संकट के बावजूद क्यों यूक्रेन जा रहे हैं भारतीय छात्र

सहारनपुर की रहने वाली सबीना यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रही है

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इमेज कैप्शन, सहारनपुर की रहने वाली सबीना, जो यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं
    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जब से रूस-यूक्रेन के बीच तनाव बढ़ा है सबीना राव के परिवार वालों की चिंता बढ़ गई है. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की रहने वाली सबीना यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रही है. सबीना यूक्रेन के खार्किव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में फर्स्ट ईयर की छात्रा हैं. 14 फरवरी 2022 को ही सबीना भारत से यूक्रेन गई थी और इसी दौरान रूस-यूक्रेन के बीच तनाव गहराता जा रहा है, लेकिन सबीना बिल्कुल बेफिक्र हैं.

सबीना ने बीबीसी से बातचीत में जो कुछ कहा वो खबरों से बिल्कुल अलग है. ''यहां का माहौल बहुत सुरक्षित है. मैं कल ही मॉल गई थी. यहां कोई तनाव नहीं दिख रहा है''

दूसरी तरफ तनाव को देखते हुए भारतीय दूतावास ने दूसरी बार 20 फरवरी को एडवाइजरी जारी की. इसमें यूक्रेन में पढ़ रहे छात्रों और भारतीयों से एम्बेसी से सम्पर्क साधाने की बात कही गई है. ज़रूरी ना होने पर भारत लौटने की सलाह भी दी गई है.

बिहार के औरंगाबाद से यूक्रेन गए सौरभ की आपबीती भी सबीना की तरह है. बीबीसी से बातचीत में सौरभ कहते हैं, ''तनाव का कहीं कोई माहौल दिखाई नहीं दे रहा है. ऐसा लग रहा है कि सिर्फ भारतीय न्यूज़ चैनलों पर जंग की तैयारी चल रही है''

बिहार के औरंगाबाद से यूक्रेन गए सौरभ

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इमेज कैप्शन, बिहार के औरंगाबाद से मेडिकल की पढ़ाई के लिए यूक्रेन गए सौरभ

रूस से तनाव के बीच यूक्रेन जा रहे हैं भारतीय छात्र

जंग की आशंका के बीच भी भारतीय छात्र मेडिकल की पढ़ाई के लिए यूक्रेन जा रहे हैं.

यूक्रेन में करीब दस हजार मेडिकल सीटों के लिए साल में दो बार एडमिशन मिलता है. एक सितंबर महीने में और दूसरा जनवरी महीने में.

एफिनिटी एजुकेशन भारतीय बच्चों को यूक्रेन की मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला दिलवाने का काम करता है. एफिनिटी एजुकेशन के डायरेक्टर विशु त्रिपाठी बताते हैं, "14 फरवरी को भी करीब चालीस बच्चे हमने यूक्रेन भेजे हैं. 27 फरवरी तक हमारे पास बुकिंग भरी हुई है. सितंबर इनटेक की आखिरी तारीख 28 फरवरी है. यूक्रेन में एडमिशन के लिए बायोमेट्रिक और पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य है. बच्चा जब वहां मौजूद होगा तभी उसका एडमिशन होगा. अपना एक साल बचाने के लिए छात्र अभी भी यूक्रेन जा रहे हैं.

14 फरवरी 2022 को भारत से यूक्रेन गए सबीना और सौरभ का कहना है कि अभी उनकी एडमिशन प्रक्रिया चल रही है. एडमिशन प्रक्रिया खत्म होने के बाद ही वे भारत आने के बारे में सोचेंगे.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 18 से 20 हजार भारतीय छात्र यूक्रेन में रह रहे हैं. यूक्रेन की राजधानी कीव में भारतीय दूतावास ने अपने नागरिकों के लिए अलग से एक इमरजेंसी हेल्पलाइन +380 997300483, +380 997300428 और एक ई-मेल की व्यवस्था की है.

कीव में भारतीय दूतावास ने अपनी वेबसाइट पर बच्चों से उनके बारे में जानकारी भी मांगी है कि वे इस वक्त यूक्रेन में कहां रह रहे हैं ताकि उन्हें जल्द भारत वापिस लाया जा सके.

