ममता बनर्जी ने अपने भतीजे से मतभेद की ख़बरों के बीच लिया यह फ़ैसला

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
'एक व्यक्ति एक पद' के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस की पुरानी और नई पीढ़ी के नेताओं में चल रहे कथित विवाद के बीच पार्टी प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पार्टी में अध्यक्ष के अलावा बाक़ी तमाम सांगठनिक पद ख़त्म कर दिए हैं.
इसकी जगह अब नई बनी 20-सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यसमिति ही पार्टी का कामकाज़ देखेगी. समिति में कौन किस पद पर रहेगा, इसका फ़ैसला ममता बाद में करेंगी. ममता बनर्जी ही इस समिति की प्रमुख हैं.
शनिवार शाम को ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर शीर्ष नेताओं की बैठक में यह फ़ैसला किया गया.
इस फ़ैसले से साफ़ है कि ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी अब पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव नहीं रहे. हालांकि, नई समिति में उनको जगह दी गई है लेकिन अभिषेक के क़रीबी समझे जाने वाले सांसद सौगत रॉय और डेरेक ओ ब्रायन को इसमें शामिल नहीं किया गया है.
बीते कुछ दिनों से पार्टी में चल रही उठपटक और अभिषेक बनर्जी के महासचिव पद से इस्तीफ़े की अटकलों के बीच ममता बनर्जी की इस बैठक को काफ़ी अहम माना जा रहा था.

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समझा जा रहा था कि ममता इस बैठक में शीर्ष नेताओं से आपसी मतभेद भुला कर पार्टी के हित में काम करने का कड़ा संदेश दे सकती हैं. लेकिन इसकी बजाय उन्होंने तमाम पदों को ख़त्म करने के साथ ही कार्यसमिति के गठन का भी एलान कर दिया.
बैठक के बाद तृणमूल नेता पार्थ चटर्जी ने पत्रकारों को बताया, "समिति के सदस्यों में से कौन किस पद पर रहेगा, इसका एलान ममता बाद में करेंगी."
टीएमसी के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "यह बैठक मुख्य रूप से 'एक व्यक्ति एक पद' के मुद्दे पर मुख्यमंत्री और उनके भतीजे के बीच बढ़ते तनाव की वजह से बुलाई गई थी. अभिषेक के क़रीबी युवा नेताओं की ओर से चलाए जा रहे इस अभियान ने पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को सांसत में डाल दिया था. इसकी वजह यह थी कि ऐसे तमाम नेता किसी न किसी सरकारी पद पर हैं."

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ममता की पार्टी पर पकड़
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि इस फ़ैसले से ममता ने एक बार फिर यह दिखाया है कि अब भी पार्टी पर उनकी पूरी पकड़ है. बैठक में मौजूद तमाम नेताओं ने भी संगठन का ज़िम्मा पूरी तरह ममता को सौंप दिया.
उनका कहना था कि पार्टी के मामले में ममता बनर्जी का वचन ही ब्रह्मवाक्य है. बैठक में ममता ने तमाम नेताओं को एकजुट होकर काम करने का भी निर्देश दिया.
हालांकि, किसी भी नेता ने सार्वजनिक रूप से बैठक के बारे में कुछ कहने से इनकार कर दिया है. पार्थ चटर्जी और फिरहाद हकीम ने बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में समिति के सदस्यों के नाम पढ़ कर सुनाए. इस दौरान भी पार्थ ने तमाम पद ख़त्म करने की बात नहीं कही.
उनका कहना था, "पार्टी का कामकाज़ देखने के लिए राष्ट्रीय कार्यसमिति का गठन किया गया है. इसके पदाधिकारियों का एलान ममता बाद में करेंगी."
कार्यसमिति के गठन का मतलब है कि अब न तो पार्थ चटर्जी महासचिव रहेंगे और न ही सुब्रत बख्शी अध्यक्ष. अभिषेक बनर्जी भी अब राष्ट्रीय महासचिव की बजाय कार्यसमिति के सदस्य होंगे. पार्टी में अब सवाल पूछा जा रहा है कि क्या ममता कार्यसमिति में अभिषेक को कोई अहम पद देंगी और क्या अभिषेक कोई पद स्वीकार करेंगे?

