गुजरात: आवारा जानवरों की रोकथाम के लिए बिल पास, कुछ लोग क्यों बता रहे हैं 'काला क़ानून'

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, जयदीप वसंत
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
गुजरात विधानसभा में छह घंटे की बहस के बाद आवारा पशुओं की समस्या से निपटने के लिए 'गुजरात मवेशी नियंत्रण विधेयक (शहरी इलाक़ों में), 2022' पारित हुआ.
विधेयक के प्रावधानों के अनुसार नगरपालिका और शहरी क्षेत्रों में मवेशियों की टैगिंग अनिवार्य होगी. उन मवेशी पालकों के ख़िलाफ़ भी सख़्त और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी जो अपने पशुओं को आवारा भटकने के लिए छोड़ देते हैं.
कांग्रेस ने इस बिल का विरोध किया. बीजेपी के कुछ विधायकों ने भी बिल के कुछ प्रावधानों को लेकर चिंता ज़ाहिर की.
मालधारी (मवेशी रखने वाले) समुदाय ने तो इसे 'काला क़ानून' बता दिया है. मालधारी समुदाय ने इसके विरोध में मार्च निकाला. समुदाय की ओर से सूरत, राजकोट, अहमदाबाद और दूसरे शहरों में ज्ञापन दिया गया है. उन्होंने चेतावनी दी है कि आगे विधेयक के ख़िलाफ़ विरोध की आवाज़ बुलंद की जाएगी.
बीते जनवरी-फरवरी में गुजरात हाई कोर्ट में आवारा पशुओं को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई. इस याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकार ने आश्वासन दिया था कि इस समस्या पर लगाम लगाने के लिए बजट सत्र में विधेयक पेश किया जाएगा.
एक अनुमान के मुताबिक़, गुजरात में क़रीब 50 लाख मालधारी हैं.
हालांकि मवेशियों को लेकर किसी भी तरह का फ़ैसला ले पाना सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए आसान नहीं है. जानकारों का कहना है कि गुजरात के आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र पार्टी मालधारी समुदाय को नाराज़ नहीं करना चाहेगी.

इमेज स्रोत, Getty Images
विपक्ष की आपत्ति
बजट सत्र के आख़िरी दिन, बीते गुरुवार की शाम को क़रीब छह बजे गुजरात के शहरी विकास मंत्री विनोदभाई मोर्दिया ने विधानसभा के समक्ष विधेयक पेश किया.
सदन में विधेयक पेश करने के दौरान मोर्दिया ने कहा, "कई शहरी इलाक़ों में गाय, बैल, सांड, भैंस और बकरियां घूमती नज़र आती हैं जिसके कारण कई बार ट्रैफ़िक की समस्या हो जाती है और कई बार ये दुर्घटना का कारण भी बन जाते हैं. यह विधेयक इन समस्याओं का निवारण करने के लिए है."
इस बिल के कुछ प्रावधानों के मुताबिक़
- इस विधेयक के क़ानून बनने के 15 दिनों के भीतर मवेशी रख सकने के लिए लाइसेंस होना चाहिए.
- यह लाइसेंस हर हाल में डिस्प्ले होना चाहिए और इतना स्पष्ट होना चाहिए कि सभी को दिखाई दे. साथ ही ड्यूटी ऑफ़िसर उन जगहों के निरीक्षण के लिए अधिकृत होंगे जहां मवेशी रखे जा रहे हैं.
- हर मवेशी के लिए टैगिंग अनिवार्य होगी.
- जिन मवेशियों की टैगिंग नहीं हुई होगी, उन्हें ज़ब्त कर लिया जाएगा और पचास हज़ार रुपये के जुर्माने का भुगतान करने के बाद ही उन्हें छोड़ा जाएगा.
- मवेशियों के मालिकों को इस बात के लिए आश्वस्त करना होगा कि उनके मवेशी सड़कों पर या सार्वजनिक जगहों पर ना घूमें.
- जिन मवेशी मालिकों ने अपने मवेशियों की टैगिंग नहीं करवायी होगी उन्हें सज़ा स्वरूप या तो जेल जाना पड़ सकता है या फिर दस हज़ार रुपये का जुर्मना देना हो सकता है. या फिर दोनों ही.
- मवेशियों को ज़ब्त करने वाले कर्मचारियों की कार्रवाई में बाधा डालने वालों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई का प्रावधान है. या तो उन्हें जेल जाना पड़ सकता है या फिर 50 हज़ार रुपये का दंड.
- अगर कोई आवारा मवेशी पहली बार पकड़ा जाता है, तो मालिक को पहली बार में पांच हज़ार रुपये का भुगतान करना होगा. दूसरी बार के लिए दस हज़ार रुपये और तीसरी बार में 15 हज़ार जुर्माना भरना होगा. इसके साथ ही एक एफ़आईआर भी दर्ज की जाएगी.
- मवेशियों के मर जाने पर उनका सही तरीक़े से निपटारा अनिवार्य होगा ताकि आम लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित ना हो.
इनके अलावा महामारी की स्थिति में पशुओं को स्थानांतरित करने को लेकर भी प्रावधान है. हालांकि दूसरे क़ानूनों के तहत भी ऐसे प्रावधान हैं.
चार साल पहले जब गुजरात में घोड़ों में ग्लैंडर रोग पाया गया था तो कुछ घोड़ों को इंजेक्शन देकर मौत दी गयी थी. इसके पीछे वजह यह दी गयी थी कि यह बीमारी फैले नहीं, साथ ही आम लोग पर इसका बुरा असर नहीं हो.
इस विधेयक के प्रावधान आठ नगर निगमों, अहमदाबाद, राजकोट, वडोदरा, सूरत, गांधीनगर, जूनागढ़, जामनगर, भावनगर के अलावा 156 नगर पालिकाओं में लागू होंगे.
इस विधेयक पर चर्चा करते हुए गुजरात के पूर्व उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने कहा कि जुर्माने की राशि बहुत अधिक तय की गयी है. उन्होंने इसे कम करने पर ज़ोर दिया है. कांग्रेस ने नितिन पटेल की इस टिप्पणी की सराहना की है.