भारत और यूक्रेन के बीच उड़ानों को बढ़ाने के लिए विदेश मंत्रालय भारतीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय और कई एयरलाइन्स के साथ बातचीत कर रहा है. बच्चों को भारत वापिस लाने के लिए अलग से 7 फ्लाइट्स का इंतजाम किया गया है. इसमें तीन फ्लाइट्स एयर इंडिया की हैं जो 22, 24 और 26 फरवरी को कीव से दिल्ली के लिए रवाना होंगी.

इसके अलावा एक फ्लाइट 25 फरवरी , 2 फ्लाइट 27 फरवरी और 1 फ्लाइट 6 मार्च को उड़ेगी.

चार्टर्ड फ्लाइट से भी छात्रों को वापिस भारत लाया जा रहा है. यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई के लिए बच्चों को भेजने वाली कंपनी एफिनिटी एजुकेशन के डायरेक्टर विशु त्रिपाठी ने बीबीसी से बातचीत में बताया, ''23 और 26 फरवरी को दो चार्टर्ड फ्लाइट की मदद से 500 बच्चों को हम वापिस भारत ला रहे हैं.''

यूक्रेन क्यों जाते हैं भारतीय छात्र?

भारत में मेडिकल की तैयारी कर रहे छात्रों के बीच रूस और यूक्रेन की खूब चर्चा होती है. वजह ये है कि दोनों देशों के कई मेडिकल यूनिवर्सिटी के दरवाजे भारतीय छात्रों के लिए खुले हैं. ये मेडिकल यूनिवर्सिटी हर साल हजारों भारतीय छात्रों के डॉक्टर बनने का सपना पूरा करती हैं. ऐसा क्यों है ?

ये समझने के लिए भारत में मेडिकल कॉलेज का हाल जानना होगा. दरअसल भारत में मेडिकल की तैयारी कर रहे छात्रों के हिसाब से मेडिकल कॉलेज की उपलब्ता कम है. साल 2021 के दिसंबर महीने में ही केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री डॉ भारती प्रवीण पवार ने लोकसभा में बताया था. उनके मुताबिक देश में सरकारी और निजी कॉलेजों में एमबीबीएस की कुल 88120 और बीडीएस की 27498 सीटें हैं.

भारत में एमबीबीएस की सीटें

इन सीटों के लिए पिछले साल करीब आठ लाख बच्चों ने परीक्षा दी थी. करीब 88 हजार एमबीबीएस की सीटों में करीब पचास प्रतिशत सीटें प्राइवेट कॉलेजों में हैं. इस हिसाब से मेडिकल की तैयारी कर रहे छात्रों को भारत के मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलना मुश्किल होता है. करीब दस प्रतिशत बच्चों को ही दाखिला मिल पाता है.

दूसरी तरफ निजी कॉलेजों में मेडिकल की पढ़ाई का खर्चा भी ज्यादा है. ऐसे में भारत के हजारों छात्र रूस, यूक्रेन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान जैसे देशों की तरफ रुख करते हैं जहां मेडिकल कॉलेज में दाखिला भी आसान है और खर्चा भी कम.

सबीना राव ने बीबीसी से बातचीत में बताया, "2021 में मैंने नीट की परीक्षा दी थी. नंबर कम आने के चलते मुझे दाखिला नहीं मिला. प्राइवेट कॉलेज में पता किया तो पढ़ाई का खर्चा करीब एक करोड़ रुपये था. वहीं यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई के लिए छह साल की कुल ट्यूशन फीस करीब बीस लाख रुपये है. इसके अलावा रहने और खाने का खर्चा साल का करीब दो लाख रुपये है. कुल मिलाकर यूक्रेन में भारत के मुकाबले आधे से भी कम खर्चे में मेडिकल की पढ़ाई पूरी हो जाती है''

यही कहानी यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई पढ़ रहे सौरभ की भी है. बिहार के रहने वाले सौरभ बताते हैं, "मेरे पिता किसान हैं. कई साल तैयारी करने के बाद भी मुझे भारत के सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला. यही वजह है कि मैंने यूक्रेन की खार्किव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया. यहां 20 से 25 लाख रुपये में मैं डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर पाऊंगा''

एफिनिटी एजुकेशन के डायरेक्टर विशु त्रिपाठी बताते हैं, ''हम उन बच्चों को मोटिवेट करते हैं जिनका दाखिला भारत में सरकारी मेडिकल कॉलेज में नहीं होता. जो बच्चे दो लाख रुपये सालाना खर्च कर बीडीएस, बी-फार्मा या बीएससी करने की सोचते हैं हम उन्हें यूक्रेन जैसे देशों से डॉक्टर बनाने का काम करते हैं. यूक्रेन में हम बच्चों को भारतीय भोजन, हॉस्टल जैसी सुविधाएं भी देते हैं. भारत में इतने कम पैसे में डॉक्टर बनना संभव नहीं है''

मेडिकल की पढ़ाई के खर्च के लिहाज से यूक्रेन दुनिया के कई देशों से काफी सस्ता है. यूक्रेन की मेडिकल यूनिवर्सिटी ना सिर्फ भारत बल्कि दूसरे कई देशों के छात्रों को भी अपनी तरफ खींच रही हैं.