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क्यों लेना पड़ा ये फ़ैसला
लेकिन, ममता बनर्जी ने अचानक यह फ़ैसला क्यों किया? पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की दलील है कि 'एक व्यक्ति एक पद' की नीति पर जारी विवाद की वजह से अभिषेक के क़रीबी नेताओं ने राष्ट्रीय महासचिव पद से उनके इस्तीफ़ा देने का संकेत दिया था.
इसी वजह से ममता ने एक झटके में तमाम पद ख़त्म कर दिए. पद ही ख़त्म हो गया तो कोई इस्तीफ़ा कैसे देगा? हालांकि, इस मुद्दे पर कोई नेता सार्वजनिक रूप से कुछ कहने को तैयार नहीं हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना था, "ममता ने किसी से सलाह-मशविरा किए बिना ही ख़ुद यह फ़ैसला किया है."
शनिनार की बैठक में कुल आठ नेता मौजूद थे. इसमें ममता की ओर से हाल में बनाई गई कोर कमिटी के सदस्यों के अलावा सांसद सुदीप बनर्जी को भी बुलाया गया था.
तृणमूल कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अभिषेक बनर्जी की ओर से 'एक व्यक्ति एक पद' की नीति पर ज़ोर देने के कारण ही पार्टी में विवाद शुरू हुआ था.

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पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने के बाद उन्होंने इस नीति को लागू करने का प्रयास किया था. इस दिशा में कुछ पहल भी की गई थी. लेकिन कोलकाता नगर निगम चुनाव से पहले मंत्री और मेयर फिरहाद हकीम के मामले में पहली बार इसकी अनदेखी की गई.
इस नीति के उलट फिरहाद को नगर निगम चुनाव का टिकट दिया गया था. उसके बाद ही पार्टी में असंतोष की सुगबुगाहट होने लगी थी. लेकिन 108 शहरी निकायों के चुनावों के समय पार्टी के उम्मीदवारों की सूची के मुद्दे पर यह विवाद चरम पर पहुँच गया.
इसके लिए पार्टी के उम्मीदवारों की दो-दो सूची सामने आई थी. तब कहा गया था कि पार्टी के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल (फ़ेसबुक और ट्विटर पर) से जो सूची जारी की गई थी उसे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर उर्फ़ पीके की कंपनी आई-पैक ने तैयार किया था जबकि दूसरी सूची पार्थ चटर्जी और सुब्रत बख्शी ने बनाई थी. इस वजह से मतभेद और भ्रम बढ़ा. कई ज़िलो में नेताओं ने विरोध प्रदर्शन भी किया.
आख़िर में ममता बनर्जी को हस्तक्षेप करते हुए सफ़ाई देनी पड़ी कि पार्थ और सुब्रत के हस्ताक्षर से जारी सूची ही अंतिम और आधिकारिक है. उधर, पीके की कंपनी ने हालांकि इस आरोप का खंडन कर दिया लेकिन तब तक इससे जितना नुक़सान होना था वह हो चुका था.

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'एक तीर से दो निशाने'
पार्टी के एक नेता ने बताया कि शनिवार की बैठक में इन मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं हुई. अभिषेक बनर्जी पूरी बैठक के दौरान लगभग चुप्पी साधे बैठे रहे. उन्होंने महज़ यही कहा कि पार्टी का नया मुख्यालय बनाने में देरी हो रही है. इस पर ममता ने मेयर फिरहाद हकीम से इस मामले को देखने को कहा.
अभिषेक फ़िलहाल गोवा विधानसभा चुनाव में तृणमूल के अभियान की ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं. वहाँ सोमवार को मतदान होना है. बैठक में शामिल नेताओं का कहना था कि ममता ने हाल में नेताजी इंडोर स्टेडियम में हुई बैठक में पार्टी का कामकाज़ देखने के लिए चार-पाँच नेताओं की कोर कमिटी बनाई थी. अब कार्यसमिति का गठन उसी का विस्तार है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता ने इस फ़ैसले से एक बार फिर दिखा दिया है कि संगठन पर उनकी पकड़ कितनी मज़बूत है.
राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर समीरन पाल कहते हैं, "ममता ने इस फै़सले के जरिए एक तीर से दो शिकार किए हैं. एक ओर उन्होंने जहाँ पार्टी पर अपना नियंत्रण साबित किया है वहीं पुरानी और नई पीढ़ी के बीच लगातार तेज़ होते टकराव पर भी अंकुश लगाने का प्रयास किया है."
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