इमेज स्रोत, YAWAR NAZIR
मालधारी समुदाय के लिए समस्या
गुजरात के मालधारी समुदाय के लोगों में इस विधेयक के प्रावधानों के ख़िलाफ़ काफी नाराज़गी है. वे इसे 'काला क़ानून' बताते हुए इसका विरोध कर रहे हैं.
शुक्रवार को अहमदाबाद के बापूनगर में मालधर एकता समिति के नेतृत्व में नारेबाज़ी और धरना प्रदर्शन किया गया. प्रदर्शन कर रहे लोगों ने इस विधेयक को ख़त्म करने के लिए नारे लगाए.
समिति के अध्यक्ष नागजीभाई देसाई के मुताबिक़, "हम भी इस बात से चिंतित हैं कि आवारा पशुओं के कारण ट्रैफ़िक की समस्या हो जाती है और कई बार दुर्घटना भी हो जाती है. ऐसे में मवेशियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में हमें कोई आपत्ति नहीं है लेकिन सरकार को इस तरह के विधेयक पेश करने से पहले इससे जुड़े व्यावहारिक पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए."
वह कहते हैं, "साल 2021 में 38 गांवों को अहमदाबाद शहर में मिला दिया गया. गांव अभी भी वहीं हैं लेकिन शहरों ने उन्हें अपने में समाहित कर लिया है. अलग-अलग समुदायों के बहुत से मवेशी पालक हैं और वे अभी भी गांवों में ही रह रहे हैं. उनके लिए परेशानी होगी. वे रातों-रात कहां जाकर नयी व्यवस्था कर लेंगे?"
देसाई के अनुसार, मालधारी कॉलोनी को लेकर पहले भी कई तरह के प्रयोग किये गए हैं और वे कामयाब भी रहे हैं. मौजूदा सरकार को भी इस तरह की कॉलोनी की व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए.
कांग्रेस विधायक और मालधारी समुदाय के नेता रघु देसाई ने विधानसभा को बताया, "गुजरात में लगभग 70 लाख मालधारी हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत अनपढ़ और ग़रीब हैं. यह बिल पशु संपत्ति रखने के उनके मूल अधिकार का उल्लंघन करेगा."
उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर शांत नहीं बैठेगी और इस बिल के ख़िलाफ़ राज्यव्यापी प्रदर्शन किये जाएंगे.

इमेज स्रोत, Getty Images
सरकार के लिए समस्या
हिंदू धर्म में गाय को पवित्र माना जाता है. जन्म, मृत्यु या किसी भी शुभ अवसर पर लोग गाय को चारा खिलाते हैं. कुछ मालधारी अपने मवेशियों को मंदिरों या खुले स्थानों पर बांधते हैं ताकि वहां से गुज़रने वाले लोग मवेशियों को चारा खिला सकें और उनसे आशीर्वाद ले सकें.
इसके अलावा गाय का दूध घर-घर और अलग-अलग डेरियों में भी बेचा जाता है. कुछ मामलों में मवेशियों को खुला रखा जाता है. इस पर रोक लगाने के लिए इस विधेयक में शहर में निर्धारित जगहों पर ही घास या खर-पतवार बेचने का प्रावधान किया गया है.
हाईकोर्ट में आवारा पशुओं की समस्या पर सुनवाई के दौरान जजों की पीठ ने अपनी टिप्पणी में निजी अनुभव साझा किये थे. उसी दौरान बजट सत्र में इससे संबंधित विधेयक लाने की बात कही गयी थी. उस दौरान बेंच ने कहा था कि ऐसे क़ानून को लागू किये जाने की ज़रूरत है. हालांकि अभी भी क़ानूनी प्रावधान हैं लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा है.
मार्च महीने में गुजरात सरकार के पेश किए गए बजट में वित्त मंत्री कनुभाई देसाई ने गो पालन और सुरक्षा के लिए कुछ घोषणाएं की थीं. 500 करोड़ रुपये के 'मुख्यमंत्री गो माता पोषण योजना' की घोषणा की गयी थी.
इससे पहले, गोशालाओं को भी अर्बन लैंड सीलिंग एक्ट से छूट दी गई थी.
इसके अलावा आवारा मवेशियों के लिए अतिरिक्त 100 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया था. साथ ही जो किसान गो-आधारित कृषि करते हैं उनके लिए 213 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया था.
विधानसभा में बहस के दौरान विधेयक का बचाव करते हुए बीजेपी ने कहा कि इस विधेयक का मक़सद आवारा पशुओं को नियंत्रित करना है. बीजेपी ने दावा किया कि इस क़ानून के बनने से मवेशी-मालिकों को कोई समस्या नहीं होगी.
गुजरात के क़ानून और न्याय मंत्री राजेंद्र त्रिवेदी ने कांग्रेस से अपील की है कि वे इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं करें.
ये भी पढ़ें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)













