को उचित तरीके से डील न करने के कारण सुर्खियों में बने रहते हैं.

सरकार के खिलाफ़ हुए सबसे बड़े प्रदर्शनों में से एक एंटी-सीएए प्रदर्शनों का मोर्चा भी महिलाओं ने ही थामे रखा. लेकिन इन सबके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि अब ज्यादा महिलाएं बीजेपी को वोट दे रही हैं.

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साल 2014 से कैसे बदली तस्वीर?

तो आख़िर कैसे बीजेपी भारत की महिलाओं के लिए पहली पसंद बन गई?

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटी यानी सीएसडीएस के संजय कुमार इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं, '' मोदी इसकी वजह हैं.''

"यह अचानक नहीं हुआ है कि पार्टी महिलाओं के लिए आकर्षक हो गई है. इसके पीछे मोदी निश्चित रूप से एक फैक्टर हैं "

राजनीतिक वैज्ञानिक और लेखक नलिन मेहता ने अपनी हालिया किताब 'द न्यू बीजेपी' के लिए इस विषय पर व्यापक शोध किया. वह कहते हैं कि पार्टी ने 1980 में महिलाओं को साधने की शुरुआत की इसी वक्त उन्होंने महिला विंग का गठन किया था.

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नलिन मेहता कहते हैं, ''तब बीजेपी के पास कुछ महत्वपूर्ण और शक्तिशाली महिला नेता थीं और पार्टी ने महिला के लिए ज़रूरी मुद्दों पर महत्वपूर्ण वादे किए, लेकिन कई महिलाओं ने दशकों बाद भी बीजेपी को वोट नहीं दिया. पार्टी को बड़े पैमाने पर पितृसत्तात्मक पुरुषों के प्रभुत्व के रूप में देखा जाता रहा और महिलाओं के लिए ऐसे में बीजेपी को लेकर बहुत उत्साह नहीं रहा.''

नलिन कहते हैं कि साल 2019 में बड़ा बदलाव आया. इसे साल 2007 में मोदी के गुजरात में दोबारा चुन कर सत्ता में आने के समय से ही ट्रेस किया जा सकता है.

मेहता कहते हैं, कि यह पहली बार था, जब मोदी ने "महिलाओं को व्यापक रूप से आकर्षित किया.

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56 इंच का सीना और 'उग्र राष्ट्रवाद'

चुनावी रैलियों में, वह अक्सर अपने 56 इंच के सीने के बारे में बात करते थे जो ताकतवर लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक सामान्य 'मर्दाने घमंड' वाला शब्द है. लेकिन "उग्र राष्ट्रवाद" की अपनी राजनीति के लिए जाने जाने वाले मोदी के लिए ये शब्द पर्याय बन गया.

मेहता कहते हैं, "हर बार जब वह इसका जिक्र करते, तो दर्शकों की ओर से एक गहरी सांस भरने की आवाज़ सुनने को मिलती, खास कर उस वर्ग से जहां महिला मतदाता बैठी रहतीं. अक्सर मोदी की रैलियों में पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाएं दिखतीं, वह उनसे यह कहते हुए अपील करते थे, 'मैं हूं तुम्हारा भाई, मैं तुम्हारा बेटा हूं, मुझे वोट दो और मैं तुम्हारे हितों की रक्षा करूंगा.''

''लेकिन मर्दानगी की भी अपनी अलग सीमाएं हैं. इसलिए उन्होंने खुद की एक अल्फ़ा मेल की छवि तैयार की यानी वह शख़्स जो 'सब कुछ ठीक कर' सकता है. खास कर महिलाओं और उनसे जुड़ी नीतियों को लेकर इस तरह का अप्रोच रखा गया, जिसने गुजरात में साल 2007 और 2012 में मोदी को चुनाव जीतने में काफ़ी अहम भूमिका निभाई.''

साल 2014 तक मोदी अपनी इस स्किल को और पैना कर चुके थे.

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प्रधानमंत्री बनने के बाद अगस्त में उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में, कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ अपील की, रेप की निंदा की और माता-पिता को बेटों की परवरिश बेहतर करने की सलाह दी.

मेहता कहते हैं कि प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी ने 'बदलाव के उत्प्रेरक' की पहचान बनाई, जो जनसभाओं और रैलियों में महिलाओं के मुद्दों पर बात करता है. साल 2014 और 2019 में उनके भाषणों के कुल पांच बड़े मुद्दों में से महिलाओं के मुद्दे पर उन्होंने सबसे ज़्यादा बोला.

