रूस-यूक्रेन: नहीं लागू हो पाया सुरक्षित गलियारा बनाने का फ़ैसला, भारतीय छात्रों की मुसीबतें बढ़ी- प्रेस रिव्यू

यूक्रेन संकट

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इमेज कैप्शन, शुक्रवार को भी भारतीय वायुसेना के विमान से सैकड़ों छात्रों को वापस लाया गया

रूस और यूक्रेन संघर्ष के बीच यूक्रेन में फंसे लोगों को बाहर निकालने के लिए सुरक्षित गलियारे पर सहमति बन जाने के बाद भी इसके लागू न होने से शुक्रवार को कई भारतीय छात्रों को पूर्वी यूक्रेन के खारकीएव और सुमी जैसे इलाक़ों से बाहर निकाला नहीं जा सका.

अंग्रेज़ी अख़बार टेलीग्राफ़ इंडिया ने इस ख़बर को प्रमुखता से छापा है. अख़बार के अनुसार संघर्ष वाले इलाक़ों में राशन और पानी की कमी से जूझने वाले भारतीय छात्रों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने के रूस के प्रस्ताव को भी भारत अभी तक स्वीकार नहीं कर सका है.

रूस ने ये एलान किया था कि संघर्ष वाले इलाक़ों में भारतीय सहित फंसे हुए विदेशी छात्रों को निकालने के लिए उसकी 130 बसें सीमा पर खड़ी हैं. इस पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा, "छात्र जहां हैं, वहां से बसें असल में क़रीब 50 से 60 किलोमीटर दूर हैं. यहां तक चलकर जाना उनके लिए काफ़ी मुश्किल है."

बागची ने कहा, "इसके अलावा जब तक स्थानीय स्तर पर संघर्षविराम लागू न हो, तब तक इन छात्रों को निकालने के लिए कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है."

रूसी नेशनल डिफेंस कंट्रोल सेंटर के प्रमुख कर्नल जनरल मिख़ाएल मिज़िन्सतेव ने गुरुवार को कहा था, "कुल 130 बसें ख़ारकीएव और सुमी से नख़ोतेयेव्का और सुध्ज़ा चेकपॉइंट के रास्ते सुबह 6 बजे से भारतीय छात्रों सहित अन्य देशों के छात्रों को निकालने के लिए तैयार खड़ी हैं."

उन्होंने कहा कि इन छात्रों के रहने और आगे की यात्रा की भी तैयारियां की गई हैं. इसमें छात्रों को रूसी विमानों से भारत पहुंचाना भी शामिल है.

बागची ने कहा, "सबसे मुश्किल काम संघर्ष वाले इलाक़ों से छात्रों को निकालना है. एक बार छात्र रूस पहुंच जाएं तो हम उन्हें वापस लाने के लिए अपने विमान भेज देंगे."

ये पूछे जाने पर कि यूक्रेन के राष्ट्रपति के सलाहकार मायखाइलो पोदोल्याक की ओर से गुरुवार को सुरक्षित गलियारे की घोषणा पर कोई प्रगति हुई है या नहीं, बागची ने कहा, "हमने रिपोर्ट देखी हैं लेकिन ज़मीन पर इससे आगे कुछ भी नहीं देखा है. अगर ये काम करता है, तो हमारी मदद होगी."

यूक्रेन और बेलारूस के बीच हुई दूसरे दौर की वार्ता के बाद पोदोलियाक ने ट्वीट किया था, "एक ही समाधान निकला है, मानवीय गलियारों को बनाने का." रूस की ओर से बसों को लेकर भी लगभग इसी समय एलान किया गया.

भारत उन छात्रों को निकालने के लिए कुछ बसों की व्यवस्था कर पाया है, जो बुधवार को रूस की ओर से सुरक्षित स्थान घोषित किए गए पिसोचिन पहुंचे थे. लगभग 40 बसों को लेकर दो बसें गुरुवार को पोलिश सीमा के पास ल्वीव के लिए रवाना हुई थी. इसके अलावा तीन और बसें शुक्रवार को क]रीब इतने ही छात्रों को लेकर मॉलडोवा की सीमा की ओर रवाना की गईं.

बागची ने कहा कि ज़्यादा बसों की व्यवस्था करने की कोशिश की जा रही है लेकिन ये मुश्किल हो रहा है क्योंकि अधिकांश बसों का इस्तेमाल यूक्रेन की सेना कर रही थी. साथ ही ड्राइवरों की कमी और बसों में ईंधन भरना भी एक बड़ी चुनौती है.

फ़रवरी के मध्य में भारत सरकार की ओर से जारी पहली एडवाइज़री के बाद से अब तक 20 हज़ार से ज़्यादा भारतीय यूक्रेन छोड़ चुके हैं. इनमें से करीब 10 हज़ार 344 को भारत वापस लाया जा चुका है. विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अगले 24 घंटों में 16 विमान और भेजे जाएंगे और यूक्रेन से बड़ी संख्या में भारतीयों को शनिवार तक भारत लाया जाएगा.

