कांग्रेस की अहम बैठक पर सबकी नज़र, आगे क्या करेंगे सोनिया और राहुल गांधी

सोनिया गांधी और राहुल गांधी

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    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब के विधानसभा चुनाव में ख़राब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस पार्टी में उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया है. बीते गुरुवार चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद से कांग्रेस नेताओं की ओर से पार्टी नेतृत्व में बदलाव की मांग करने वाले ट्वीट किए जा रहे हैं.

कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेता शशि थरूर ने ट्वीट करके लिखा है कि अगर सफल होना है तो बदलाव से बचा नहीं जा सकता.

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इसके साथ ही जी-23 कहे जाने वाले कांग्रेस नेताओं के बीच नेतृत्व में बदलाव को लेकर विचार-विमर्श जारी है.

पिछले कुछ घंटों से रह-रहकर ख़बरें आ रही हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व में बदलाव हो सकता है. जहां एक ओर कुछ कांग्रेस नेता बदलाव की मांग कर रहे हैं. वहीं, दूसरी ओर कांग्रेस का एक धड़ा कह रहा है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का अस्तित्व संभव नहीं है.

कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने कहा है कि "गांधी परिवार के बिना कांग्रेस पार्टी एकजुट नहीं रह सकती."

इसी बीच समाचार एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से ये जानकारी दी है कि सोनिया गांधी रविवार शाम 4 बजे होने जा रही कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक की अध्यक्षता करने वाली हैं. इसके साथ ही कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से सोनिया, प्रियंका और राहुल गांधी के इस्तीफ़े के कयास लगाए जा रहे थे.

हालांकि कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने इन अटकलों को ख़ारिज़ किया है और कहा है कि ये ख़बर "पूरी तरह से अनुचित, शरारतपूर्ण और ग़लत है."

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शशि थरूर

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क्या है मामला?

कांग्रेस पार्टी को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, और गोवा के विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है.

इनमें से पंजाब, गोवा और उत्तराखंड ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस के लिए बेहतर प्रदर्शन करना मुश्किल नहीं माना जा रहा था. वहीं, उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी के अभियान के बाद पार्टी कार्यकर्ता चुनाव नतीजों को उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे थे.

लेकिन चुनावी नतीजों में कांग्रेस पार्टी को निराशा हाथ लगी. पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत के साथ ही उत्तर प्रदेश में पार्टी के विधायकों की संख्या और कुल वोट शेयर भी कम हो गया. वहीं उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस सिर्फ़ दो ही सीट पर जीत दर्ज़ कर सकी है. बहुत सारे कांग्रेस के प्रत्याशियों की ज़मानत जब्त हो गई है.

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माना जा रहा है कि रविवार को होने वाली रही बैठक में जी-23 के नेता अपनी बात रख सकते हैं. ये वही नेता हैं जिन्होंने केरल, असम और पश्चिम बंगाल के नतीजों के बाद पार्टी में सुधार का सुझाव दिया था. लेकिन उस मोर्चे पर ज़्यादा कुछ नहीं हो सका.

जी-23 के नेता संगठनात्मक बदलाव की मांग कर रहे हैं, इन नेताओं ने शुक्रवार को गुलाम नबी आज़ाद के घर पर मुलाक़ात की है.

गुलाम नबी आज़ाद और आनंद शर्मा जी-23 ग्रुप के ऐसे नेता हैं जो कांग्रेस कार्यसमिति के भी सदस्य हैं. इस ग्रुप ने शुक्रवार की बैठक में पार्टी की हार पर हैरानी जताई.

पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से बताया कि बैठक में कांग्रेस को फिर से पटरी पर लाने के लिए ज़रूरी कदमों पर चर्चा की गई. सूत्रों का कहना है कि बैठक में कांग्रेस नेतृत्व की ओर से पार्टी के सुधार को लेकर ज़रूरी कदम नहीं उठाए जाने पर भी निराशा जताई गई.

सोनिया गांधी और राहुल गांधी

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गांधी परिवार पर कितना दबाव?

पीटीआई से बातचीत में लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा है कि कांग्रेस संगठनात्मक कमज़ोरी की वजह से हारी है लेकिन पार्टी के नेतृत्व में बदलाव की कोई ज़रूरत नहीं है.

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं. उन्होंने कहा, "अगला नेता कौन होगा? अगर नेतृत्व में बदलाव का मतलब राहुल या प्रियंका गांधी को हटाना है तो ये पूछना होगा कि उनकी जगह कौन लेगा. राहुल और प्रियंका दोनों ही पूरे दिल से कोशिश कर रहे हैं, उनकी कोशिश पर कोई शक़ नहीं है."