महिलाओं के लिए बनाई गई नीतियों से बढ़ी पॉपुलैरिटी

लेकिन मोदी के करिश्माई छवि के साथ-साथ बीजेपी में महिलाओं की भागीदारी पार्टी में लागातार बढ़ा रही है.

2019 में बीजेपी किसी भी अन्य पार्टी की तुलना में अधिक महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा और पिछली सरकारों की तुलना में अधिक महिला को मंत्री बनाया गया.

इस क़दम ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को भी नया रूप दिया. पार्टी ने ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि की अधिक महिलाओं के बीच फिट होने के लिए अपने सामाजिक आधार का विस्तार किया.

मेहता कहते हैं, "बीजेपी की महिला समर्थकों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों और गरीबी रेखा से नीचे के तबकों से आता हैं, पार्टी की कल्याणकारी योजनाओं ने भी मुख्य रूप से उन्हें 'आकर्षित' किया है."

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भारत जैसे पितृसत्तात्मक देश में महिलाओं के पास संपत्ति के बेहद कम अधिकार हैं. 2014 और 2019 के बीच गरीबों के लिए स्वीकृत 17 लाख से अधिक घरों में से लगभग 68 फ़ीसदी घर या तो केवल पुरुषों के नाम थे या पुरुषों के साथ संयुक्त रूप से महिलाओं के नाम पर रजिस्टर्ड थे.

सरकार ने लाखों घरों में शौचालय भी बनाए और लाखों महिलाओं को बैंक खाते खोलने में मदद की ताकि वे सीधे पेंशन, सब्सिडी और अन्य लाभ प्राप्त कर सकें.

मेहता कहते हैं, "मोदी को अक्सर यह कहते सुना गया है कि हम एक कल्याणकारी नेटवर्क बना रहे हैं जो पालने (बच्चों का झूला) से लेकर कब्र तक महिलाओं की देखभाल करेगा. योजनाएं परफेक्ट तो नहीं हैं, लेकिन वे निश्चित रूप से फर्क पैदा कर रही हैं."

''इसका नतीजा है कि महिला वोटर्स बीजेपी को बाकी पार्टियों की तुलना में बेहतर मान रही हैं.''

व्यक्ति विशेष की राजनीति के लिए चुनौती क्या है?

वरिष्ठ पत्रकार और अशोका विश्वविद्यालय में मीडिया स्टडीज की प्रमुख माया मीरचंदानी कहती हैं, ''किसी पार्टी के लिए इस तरह का लिंग-आधारित समर्थन और व्यक्ति- विशेष से प्रेरित राजनीति ज़्यादा दिन तक नहीं टिकती.''

वे कहती हैं, "मोदी बेहद करिश्माई लीडर हैं और अपने समर्थकों से जबरदस्त सहानुभूति भी उन्हें मिलती है. उनके समर्थक उन्हें एक साधारण व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो एक बेहद साधारण जीवन जीता है. उनके लिए मोदी आकर्षक हैं क्योंकि वह फिट हैं, वे दिखावटी या आडंबर से भरे नहीं हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से बेदाग हैं. लेकिन ध्यान रखने वाली बात है कि वह 71 साल के हैं और उनका ये करिश्मा आने वाले वक्त के साथ बढ़ती उम्र के साथ फ़ीका पड़ जाएंगा."

वह कहती हैं, यह भी देखना बाकी है, क्या उनकी लोगों के बीच ये अपील इस समय भारत के सामने आने वाली कठिनाइयों से निपटने में मदद करेगी.

मीरचंदानी कहती हैं, "ऐसे समय में जब बेरोजगारी बढ़ रही है, मुद्रास्फीति अधिक है, और ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, उनके समर्थकों को बांधे रखने वाली एकमात्र चीज धार्मिक पहचान की राजनीति है. लेकिन अगर सांप्रदायिक हिंसा का मामला हाथ से निकल गया और अर्थव्यवस्था भी सरकार सुधार नहीं पाई तो ये महिलाएं ही होंगी जो मोदी के खिलाफ़ हो जाएंगी.''

"वो वक़्त अभी आया तो नहीं है लेकिन आ सकता है."

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