भारत-चीन सीमा विवाद

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इमेज कैप्शन, बीते साल दोनों देश विवाद वाले कुछ इलाकों से सैनिक पीछे हटाने पर राज़ी हुए थे.

भारत ने चीन को भेजा वार्ता का प्रस्ताव, जवाब का इंतज़ार

सीमा पर विवाद को सुलझाने के लिए भारत ने सोमवार को चीन के सामने अगले दौर की वार्ता का प्रस्ताव रखा है. इस प्रस्ताव पर रविवार तक बीजिंग का जवाब आने की उम्मीद है.

अंग्रेज़ी अख़बार द इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक़ एक अधिकारी ने बताया, "मौजूदा बातचीत हॉट स्प्रिंग इलाक़े को लेकर होगी, जहां 2020 के संघर्ष के बाद से ही सैनिक और बख्तरबंद वाहनों की संख्या बढ़ा दी गई है. अब जब संघर्ष के दो साल होने वाले हैं, दोनों पक्ष मसले को सुलझाकर शांति बनाए रखना चाहते हैं."

इसे लेकर कई दौर की बातचीत के बाद पेंगोंग, गलवान और गोगरा के पास दोनों देशों के बीच सैनिकों को वापस बुलाने पर सहमति बनी थी. हालांकि, मई 2020 में चीन की ओर से भारी संख्या में सैनिक भेजने के बाद कुछ इलाक़ों में 50 हज़ार से ज़्यादा जवान आमने-सामने थे.

भारत-तिब्बत पुलिस के साथ भारतीय सेना हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में चीन के साथ लगने वाली 3 हज़ार 488 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा की रक्षा करती है.

राणा अयूब

हिजाब विरोधी प्रदर्शनकारियों को "आतंकवादी" कहने पर राणा अयूब पर एफ़आईआर

कर्नाटक पुलिस ने पत्रकार और लेखिका राणा अयूब पर बीबीसी को दिए इंटरव्यू के दौरान हिजाब-विरोधी प्रदर्शनकारियों को "आतंकवादी" कहे जाने को लेकर प्राथमिकी दर्ज की है.

अंग्रेज़ी अख़बार टेलीग्राफ़ इंडिया ने ये ख़बर छापी है. अख़बार लिखता है कि हुबली-धारवाड़ पुलिस ने शुक्रवार को "हिंदू आईटी सेल" नाम के एक संगठन के सदस्य अश्वथ की शिकायत पर ये एफ़आईआर दर्ज की है.

धारवाड़ पुलिस कमिश्नर लभु राम के हवाले से अख़बार ने लिखा है, "केस दर्ज कर लिया गया है और अब हम मामले की जांच करेंगे."

अयूब पर भारतीय दंड संहिता की धारा 295ए (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर किया गया कृत्य) के तहत मामला दर्ज किया गया है. अपराध साबित होने पर इसमें दोषी को तीन साल तक की सज़ा हो सकती है.

अयूब ने ये इंटरव्यू फ़रवरी महीने में दिया था. उस समय कर्नाटक के कई कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध की वजह से प्रदर्शन हुए थे. उसी समय कुछ छात्रों ने हिजाब का विरोध भी किया था.

तब्लीगी जमात

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इमेज कैप्शन, दो साल पहले पाबंदी के बावज़ूद इकट्ठा होने पर तब्लीगी जमात के कई सदस्य कोरोना संक्रमित पाए गए थे.

मरकज़ केस: मस्जिद ख़ोलने पर अपने रुख़ से पलटी केंद्र सरकार, अब पाबंदी की मांग

दिल्ली उच्च न्यायालय को ये बताने के बाद कि निज़ामुद्दीन में मरकज़ मस्जिद को दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) द्वारा जारी किए गए कोविड दिशानिर्देशों के अनुसार फिर से खोला जा सकता है, केंद्र ने शुक्रवार को पूरे परिसर को फिर से खोलने का विरोध किया.

अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक, केंद्र ने कहा कि केवल कुछ पुलिस-सत्यापित लोगों को ही यहां नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी जा सकती है.

डीडीएमए ने बीते सप्ताह राजधानी दिल्ली में सारे कोरोना प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया था. केंद्र की ओर से दलील दे रहे अधिवक्ता रजत नायर ने अदालत से कहा, "याचिकाकर्ता (दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड) ने जिस जगह का उल्लेख किया है वो संदिग्ध है और ये विशेष परिसर एक केस से जुड़ी उस संपत्ति का हिस्सा है, जिसे कुर्क किया गया है."

नायर दिल्ली पुलिस द्वारा मरकज़ प्रबंधन के ख़िलाफ़ दो साल पहले कोरोना नियमों की अनदेखी के लिए दर्ज की गई एफ़आईआर का हवाला दे रहे थे. इसकी वजह से बड़ी संख्या में तब्लीगी जमात के सदस्यों के बीच कोरोना फैला था.

दिल्ली उच्च न्यायालय मरकज़ निज़ामुद्दीन में प्रतिबंधों को कम करने के लिए वक़्फ़ बोर्ड की याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जहां उस महामारी के शुरू होने के बाद से ही लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

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