लेकिन सवाल उठता है कि इन चुनावी नतीजों के बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी पर किस तरह का दबाव है. क्योंकि जहां एक ओर उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रियंका गांधी के नेतृत्व में लड़ा जा रहा था. वहीं, पंजाब में होने वाले नेतृत्व बदलाव में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की अहम भूमिका बताई जाती है.

सवाल ये भी है कि रविवार शाम होने वाली बैठक कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार के भविष्य के लिए कितनी महत्वपूर्ण है.

कांग्रेस पार्टी पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई मानते हैं कि ये बैठक काफ़ी अहम साबित हो सकती है.

वे कहते हैं, "पिछले चुनावों में जिस तरह पार्टी की हार हुई है, उससे काफ़ी सवाल खड़े हुए हैं. सोनिया गांधी युग का अंत 2014 और 2016 में ही हो गया था. लेकिन 2019 में एक बार फिर करारी हार हुई और राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा दे दिया. इस इस्तीफ़े में सबसे महत्वपूर्ण बात ये थी कि उन्होंने कहा था कि अगला अध्यक्ष गांधी परिवार से नहीं होगा."

"लेकिन इसका ठीक उल्टा हुआ और जुलाई 2019 में सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्षा बना दिया गया. फिर बात हुई कि साल भर में स्थितियां ठीक कर ली जाएंगी. लेकिन अंदरखाने कुछ ऐसे खेल चले कि ऐसा हो नहीं पाया. और फिर राहुल गांधी को बिना ज़िम्मेदारी के ताक़त वाला मॉडल पसंद आने लगा."

वे कहते हैं, "अब पानी सर से ऊपर चला गया है. लेकिन समस्या ये है कि इसका समाधान अभी भी नज़र नहीं आ रहा है. क्योंकि सोनिया गांधी सक्रिय राजनीति में नहीं हैं. राहुल गांधी किसी पद पर नहीं हैं, ऐसे में उनका इस्तीफ़ा बेमानी है. और प्रियंका गांधी सिर्फ महामंत्री हैं.

"हालांकि, मुझे ऐसा लगता है कि अगर रविवार की बैठक में सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्षा के पद से इस्तीफ़ा दे देती हैं और पूरी कार्यसमिति भी इस्तीफ़ा देती है तो सितंबर में होने वाले अगले चुनाव के लिए एक समिति बना दी जाएगी. लेकिन फिर इस समिति में कौन होगा... ये तमाम सवाल हैं."

सोनिया गांधी और राहुल गांधी

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कौन लेगा अहम फै़सले

बता दें कि कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव चल रहे हैं और पार्टी को 21 अगस्त से 20 सितंबर के बीच नया अध्यक्ष मिल सकता है.

इसके बाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पूर्ण सत्र में अक्टूबर तक सीडब्ल्यूसी के चुनाव होंगे.

लेकिन सितंबर में होने वाले पार्टी के आंतरिक चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी को राज्यसभा के टिकटों से लेकर तमाम दूसरे राज्यों में चुनावी रणनीति जैसे मसलों पर अहम फ़ैसले लेने हैं. और सवाल ये है कि ये फ़ैसले कैसे लिए जाएंगे.

रशीद किदवई बताते हैं, "इस समय कांग्रेस पार्टी के सामने कई सवाल हैं, जैसे लोकसभा और राज्यसभा का नेता कौन हो. अभी राज्यसभा की अप्रैल में सीटें आएंगी, उसमें कौन फ़ैसला लेगा. या आने वाले दिनों में जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, उनसे जुड़ी चुनावी रणनीति पर फैसला कौन लेगा. पार्टी इस तरह के कई सवालों से जूझ रही है."

"इन फ़ैसलों में राहुल गांधी की क्या भूमिका होगी, क्या राहुल गांधी सितंबर में अध्यक्ष बनने के लिए तैयार हैं? क्या वह लोकसभा में पार्टी के नेता बनने के लिए तैयार हैं... ऐसे तमाम सवाल हैं. और कांग्रेस नेताओं की मांग है कि पार्टी पर गांधी परिवार का नियंत्रण थोड़ा कम हो लेकिन ऐसी मांग करने के लिए मुफ़ीद स्थिति बनती नहीं दिख रही है. क्योंकि अगर गांधी परिवार नाराज़ हो जाता है तो फिर जो मान-मुनव्वल का दौर शुरू होगा, उससे पार्टी की और ज़्यादा फज़ीहत होगाी. ऐसे में इस लिहाज़ से ये बैठक काफ़ी अहम है."

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