भारत और दूसरे देशों में मेडिकल की पढ़ाई का खर्च

यूक्रेन में मेडिकल कॉलेज का हाल

जानकारों का मानना है कि मेडिकल की पढ़ाई के लिए हर साल चार से पांच हजार बच्चे यूक्रेन जाते हैं.

यूरेशिया एजुकेशन लिंक भारतीय बच्चों को कई देशों की यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिलवाने में मदद करता है. यूरेशिया एजुकेशन लिंक के चेयरमैन महबूब अहमद का कहना है कि वे सालाना करीब एक हजार बच्चों को मेडिकल की पढ़ाई के लिए यूक्रेन जैसे देशों में भेजते हैं.

यूक्रेन में करीब 20 मेडिकल यूनिवर्सिटी हैं. महबूब अहमद बताते हैं, ''यूक्रेन में तीन तरह की यूनिवर्सिटी होती हैं. जिसमें नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी, नेशनल यूनिवर्सिटी और स्टेट यूनिवर्सिटी शामिल हैं. नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी को यूक्रेन की केंद्र सरकार कंट्रोल करती है. इस यूनिवर्सिटी में सिर्फ मेडिकल कोर्स ही होते हैं. इस तरह की चार से ज्यादा नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी यूक्रेन में हैं जो मेडिकल कमीशन ऑफ इंडिया से मान्यता प्राप्त हैं.

नेशनल यूनिवर्सिटी, नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी से अलग है. इसमें मेडिकल के अलावा दूसरे कोर्स भी पढ़ाए जाते हैं. इसमें मेडिकल की पढ़ाई के लिए सिर्फ एक ब्रांच होती हैं''

इनके अलावा यूक्रेन में राज्यों की अपनी सरकारी स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी भी है. इन्हें राज्य कंट्रोल करते हैं. यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई के लिए जाने वाले बच्चों की पहली पसंद नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी रहती है.

यूक्रेन में मेडिकल के दाखिले के लिए ये ध्यान रखना जरूरी होता है कि वो यूनिवर्सिटी भारतीय मेडिकल काउंसिल से मान्यता प्राप्त हो.

यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई करने वाली छात्राएं, सबीना बीच में है.

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यूक्रेन जैसे देशों से मिली डिग्री भारत में मान्य ?

विदेश से मेडिकल की पढ़ाई खत्म करने के बाद बच्चों को भारत में फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) देनी होती है. इसे पास करने के बाद ही भारत में डॉक्टरी करने का लाइसेंस मिलता है और प्रैक्टिस की जा सकती है. 300 नंबर की इस परीक्षा को पास करने के लिए 150 नंबर लाने पड़ते हैं.

यूक्रेन की उजारॉड नेशनल यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने वाले डॉ. सुनिल फेनिन बताते हैं, ''साल 2020 में मैंने फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन दिया था. ये परीक्षा आसान नहीं होती. इसके लिए तैयारी की जरूरत पड़ती है. परीक्षा पास करने के बाद मुझे लाइसेंस मिला और अब मैं दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में डॉक्टर हूं''

डॉ. सुनील फेनिन के मुताबिक, ''दिसंबर 2021 में विदेश से मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने वाले करीब 23 हजार बच्चों ने फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन दिया था, सिर्फ 5,665 बच्चे ही इस परीक्षा को पास कर पाए थे''.

किग्रिस्तान से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले कपिल सिंगला ने दो बार परीक्षा दी लेकिन पास नहीं कर पाए. साल में दो बार होने वाली इस परीक्षा को 15 से 25 प्रतिशत बच्चे ही पास कर पाते हैं. रूस- यूक्रेन संकट के बीच यूक्रेन में रह रहे इन भारतीय छात्रों का भविष्य पर अधर में लटक सकता है.

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